प्राचीन छत्तीसगढ़
Chhattisgarh in ancient times
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प्राचीन छत्तीसगढ़ - (हिन्‍दी में)

Chhattisgarh in ancient times - (In English)

सिंधु घाटी सभ्यता और छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में सिंधु घाटी की सभ्य‍ता के समय के जीवन के पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले है, यद्यपि कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि जब सिंधु घाटी की सभ्यता समापन की ओर थी, उस समय सरस्वती नदी में भयंकर बाढ़ आई थी, जिसके कारण वहां के लोग दक्षिण की ओर चले गए थे. उनमें से कुछ शायद छत्तीसगढ़ में आकर बसे होंगे. महानदी के किनारे प्रचीन बंदरगाह के कुछ प्रमाण मिले हैं जिससे लगता है कि उस समय महानदी में नौ परिवहन होता होगा, जो सिंधु घाटी की सभ्यता की याद दिलाता है.

पौराणिक संदर्भ -

पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, बाद में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था. प्रचीन 'दक्षिण कोशल' ही वर्तमान छत्तीसगढ़ है. छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी नदी महानदी उस समय 'चित्रोत्पला' कहलाती थी. इस नदी का उल्लेख मत्स्य पुराण, महाभारत के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण में है.

महाभारत – भीष्मपर्व – 9/34
चित्रोत्पला चित्ररथां मंजुलां वाहिनी तथा।
मन्दाकिनीं वैतरणीं कोषां चापि महानदीम्।।”

मत्स्यपुराण – भारतवर्ष वर्णन प्रकरण – 50/25
मन्दाकिनीदशार्णा च चित्रकूटा तथैव च।
तमसा पिप्पलीश्येनी तथा चित्रोत्पलापि च।।

रामायण काल में छत्तीसगढ़

वाल्मीकि रामायण में छत्तीसगढ़ के वनों का वर्णन है. कहते हैं कि राजा दशरथ के लिए पुत्र्येष्ठि यज्ञ करवाने वाले श्रृंगी ऋषि धमतरी के पास सिहावा में रहते थे, जहां महानदी का उद्गम भी है. वनवास के समय राम यहाँ आये थे.

हरि ठाकुर ने अपनी पुस्तक "छत्तीसगढ़ गाथा" में छत्तीसगढ़ को वेदकाल जितना प्राचीन बताया है. छत्तीसगढ़ पहले "कौसल" के नाम से जाना जाता था. वहाँ के राजा की पुत्री कौसल्या का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से हुआ था. इसलिए राम को छत्तीसगढ़ का भानजा मानते हैं. महारानी कौसल्या का पूरे भारत में एकमात्र मंदिर रायगढ़ बिलासपुर की सीमा पर कोसीर ग्राम में हैं. कौसल राज्य में बहुत से ॠषि थे - श्रृंगी, अत्रि, अगस्त, मतंग, माण्डकर्णी, शरभंग और सुतीक्षण. श्रृंगी ॠषि का विवाह राजा दशरथ की पुत्री शांता से हुआ था जिसे अंग के राजा लोमपाद ने गोद लिया था. हरि ठाकुर ने अपनी पुस्तक छत्तीसगढ़ गाथा में लिखा है कि अत्रिमुनि का आश्रम अतरमढ़ा में रहा होगा. मढ़ा मठ का अपभ्रंश है. इस नाम का एक गाँव धमतरी तहसील में है. छत्तीसगढ़ में वैद्यराज सुदेषण रहते थे जिन्होने संजीवनी बूटी का पता बताया था. अमरकंटक पर्वत से सिहावा पर्वत तक की पर्वत श्रेणियाँ ॠक्ष पर्वत के नाम से जानी जाती हैं. संजीवनी बूटी गंधमादन पर्वत पर मिली थी जो ॠक्ष पर्वत का अंग था. कहते हैं कि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी छत्तीसगढ़ में ही था. वह आश्रम तुरतुरिया गाँव में है. इसी आश्रम में उन्होंने रामायण की रचना की थी. निर्वासन काल में सीता भी तुरतुरिया में इसी आश्रम में रहीं. यहीं कुश और लव का जन्म हुआ.

