अकादमिक कौशल


प्रारंभिक स्‍तर पर शिक्षा का प्रमुख उद्देश्‍य क्‍या है ? बच्‍चों को विषय की जानकारी देना अथवा बच्‍चों में वे कौशल विकसित करना जिनका उपयोग करके वे लगातार नई बातें सीचा सकते हैं ? निश्‍चित ही कोई भी शिक्षक किसी भी विषय का पूर्ण ज्ञान रखने का दावा नहीं कर सकता. यदि हम बच्‍चों को अपने स्‍वयं के ज्ञान के आधार पर जानकारी मात्र देते हैं तो उनका ज्ञान हमारी जानकारी की सीमाओं के भीतर सीमित रह जायेगा, परन्‍तु यदि बच्‍चों में वे कौशल विकसित कर दिए गए जिससे वे स्‍वयं ही अपने आसपास के वातावरण से, मित्रों से, शिक्षकों से और पुस्‍तकों से मदद लेकर अपना ज्ञान बढा सकें तो उन्‍हें अपना ज्ञान बढ़ाने की असीमित शक्ति मिल जायेगी. इसलिये शिक्षा का उद्देश्‍य मात्र जानकारी देना न होकर सीखने के कौशल विकसित करना होना चाहिए. विशेषकर प्रारंभिक कक्षाओं में इस बात का विशेष ध्‍यान रखना आवश्‍यक है.


वैसे तो बच्‍चों को अनेक प्रकार के कौशल सीखना आवश्‍यक है, परन्‍तु हम ब्‍लागों की इस श्रंखला में केवल अकादमिक कौशलों पर बात करेंगे. अकादमिक कौशलों में भाषा के कौशल, अंकों, संख्‍याओं और गणित के कौशल, रचनात्‍मक कल्‍पना के कौशन आदि शमिल हैं. भाषा के कौशल प्रमुख रूप से चार माने गए हैं. य‍ह हैं - सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना. किसी भी भाषा को भली भांति सीखने का अर्थ है इन भाषाई कौशलों में दक्षता प्राप्‍त करना. यह तो सभी जानते हैं कि भाषा संप्रेषण और एक दूसरे को समझने का प्रमुख आधार है. भाषा सीख जाने से बालक के समक्ष असीमित ज्ञान का भंडार खुल जाता है. इसीलिए प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा के कौशलों पर विशेष ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है.


आइये आज सुनने और बोलने के कौशल पर बात करते हैं. सह तो सभी जानते हैं कि बच्‍चा सुनकर सी सीखता है. सुनने का कौशल बहुत हद तक बच्‍चा स्‍कूल में भर्ती होने के पहले अपने घर पर ही सीख जाता है. हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि स्‍कूल में भर्ती होने के पहले ही बच्‍चों को अपनी मातृ भाषा का अच्‍छा ज्ञान होता है. वे अपनी मातृभाषा में न केवल बातचीत कर सकते हैं बल्कि आपनी भावनाओं को भी अच्‍छी तरह से व्‍यक्‍त कर सकते हैं. विद्यालय में उनके इन भाषाई कौशलों में वृध्दि करना आवश्‍यक है. इनमें सबसे पहला कौशल सुनने का कौशल है.


सुनने का तात्‍पर्य है, सुनकर समझना. ठीक प्रकार से सुनने का उद्देश्‍य बोली गई बात के अर्थ को समझना होता है. यह एक कौशल मात्र ही नहीं, एक कला भी है. बहुधा कही गई बात का अर्थ समझने के लिये उसे कहने वाले व्‍यक्ति के हाव-भाव और बोलने के लहजे को समझना आवश्‍यक होता है. यदि मैं कहूं - यह बर्तन साफ है. और यह बात मैं साधारण लहजे में कहूं, तो इसका अर्थ यह होगा कि मैं आपको बता रहा हूं कि यह बर्तन साफ है, परन्‍तु यदि यही बात कहते समय चेहरे के भाव प्रश्‍नवाचक हों तो और लहजा प्रश्‍न करने का हो तो इसका अर्थ यह है कि मै आपसे पूछ रहा हूं यह बर्तन साफ है अथवा नहीं. इसी प्रकार यदि मेरे हाव भाव और लहजे में क्रोध है तो इसका अर्थ शायद यह होगा कि मैने आपसे बर्तन को साफ करने को कहा था, परन्‍तु आपके व्दारा साफ किया गया बर्तन मुझे अभी भी पूरी तरह से साफ नहीं दिखाई दे रहा है.


