छत्तीसगढ़ की जनजातियां
Tribes of Chhattisgarh
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छत्तीसगढ़ की जनजातियां - (हिन्‍दी में)

Tribes of Chhattisgarh - (In English)

छत्तीसगढ़ की जनजातियां

छत्तीसगढ़ की जनजातीय भाषाएं

  1. छत्तीसगढ़ की सभी जनजातियों में प्रोटो-आस्ट्रोलायड प्रजातीय के 45 प्रतिशत लक्षण पाये जाते हैं.
  2. मुण्डा, कोरबा, मांझी, खरिया, गदबा, बिरहोर, संवारा आदि आस्ट्रोलायड भाषा परिवार की बोली बोलते है.
  3. द्रविड़ भाषा परिवार की बोली में गोंड़ (गोंड़ी या कोया) उरांव (कुडुख बोली) दोरला तथा परजा आदि बोली आती हैं.
  4. मूल बोली व भाषा भूलकर जिन जनजातियों ने क्षेत्रीय बोली छत्तीसगढ़ी को अपनाया है वे हैं - कंवर, बिंझवार, भूंजिया, धनवार, मैना, बैगा और हल्बा.
  5. प्रदेश की जनजातियों की सबसे समृद्ध बोली व भाषा में गोंडी, हल्बी, मुण्डा है. इसमें हल्बी और गोंडी में साहित्य लेखन भी समृध्द है.
  6. जनजातीय भाषा हल्बी व गोंडी में प्रकाशित होनेवाला प्रदेश का एक मात्र साप्ताहिक अखबार बस्तिरया जगदलपुर से प्रकाशित होता है.

छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर शोध और पुस्तकें

  1. छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर सर्वप्रथम शोध करने वाले समाजशास्त्रियों में वेरियर एलविन का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है. इनकी पुस्तके हैं - द बैगा, द रीलिजन आफ इन्डीयन ट्राइब्स, द मुरियाज एंड देयर घोटूल, द अगरिया, मुरिया मर्डर एंड सुसाईड.
  2. बस्तर की जनजातियों पर डब्‍ल्‍यू. बी. गिर्यसन ने भी काफी महत्वपूर्ण शोध ग्रन्थ लिखा. उनकी पुस्तक है - द मुरिया गोंड आफ बस्तर.
  3. बस्तर के पूर्व कलेक्टर रह चुके प्रसिध्द समाजसेवी व जन आंदोलन से जुड़े श्री ब्रम्हदेव शर्मा की पुस्तकें आदिवासी विकास - एक सैध्दांतिक विवेचन, और आदिवासी स्वशासन भी काफी चर्चित हैं.
  4. अन्य चर्चित पुस्तकें - बस्तर भूषण - केदारनाथ ठाकुर, आदिवासियों के बीच - श्री चंद जैन.