महाभारत काल में छत्तीसगढ़

महाभारत काल में हैहयवंश के राजा मयूरध्वज रायपुर में शासन करते थे. वे बहुत ही पराक्रमी और दानी थे. उनके पुत्र ताम्रध्वज थे. ताम्रध्वज ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के घोड़े को पकड़ लिया था. इस कारण अर्जुन और ताम्रध्वज के बीच में युध्द हुआ. अर्जुन जब बहुत कोशिश के बाद भी ताम्रध्वज को हरा नही सके, तब अर्जुन ने कृष्ण से कारण पूछा. कृष्ण ने कहा कि मयूरध्वज कृष्ण भक्त और परमदानी हैं इसलिए अपराजेय हैं. अर्जुन मयूरध्वज की भक्ति और दानवीरता को परखने के लिये उनकी राजधानी गए और कृष्ण ने राजा से उसका आधा शरीर मांगा. राजा ने आरा मंगवाया और आँखें मूंद कर बैठ गये. जैसे ही लोग उन्हें आरे से काटने लगे, कृष्ण ने उन्हें रोक दिया और अपने परम भक्त को गले लगा लिया. हरिठाकुर अपनी पुस्तक "छत्तीसगढ़ गाथा" में कहते हैं कि छत्तीसगढ़ का श्रीपुर पहले मणिपुर के नाम से जाना जाता था. वहां के राजा चित्रांगद थे जिनकी पुत्री चित्रांगदा का विवाह अर्जुन से हुआ था. चित्रांगदा के बेटे का नाम बब्रूवाहन था. बब्रूवाहन ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के घोड़े को पकड़ लिया था. अर्जुन और बब्रूवाहन के बीच घोर युध्द हुआ जिसमे अर्जुन पराजित हुए और घायल हो गए. चित्रांगदा ने अर्जुन की सेवा की और उन्हें ठीक कर दिया. इसके बाद बब्रूवाहन को पता चला कि अर्जुन उसके पिता हैं.

बौध्द काल (मौर्यकाल) में छत्तीसगढ़

सन् 639 ई० में चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने सिरपुर की यात्रा की थी. उन्होने सिरपुर का वर्णन अपने यात्रा वृतांत में किया है. उनके अनुसार सिरपुर दक्षिण-कौसल की राजधानी थी. ह्वेनत्सांग ने लिखा है कि गौतम बुध्द सिरपुर में तीन महीने रहे थे. इसके संबंध में कथा है कि सिरपुर के राजा विजयस और श्रावस्ती के राजा प्रसेनजित के बीच युध्द हुआ. जब प्रसेनजित हारने लगे तो उन्होने गौतम बुध्द से अनुरोध किया कि सिरपुर के साथ संधि करा दें. विजयस ने शर्त रखी कि गौतम बुध्द को कुछ समय सिरपुर मे रहना होगा. बौध्‍द धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम भी सिरपुर में ही था. उस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का राज्य था. कहा जाता है कि नागार्जुन का जन्म पहली शताब्दी में सुन्दराभूति नदी के पास स्थित महाबालुका ग्राम में हुआ था. हरि ठाकुर ने पुस्तक "छत्तीसगढ़ गाथा" में लिखा है कि सुन्दराभूति नदी आज की सोन्दुर नदी हैं और महाबालुका ग्राम आज बारुका कहलाता है. नागार्जुन महान लेखक थे. उन्होने तीस ग्रन्थ लिखे. वे आयुर्वेदाचार्य और रासायनज्ञ भी थे. उन्होने "रस-रत्नाकर" नामक ग्रंथ की रचना की है. नागार्जुन बाद में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलगुरु बने. सिरपुर के एक अन्य विव्दान आचार्य बुध्‍द घोष थे, जो बाद में श्रीलंका चले गए थे.

मौर्य काल के बाद का प्राचीन छत्तीसगढ़

मौर्यकाल के बाद साम्राज्य का विभाजन हो गया और अनेक राजवंशों का उदय हुआ -

  1. बिहार (मगध) में शुंग वंश
  2. कलिंग में चेदि वंश
  3. दक्षिण में सातवाहन वंश

सातवाहन वंश

सातवाहन 200 ई० पूर्व से 60 ई० पूर्व के मध्य हुए थे. इस वंश के शतकर्णि (प्रथम) ने जबलपुर तक अपने राज्य का विस्तार किया था. बिलासपुर जिले में सातवाहन काल के कुछ सिक्के पाए गये हैं और सातवाहन काल की कुछ पाषाण प्रतिमाएं भी मिली हैं. बिलासपुर जिले में सक्ती के पास ॠषभतीर्थ के शिलालेख में सातवाहन राजा कुमारवर दत्त का उल्लेख है. महायान मत के प्रवर्तक नागार्जुन की सातवाहनों से मित्रता थी.