भाषा का दूसरा महत्‍वपूर्ण कौशल है - बोलना. हम बोलकर अपनी बात सुनने वालों तक पहुंचा सकते हैं. बोलने का अर्थ न केवल बोले गए शब्‍दों पर निर्भर करता है, बल्कि बोलने वाले के हाव-भाव और लहजे पर भी निर्भर करता है. बच्‍चा स्‍कूल में भर्ती होने के पहले ही अपनी मातृ भाषा को बोलना सीख जाता है. उसे अपनी मातृ भाषा में अपनी बात को कहने का अच्‍छा खासा अनुभव होता है. शिक्षक का कर्तव्‍य है कि बच्‍चों के शाला पूर्व सीखे गए सुनने और बोलने के कौशल में वृध्दि करे. यदि बच्‍चे की मातृ भाषा स्‍कूल में उपयोग की जाने वाली भाषा से भिन्‍न हो तो इस कार्य में कठिनाई कुछ अधिक हो सकती है. यथा अनुससूचित जनजाति क्षेत्रों के बच्‍चों की मातृ भाषा हिन्‍दी के अतिरिक्‍त कोई अन्‍य भाषा जैसे गोंडी आदि हो सकती है ऐसे में शिक्षक को बच्‍चों की मातृ भाषा का उपयोग कर उन्‍हें सुनने और बोलने के कौशल सिखाने होंगे और धीरे-धीरे हिन्‍दी के लिये भी इन कौशलों में वृध्दि करनी होगी.


सुनने और बोलने के कौशल में वृध्दि सुनकर और बोलकर ही हो सकती है. इसके लिए कक्षा में सुनने और बोलने के अधिक से अधिक अवसर होना आवश्‍यक है. हमारे स्‍कूलों में अक्सर शिक्षक ही बोलते हैं और बच्‍चों से चुप रहने को कहा जाता है. सभी शिक्षकों को यह बात समझना अनिवार्य है कि सुनने और बोलने के कौशल सीखने के लिए बातचीत में बच्‍चों की सक्रिय सहभागिता अनिवार्य है.


बातचीत में बच्‍चों की सहभागिता

बातचीत में ‘सक्रिय सहभागिता का अर्थ क्‍या है? क्या यह सिर्फ शिक्षक के प्रश्नों का उत्तर देने तक सीमित है या यह उससे कुछ अधिक है? बातचीत के व्दारा बच्‍चों की समझ विकसित करने, प्रश्न पूछने, नए विचारों को जानने और नई बातें सीखने में मदद मिलती है. शिक्षक को कक्षा में ऐसी गतिविधियां करनी होंगी जिसे सभी बच्‍चों को बातचीत करने और स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करने का अधिक से अधिक अवसर मिले.


चित्रों आदि पर कहानी कहना

चित्रों या वस्तुओं को देखकर कहानी कहने की गतिविधि के माध्‍यम से बच्‍चों को न केवल बोलने के लिए प्रोत्‍साहित किया जा सकता है बल्कि इससे उनमें स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करने का कौशल भी विकसित होगा. शिक्षक विद्यार्थियों से किसी जानवर, फोटो,या वस्तु के बारे में कहानी कहने को कह सकते हें, और एक बच्‍चे व्दारा सुनाई गई कहानी पर कक्षा में अन्‍य बच्‍चों से साथ बातचीत की जा सकती है.