छत्तीसगढ़ के जनजातियों के प्रमुख आभूषण

  1. लुरकी - यह कानों में पहना जाता है, जो पीतल, चांदी, तांबे आदि धातुओं का बना होता है. इसे कर्ण फूल, खिनवा आदि भी कहा जाता है.
  2. करधन - चांदी गिलट या नकली चांदी से बना यह वजनी आभूषण छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी जनजाति की महिलाओं व्दारा कमर में पहना जाने वाला आभूषण है. इसे करधनी भी कहते है.
  3. सूतिया - गले में पहना जाने वाला यह आभूषण ठोस गोलाई में एल्यूमिनियम, गिलट, चांदी, पीतल आदि का होता है.
  4. पैरी - पैर में पहना जाता है, गिलट यया चांदी का होता है. इसे पैरपटटी, तोड़ा या सांटी भी कहा जाता है. कहीं-कहीं इसका नाम लच्छा भी है.
  5. बांहूटा - बांह में स्त्री पुरूष दोनो व्दारा पहना जाने वाला यह आभूषण अकसर चांदी या गिलट का होता है. इसे मैना जनजाति में पहुंची भी कहा जाता है. भुंजिया इसे बनौरिया कहते है.
  6. बिछियां - पैर की उंगलियों में पहना जाता है. यह चांदी का होता है. इस का अन्य नाम चुटकी बैगा जनजाति में अपनाया जाता है.
  7. ऐंठी - यह कलाई में पहना जाने वाला आभूषण है, जो कि चांदी, गिलट आदि से बनाया जाता है. इसे ककना और गुलेठा भी कहा जाता है.
  8. बन्धा - गले में पहना जाने वाली यह सिक्कों का माला होती है, पुराने चांदी के सिक्कों की माला आज भी आदिवासी स्त्रियों की गले की शोभा है.
  9. फुली - यह नाक में पहना जाता है, चांदी, पीतल या सोने का भी होता है, इसे लौंग भी कहा जाता है.
  10. धमेल - गले में पहना जानेवाला यह आभूषण चांदी या पीतल अथवा गिलट का होता है. इसे सरिया व हंसली भी कहा जाता है.
  11. नागकोरी - यह कलाई में पहना जाता है.
  12. खोंचनी - यह सिर के बालों में लगाया जाता है. बस्तर में मुरिया, माडि़या आदिवासी इस लकड़ी से तैयार करते हैं. अनेक स्था नों पर चांदी या गिलट का तथा कहीं पत्थर भी प्रयोग किया जाता है. बस्तर में प्लास्टिक कंघी का भी इस्तेमाल इस आभूषण के रूप में होता है. इसे ककवा कहा जाता है.
  13. मुंदरी - यह हाथ में उंगलि‍यों पहना जाने वाला धातु निर्मित आभूषण है, बैगा जनजाति की युवतियां इसे चुटकी भी कहती है.
  14. सुर्डा/सुर्रा - यह गले में पहना जाता है. गिलट या चांदी निर्मित यह आभूषण छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की एक पहचान है.

छत्तीसगढ़ की जनजातियों में प्रचलित विवाह

  1. पैठुल विवाह- अगरिया जनजाति में इसे ढूकू तथा बैगा जनजाति में पैढू कहा जाता है. बस्तर संभाग की जनजातियों में यह ज्यादा लोकप्रिय है. इसमें कन्या अपनी पसंद के लड़के के घर घुस जाती है. जिसे लड़के की स्वीकृति पर परिवार के विरोध के बाद भी सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है. कोरबा जनजाति में भी ढुकु विवाह होता है.
  2. लमसेना - यह सेवा विवाह का रूप है तथा संपूर्ण छत्तीसगढ़ की जनजातियों में इसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है. इस विवाह में विवाह योग्य युवक को कन्या के घर जाकर एक या दो वर्ष कभी इससे ज्यादा समय तक अपनी शारीरिक क्षमता का परिचय देना पड़ता है. अपने भावी ससुराल में परिवार के सदस्य की तरह मेहनत करते हुए उसे कन्या के साथ पति की तरह रहने की स्वतंत्रता रहती है, किंतु विवाह का निर्णय संतुष्टि के बाद ही लिया जाता है. बस्तर में इस तरह के विवाह कभी-कभी एक या अधिक बच्चों के जन्म के बाद भी होते हैं. इस तरह की विवाह पध्दति कंवर, गोंड, भील, मारिया, माड़ि‍या बिंझवार, अगरिया, कोरवा आदि जनजातियों में अपनायी जाती है. कंवर इसे घरजन और बिंझवार घरजिया कहते है.
  3. गुरांवट - यह एक प्रचलित विवाह पध्दति है, जो संपूर्ण छत्तीसगढ़ में गैर जन-जातीय व जन-जातीय दोनो समूहों में अपनायी जाती है. इसमें दो परिवारों के बीच दो विवाह एक साथ संपन्न होते हैं, जिसमें दोनो परिवार की लड़कियों को एक-दूसरे के लड़कों के लिए वधु के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है. इसे बिरहोर जनजाति में गोलत विवाह भी कहा जाता है.
  4. भगेली - भगेली विवाह का प्रचलन गोड जनजाति में हैं, यह लड़के और लड़की की मर्जी से होता है. लड़की के मां-बाप के राजी न होने की स्थिति में लड़की अपने घर से भागकर रात्रि में अपने प्रेमी के घर आ जाती है, जहां छपरी के नीचे आकर खड़ी हो जाती है, और लड़का एक लोटा पानी अपने घर के छप्पर पर डालता है, जिसका पानी लड़की अपने सिर पर झेलती है. इसके पश्चात् लड़के की मां उसे घर के अंदर ले आती है. फिर गांव का मुखिया या प्रधान लड़की को अपनी जिम्मेदारी में ले लेता है और लड़की के घर उसने भगेली होने की सूचना देता है. फिर रात्रि में मड़वा गाढ़कर भांवर कराया जाता है. अक्‍सर लड़की के माता-पिता अन्न और भेंट पाकर राजी हो जाते हैं.
  5. चढ़ विवाह - इस तरह के विवाह में दुल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है और विधि-विधान तथा परंपरागत तरीके से विवाह रस्म को पूर्ण करता है. इसके बाद वह दुल्हन को विदा कराकर अपने साथ ले आता है. छत्तीसगढ़ की प्रायः सभी जनजातियों में यह विवाह का प्रचलित तरीका है.
  6. पठोनी विवाह- इस विवाह में लड़की बारात लेकर लड़के के घर आती है लड़के के घर पर ही मंडप में विवाह संपन्न होता है, तदुपरान्त दुल्हा को विदाकराकर के अपने घर ले आती है. इस तरह का विवाह छत्तीसगढ़ में अत्यन्त अल्प रूप में गोंड जनजाति में देखने को मिलता है.
  7. उढ़रिया - इस विवाह को पलायन विवाह कहना ज्यादा उचित है. इसे उधरिया भी कहा जाता है. इस तरह का विवाह भी प्रायः सभी जनजातियों में होता है. यह प्रेम विवाह है, जिसमें लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद कर लेते हैं. माता-पिता की अनिच्छा के बाद भी अपने सहेली और मित्रों के साथ किसी मेला-मड़ई या बाजार में मिलते हैं और वहीं से एक साथ हो किसी रिश्तेदार के यहां जा पहुंचते हैं, जहां उनके आंगन में डाली गाढ़कर अस्थाई विवाह करा दिया जाता है. बाद में पंचों व रिश्तेदारों के प्रयास से मां-बाप को राजी कराकर स्थायी विवाह करा लिया जाता है.
  8. पारिंगधन - क्रय विवाह, मुख्यतय: खैरवार जनजाति में होता है.
  9. हल्दी-पानी - विधवा या विधुर पुर्नविवाह.
  10. अर-उतो- विधवा विवाह.
  11. पायसोतुर - वर व्दारा वधु का अपहरण.
  12. पोटा - विवाहित स्त्री का दूसरे से विवाह.

