लोकमंच
छत्‍तीसगढ़ में बोली जाने वाली सभी भाषाओं और छत्‍तीसगढ़ की विविधतापूर्ण संस्‍कृति का मंच
पारंपरिक भित्ति-चित्रकला
कलाकार - राजेंद्र राव, अंकिता राव राउत एवं अन्‍य अनेक
प्रस्‍तुतकर्ता - हितेन्‍द्र श्रीवास

पारंपारिक हस्तकला के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ परिपूर्ण एवं संपन्न है. यहां लगभग प्रत्येक घर पर भित्ति-चित्रकारी के दर्शन हो जाते हैं. कोंडागांव (बस्तर संभाग) पारंपारिक हस्तकला के क्षेत्र में अनूठा, अभिनव पड़ाव है. यहां आदिम संस्कृति की परछांई लिए हस्तकलाओं की श्रृंखला जीवंत है. भित्ति-चित्रकला इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है.

खुट-लिखना भित्ति - चित्रकारी की प्राथमिक इकाई है. विशेषकर महिलाओं द्वारा गृह-सज्जा के लिये घर की बाहरी एवं भीतरी दीवारों पर एवं दीवारों के निचले भाग पर किया जानेवाला रंगाई का कार्य भित्ति-चित्र का प्रथम सोपान है.

हरेली भित्ति - इसी तरह छत्तीसगढ़ की कृषि आधारित 'हरेली तिहार' के अवसर पर कपाट के दोनों ओर आवश्यक रूप से गोबर / मिट्टी से महिलाएं अनिवार्यत: भित्तिचित्र बनाती हैं. भित्ति का यह पक्ष छत्तीसगढ़ की संस्कृति में रचा-बसा है.

आठे कन्हैया की भित्ति - यह चित्रकारी कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर की जाती है.

अलावा इनके समस्त छत्तीसगढ़ में भित्ति चित्रकारि‍ता विभिन्‍न रूपों में ग्रामीण परिवेश में निरंतर सुगंध बिखेर रही है.

बस्तर संभाग में मृतक स्तंभों में उकेरे हुए अद्भुत लोकचित्र सर्वत्र परिलक्षित हैं. वहीँ लछमी जगार आयोजनों में भी भित्ति चित्र प्रचुरता के साथ दृष्टिगोचर होते हैं. घरों की साज-सज्जा के लिए भी छुई माटी तथा पोतनी और विविध जैविक रंगों से छत्तीसगढ़ की भित्ति चित्रकला सर्वत्र सदैव गुंजायमान है.

बस्‍तर में भित्ति चित्रकाला की तीन शैलियां प्रचलित हैं. यह है जगार शैली, घोटुल शैली और माड़या शैली. इसके अलावा एक और शैली मृतक स्‍तंभ शैली कही जा सकती है.

जगार शैली - इस शैली के भित्ति चित्र परिकृत और आकर्षक रूप में बनाये जाते हैं. हर अनुष्‍ठान का चित्रण किया जाता है. यह संस्‍कार प्रधान है.

घोटुल शैली - इसमें घोटुल से संबंधित चित्र होते हें और इसका प्रयोग घोटुल की सजावट के लिये किया जाता है.

माड़या शैली - यह जीवन शैली आधारित चित्र होते हैं. इन्‍हें बिन्‍दुओं को बनाकर तैयार किया जाता है.

श्री खेम वैष्‍णव जी ने भित्ति चित्रों की लुप्‍त होती कला को संरक्षण दिया और उसे देश विदेश तक पहुंचाया. श्री राजेंन्‍द्र राव राउत जी ने श्री वैष्‍णव से इस शैली को सीखकर राज्‍य सम्‍मान प्राप्‍त किया. श्री दुर्जन राव सोरी ने भी इस कला में राज्‍य सम्‍मान प्राप्‍त किया है और वे इसमें निरंतर कार्यरत हैं.

