छत्तीसगढ़ में नगरीय प्रशासन
Urban administration in Chhattisgarh
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छत्तीसगढ़ में नगरीय प्रशासन - (हिन्‍दी में)

Urban administration in Chhattisgarh - (In English)

छत्तीसगढ़ में नगरीय प्रशासन

भारत में नगरीय प्रशासन का विकास

ब्रिटिश काल में नगरीय प्रशासन - भारत में नगरीय शासन व्यवस्था प्राचीन काल से ही प्रचलन में रही है, लेकिन इसे क़ानूनी रूप सर्वप्रथम 1687 में दिया गया, जब ब्रिटिश सरकार व्दारा मद्रास शहर के लिए नगर निगम संस्था की स्थापना की गयी. बाद में 1793 के चार्टर अधिनियम के अधीन मद्रास, कलकत्ता तथा बम्बई के तीनों महानगरों में नगर निगमों की स्थापना की गयी. बंगाल में नगरीय शासन प्रणाली को प्रारम्भ करने के लिए 1842 में बंगाल अधिनियम पारित किया गया. वर्ष 1882 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन ने नगरीय शासन व्यवस्था में सुधार करने का प्रयास किया, लेकिन वह राजनीतिक कारणों से अपने इस कार्य में असफल रहा. नगरीय प्रशासन के विकेन्द्रीकरण पर रिपोर्ट देने के लिए 1909 में शाही विकेन्द्रीकरण आयोग का गठन किया गया, जिसकी रिपोर्ट को आधार बनाकर भारत सरकार अधिनियम, 1919 में नगरीय प्रशासन के सम्बन्ध में स्पष्ट प्रावधान किया गया.<

स्वतंत्रता के बाद नगरीय प्रशासन -नगरीय शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में मूल संविधान में कोई प्रावधान नहीं किया गया था, लेकिन इसे सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में शामिल करके यह स्पष्ट कर दिया गया था कि इस सम्बन्ध में क़ानून केवल राज्यही बना सकते थे. इन क़ानूनों के अनुसार नगरीय शासन व्यवस्था के संचालन के लिए निम्नलिखित निकायों को गठित करने के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया था - नगर निगम, नगर पालिका, नगर क्षेत्र समितियाँ, अधिसूचित क्षेत्र समिति तथा छावनी परिषद्.

74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम एवं नगरीय प्रशासन के संवैधानिक प्रावधान

22 दिसम्बर, 1992 को लोकसभा ने तथा 23 दिसम्बर, 1992 को राज्यसभा ने 74वां संविधान संशोधन पारित किया और 20 अप्रैल, 1993 को राष्ट्रपति ने इसे अनुमति प्रदान की. इसे 1 जून, 1993 से लागू किया गया. इसके व्दारा संविधान में भाग 9-क के अंगर्तत नये अनुच्छेद (243 त से 243 य छ तक) एवं 12वीं अनुसूची जोड़कर निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं –

  1. अनुच्छेद 243 त – परिभाषा
  2. अनुच्छेद 243 थ - नगर पालिकाओं का गठन
  3. अनुच्छेद 243 द - नगर पालिकाओं की संरचना
  4. अनुच्छेद 243 ध - वार्ड समितियों आदि का गठन और संरचना
  5. अनुच्छेद 243 न - स्थानों का आरक्षण
  6. अनुच्छेद 243 प - नगर पालिकाओं की अवधि आदि
  7. अनुच्छेद 243 फ - सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
  8. अनुच्छेद 243 ब - नगरपालिकाओं आदि की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तदायित्व
  9. अनुच्छेद 243 भ - नगरपालिकाओं द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्ति और उनकी निधियाँ
  10. अनुच्छेद 243 म - वित्त आयोग
  11. अनुच्छेद 243 य - नगरपालिकाओं के लेखाओं की संपरीक्षा
  12. अनुच्छेद 243 य क - नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन
  13. अनुच्छेद 243 य ख - संघ राज्य क्षेत्रों को लागू होना
  14. अनुच्छेद 243 य ग - इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
  15. अनुच्छेद 243 य घ - ज़िला योजना के लिए समिति
  16. अनुच्छेद 243 य ङ - महानगर योजना के लिए समिति
  17. अनुच्छेद 243 य च - विद्यमान विधियों पर नगर पालिकाओं का बना रहना
  18. अनुच्छेद 243 य छ - निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्णन