गोंड

गोंड जनजाति भारत की एक प्रमुख जनजाति है. भारत के कटि प्रदेश - विंध्यपर्वत, सतपुड़ा पठार, छत्तीसगढ़ मैदान में दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम - में गोदावरी नदी तक फैले हुए पहाड़ों और जंगलों में रहनेवाली आस्ट्रोलायड नस्ल तथा द्रविड़ परिवार की एक जनजाति, जो संभवत: पाँचवीं-छठी शताब्दी में दक्षिण से गोदावरी के तट को पकड़कर मध्य भारत के पहाड़ों में फैल गई. गोंडों की भाषा गोंडी है जो द्रविड़ परिवार की है.

गोंड देवी- देवता और धर्म –

  1. बड़ादेव (सृजन करने वाली शक्ति), दुल्हा दुल्ही देव (शादी विवाह सूत्र में बाँधने वाला देव), पंडा पंडिन (रोग दोष का निवारण करने वाला देव), बूड़ादेव (बूढाल पेन) कुलदेवता या पुरखा, जिसमे उनके माता पिता को भी सम्मिलित किया जाता है, नारायण देव (सूर्य) और भीवासू गोंडों के मुख्य देवता हैं.
  2. इनके अतिरिक्त ग्रामों में ग्राम देवता के रूप में खेरमाई (ग्राम की माता), ठाकुर देव, खीला मुठ्वा, नारसेन (ग्राम की सीमा पर पहरा देने वाला देव), ग्राम के लोगों की सुरक्षा, फसलों की सुरक्षा, पशुओं की सुरक्षा, शिकार, बीमारियों और वर्षा आदि के भिन्न भिन्न देवी देवता हैं.
  3. इन देवताओं को बकरे और मुर्गे आदि की बलि देकर प्रसन्न किया जाता है.
  4. गोंडों का भूत प्रेत और जादू टोने में अत्यधिक विश्वास है और इनके जीवन में जादू टोने की भरमार है.
  5. अनेक गोंड लंबे समय से हिंदू धर्म तथा संस्कृति के प्रभाव में हैं और कितनी ही जातियों तथा कबीलों ने बहुत से हिंदू विश्वासों, देवी देवताओं, रीति रिवाजों तथा वेशभूषा को अपना लिया है.
  6. पुरानी प्रथा के अनुसार मृतकों को दक्षिण दिशा की ओर सिर रखकर दफनाया जाता है. मृतक संस्कार में गोंड तीसरे दिन कोज्जी मनाते हैं तथा दसवें दिन कुण्डा मिलान संस्कार होता है.
  7. गोंडों के प्रमुख पर्व नवाखानी, बिदरी, बकपंथी, जवारा, मड़ई, छेरता, लारूकाज आदि हैं.
  8. गोंडों के प्रमुख नृत्य करमा, सैला, भड़ौनी, बिरहा, कहरवा, सजनी, सुआ, दीवानी, गेंडी आदि हैं.
  9. विवाह संबंध –