वकाटक वंश -

दुर्ग जिले में प्राप्त एक ताम्रपत्र वकाटक वंश का है. इस वंश का राज्य बहुत कम समय तक रहा.

गुप्तवंश -

इलाहाबाद शिलालेख में समुद्रगुप्त के विजय अभियान का वर्णन है. इसकी 14 वीं लाइन में कोटा परिवार के एक राजा को बंदी बनाने का विवरण है और 21 वीं लाइन में आर्यावर्त के अनेक राजाओं को हिंसात्माक रूप से नष्ट करने तथा वनक्षेत्रों के राजाओं को अधीन करने का वर्णन है. इनमें से प्रमुख व्याघ्र राजा था जिसका राज्य महाकान्तार (घना वन) धमतरी में सिहावा के आसपास था. शिलालेख की लाइन 22 में राजाओं व्दारा समुद्रगुप्त के आदेश पालन एवं उसके समक्ष सम्मान प्रदर्शित करने का वर्णन है. इलाहाबाद-प्रहस्ति शिलालेख की लाइन 12 एवं 20 में दक्षिण के अनेक राजाओं को अधिकृत करके बाद में स्वतंत्र कर देने का विवरण हैं. आरंग में मिले गुप्तकाल (छठवीं शताब्दि ईसवी) के एक शिलालेख में राजा भीमसेन के संबंध में कहा गया है कि वह राजर्षियों के परिवार का था. यह कादचित् उसके गुप्त अधिपतियों के संदर्भ में है, जैसा कि उदयगिरी गुफा शिलालेख में चन्द्रगुप्त‍-2 के लिए राजर्षि की उपाधि का प्रयोग किया गया है. छत्तीसगढ़ के बानबरद नामक जगह में गुप्तकाल के सिक्के मिले हैं. डॉ० हीरालाल शुक्ल, डॉ० कृष्णदेव सारस्वत, स्व. गंगाधर सामंत जैसे इतिहासवेत्ताओं का मानना है कि महाकवि कालिदास का जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ था. उनके अनुसार कालिदास ने अपना पहला ग्रंथ "ॠतुसंहार" भी छत्तीसगढ़ में ही लिखा था.

राजर्षितुल्य कुल

छत्तीसगढ़ में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जिसमे राजर्षितुल्य वंश के शासक भीमसेन (व्दितीय) का उल्लेख है. राजर्षितुल्य नाम के राजवंश का शासन दक्षिण-कौसल में पाँचवीं सदी के आस पास था. कुछ लोगों का यह कहना है कि ये राजा महेन्द्र के वंशज थे, पर इसका कोई प्रामाणिक आधार नहीं मिलता. राजर्षितुल्य नामक इस राजवंश की वंशावली महाराज सूर से आरम्भ होती है. इस वंश के महत्वपूर्ण शासक थे दयित वर्मा, भीमसेन (प्रथम), विभीषण. छत्तीसगढ़ में इस वंश का शासन सौ वर्षों से भी अधिक समय तक चला.

शरभपुरीय वंश -

इस वंश की राजधानी शरभपुर में थी जो वर्तमान उड़ीसा का सम्बलपुर है. कुछ लोगों का यह भी मानना है सिरपुर ही शरभपुर कहलाता था. शरभ राजा के बाद उनका पुत्र नरेन्द्र राजा हुआ। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा प्रसन्नमात्र था. इस वंश के अंतिम राजा का नाम प्रवरराज था. कुरुद में मिले ताम्रपत्र राजा नरेन्द्र के काल के हैं. राजा प्रसन्नमात्र के कुछ सोने के सिक्के भी मिले हैं. छठी सदी के अंत में शरभपुरीय राजवंश को पाण्डुवंशियों ने पराजित किया था.