बारहवीं अनुसूची

इसमें शामिल विषयों के सम्बन्ध में राज्य विधानमण्डल क़ानून बनाकर नगरीय संस्थानों को अधिकार एवं दायित्व सौंप सकते हैं –

  1. नगरीय योजना (इसमें शहरी योजना भी सम्मिलित है)
  2. भूमि उपयोग का विनियम और भवनों का निर्माण
  3. आर्थिक और सामाजिक विकास की योजना
  4. सड़के और पुल
  5. घरेलू, औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रयोजनों के निमित्त जल की आपूर्ति
  6. लोक स्वास्थ्य, स्वच्छता, सफ़ाई तथा कूड़ा-करकट का प्रबन्ध
  7. अग्निशमन सेवाएँ
  8. नगरीय वानिकी, पर्यावरण का संरक्षण और पारिस्थितिक पहलुओं की अभिवृध्दि
  9. समाज के कमज़ोर वर्गों (जिसके अन्तर्गत विकलांग और मानसिक रूप से मन्द व्यक्ति सम्मिलित हैं) के हितों का संरक्षण
  10. गन्दी बस्तियों में सुधार
  11. नगरीय निर्धनता में कमी
  12. नगरीय सुख-सुविधाओं, जैसे पार्क, उद्यान, खेल का मैदान इत्यादि की व्यवस्था
  13. सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सौन्दर्यपरक पहलुओं की अभिवृध्दि
  14. क़ब्रिस्तान, शव गाड़ना, श्मशान और शवदाह तथा विद्युत शवदाह
  15. पशु-तालाब तथा जानवरों के प्रति क्रूरता को रोकना
  16. जन्म-मरण सांख्यिकी (जन्म-मरण पंजीकरण सहित)
  17. लोक सुख सुविधायें (पथ-प्रकाश, पार्किंग स्थल, बस स्टाप, लोक सुविधा सहित)
  18. वधशालाओं तथा चर्म शोधनशालाओं का विनियमन
    1. छत्तीसगढ़ में नगरीय प्रशासन से संबंधित महत्वपूर्ण सांख्यिकी

      1. नगर पालिक निगम – 13 इनके वार्ड 688
      2. नगर पालिका परिषद् – 44 – इनके वार्ड 864
      3. नगर पंचायत – 111 – इनके वार्ड 3217
      4. कुल नगरीय निकाय – 168 – कुल वार्ड – 4769

      नगर पालिक निगम

      1. इसमें महापौर एवं वार्डों के पार्षर्दो का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता है.
      2. इसके अतिरिक्त विशेष अनुभव रखने वाले 6 सदस्य राज्य सरकार नामांकित कर सकती है जो एल्डरमैन कहलाते हैं.
      3. लोक सभा सांसद, एवं विधायक जिनका क्षेत्र पूर्ण अथवा आंशिक रूप से नगर पालिक निगम के क्षेत्र में आता है, अथवा उनके प्रतिनिधि
      4. राज्य सभा सदस्य जो उस नगर पालिक निगम के क्षेत्र में मतदाता सूची में पंजीक्रत हों
      5. एल्डरमैन का कार्यकाल शासन के विवेकाधिकार पर होता है. उसकी निश्चित अवधि निर्धारित नहीं है.
      6. बैठकों में मतदान का अधिकार केवल महापौर और निर्वाचित पार्षदों को है.
      7. किसी भी नगर पालिक निगम में वार्डो की न्यूनतम संख्या 40 एवं अधिकतम संख्या 70 हो सकती है, परंतु 10 लाख से अधिक जनसंख्या, वाले निगमों में वार्डों की संख्या 85 तक हो सकती है.