    1. आस्ट्रोलायड नस्ल की जनजातियों की भाँति विवाह संबंध के लिये गोंड भी सर्वत्र दो या अधिक बड़े समूहों में बंटे रहते हैं. एक समूह के अंदर की सभी शांखाओं के लोग 'भाई बंद' कहलाते हैं और सब शाखाएँ मिलकर एक बहिर्विवाही समूह बनाती हैं.
    2. विवाह के लिये लड़के द्वारा लड़की को भगाए जाने की प्रथा है. विवाह पूरे ग्राम समुदाय व्दारा संपन्न होता है. ऐसे अवसर पर कई दिन तक सामूहिक भोज और सामूहिक नृत्यगान चलता है. वधूमूल्य की प्रथा है और इसके लिए बैल तथा कपड़े दिए जाते हैं.
    3. ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों में विवाह मान्य है जिसे दूध लौटाना कहते हैं.

    खेती –

    1. गोंड खेतिहर हैं और परंपरा से दहिया खेती करते हैं जो जंगल को जलाकर उसकी राख में की जाती है और जब एक स्थान की उर्वरता तथा जंगल समाप्त हो जाते हैं तब वहाँ से हटकर दूसरे स्थान को चुन लेते हैं. किंतु सरकारी निषेध के कारण यह प्रथा बहुत कम हो गई है.
    2. समस्त गाँव की भूमि समुदाय की संपत्ति होती है और खेती के लिये व्यक्तिगत परिवारों को आवश्यकतानुसार दी जाती है.

    इतिहास

    1. 15वीं से 17वीं शताब्दी के बीच गोंडवाना में अनेक गोंड राजवंशों का दृढ़ और सफल शासन स्थापित था.
    2. इन शासकों ने बहुत से दृढ़ दुर्ग, तालाब तथा स्मारक बनवाए और सफल शासकीय नीति तथा दक्षता का परिचय दिया.
    3. इनके शासन की परिधि मध्य भारत से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार तक पहुँचती थी.
    4. 15 वीं शताब्दी में चार महत्वपूर्ण गोंड साम्राज्य थे, जिसमें खेरला, गढ मंडला, देवगढ और चाँदागढ प्रमुख थे.
    5. गोंड राजा बख्त बुलंद शाह ने नागपुर शहर की स्थापना कर अपनी राजधानी देवगढ से नागपुर स्थानांतरित किया था.
    6. गोंडवाना की प्रसिध्द रानी दुर्गावती गोंड राजवंश की रानी थी. रानी दुर्गावती के शौर्य गाथाओं को आज भी गोंडी, हल्बी व भतरी लोकगीतों में बड़े गर्व के साथ गया जाता है.
    7. राजा संग्राम शाह गोंड साम्राज्य के पराक्रमी राजाओं में से एक थे, जिन्होंने अपने पराक्रम के बल पर राज्य का विस्तार व नए-नए किलों का निर्माण किया. 1541 में राजा संग्राम की मृत्यु पश्चात् कुंवर दल्पतशाह ने पूर्वजों के अनुरूप राज्य की विशाल सेना में इजाफा करने के साथ-साथ राज्य का सुनियोजित रूप से विस्तार व विकास किया.
    8. गोंड धर्मं की स्थापना पारी कुपार लिंगो ने शम्भूशेक के युग में की थी. गोंडी धर्मं कथाकारों के अनुसार शम्भूशेक अर्थात महादेवजी का युग देश में आर्यों के आगमन से पहले हुआ था. महादेवों की 88 पीढ़ियों का उल्लेख गोंडी गीत (पाटा), कहानी, किस्से में मौखिक रूप से मिलते हैं. महादेवों की 88 पीढ़ी में प्रथम पीढ़ी शंभू-मूला मध्य पीढ़ी में शंभू-गौरा एवं अंतिम पीढ़ी में शंभू-पार्वती का नाम आता है. प्रमुखतः शंभू-मूला, शंभू-गोंदा, शंभू-सय्या, शंभू-रमला, शंभू-बीरो, शंभू-रय्या, शंभू-अनेदी, शंभू-ठम्मा, शंभू-गवरा, शंभू-बेला, शंभू-तुलसा, शंभू-आमा, शंभू-गिरजा, शंभू-सति आदि तथा अंत में शंभू-पार्वती की जोड़ी का उल्लेख मिलता है. इन महादेवों की पीढ़ी के साथ अनेक लिंगों (धर्म गुरुओं) की गाथाएं भी मिलती है.