नाटक, कठपुतली आद‍ि के माध्‍यम से बातचीत को बढ़ावा देना

विद्यार्थी किसी नाटक या कठपुतली के खेल आद‍ि में सम्मिलित हो सकते हें. इसके बाद उसपर कक्षा में चर्चा करके बच्‍चों से पात्रों के बारे में बात की जा सकती है. बातचीत कुठ इस प्रकार की हो सकती है कि - इसके बाद क्या होगा ?, क्या हमने इसे पहले कभी देखा है ?, क्‍या ऐसा भी हो सकता है ?, आपके अनुसार ऐसा क्यों है ? आदि.

हो सकता है कि कुछ बच्‍चे प्रारंभ में बोलने में शर्माएं अथवा हिचकिचाएं. ऐसे बच्‍चों को प्रोत्‍साहित करना आवश्‍यक है. इसके लिए उनसे सरल प्रश्न पूछें. शायद प्रारंभ मे वे एक शब्द में या इशारे से या सिर हिलाकर जवाद दें. परन्‍तु उन्‍हें बोलने के लिए लगातार प्रोत्‍साहित करते रहना आवश्‍यक है.

पाठ की योजना बनाने से पहले सोचें कि आप इस गतिविधि का कक्षा में उपयोग कैसे करेंगे. आप बच्‍चों की जोड़ियाँ बनाने या उन्‍हें छोटे समूहों में बांटने और गतिविधि को रुचिकर बनाने के लिए उसे कक्षा के बाहर कराने पर भी विचार कर सकते हैं. गतिविधि कराते समय सभी बच्‍चों पर ध्‍यान रखन आवश्‍यक है. विशेष रूप से उन बच्‍चों पर ध्‍यान देना अनिवार्य है जो गतिविधि में ठीक प्रकार से हिस्‍सा नहीं ले रहे हैं.


विद्यार्थियों की बातचीत से सहायता लेना

बच्‍चे कक्षा के भीतर और बाहर एक दूसरे से बातचीत करते हैं. इस बातचीत को सुनकर भी उनकी समझ के संबध में अनुमान लगाया जा सकता है और कक्षा की पाठ योजना बानाने में सहायता मिल सकती है. इस बात को जान लें कि शिक्षक का एक अच्‍दा श्रोता होना आवश्‍यक है. तभी वह अपने विद्यार्थियों की आवश्‍यकताओं को भली भांति समझ सकेगा.


समूह चर्चा

बच्‍चो को समूह में बिठाकर किसी विषय पर चर्चा कराने से भी सुनने और बोलने के कौशल का विकास होता है. यदि आवश्‍यक हो तो प्रारंभ में बच्‍चों को विशय के संबंध में कुछ पढ़ने को दें और उसके बाद चर्चा करायें.

तो याद रखें सुनने और बोलने के कौशल बढ़ाने में निमनलिखित बातें सहायक हो सकती हैं -

  1. बच्‍चों को बालने का अधिक से अधिक अवसर दें.
  2. बातचीत करने के लिये गतिविधियों की कार्य योजना बनाएं.
  3. चित्रों आदि के माध्‍यम से कहानी कहने की कजा विकसित करें.
  4. नाटक कठपुतली आदि के व्दारा भी बातचीत को बढ़ावा दिया जा सकता है.
  5. कराई जाने वाली गतिविधियां आनंदप्रद होनी चाहिए. इन्‍हें रोचक बनाएं.
  6. प्रयास कारें कि सभी विद्यार्थी गतिविधियों में भाग लें. चुप रहने वाले बच्‍चों को बोलने के लिए प्रोत्‍साहित करें.
  7. बच्‍चे सुरक्षित अनुभव करें व उन्हें उपहास का पात्र बनने व गलत होने का भय भी न लगे.

इन कौशलों से संबंध में यू-ट्यूब पर उपलब्‍ध एक वीडियो भी देखें -

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Comments :

के के धुरंधर On: 28/11/2018

भाषाई कौशल के लिए शिक्षण सामग्री बेहद उम्दा है

Raghuvansh Mishra On: 26/11/2018

Good interpretation of language skills.

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