      स्थानों का आरक्षण

      1. वार्डों की कुल संख्या में से आरक्षित अनुसूचि‍त जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित वार्डों की संख्या उस नगरीय क्षेत्र में यथास्थिति अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या के अनुपात में होगी. ऐसे वार्डों को आरक्षित किया जायेगा जिनमें अजा/अजजा की जनसंख्या सर्वाधिक है.
      2. जिन निगमों में 50% या कम स्थान आरक्षित हैं तो कुल आबादी में अपिव की आबादी के अनुपात में 50% आरक्षण होने तक अपिव के लिये उनकी जनसंख्या के अवरोही क्रम में स्थान आरक्षित किये जायेंगे.
      3. यदि अपिव के लिये आरक्षित किसी वार्ड में कोई नामांकन फाइल नहीं होता है तो कलेक्टर उसे अनारक्षित वार्ड के रूप में घोषित करेगा.
      4. कुल स्थानों का एक तिहाई महिलाओं के लिये आरक्षित होगा. यह आरक्षण क्षैतिज आरक्षण होगा.
      5. महापौर के पदो का आरक्षण – कुल निगमों के महापौरों के पदों में से उस संख्या में महापौर के पद अजा/अजजा के लिये आरक्षित रखे जायेंगे जो राज्य के सभी निगमों की सीमाओं में अजा/अजजा की जनसंख्या के अनुपात में होगा. महापौर के पदों में से यथासंभव 25% अपिव के लिये आरक्षित किये जायेंगे. महापौर के पदों में भी एक तिहाई का महिलाओं के लिये क्षैतिज आरक्षण होगा.
      6. नगर पालिकाओं एवं नगर पंचायतों में भी आरक्षण नगर निगम के समान ही होगा.

      मतदाताओं की अर्हता

      आयु 18 वर्ष तथा निगम के किसी वार्ड का निवासी होना चाहिए.

      महापौर/पार्षद के रूप में निर्वाचन की निरर्हता

      1. महापौर के लिये आयु 25 वर्ष तथा पार्षद के लिए 21 वर्ष न होने पर
      2. जमाखोरी, मुनाफाखोरी, खाद्य और औषधि अपमिश्रण या दहेज प्रतिषेध अधिनियम में दोषसिध्द, होने पर.
      3. विक्रत चित्त,
      4. दीवालिया
      5. शासन या स्थानीय प्राधिकारी की सेवा में हो या अभिभाषक हो
      6. निगम के किसी कार्य में हित रखता हो
      7. एक वर्ष से अधिक अवधि से निगम का बकायेदार हो
      8. विद्युत मंडल की 6 माह से अधिक की देनदारी हो
      9. वोटर लिस्ट में नाम न हो
      10. निर्धारित प्रारूप मे कलेक्टर के समक्ष शपथ लेना अनिवार्य है. यदि बिना संभागीय आयुक्त की अनुमति के महापौर या पार्षद 3 माह तक शपथ न ले तो उसका निर्वाचन स्वयमेव समाप्त होकर पद रिक्त हो जायेगा

      अध्यक्ष/सभापति (स्पीकर)

      1. महापौर एवं पार्षदों के निर्वाचन की अधि‍सूचना के 15 दिन के भीतर कलेक्टर की उपस्थिति में आयोजित बैठक में गुप्त‍ मतदान व्दारा पार्षदों में से एक अध्यक्ष निर्वाचित किया जायेगा.
      2. अध्यक्ष का कार्य निगम के सम्मिलनों की अध्यक्षता करना है. अध्यक्ष की अनुपस्थिति में अध्यक्ष व्दारा नामांकित 2 पार्षदों में से एक सम्मिलन की अध्यक्षता करेंगे.
      3. अध्यक्ष का कार्यकाल निगम के कार्यकाल के बाराबर होगा.
      4. अध्यक्ष के लिये आरक्षण का प्रावधान नही है.
      5. अध्यक्ष के विरुध्द अविश्वास प्रस्ताव – निगम के पार्षदों की कुल संख्या के 1/3 सदस्यों व्दारा कलेक्टर को हस्ताक्षर युक्त अनुरोध करने पर कलेक्टर व्दारा 10 दिनों के भीतर पूर्व सूचना देकर निगम का विशेष सम्मिलन आहूत किया जोयगा. इस सम्मिलन में उपस्थित तथा मतदान करने वाले निर्वाचित पार्षदों के 2/3 बहुमत से तथा कुल पार्षदों के आधे से अधि‍क सदस्यों व्दारा अध्यक्ष को हटाये जाने का प्रस्ताव पारित होने पर अध्यक्ष का पद रिक्त हो जायेगा. अध्यक्ष के पद ग्रहण करने से 2 वर्ष के भीतर अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता.