    गोंडी भाषा

    1. गोंडी धर्मं दर्शन के अनुसार गोंडी भाषा का निर्माण आराध्य देव शम्भू शेक के डमरू से हुआ है, जिसे गोएन्दाणी वाणी या गोंडवाणी कहा जाता है.
    2. अति प्राचीन भाषा होने की वजह से गोंडी भाषा अपने आप में पूरी तरह से पूर्ण है.
    3. गोंडी भाषा की अपनी लिपि है, व्याकरण है जिसे समय-समय पर गोंडी साहित्यकारों ने पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित किया है.

    छत्तीसगढ़ में गोंड जनजाति

    जनसंख्या की दृष्टि से ये राज्य की सबसे बड़ी जनजाति है. ये बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर, सुकमा,जांजगीर-चंपा और दुर्ग जिले में पाये जाते हैं. गोंड तथा उसकी उपजातियां स्वयं की पहचान ‘कोया’ या ‘कोयतोर शब्दों से करती है जिसका अर्थ ‘ मनुष्य’ या ‘पर्वतवासी मनुष्य’ है. आजादी के पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य के अंतर्गत आने वाली 14 रियासतों में 4 रियासत क्रमशः कवर्धा, रायगढ़, सारंगढ एवं शक्ति गोंड रियासत थीं.

    बैगा

    1. बैगा का अर्थ होता है पुराहित. यह गोंडों के परंपरागत पुरोहित हैं.
    2. इन्हें विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त है.
    3. बैगा जनजाति की उपजातियों में ‘नरोतिया’, ‘भरोतिया’, ‘रायमैना’, ‘कंठमैना’ और ‘रेमैना’ आदि प्रमुख हैं.
    4. बैगा लोगों में संयुक्त परिवार की प्रथा पायी जाती है. इनमें मुकद्दम गाँव का मुखिया होता है.
    5. इन्हें वनौषधियों का अच्छा ज्ञान है. इस जाति के लोग झाड़-फूँक और अंध विश्वास जैसी परम्पराओं में विश्वास करते हैं.
    6. इन्हें गोदना बहुत प्रिय है.
    7. इस जाति का मुख्य व्यवसाय झूम खेती एवं शिकार करना है.
    8. इस जाति के लोग शेर को अपना अनुज मानते हैं.
    9. इनमें सेवा विवाह की ‘लामझेना’, ‘लामिया’ और ‘लमसेना’ प्रथा प्रचलित हैं.
    10. बैगा जनजाति के लोग पीतल, तांबे और एल्यूमीनियम के आभूषण पहनते हैं.
    11. इस जाति में ददरिया प्रेम पर आधारित नृत्य दशहरे पर एवं परधौनी लोक नृत्य विवाह के अवसर पर होता है.
    12. बैगा जनजाति मंडला जिले के चाड़ा के घने जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है.
    13. इस जनजाति के प्रमुख नृत्यों में बैगानी करमा, दशहरा या बिलमा तथा परधौनी नृत्य है. इसके अलावा विभिन्न अवसरों पर घोड़ा पैठाई, बैगा झरपट तथा रीना और फाग नृत्य भी करते हैं. बैगा करधौनी नृत्य विवाह के अवसर पर बारात की अगवानी के समय किया जाता है, इसी अवसर पर लड़के वालों की ओर से आंगन में हाथी बनकर नचाया जाता है. बैगा फाग होली के अवसर पर किया जाता है. इस नृत्य में मुखौटे का प्रयोग भी होता है.