पाण्डुवंश -

छठी सदी में पाण्डुवंशियों ने शरभपुरीय राजवंश को पराजित करने के बाद श्रीपुर को अपनी राजधानी बनाया. पाण्डुवंशी राजा सोमवंशी थे और वे वैष्णव धर्म को मानते थे। पाण्डुवंश के प्रथम राजा का नाम उदयन था. इसी वंश के राजा इन्द्रबल के चार पुत्रों का उल्लेख मांदक में प्राप्त अभिलेख में हैं. इन्द्रबल का एक बेटा नन्न पराक्रमी था. उसने राज्य का विस्तार किया था. बिलासपुर के खरोद के एक शिलालेख मिला है में राजा नन्न के छोटे भाई ईशान-देव का उल्लेख है. राजा नन्न के पुत्र महाशिव तीवरदेव को कौसलाधिपति की उपाधि मिली थी क्योंकि उन्होंने कौसल और उत्कल पर अपना अधिकार कर लिया था. राजिम और बलौदा में ताम्रपत्रों में महाशिव तीवरदेव के पराक्रम का वर्णन है. इसी वंश के राजा हर्षगुप्त की पत्नी का नाम वासटा था. वासटा मगध सम्राट सूर्य वर्मा की पुत्री थी. हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद महारानी वासटा ने पति की स्मृति में श्रीपुर में लक्ष्मण मन्दिर का निर्माण करवाया था. यह मन्दिर उस काल की वास्तु कला का श्रेष्ठ उदाहरण है. हर्षगुप्त के पुत्र महाशिव गुप्त बालार्जुन भी कहलाते थे क्योंकि वे धनुर्विद्या में अर्जुन जैसे थे. वे सन् 595 ई. में राजा बने और उन्होने साठ वर्ष तक राज्य किया. उनके बहुत सारे ताम्रलेख और शिलालेख मिले हैं. बालार्जुन की माता वासटा देवी एवं पिता हर्षगुप्त वैष्णव थे परन्तु बालार्जुन शैव थे. उनकी राजमुद्रा पर नन्दी बना हुआ है. उनके सरंक्षण में शैव, वैष्णव, जैन व बौध्द धर्मो का समान रुप से विकास हुआ. इसी समय प्रसिध्द चीनी यात्री ह्वेनत्सांग भी यहाँ आये थे. सिरपुर में बौध्द विहार, प्रतिमाएँ और शिलालेख मिले हैं. सम्राट बालार्जुन ने कई कवियों, विव्दानों, कलाकारों को राजाश्रय दिया. सम्राट बालार्जुन के शासनकाल को छत्तीसगढ़ का "स्वर्णयुग" कहा जा सकता है. बालार्जुन के उत्तराधिकारी महाभव गुप्त विनीतपुर में बस गए. उसके पुत्र शिवगुप्त थे, और शिवगुप्त के पुत्र जनमेजय थे. जनमेजय ने त्रिकलिंगाधिपति की पदवी धारण की थी. जनमेजय के पुत्र का नाम महाशिव गुप्त ययाति था. उसने विनीतपुर का नाम ययाति नगर रखा था.

नलवंश -

नल नामक राजा से नल वंश का आरम्भ हुआ. इस वंश का समय 700 ई. है. नलवंश का मुख्य केन्द्र बस्तर था. इस वंश के राजा भवदन्त वर्मा बहुत ही पराक्रमी थे. उन्होंने बस्तर और कौसल क्षेत्र में राज्य करते वक्त अपने साम्राज्य को बढ़ाया. स्कन्द वर्मा इस वंश के और एक शक्तिशाली राजा हुए.

क्षेत्रिय राजवंश -

छत्तीसगढ़ में क्षेत्रिय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर था. इनमें प्रमुख थे:

  1. बस्तर के नल और नाग वंश
  2. कांकेर के सोमवंशी
  3. और कवर्धा के फणि-नाग वंशी

नलवंश

बस्तर के अड़ेगा से मिली स्वर्ण-मुद्राओं से पता चलता है कि नलवंशी राजा वराह राज का शासन ई 440 के आस पास बस्तर के कोटापुर क्षेत्र में था. उसके बाद नल राजाओं जैसे भवदन्त वर्मा, अर्थपति, भट्टारक का सम्बन्ध बस्तर के कोटापुर से रहा. कुछ विव्दानों का कहना है कि व्याध्रराज भी नल-वंशी राजा थे, जिनके राज्य का नाम महाकान्तर था और जिन्हें समुद्रगुप्त ने हराया था. नलवंश में एक और पृथ्वी राज चिकित्सा शास्र का ज्ञान भी रखते थे. उनके बाद विरुपराज राजा बने जिनकी तुलना सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के साथ ही जाती है. उनके पुत्र विलासतुंग पाण्डुवंशीय राजा बालार्जुन के समसामयिक थे. बालार्जुन की माँ ने सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर निर्माण करवाया था. उसी का अनुकरण करके विलासतुंग ने राजिम में राजीव लोचन मंदिर का निर्माण करवाया. दसवीं सदी की शुरुआत में कल्चुरियों ने नल वंशियों को पराजित करके अपना राज्य स्थापित किया.

छिंदक नागवंश (बस्तर)

बस्तर के प्राचीन नाम के सम्बन्ध में अलग-अलग मत हैं. कुछ लोग उसे "चक्रकूट" तो कुछ "भ्रमरकूट" कहते हैं. नागवंशी राजा इसी "चक्रकूट" या "भ्रमरकूट" में राज्य करते थे. सोमेश्वरदेव छिंदक नागों में सबसे जाने-माने राजा थे. उन्होंने अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया. उन्होने सन् 1096 से सन् 1111 तक राज्य किया. इस वंश के अंतिम राजा का नाम था हरिश्चन्द्र देव था और उसे वारंगल के काकतिया वंश के चालुक्य राजा अन्नमदेव ने हराया. चक्रकूट या भ्रमरकूट में छिंदक नाग वंशियों का शासन दसवीं सदी के आरम्भ से 400 सालों तक चला. लोगों में उनके प्रति आदरभाव था. अनेक विव्दान उनके दरबार में थे. उस समय की शिल्पकारी भी उच्चकोटि की थी. नाग वंशियों के शासन कार्य में महिलाओं का भी योगदान रहता था. पर नागयुग में सती प्रथा थी. नाग युग में संस्कृत और तेलगु दोनों भाषाओं को राजभाषा की मान्यता मिली थी. राजा न्यायप्रमुख भी होता था. वह मृत्युदण्ड देता था और मृत्युदण्ड को क्षमा भी करता था. नल राजा शिव और विष्णु के उपासक थे. वे ब्राह्मणों का आदर करते थे और उन्हें ज़मीन देकर अपने राज्य में बसाते थे. मूर्ति - शिल्प में हमें उमा-महेश्वर, महिषासुर, विष्णु, हनुमान, गणेश, सरस्वती, चामुंडा, अंबिका आदि की प्रमुख प्रतिमाएं मिली हैं.

फणि नागवंश -

कवर्धा में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल के नाम से भी जानते हैं. इस मंदिर में प्राप्त शिलालेख में नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है. नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था. इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं. भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा.

कांकेर के सोमवंशी -

सोम वंश का शासन छत्तीसगढ़ के कांकेर राज्य में 1125 ई. से 1344 ई. तक था. माना जाता है की सोम वंश पाण्डु वंश की एक शाखा थी. इस वंश के व्याघ्र राज ने भैरव के मंदिर के निर्माण के लिए कुछ भूमि का दान दिया था. कर्ण राज ने सिहावा में भगवान शिव का मंदिर और कांकेर में दूध नदी के तट पर रामनाथ मंदिर का निर्माण कराया. चंद्रसेन देव ने 1344 ई. तक शासन किया. चंद्रसेन देव सोम वंश के अंतिम राजा थे.

Chhattisgarh and Indus Valley Civilization

Archeological evidence of life of Indus Valley civilization has not been found in Chhattisgarh. Some people believe that toward the end of Indus Valley Civilization there was a big flood in Saraswati River because of which many people moved toward south and some of them could have come to Chhattisgarh and settled here. Recently some port like formations have been found on the banks of Mahanadi which show that this river was used of for navigation at that time and this is a feature of Indus Valley Civilization

Puranic Rerences -

The Kosala area of the Puranic times was later divided into North (Uttar) Kosala and South (Dakshin) Kosala. Today’s Chhattisgarh is the ancient South Kosala. The largest river of Chhattisgarh, Mahanadi is mentioned as Chitrotpala in Matsya Purana, Brahma Purana and Bhishma Parva of Mhabharata.