      महापौर, अध्य‍क्ष या पार्षद का हटाया जाना

      राज्य सरकार की राय में यदि महापौर या अध्यक्ष का पद पर बने रहना लोकहित में या निगम हित में वांछनीय न हो या वे अपने कर्तव्य के पालन में अक्षम हों या निर्धारित आरक्षित प्रवर्ग से न हों तो राज्य सरकार संबंधित को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात पद से हटाने का आदेश पारित कर सकेगी.

      पार्षदों को भी इन्हीं कारणों से तथा ऐसी ही प्रक्रिया का पालन करके संभागायुक्त वदारा पद से हटाया जा सकेगा.

      महापौर व्दारा त्यागपत्र

      लिखित में त्याग पत्र देने पर राज्य सरकार उसे स्‍वीकार कर सकती है, परंतु कदाचरण के दोषी महापौर का त्यागपत्र स्वीकार नहीं किया जायेगा.

      अध्यक्ष एवं पार्षदों का त्यागपत्र

      अध्यक्ष या पार्षद महापौर के माध्यम से अथवा सीधे संभाग आयुक्त को त्याग पत्र प्रस्तुत कर सकते हैं.

      महापौर का वापस बुलाया जाना

      निर्वाचित पार्षदों के तीन चौथाई यदि हस्ताक्षरयुक्त अनुरोध प्रस्तुत करते हैं तो वापस बुलाने के लिये गुप्त मतदान कराया जायेगा और यदि निगम क्षेत्र के कल मतदाताओं के आधे से अधिक वापस बुलाने के पक्ष में मतदान करते हैं तो महापौर का पद रिक्त हो जायेगा. यह प्रक्रिया महापौर के पद धारण करने के दो वर्ष के भीतर प्रारंभ नहीं की जायेगी.

      नगर पालिक निगम की अवधि

      प्रथम सम्मिलन से 5 वर्ष. यदि किसी पद की रिक्ति निगम का कार्यकाल 6 माह से अधिक रहने पर होती है तभी उस पद के लिये कार्यकाल की शेष अवधि हेतु निर्वाचन कराया जायेगा.

      पार्षदों के कर्तव्य

      1. निगम के सम्मिलनों में उपस्थित होना तथा एजेंडा में शामिल विषयों पर अपना पक्ष रखना तथा वोट देना.
      2. निगम की किसी योजना के क्रियांवयन में कमी अथवा निगम को होने वाली हानि के प्रति आयुक्त अथवा संबंधित अधिकारी का ध्यान आकृष्ट करना.

      निगम का सम्मिलन

      1. प्रत्येक 2 माह में कम से कम एक बार आवश्यक.
      2. आयुक्त ऐजेंडा तैयार कर महापौर को प्रस्तुत करेगा और महापौर के अनुमोदन के बाद अध्यक्ष को भेजेगा.
      3. अध्यक्ष एजेंडा के विषयों के साथ सम्मिलन की सूचना सभी पार्षदों को भिवायेगा.
      4. विशेष सभा – पार्षदों के 1/3 के लिखित आवेदन पर विशेष सभा बुलाई जाती है.
      5. कोरम – पार्षदों की कुल संख्याा का 1/3 कोरम है. कोरम के अभाव मेंआगामी बैठक की तिथि एवं समय निर्धारित करके अध्यक्ष बैठक स्थागित कर देगा. स्थगित बैठक में कोरम की आवश्यकता नहीं होगी.
      6. सम्मिलन में सामान्य व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व अध्यक्ष का है.