माटी मांदरी नृत्य
प्रस्‍तुतकर्ता - हितेन्‍द्र श्रीवास

यह कोंडागांव जिले का विश्व सुप्रसिद्ध माटी मांदरी नृत्य है. बस्तर संभाग में आदिम संस्कृति संदर्भ में समूह नृत्य का महत्त्वपूर्ण स्थान / प्रयोजन है. प्रमुखत: तीन तरह के वाद्य नृत्यों की लोकप्रियता कोंडागांव जिले में है. जिसमें प्रथम है विशाल 'गुटा मांदरी नृत्य' जिसे 'गुटामांदर' नृत्य भी कहा जाता है. द्वितीय है 'माटीमांदरी नृत्य'. तृतीय है 'हुल्की मांदरी नृत्य'. गुटामांदर / गुटामांदर वाद्य काष्ठ निर्मित वाद्य है जिसके दोनों स‍िरों पर ध्वनि उत्पन्न करने हेतु चमड़ा लगा होता है. इसकी विशेषता है कि एक सिरा अपेक्षाकृत बड़ा और दूसरा छोटा होता है. दोनों छोरों को हथेलियों से थाप देकर ध्वनि उत्पन्न की जाती है. इसे ग्रीवा के सहारे लटकाकर कमर तक स्थापित कर प्रयुक्त किया जाता है. वहीं माटी मांदरी नृत्य का वाद्य मृदा निर्मित होता है. इसके भी दोनों सिरों पर ध्वनि उत्पन्न करने के लिए चमड़ा मढ़ा होता है. दोनों छोरों का आकार समान होता है. रोचक ध्वनि उत्पन्न करने हेते चमड़ों के मध्य मे भात को चिपकाया जाता है. यह इस वाद्य की एक विशेषता है. वाद्य को कसकर कमर में बांधकर नृत्य किया जाता है. प्रस्तुत वीडियो में यह वाद्य पुरुष प्रयुक्त है. विवाह, शिशुजन्म (छट्ठी) अवसरों पर माटी मांदरी नृत्य का विशेष महत्व है. हर्षोउल्लास के साथ इन अवसरों पर समाज / समुदाय के द्वारा सामूहिक माटी मांदरी नृत्य किया जाता है. विवाह के अवसर पर वर पक्ष एवं वधू पक्ष के नव युवक और युवतियों के द्वारा (दोनों पक्ष) मिलकर माटी मांदरी वाद्य बजाते तथा चिटकोली बजाते हुए नृत्य करते हैं.

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
एन एल कुंभकार

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया

सरगुजिहा हो, बिलासपुरिहा हो,
रायगढिय़ा हो, रायपुरिहा हो,
धमतरिहा हो या हो बस्तरिहा
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया

गुरतुर गुरतुर बोली भाखा,मुंहु म सजा के
आवत जावत पहुना के सेवा ल बजा के
दाई दीदी बहिनी पहिने,गहना लज्जा के
हर घर के अंगना में,मेला हे मजा के

मन बिल्कुल सफ्फा हे,रंग भले करिया
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया

रहन सहन पहनावा,हावे सब ले हट के
रीत,परब, संस्कृति में,सीख हे लिपट के
दिखे में सीधा साधा,पर मेहनत हे डट के
नइये जगा जिनगी में,छल अऊ कपट के

नून बासी चटनी खाथन,पीथन पेज मड़िया
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया

मैं महानदी ओं
एन एल कुंभकार

छत्तीसगढ़ के जीवन रेखा मोला कहिथे गा।
मोर लईका मन मोरे रददा देखत रहिथे गा
मैं महानदी ओं....
मैं महानदी ओं....

धमतरी के सिहावा ले, निकले हावों जब ले
छत्तीसगढ़ अऊ उड़ीसा ल,मया करथों तब ले
पहली के सियान मन मोला, कहै चित्रोत्पला
कोनो काहय महानंदा, कोनो बोले नीलोत्पला
दक्षिण ले उत्तर दिशा मोर धार ह बहिथे गा
मोर लईका मन मोरे रद्दा....

छत्तीसगढ़ के मैं गंगा वों,मोला पूजे लोग बाग
मोर पानी ल पाके चमके,सबो झन के भाग
धमतरी,चारामा,राजिम, चंपारण बसे मोर तीर
आरंग ,सिरपुर ,शिबरीनारायण, वाले मन के हरौं सब पीर
शिबरी ले मोर धार ह पूरब दिशा में मुड़थे गा
मोर लईका मन मोरे रददा....

मोर सहायक अरपा,पैरी, शिवनाथ अऊ तेल
सोंढूर,हसदेव जोंक नदी से, होथे गा मोर मेल
उड़ीसा में हीराकुंड बंधाए, छत्तीसगढ़ गंगरेल
रूद्री बांध ल सबो जाने, रखथों पानी सकेल
आखिर में बंगाल की खाड़ी के गोदी मिलथे गा
मोर लईका मन मोरे रद्दा....