Mahabharat – Bhishmaparva – 9/34
Chitrotpala chitraratham Manjula Vahini tatha,
Mandakinim Vaitarinia Kosham Chapi Mahanadim.

Matyapurana – Bharatvarsha Prakaran – 50/25
Mandanikidsharna ch chitrakuta tathaiva ch,
Tamsa Pippalishyaini tatha chitrotpalapi ch.

Chhattisgarh in Ramayana Period

Forests of Chhattisgarh are described in Valmiki Ramanyana. It is said that Shringi Rishi who conducted the Putryeshthi Yajna for king Dashrath lived in Sihava near Dhamtari. This is also the origin of Mahandi. Ram had come to this place during his Vanvas.

Hari Thakur has called Chhattisgarh as old as the Vedas in his book Chhattisgarh Gatha. In the olden days Chhattisgarh was known as Kosala. Daughter of King of Kosala was married to King Dashrath of Ayodhya. She was known as Kosalya. For this reason Ram is called the nephew of Chhattisgarh. The only temple dedicated to Maharani Kosalya is in village Kosir on the border of Bilaspur and Raigar districts of Chhattisgarh. Many rishis lived in Chhattisgarh. The main among them were Shringi, Agstya, Matang, Mandkarni, Sharbhang and Suthikshan. Shanta, the daughter of king Dashrath, who was adopted by Lomapad the king of Anga was married to Shringi Rishi. Hari Thakur has written in his Chhattisgarh Gatha that the ashram of Atri Muni must have been in Atarmadha. Madha is a apbhramsha of Math. This village is in Dhamtari tahsil of Chhattisgarh. Vaidya Sukhen lived in Chhattisgarh who told about Sanjeevani Booti when Lakshman was unconscious in the battlefield. The ranages from Amarkantak to Sihava were known as Riksha Parvat and Gandhmadan where Sanjeevani Booti was found was a part of this range. It is said that the ashram of Valmiki Rishi was in Turturia village of Chhattisgarh. Sita lived in this ashram after her exile from Ayodhya. her sons Lav and Kush were also born here.

Chhattisgarh in Mahabharata Period

During the Mahabharata period Haihaivanshi King Mayurdhwaj ruled in Raipur. He was very brave and also famous for his donations. He never refused anything to any persons. His son was Tamradhwaj, who stopped the horse of Yudhishthir during Rajsuya Yajna. Arjun fought Tamradhwaj but could not defeat him. When he asked Krishna for the reason, Krishan told him that it was because of the holiness of his father Mayurdhwaj who was a devotee of Krishna and never refused a beggar. Arjuna wanted to test Mayurdhwaj. Krishna and Arjuna went to Mayurdhwaj and Krishan asked for half of his body. When the king called for a saw to cut his body into hald, Krishna stopped him and embraced him. Hari Thakur has written in Chhattisgarh Gatha that Sirpur of Chhattisgarh was also known as Manipur and king Chitrangad ruled there. His daughter Chitrangada was married to Arjuna. When Yudhishthir did his Rajsuya Yajna, the Yajna horse was stopped by Babruvahana, the son of Chitrangada. There was a fierce battle between Arjuna and Babruvahana in which Arjuna was not only defeated but was also seriously injured. Chitrandaga rescued him and treated him. It was then that Babruvahan found out that Arjuna was his father.

Chhattisgarh during Baudha (Mauryan) period

Chinese traveler Huentsang had travelled to Sirpur in 639 AD. He has described Sirpur in his travelogue. According to him Sirpur was the capital of Dakshin Kosala. Huentsang has written that Gautama Budhha had lived here for three months. The legend is that King Prasenjit of Shravasti invaded Sirpur. However he was defeated. He then approached Buddha to negotiate a treaty with King Vijayas of Sirpur. King Vijayas kept a condition that he would enter into a treaty if Budhha agreed to come to Sirpur and spend some time there. The founder of Mahayana Buddhism, Bodhisatva Nagarjuna lived in Sirpur. It is said that he was born in first century AD in village Mahabaluka on the banks of river Sundarabhuti. According to Hari Thakur, Sundarabhuti is the Sondur river of today and Bahabaluka village is called Baruka now. Nagarjuna was a great writer and has written 30 books. He was also a physician and a chemist. He has written the famous Rasa-Ratnakar. He was latter appointed Vice-chancellor of Nalanda University. Another famous scholar of Sirpur was Acharya Budhghosha who latter went to Srilanka.