      मेयर इन काउंसिल

      1. पाषदों एवं अध्याक्ष के निर्वाचन के 7 दिन के भीतर महापौर निर्वाचित पार्षदों में से उनकी संख्या के 20% के बारबर सदस्यों को लेकर मेयर इन काउंसिल (महापौर परिषद्) गठन करेगा. इसमें कम से कम 5 और अधिक से अधिक 10 सदस्य होंगे.
      2. मेयर इन काउंसिल में कम से कम 1 सदस्य अजा या अजजा वर्ग से होगा कम से कम 1 अपिव से होगा और कम से कम 1 महिला सदस्य होगी.
      3. मेयर इन काउंसिल के सदस्य महापौर के प्रसाद पर्यन्त कार्य करेंगे.
      4. इन सदस्यों को विभिन्न विभागों का प्रभारी बनाया जा सकता है.
      5. मेयर इन काउंसिल की बैठक का कोरम आधे सदस्यों का है और निर्णय बहुमत से लिया जाता है.
      6. नगर पालिका एवं नगर पंचायत में इसे प्रैसिडेंट इन कांउसिल कहा जाता है.

      सलाहकार समितियां

      1. मेयर इन काउंसिल के प्रत्येक सदस्य के विभाग हेतु अध्यक्ष सलाहकार समितियों का गठन कर सकेगा.
      2. प्रत्येक समिति में 7 से 9 सदस्य होंगे
      3. मेयर इन काउंसिल का प्रभारी सदस्य प्रत्येक माह अपने विभाग की सलाहकार समिति की बैठक आयोजित करेगा.

      वार्ड समितियां

      3 लाख से अधिक जनसंख्या वाली निगमों मे न्युनतम 3 समितियां. 1 लाख पर एक समिति. निर्वाचित पार्षद तथा क्षेत्र में निवास करने वाले 2 व्यक्ति इसके सदस्य होते हैं. इन्हें महापौर नामांकित करते हैं. यह राज्य सरकार व्दारा निर्धारित कार्य संपादित करती हैं.

      मुहल्ला समिति‍यां

      निगम क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में एक मुहल्ला समिति होती है जिसके 10 सदस्य होते हैं. नगर पालिका क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में एक समिति होती है जिसके 7 सदस्य होते हैं. नगर पंचायत क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में एक समिति होती है जिसके 5 सदस्य होते हैं. आधे सदस्य अजा/अजजा/अपिव/महिला होना चाहिये. इनका कार्यकाल निगम के बराबर होता है. इनका कार्य मुहल्ले की विकास योजना बनाना, जनभागीदारी को प्रोत्साहन देना, निगम की संपत्ति को सुरक्षित रखना आदि है.

      आयुक्त

      शासन व्दारा नियुक्त निगम का मुख्य कार्यपालन अधिकारी आयुक्त कहलाता है. निगम के सारे कर्मचारी उसके अधीन होते हैं. आयुक्त का अधिकतम कार्यकाल 5 वर्ष का है. यदि किसी सम्मिलन में उपस्थित ¾ सदस्य आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव पारित करें तो शासन व्दारा आयुक्त को हटाया जायेगा. नगर पालिका एवं नगर पंचायत में मुख्य कार्यपालिक अधिकारी को मुख्य नगरपालिका अधि‍कारी कहा जाता है.

      निगम व्दारा अधिरोपित कर

      संपत्ति कर, जल कर, समामन्य स्वच्छ‍ता कर, सामान्य अग्नि कर, बिक्री पर स्थानीय निकाय कर, बाज़ार फीस, पशुओं की बिक्री पर फीस, निर्यात कर, कालोनी निर्माण पंजीकरण शुल्क अदि.

      नगर पालिका एवं नगर पंचायत

      1. निर्वाचित पार्षदों की संख्या न्यूकतम 15 एवं अधिकतम 40, नगर पालिका में 4 एल्डरमैन एवं नगर पंचायत में 2 एल्डरमैन. विधायक एवं सांसद के सदस्‍यता प्रावधान निगम की भांति. वोट देने का अधिकार केवल निर्वाचित पार्षद को है.
      2. आरक्षण निगम की भांति.
      3. अध्यक्ष तथा पार्षद का निर्वाचन प्रत्यक्ष मतदान से होता है. उपाध्यक्ष का निर्वाचन पार्षदों व्दारा प्रथम सम्मिलन में किया जाता है.
      4. पार्षद को हटाने का अधिकार कलेक्टर को है.
      5. अघ्यक्ष को वापस बुलाने का अधि‍कार निगम के मेयर के समान.
      6. अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष सम्मिलन की अध्‍यक्षता करता है.
      7. शपथ प्रथम सम्मिलन में अुनुविभागीय अधिकारी के समक्ष ली जाती है.
      8. निगम के किसी संकल्प को राज्य शासन रद्द कर सकता है. नगर पालिका एवं नगर पंचायत के लिये यह अधि‍कार कलेक्टर को है.