    उरांव जनजाति

    1. ये रायगढ़, जशपुर, सरगुजा और बिलासपुर जिलों में रहते हैं.
    2. इनके नाम पशुओं, पक्षियों, मछली,पौधों तथा वृक्षों के नाम पर रखे जाते हैं.
    3. इनमे लड़के लड़कियां विवाह से पूर्व स्वच्छन्द रहते है. इनमे विवाह से पूर्व यौन संबंधों पर आपत्ति नही की जाती है.
    4. इनमे तलाक,विधवा एवं बहु विवाह का भी प्रचलन है.
    5. उरांव के प्रमुख देवता धर्मेश हैं, जो सूर्य देवता का ही रूप है.
    6. पुरुष घोती और स्त्रियां साड़ी पहनती हैं. पीतल के आभूषण और मोतियों की माला बहुत लोकप्रिय है.
    7. गांव का प्रमुख मांझी होता है. अनेक गांवों से मिलकर परहा बनता है जिसका प्रमुख परहा राजा गांवों के विवादों में फैसला करता है.
    8. बड़ी संख्या में इन्होाने इसाई धर्म ग्रहण कर लिया है.
    9. प्रमुख उत्सव सरहुल और कतिहारी हैं. सरहुल, साल के वृक्ष के फूलने पर आयेजित होता है.
    10. धान बुवाई के समय यह कर्मा नृत्य करते हैं.
    11. इनकी बोली कुरुख है.
    12. इनमें शि‍क्षा का स्तर बहुत अच्छा है और इस समुदाय के काफी लोग उच्च शासकीय पदों पर हैं.

    कोरबा जनजाति

    1. ये कोरबा, बिलासपुर, सरगुजा, सूरजपुर एवं रायगढ़ जिले के पूर्वी भाग में निवास करते हैं.
    2. इनकी उपजाति में दिहाड़ी एवं पहाड़ी कोरबा प्रमुख हैं. दिहाड़ी कोरबा कृषि कार्य करते है. इस कारण इन्हें किसान कोरबा भी कहा जाता है.
    3. पहाड़ी कोरबा को बेनबरिया भी कहा जाता है.
    4. कोरबा जनजाति की अपनी पंचायत होती है, जिसे मैयारी कहते हैं.
    5. कोरबा जनजाति का मुख्य त्योहार करमा होता है.
    6. पहाड़ी कोरबा को विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त है.
    7. पुरुष कमीज, बंडी और धोती पहनते हैं, महिलाएं सफेद साड़ी पहनती हैं.
    8. चावल की बनी हंडि़या शराब इन्हें बहुत प्रिय है.
    9. यह मानते हें कि हल चलाने से धरती को कष्टत होता है इसलिये स्थानान्तंरित कृषि करते हें जिसे बेवार कहा जाता है.
    10. इनके मुख्य देवता बूढ़ा देव, खुडि़या रानी, ठाकुर देव, करम देव आदि प्रमुख हैं.
    11. मुख्य त्योहार करमा, नवाखनी, देवारी, सोहराई, होली आदि हैं. सिंगरी 5 साल में एक बार मनाया जाता है जिसमें महिलाएं भित्ति चित्र बनाती हैं.
    12. मृतक संस्कातर वनाघावी किया जाता है जिसमें कुमारी भात क्रियाकर्म होता है.

    माड़ि‍या जनजाति

    1. ये नारायणपुर, बस्तर, कोंडागांव एवं बिलासपुर जिले में रहते हैं.
    2. यह गोंडों की उपजाति है.
    3. भूमियां, भुईहार एवं पांडो इस जनजाति की प्रमुख उपजाति हैं. ‘भीमसेन’ इन लोगो का मुख्य देवता है.
    4. यह सिर पर सींग पहनकर नृत्य करते हैं इसलिए इन्हें बाइसन हार्न माड़ि‍या भी कहा जाता है.

    हल्बा जनजाति

    1. ये बस्तर, रायपुर, कोंडागांव, कांकेर, सुकमा, दंतेवाड़ा एवं दुर्ग जिले में निवास करते हैं.
    2. इनकी उपजातियों में बस्तरिया, भतेथिया, छत्तीसगढ़िया आदि मुख्य है.
    3. हलवाहक होने के कारण इस जनजाति का नाम हल्बा पड़ा है.