लौह कला (Wrought Iron) हस्तशिल्प
कलाकार - सुनील विश्वकर्मा, अनिल विश्वकर्मा एवं अन्‍य अनेक
प्रस्‍तुतकर्ता - हितेन्‍द्र श्रीवास

कोंडागांव (बस्तर) का सुप्रसिद्ध लौह हस्तशिल्प : - बेलमेटल आर्ट अर्थात गडबा हस्तशिल्प के बाद दूसरे क्रम पर आनेवाला यह महत्वपूर्ण हस्तशिल्प छत्तीसगढ़ की विशेषताओं में शुमार है.
भारतवर्ष के चुनिंदा स्थानों में पाया जानेवाला यह wrought iron work है.
जैसा कि यह तो सर्वविदित है कि बस्तर में विश्व का सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोत्तम लौह अयस्क का अकूत, विपुल भंडार है. संभवतः यही प्रचुरता / प्राकृतिक धनी होना ही यहाँ लौह हस्तशिल्प के जनक होने का कारक/कारण है. सदियों से लोहा यहां के वासीयों का जीवनसाथी है । चाहे आखेट हेतु तीर के लिए या विभिन्न कृषि उपकरणों के तौर पर हो.
लोहा यहां के जीवन में रचा-बसा हुआ है । जन्म से लेकर विवाह तथा मृत्यु संस्कारों में लोहा की महति भूमिका है. विभिन्न प्रकार के दीपक, देवी देवताओं के सवार तथा अस्त्रों शस्त्रों के लिए लोहा की आवश्यकता समूचे समुदाय की प्राथमिकता है. जो कि भिन्न रूपों , स्वरूपों में यहां की संस्कृति तथा जीवनशैली में प्रकट है
भीमन दीया, लामन दीया, खूट दीया, सुपली दीया चंद उदाहरण हैं लोहे से निर्माण किये जाने वाले दीपकों के वर्गीकरण हैं. यह भिन्न भिन्न आकृतियों तथा अवसरों को प्रतिपादित करते हैं.
इसी तरह अनेकानेक घरेलू आवश्यकता की उपयोगिताओं के अनुरूप उपकरणों का निर्माण , व्यक्तिगत/व्यक्तिपरक समग्रीयों का हस्तशिल्प निर्माण यहाँ के लौह हस्तशिल्प को उत्कृष्टता प्रदान करती है.
राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हैं - स्वर्गीय श्री सोनाधर पोयाम, श्री तीजूराम विश्वकर्मा
राज्य पुरस्कृत - सर्वश्री तीजूराम विश्वकर्मा, तातीराम विश्वकर्मा, ललित विश्वकर्मा, नंदलाल विश्वकर्मा, श्यामसुंदर विश्वकर्मा, ओड़सूराम विश्वकर्मा, प्रेमलाल विश्वकर्मा, श्रीमति सोनादई विश्वकर्मा.
श्री चमरूराम बघेल को मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित राष्ट्रीय पुरस्कार तुलसी सम्मान लौह हस्तशिल्प के लिए दिया गया.

बेल मेटल हस्तशिल्प
कलाकार - डॉक्टर जयदेव बघेल, गौतम मरकाम, सुधीर बिसोई एवं अन्‍य अनेक
प्रस्‍तुतकर्ता - हितेन्‍द्र श्रीवास