Urban administration in Chhattisgarh

Development of Urban Administration in India

Urban administration in British period Representative urban administration has been in India from ancient times. It was given legal status in 1687 when the British Government established a Municipal corporation in Madras. Municipal Corporations were established in Madras, Calcutta and Bombay under e charter Act of 1793. Bengal urban administration Act was passed in 1842. Viceroy Lord Ripon made efforts for improvement of urban administration in 1882 but he was not successful due to political reasons. Shahi decentralization Commission was appointed for giving recommendations on decentralization of urban administration in 1909. Provisions for urban administration were made in the Government of India Act 1919 based on the report of this commission.

Urban administration post-independence No specific provision was made about urban administration in the original Constitution but it was made clear by including it in the State list of 7th Schedule that only States can make laws with respect to urban administration. Law were made by different states and municipalities, municipal corporations cantonment boards etc. were established.

74th Constitution amendment and Constitutional Provisions for Urban Administration

This amendment was passed in the Lok Sabha on 22nd December 1992 and by Rajya Sabha on 23rd December1992. President of India gave his assent on this bill on 20th April1993 and it came into force on 1st June 1993. Par 9-A (Articles 243 P to 243 ZG) and 12th Schedule were inserted in the Constitution by this amendment –

  1. Article 243P – Definitions
  2. Article 243Q - Constitution of Municipalities
  3. Article 243R - Composition of Municipalities
  4. Article 243S - Constitution and composition of Wards Committees, etc.
  5. Article 243T - Reservation of seats
  6. Article 243U - Duration of Municipalities, etc.
  7. Article 243V - Disqualifications for membership
  8. Article 243W - Powers, authority and responsibilities of Municipalities etc.
  9. Article 243X - Power to impose taxes by, and Funds of, the Municipalities
  10. Article 243Y Finance Commission
  11. Article 243Z - Audit of accounts of Municipalities
  12. Article 243ZA - Elections to the Municipalities
  13. Article 243ZB - Application to Union territories
  14. Article 243ZC - Part not to apply to certain areas
  15. Article 243ZD - Committee for district planning
  16. Article 243ZE - Committee for Metropolitan planning
  17. Article 243ZF - Continuance of existing laws and Municipalities
  18. Article 243ZG - Bar to interference by Courts in electoral matters

Twelfth Schedule

State legislature can transfer these subjects by law to urban local bodies –

  1. Regulation of land use and construction of land buildings.
  2. Urban planning including the town planning.
  3. Planning for economic and social development
  4. Urban poverty alleviation
  5. Water supply for domestic, industrial and commercial purposes
  6. Fire services
  7. Public health sanitation, conservancy and solid waste management
  8. Slum improvement and up-gradation
  9. Safeguarding the interests of the weaker sections of society, including the physically handicapped and mentally unsound
  10. Urban forestry, protection of environment and promotion of ecological aspects
  11. Construction of roads and bridges
  12. Provision of urban amenities and facilities such as parks, gardens and playgrounds
  13. Promotion of cultural, educational and aesthetic aspects
  14. Burials and burials grounds, cremation and cremation grounds and electric crematoriums
  15. Cattle ponds, prevention of cruelty to animals
  16. Regulation of slaughter houses and tanneries
  17. Public amenities including street lighting, parking spaces, bus stops and public conveniences
  18. Vital statistics including registration of births and deaths

Important Statistics of Urban Administration in Chhattisgarh

  1. Municipal Corporation – 13, wards 688
  2. Municipal Committees – 44 – wards 864
  3. Nagar Panchayats – 111 – wards 3217
  4. Total urban Local Bodies – 168 – Total Wards – 4769