    अबूझमाड़ि‍या

    1. यह भी माड़ि‍या की उपजाति है.
    2. यह अपनी उत्पत्ति कुर्सटुरंगा से मानते हैं, जिन्हें यह अपना पूर्वज मानते हैं.
    3. यह नारायणपुर के अबूझमाढ़ में रहते हैं.
    4. इन्हें विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त है.
    5. इनका प्रिय पेय सल्फी है.
    6. यह स्थानान्तरित खेती करते हैं जिसे पेड्डा कहा जाता है.
    7. प्रमुख आराध्या भूमि देवी हैं.
    8. गायता, गुनिया और बड्डे गांव के प्रमुख माने जाते हैं.
    9. नवाखानी, बीदरी, मड़ई इनके प्रमुख त्योहार हैं.
    10. इनका सबसे प्रसिध्द नृत्य गौर नृत्य है.
    11. अबूझमाढ़ छत्तीसगढ़ का सबसे दूरस्थ और पिछड़ा क्षेत्र है.
    12. यहां पर अभी तक संचार के साधन नहीं पहुंचे हैं.

    मुड़ि‍या

    1. बस्तर की मुड़ि‍या जनजाति अपने सौन्दर्यबोध, कलात्मक रुझान और कला परम्परा में विविधता के लिए ख्यात है.
    2. इस जनजाति के ककसार, मांदरी, गेंड़ी नृत्य अपनी गीतात्मक, अत्यंत कोमल संरचनाओं और सुन्दर कलात्मक विन्यास के लिए प्रख्यात है.
    3. मुड़ि‍या जनजाति में आओपाटा के रूप में एक आदिम शिकार नृत्य-नाटिका का प्रचलन भी है, जिसमें उल्लेखनीय रूप से नाट्य के आदिम तत्व मौजूद हैं.
    4. गेंड़ी नृत्य किया जाता है गीत नहीं गाये जाते. यह अत्यधिक गतिशील नृत्य है. यह घोटुल का प्रमुख नृत्य है, इसमें स्त्रियां हिस्सा नहीं लेती.
    5. ककसार धार्मिक नृत्य-गीत है. नृत्य के समय युवा पुरुष नर्तक अपनी कमर में पीतल अथवा लोहे की घंटियां बांधे रहते है साथ में छतरी और सिर पर आकर्षक सजावट कर वे नृत्य करते है.
    6. मुड़ि‍या परगने का प्रमुख मांझी कहलाता है.
    7. प्रत्येक गांव में एक युवागृह या घोटुल होता है.
    8. यह मुड़ि‍या माता ठाकुर देव और महादेव की पूजा करते हैं.
    9. मृतक के कुछ कपड़े और पैसे उसके उपयोग के लिये साथ दफनाए जाते हैं. युवा मृतक के नाम से स्तंभ भी लगाया जाता है.
    10. मड़ई, नवाखानी, जात्रा, सेसा इनके प्रमुख त्योहार हैं.
    11. यह लकड़ी, बांस के शिल्प और चित्रकला में माहिर होते हैं.
    12. इनकी प्रमुख बोलियां गोंडी और हल्बी हैं.

    कोरकू जनजाति

    1. कोरकू का शब्दिक अर्थ है – मनुष्यों का समूह.
    2. यह गांव के चारों ओर बांस की बाड़ लगाते हैं.
    3. यह अपने को राजपूतों का वंशज मानते हैं.
    4. यह महादेव और चंद्रमा की पूजा करते हैं.
    5. मृतक संस्कार में सिडोली प्रथा है. मृतकों को दफनाया जाता है और मृतक की याद में लकड़ी का स्तंभ गाड़ते हैं.
    6. ये रायगढ़, सरगुजा, बलरामपुर और जशपुर जिलो में निवास करते हैं.
    7. मोवासी, बवारी, रूमा, नहाला, बोडोया आदि इनकी उपजातियां हैं.
    8. इस जनजाति में विवाह संबंध में वधु-धन चुकाना पड़ता हैं.
    9. इनमे तलाक़ प्रथा एवं विधवा विवाह का भी प्रचलन है.

    बिंझवार जनजाति

    1. ये बिलासपुर, रायपुर,बलौदा बाजार जिले में निवास करते हैं.
    2. ये विन्ध्याचल वासिनी देवी की पूजा करते हैं.
    3. ये विंध्यवासिनी के पुत्र बारह भाई बेतकर को अपना पूर्वज मानते हैं.
    4. वीर नारायण सिंह इसी समुदाय के थे.