कोंडागांव छत्तीसगढ़ का विश्व प्रसिद्ध बेलमेटल हस्तशिल्प आदिम लोक सभ्यता की छाप के कारण जाना पहचाना जाता है.
स्वर्गीय डॉक्टर जयदेव बघेल ने इसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रसिद्धी दिलाया.
मानिक घड़वा जगदलपुर तथा सुखचंद पोयाम, जयदेव बघेल से पूर्व राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हस्तशिल्पी हैं.
बेलमेटल आर्ट जो कि घड़वा /गडबा शिल्प /आर्ट भी कहलाता है एक लंबी प्रक्रिया आधारित कला है. विभिन्न चरणों को मिलाकर इसके कुल 13 चरणों की निर्माण प्रक्रिया है.
आवश्यक औजार तथा उपकरण स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्रयुक्त किया जाना इस कला की रोचकता है, विशेषता है.
कोंडागांव जिले में लगभग 500 से अधिक परिवारों के जीवन यापन का यह माध्यम है.
इस विधा के अंतर्गत कोंडागांव से और भी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हस्तशिल्पी हैं सर्वश्री - राजेंद् बघेल , पंचूराम सागर। मेरिट अवार्ड - श्री भूपेंद्र जयदेव बघेल , श्री रामचरण पैगाम.
राज्य पुरस्कृत - सर्वश्री पंचूराम सागर, नरेंद्र मंडावी, बजरंग कुलदीप, प्रदीप सागर, रामचरण पोयाम, राजेश पोयाम, फूलसिंग सागर, फूलसिंह बेसरा तथा श्रीमती मीरा बघेल ठाकुर.
इसी विधा के कोंडागांव जिला से कुछ और राज्य पुरस्कृत हैं : सर्वश्री - भूपेंद्र बघेल, बोंडकू सागर, शबीर नाग, रविंद्र नाग, महेशलाल नेताम, बन्नूराम बैद, बंशीराम बैद

श्री गौतम मरकाम हस्तशिल्पी द्वारा बेलमेटल शिल्प निर्माण प्रक्रिया की जानकारी
  1. कुटन बनाना - सबसे पहले खेत की मुन माटी और धान का छिलका भूसा को लिाकर कुटन माटी तैसार किया जाता है. इसके बाद जो भी सामान बनाना होता है उसका माडल या कुटन रफरूप में तैसार किया जाता है. कुटन को धूप में सुखाया जाता है.
  2. छुई माटी चढ़ाना - कुटन के सूखने के बाद उसपर नदी क‍िनारे के माटी जिसे छुई माटी कहा जाता है का लेप किया जाता है. उसे दोबारा धूप में सुखाया जाता है.
  3. झाड़ना/पोती मारना/ पत्‍ता रचाना - सूखने के बाद कुटन को औजार से घिसकर चिकना किया जाता है जिससे कटी-फटी सतह न रहे. इसके बाद कुटन पर सेम का पत्‍ता रगड़ा जाता है जब तक पत्‍ते का हरा रंग उसपर चिपक न जाये. इससे धागा गुड़ि‍याने में सुविधा होती है.
  4. गुठ‍ियाना / मठना - मधुमक्‍खी के मोम को गरम करके पिघलाया जाता है और उसे पिचकी में डालकर धागा निकाला जाता है. फिर मोम के धागे को कुटन पर एक-एक करके लपेटा जाता है और कुटन को पूरा ढ़क देते हैं. फिर कुटन को चिकना किया / मठा जाता है.
  5. ड‍िज़ाइन देना - इसके बाद मोम से आंख, नाक आदि बनाए जाते हैं.
  6. रुई माटी लिपना - नदी किनारे की माटी जिसे रुई माटी कहा जाता है को सूती कपड़े से छानकर उसमें कोयला पाउडर मिलाया जाता है और गोबर पानी मिलाकर उसका लेप कुटन पर लगाकर उसे छांव में सुखाया जाता है.
  7. सादा रुई माटी लगाना - इसके बाद सादा रुई माटी का लेप किया जाता है और सूखने के लिये छोड़ दिया जाता है.
  8. लाल मिट्टी पहारना -
  9. दीमक की बांबी की मिट्टी में धान का भूसा मिलाकर तैयार किया जाता है और उसका लेप किया जाता है और धूप में सुखाया जाता है.
  10. पीतल चढ़ाना - इसके बाद पीतल की सफाई करके उसे एक भट्टी में पिघलाया जाता है. सामान को दूसरी भट्टी में 4 घंटे तक गरम किया जाता है. सामान को गरम होने के बाद उसे जलते हुए छेना के समान आग से निकाल कर उसमें पिघला पीतन डाला जाता है और ठंडा होने के लिये छोड़ दिया जाता है.
  11. सफाई - छेचा फोड़ना - ठंडा होने के बाद औजार से मिट्टी को हटाया जाता है. इसके बाद सामान को घिस मांजकर बेचने के लिये तैयार किया जाता है.
साक्षरता गीत
प्रतिभा त्रिपाठी

गांव में कक्षा लग रही रे
पढ़ने चलियो राजा ....

