04-06-2020
बेहद थक गया हूं मैं


बेहद थक गया हूं मैं
ढ़ोते-ढ़ोते सलीब अपना
गिला मैं क्‍या करूं इसका
यही तो है नसीब अपना

तुम्‍हें आवाज़ भी गर दूं
सुनोगे क्‍या मेरी आवाज़
बहुत ही दूर हूं तुमसे
करीब है पर रकीब अपना

तुम्‍हारे पास होता तो
गले मिलकर मना लेता
सुनाऊं किस तरह तुमको
यहां से हाले दिल अपना

तुझे, है तो मेरी परवाह
यह तो जानता हूं मैं
बनेगा हमसफर कब तू
बनेगा कब मेरा अपना

11

Add Your Comments Here

Comments :

चुन्नी On: 06/06/2020

आपकी रचना अंतस की अनुगूँज है। जिसमे शामिल है,,, दर्द और तमाम जद्दोज़ेहाद के बाद मिले बेहद कसैले व कडवाहट से भरे हलाहल को पीने के बावजूद की जिजीविषा की उम्दा अभिव्यक्त । ऐसी रचना जो सीधे मन को छूने में कामयब होती है ,,, बहुत अच्छी रचना है सर जी , साधुवाद 🌹🌹

Bela yadav On: 06/06/2020

बहुत सुंदर और ह्रदय स्पर्शी कविता ।

Sushil Rathod On: 06/06/2020

एक मन.........और कितने द्वंद यही ज़िंदगी है शायद कि ...बस यूं ही उम्मीद और नाउम्मीद के बीच जलते बुझते रहते है, यूं तो भीड़ हर तरफ फिर भी तन्हा रहते है, इन रौशनियों के बीच भी यह उदास अंधेरा क्यों है, इतने बडे मकाँ में सुकून का एक अदना सा कोना क्यों गुम है? क्या यही ज़िंदगी है ? सुशील

PREM LAL बर्मन On: 06/06/2020

बहुत सुंदर कविता है सर जी ।

Atul shukla On: 06/06/2020

बहुत सुंदर कविता सर

ManjushaTiwari On: 06/06/2020

Very nice kavita

Sarita Khan On: 05/06/2020

Heart touching...

Anima Upadhyay On: 05/06/2020

बहुत सुंदर कविता लिखी है भईया,हाले दिल ही बयाँ कर दिया है

Visitor No. : 2362027
Site Developed and Hosted by Alok Shukla