Chhattisgarh after the Mauryan Period

After the Mauryan period the empire was divided and many new dynasties were founded. The main among them were -

  1. Shunga dynasty in Bihar (Magadh)
  2. Chedi dynasty in Kalinga.
  3. Satvahana dynasty in the South.

Satvahan Dynasty

This dynasty was founded between 200 BC and 60 BC. King Shatakarni (first) of this dynasty extended his kingdom up to Jabalpur. Some coins of Satvahana period have been found in Bilaspur. Some stone statues of this period have also been found in Bilaspur. In a stone inscription found near Sakti inn Bilaspur, the Satvahan king Kumarvar Dutta is mentioned. It is said that the founder of Mahayana sect of Buddhism, Nagarjuna was very friendly with Satvahanas.

Vakatak dynasty

One bronze plate found in Durg district is of the Vakatak dynasty. This dynasty ruled for a very short period.

Gupta Period

The military expeditions of Samudragupta are described in the Allahabad inscription. There is the description of imprisonment of a king of Kota family in the 14th line of this inscription. There is the description of violently destroying many kings of Aryavarta and conquering many kings of forest regions in the 21st line. The main among them was Vyaghra Raja whose kingdom was in Mahakantar which is near present day Sihawa in Dhamtari. The 22nd line describes how many kings obeyed order of Samudragupta and showed respect to him. Lines 12 to 20 of the Allahabad-Prahasti Inscription describe how many kings of the South were conquered and then freed. In the Inscription found in Arang, which is from sixth century AD, it is written about King Bhimsena that he was from a family of Rajarshis. This is probably about his Gupta overlords as the title of Rajarshi has been used for Chardagupta the second in the Udaygiri cave inscription. Gupta period coins have also been found in Barnabad in Chhattisgarh. According to great historians like Dr. Hiralal Shukla, Dr. Krishnadev Saraswat and Late Gangadhar Samant, poet Kalidas was also born in Chhattisgarh. According to them Kalidas wrote his first book- Ritusamhar in Chhattisgarh.

Rajarshiyatulya Kula

Some bronze plates have been found in Chhattisgarh in which King Bhimsen (second) of Rajarshitulya Kula is mentioned. Rajarshitulya Kula ruled South Kosala around the fifth century. Some historians say that they were the descendents of King Mahendra, but there is not proof of this. The genealogy of this dynasty begins with King Sur. Important kings of this dynasty were Dayit Verma, Bhimsen (First) Vibhishan etc. This dynasty ruled Chhattisgarh for more tan 100 years.

Shaabhpuriya Dynasty

The capital of this dynasty was Sharabhpur which is probably the present day Sambalpur in Odisha. Some historians believe that Sirpur was also called Sharabhpur. After king Sharabh, his son Narendra became the king. The most important king of this dynasty was Prasannamatra. The last king of this dynasty was Pravarraha. Some bronze plates of the period of king Narendra have been found in Kurud. Some gold coins of king Prasannamatra have also been found. The Sharabhpuria dynasty was defeated by the Panduvanshis in the sixth century.