जो हम पढ़ेंगे, फिर ना छलेंगे।
गैरों के ना होंगे भरोसे रे....
पढ़ने चलियो राजा

नथनी न लइहो,न झुमका मैं लइहो।
लइहो स्लेट और पट्टी रे...….
पढ़ने चलियो राजा।।

सारी उम्र हम ने,यूं ही बिताई।
लगाऍंगे अपना ॲंगूठा रे.....
पढ़ने चलियो राजा।।
भैया भी जा रहे, भौजी भी जा रहे।
जा रहे जेठ जेठानी रे....
पढ़ने चलियो राजा....

गॉंव में कक्षा लग रही रे.....
पढ़ने चलियों राजा

बेटी यह कोख से बोलत हे
रत्‍ना गुप्‍ता

बेटी यह कोख से बोलत हे
मां कर दे तैं मोर उपर उपकार
मत मार मोला जीवन दे दे
महू ला देखन दे संसार

बिन मोर मो भैय्या ला
राखी काखर ले बंधवावे
मरत रही कोख के हर बेटी त
बहू कहां से तैं लाबे

बेटी ह बहिनी, बेटी ह दुल्‍हन
बेटी से होथे पूरा परिवार
बिन नारी के प्रीत ह अधूरा हे
नारी बिना सुन्‍नास हे घर बार

दादी ह नारी तहूं ह नारी
समझ अउ समझा के देख तो
मानही अब पापा भी अम्‍मा
तैं बात बता के देख तो

नई जानव मैं ये दुनिया ला
मैं तो जानथव मां बस तोला
मैं जानधव तोला हे चिंता मोर
तैं मार नई सकत मोला

फिर काहे इतना मजबूर हस तैं मां
तैं काहे हरन इतना लाचार
बेटी ह सतझय मां के दुख
कर लौ तुमन बेटी ला स्‍वीकार

अगर मैं नई होहूं त मां
तैं अपन अपन दिल के बात काला बतावे
मतलब के ये दुनिया मां तैं मां
घुट-घुट के रही जाबे

मोर केशकाल
नेहरू लाल कुंभकार

केशकाल के सोनहा माटी के,
मैं पैंया लागों हो।
बस्तर के मुहाटी के
मैं पैंया लागों हो।
(मुहाटी-दरवाजा)
जिला कोण्डागांव के दुलारा हे केशकाल।
प्राकृतिक सुंदरता ले,हावे मालामाल।।
मुरवेंड अऊ दादरगढ़ ले, जैसे करबे पार।
तेलिन शक्ति माता के,सजे हावे दरबार।।
इहां बारह भांवर घाटी के, मैं पैंया लागों हो।
बस्तर के मुहाटी के मैं पैंया लागों हो।।
सुंदर सुंदर झरना मन, सबके मन ल भाथे।
कल-कल करत नदिया नरवा, खुशहाली दरसाथे।।
छोटे-बड़े रुखराई,सबो डाहर हरियर हे।
(डाहर-तरफ)
परदूसन से कोसों दूर,हवा इहां फरियर हे।।
इहां के जंगल कांटी के मैं पैंया लागों हो।
बस्तर के मुहाटी के मैं पैंया लागों हो।।
गोबरहीन के शिवलिंग,भंगाराम, टाटामारी।
गढ़धनोरा,कुंएमारी,जाने दुनिया सारी।।
बाक्साइड के खदान,साल रुख भरमार।
खेती अऊ वन संपदा,जीनगी के आधार।।
परंपरा परिपाटी के मैं पैंया लागों हो।
बस्तर के मुहाटी के मैं पैंया लागों हो।।

मृदा हस्तशिल्प
कलाकार - अशोक चक्रधारी
प्रस्‍तुतकर्ता - हितेन्‍द्र श्रीवास

राज्य पुरस्कृत मृदा हस्तशिल्पी. पूर्व सदस्य छत्तीसगढ़ माटी कला बोर्ड. नेशनल मेरिट अवार्ड सन् 2016. छत्तीसगढ़ शासन की ओर से प्रायोजित फ्रांस के शहर लियाँन की यात्रा वर्ल्ड एक्सपो में भागीदारी के लिए कर चुके हैं. निवासी - कुम्हार पारा कोंडागांव.
विशेष - छत्तीसगढ़ के राज्यपाल द्वय ई. एस. एल. नलसिम्हन ने इनके निवास का भ्रमण कर गौरवान्वित किया है. श्री नरसिम्हन ने इनके चाक पर हाथ आजमाया.

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