Municipal Corporation

  1. The Mayor and Councilors are directly elected.
  2. In addition 6 members having special experience are nominated by the State Government. They are called Aldermen.
  3. Members of Parliament and Members of Legislative assembly or their representatives, whose constituency are either fully or partially in the Municipal Corporation, are also members.
  4. Members of Rajya Sbha who are registered as voter in the Municipal Corporation area are also members.
  5. The tenure of Alderman is not fixed. They work during the pleasure of the State Government.
  6. The right to vote in the meetings is only for Major and elected members.
  7. The number of wards in a Municipal Corporation is from 40 to 70 but can to up to 85 in corporations with a population more than 10 lakh.

Reservation of Seats

  1. The number of wards reserved for SC and ST is in proportion to the population of SC/ST in the corporation area. Those ward shall be reserved which have the highest population of SC/ST.
  2. Those Municipal Corporations in which the number of wards reserved for SC/ST is less than 50% will have reservation for OBC in proportion to the population of OBC in the Municipal Corporation area to the extent that total reservation of wards does not exceed 50% and the reservation shall be in the descending order of the population of OBC.
  3. If no nomination is filed in a ward reserved for OBC the Collector shall declare it to be unreserved.
  4. There shall be horizontal reservation for women in one third of the total seats.
  5. Reservation for the post of Mayor – The reservation for the posts of Mayor for SC/ST shall be in proportion to the SC/ST population within the boundaries o all the Municipal Corporations of the State. As far as may be 25% posts of Mayor shall be reserved for OBC in the State. These shall be horizontal reservation for women in one third of the posts of Mayor.
  6. The reservation in Municipal Committees and Nagar Panchayats shall also be similar to reservation of seats in Municipal Corporations.

Qualifications to be a voter

Age 18 years and should be a resident of any ward of the Municipal Corporation.

Disqualification for election as Mayor/ Councilor

  1. Age for Mayor is 25 years and for Councilor is 21 years.
  2. On being convicted for hoarding, profiteering, Food and Drug adulteration or dowry prohibition Act.
  3. Unsound mind
  4. Bankruptcy
  5. In service of Government or local bodies or advocate for them
  6. Has an interest in any work of the Municipal Corporation
  7. Is in arrears of the Corporation for more than one year.
  8. Is in arrears of Electricity Board for more than 6 months.
  9. Name not in the voters’ list
  10. It is necessary to take oath before the Collector in the prescribed format. If oath is not taken without the permission of the Commissioner for 3 moths after election, the post of the Mayor or Councilor shall become vacant.

Speaker

  1. Speaker shall be elected by secret ballot in a meeting held in the presence of the collector, within 15 days of the notification for election of the Mayor and Councilors.
  2. The speaker presides over the meetings of the Corporation. He appoints 2 members to preside over the meetings in his absence.
  3. The tenure of the speaker shall be equal to the duration of the corporation.
  4. There is no provision of reservation for the post of speaker.
  5. No confidence Motion against the speaker – On a written request with signatures of 1/3rd Councilors the Collector shall call a meeting to consider the no confidence motion against the speaker within 10 days, by giving prior notice. The motion is carried by 2/3rd Councilors present and voting and more than half of the total Councilors of the corporation and the post of the speaker becomes vacant. Motion of no confidence cannot be brought within 2 years of the speaker taking charge.

Removal of Mayor, Speaker and Councilor

If in the opinion of the State Government continuation of a person as Mayor, speaker is not in public interest or not in the interest of the Corporation or he is incompetent or not of the category for which his post is reserved then the State Government may after giving an opportunity of being heard, remove him.

Councilors can be removed for similar reasons and by following a similar process by the divisional Commissioner.

Resignation by Mayor

The State Government may accept the resignation in writing by a Mayor, but the resignation of a Mayor guilty of misconduct shall not be accepted.

Resignation of Speaker and Councilors

Speaker or Councilors may submit their resignation to the Divisional Commissioner either directly or through the Mayor.

Recall of Mayor

If three fourth of the elected Councilors submit a signed request for this purpose, a secret ballot shall be held for recall of Mayor and if more than half of the total voters vote in favor of the motion to recall the Mayor the post of Mayor shall become vacant. This process cannot be started within 2 years of the Mayor taking office.