Panduvansha

Panduvanshis made Sirpur their capital after defeating the Sharabhpurias. These kings were Somvanshis and were Vaishnavas. The first Panduvanshi king was Udayana. Four sons of king Indrabal of this dynasty are mentioned in the Mandak inscription. Nanna who was the son of Indrabal was a mighty king. He extended his kingdom. His brother Ishandev is mentioned in a rock inscription found in Kharod in Bilaspur district. King Nanna’s son Mahashiv Tivardev assumed the title of Kosaladhipati because he conquered Kosala and Utkala. The bravery of Mahashiv Tivardev is described in the bronze plates found in Rajim and Balod. The wife of king Harshgupta of this dynasty was queen Vasata who was the daughter of Magadha Emperor Surya Verma. After Harsha Gupta’s death queen Vasata got the Lakshmana temple constructed in his memory in Sirpur. This temple is a very good example of temple architecture of that period. Mahashiv was also called Balarjuna beacuse he was a great archer like Arjuna. He became king in 595 AD and ruled for 60 years. Many bronze plates of rock inscriptions of his period have been found. His father Harshagupta and mother Vasata were Vaishnavas but he was a Shaiva. Nandi was inscribed on his royal seal. He allowed equal opportunity to all religions like Boddha, Jain, Shaiv and Vaishnavas in his period. Famous Chinese traveller Huentsang visited Sirpur during this time. Many Boddha Viharas, statues, and inscriptions are found in Sirpur. King Balarjuna had many poets, artists and scholars in his court. His period can be called the “Golden Period of ancient Chhattisgarh. The successor of Balarjuna, Mahabhava Gupta settled in Vinitpur. His son was Shivgupta and his son was Janmejay. Janmejay had taken the title of Trikalingadhipati. His son was Mahashivgupta Yayati and he changed the name of Vinitpur to Yayatinagar.

Nala dynasty

This dynasty began with king Nala. The period of this dynasty is approximately 700 AD. This dyansty mostly ruled in Bastar. King Bhavadant of this dynasty was very brave. He ruled Kosala and extended his kingdom. Skand Verma was another powerful king of this dynasty.

Regional Dynasties

Regional dynasties also ruled many parts ofChhattisgarhj. The main among them were: -

  1. Nala and Naga dynasties of Bastar.
  2. Somvanshis of Kanker.
  3. Fani-Nagvanshis of Kawardha

Nala Dynasty

The gold coins found in Adega in Bastar show that the Nala dynasty king Varah Raj ruled around 440 AD in Kotapur area of Bastar. After him many other kings of Nala dynasty like Bhavdant Verma, Arthapati, Bhattaraka etc. ruled Kotapur. Some historians say that Vyaghra Raj was also a Nalvanshi king and his kingdom of Mahakantar was in Bastar. He was defeated by Samudragupta. King Prithviraj of Nala dynasty was also a physician. Virupraja became king after him. He is compared in truthfulness with king Harishchandra. His son Vilastunga was a contemporary of Panduvanshi Balarjuana. He constructed the Rajivlochan temple in Rajim which is similar to the Lakshamana temple of Sirpur which was constructed by queen Vasata the mother of Balarjuna. The Nala dynasty was defeated by the Kalchuris toards the beginning of the tenth century.

Chhindak Naga dunasty (Bastar)

There are different views about the old name of Bastar. Some people call it Chakrakut and others call it Bhramarkut. The Naga dynasty kings rulled in this Chakrakut or Bhramarkut. Soemshwara was a well known king of Chhindak Nagas. He constructed many temples. He ruled from 1096 AD to 1111 AD. The last king of this dynasty was Harishchandradev who was defeated by the Kakatiya Chalukya king Annabhdev of Warangal. The rule of Nagvanshis was from 400 AD to the tenth century. They respected Brahmins and gave them land grants to settle in their kingdom. There were many scholars in their court. They also encouraged artists. The sculpture of that period is of a very high quality. Telugu and Sanskrit both were languages of the State. Women played important role in the administration of the kingdom. The custom of Sati existed during this period. The King was also the chief judge and could give death penalty and could also revoke it. Very nice idols of Uma-Maheshwar, Mahishasura, Vishnu, Hanuman, Ganesha, Chamunda and Ambika have been found pertaining to this period.

Fani-Naga dynasty

There is a temple in Chaura in Kawardha which is also known as Mandwa-Mahal. The genealogy of Naga kings is given in the inscription found in this temple. This was inscribed during the period of Naga king Ranchandra. The first king of this dynasty was Ahiraja. This dynasty ruled the Bhoramdev area till the 14th Century.

Somvanshis of Kanker

Somvanshis ruled Kanker from 1125 AD to 1344 AD. It is said that Soma dynasty was a branch of the Panduvanshis. Vyaghra Raja of this dynasty has donated some land for the construction of Bhairava temple. Karna Raja constructed the Shiva temple in Sihava and the Ramnath temple on the banks of Dudh river in Kanker. Chandrasen Dev who was the last king of this dynasty ruled till 1344 AD.

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