Duration of Municipal Corporation

Duration of Municipal Corporation is 5 years from the date of its first meeting. It shall be necessary to hold elections only if a post falls vacant more than 6 months before the duration of the corporation comes to an end.

Duties of Councilors

  1. To be present in the meetings of the Corporation and to keep their point of view in the meeting and to vote in the meeting.
  2. To bring to the notice of the Commissioner or the concerned officer of the Corporation any deficiency in any scheme of the Corporation of any loss to the corporation.

Meetings of the Corporation

  1. A meeting should be held at least once in two months.
  2. The Commissioner will get the agenda approved by the Maor and send it to the Speaker.
  3. The speaker will get a notice served on all the Councilors along with a copy of the agenda.
  4. Special Meeting – Is called on the written request by 1/3rd of the Councilors.
  5. Quorum – The quorum is 1/3rd of the total Councilors. In the absence of quorum the meeting is postponed by the speaker to another date and time. No quorum is required for the postponed meeting.
  6. The speaker is responsible for keeping order in the meeting.

Mayor in Council

  1. Within 7 days of the election of Mayor and Councilors the Mayor shall constitute a Mayor in council from elected councilors with 20% of the elected councilors. The Mayor in council will have at least 5 and a maximum of 10 members.
  2. At least one member of Mayor in council shall be from SC/ST, 1 from OBC and there shall be at least one woman.
  3. The members of Mayor in council work during the pleasure of the Mayor.
  4. These members can be given charge of different departments of the Corporation.
  5. The quorum of the meeting of Mayor in Council is half of the total members. Decisions are by majority vote.
  6. It is called President in Council for Municipal Committee and Nagar panchayat.

Consultative Committees

  1. The speaker will constitute a consultative committee for each department of the members of Mayor in Council.
  2. Every consultative committee shall have 7 to 10 members.
  3. Member of a departmen in Mayor in Council shall hold a meeting of the consultative committee of his department every month.

Ward Committees

There shall be a minimum of 3 committees for Municipal Corporations of up to 3 lakh population. For Corporations with population more than 3 lakh there shall be a committee for each lakh population. The elected councilors and 2 persons residing in the area and nominated by the Mayor are members of these committees. They perform such functions as are decided by the State Government.

Muhalla Committees

There is a Muhalla Committee for each ward of the Municpal Corporation. It has 10 members for Municipal Corporation, 7 for Municipal Committee and 5 for Nagar Panchayats. Half of the members are from SC/ST/OBC/Women. Their tenure is for the duration of the Corporation. Their function is to make development plans, keep municipal property safe and encourage community participation.

Commissioner

The Chief Executive officers of the Municipal Corporation appointed by the Government is called Commissioner. All the employees of the Corporation are subordinate to him. The maximum tenure of the Commissioner is 5 years. If 3/4th Councilors present and voting in a meeting pass a motion for removal of the Commissioner, the Commissioner shall be removed by the Government. The Chief Executive Officer of the Municipal Committee and Nagar Panchayat is called Chief Municipal Officer.

Taxes Imposed by the Corporation

Property Tax, Water Tax, General Sanitation Tax, General Fire Tax, Local Tax on sale, Bazar Fees, Fees on sale of animals, Export Tax, Colon Registration Fess etc.

Municipal Committee and Nagar Panchayat

  1. In a Municipal Committee the minimum number of elected councilors is 15 and maximum 40, and the number of Aldermen is 4. In Nagar Panchayat the number of Aldermen is 2. The provisions about MLA and MP are the same as Municipal Corporation. Only elected members have a vote.
  2. Reservation is like Corporation.
  3. President and Councilors are elected by direct election and Vice-President is elected by the Councilors in the first meeting.
  4. The authority to remove the councilors is with the collector.
  5. The process of recall of the president is like Mayor.
  6. Vice-President presides over the meetings in the absence of the President.
  7. The oath is taken before the SDO.
  8. The resolution of the Corporation can be cancelled by the State Government and for Municipal Committee and Nagar Panchayat is with the Collector.

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