    कमार जनजाति

    1. ये रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, दुर्ग, गरियाबंद, राजनांदगांव, जांजगीर-चाम्पा, जशपुर, कोरिया, सरगुजा के वन क्षैत्रों में रहते हैं.
    2. इनका मुख्य देवता दूल्हा देव है.
    3. ये अधिकतर कृषि मजदुर के रूप में खेतो में काम करते है.
    4. ये लकड़ी और बांस की चीजें बनाने में निपुण होते है.
    5. इन्हें विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त है.
    6. पहाड़ पर रहने वाले कमार पहड़पटिया और मैदान में रहने वाले बंधरि‍जिया कहलाते हैं.
    7. कमार पुरुष लंबे बाल रखते हैं. धनुष-बाण और कंधे पर कुल्हाड़ी इनकी खास पहचान है.
    8. इनके घर बांस, लकड़ी, घास और मिट्टी के बने होते हैं. कि‍सी की मृत्यु हो जाने पर यह नया घर बसा लेते हैं.
    9. यह स्थानांतरित कृषि करते हैं जिसे दाही या दहिया कहा जाता है.
    10. इनके लिये घोड़े को छूना मना है. यह ठाकुर देव, महादेव, दूल्हा देव और हनुमान की पूजा करते हैं.
    11. मृतकों को दफनाया जाता है.पुर्नजनम की मान्यता है.

    नगेशिया जनजाति

    1. अम्बिकापुर (उत्तर-पुर्व) के डिपाडीह, लखनपुर, अनुपपुर, राजपुर, प्रतापपुर, सीतापुर क्षेत्र, में बसी हुई है.
    2. नगेशिया जनजाति का मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है, यह जनजाति जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है.

    कंवर जनजाति

    1. ये बिलासपुर, रायपुर, रायगढ़, जांजगीर-चाम्पा एवं सरगुजा ज़िलों में रहते हैं.
    2. ये लोग अपनी उत्पत्ति महाभारत के कौरव से बताते हैं.
    3. इनमे सगोत्री विवाह और विधवा विवाह वर्जित है.
    4. सगराखंड इनकी प्रमुख देवता हैं.
    5. ये कृषक एवं कृषक मजदुर है.
    6. यह देशसेवा के लिए फौज में काम करने को अपना परंपरागत कार्य मानते हैं.
    7. यह कृषि, रस्सी बुनना, खाट बनाने आदि का काम करते हैं.

    खैरवार जनजाति

    1. ये सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर तथा बिलासपुर जिले में रहते हैं.
    2. इन्हे कथवार भी कहा जाता है.
    3. कत्था का व्यवसाय करने के कारण इस जनजाति का यह नाम पड़ा है.
    4. गहिरा गुरूजी इसी समुदाय के थे.
    5. चेरवा कंवर, राठिया कंवर और तंवर इनकी शाखाएं हैं.

    भैना जनजाति

    1. सतपुड़ा पर्वतमाला एवं छोटानागपुर पठार के बीच सधन वन क्षेत्र के मध्य बिलासपुर, जांजगीर चाम्पा, रायगढ़, रायपुर, बस्तर जिलो में रहते हैं.
    2. इस जनजाति की उत्पत्ति मिश्र संबंधो के कारण हुई प्रतीत होती है.
    3. किंवदन्ती के अनुसार ये बैगा और कंवर की वर्ण संकर संताने हैं.

    बिरहोर

    1. बिरहोर का अर्थ है – वनचर.
    2. यह जशपुर ओर रायगढ़ जिलों में बसे हैं.
    3. यह मूलत: शिकार पर निर्भर हैं.
    4. इन्हें विशेष पिछड़ी जनजति का दर्जा प्राप्त है.
    5. इनका आर्थिक स्तर काफी पिछड़ा हुआ है.

    अन्य जनजातियां

    अन्य जनजातियों में कोल, परजा, पण्डों, गदबा, भतरा, अगरिया (लौह अयस्क गलाने वाले), धनवार, मझवार, परधान, पारधी आदि हैं.

    जनजातियों के युवा गृह

    बहुत सी जनजातियों में युवाओं के मिलने-जुलने और मनोरंजन के लिए युवा गृह की परंपरा है. इन युवा गृहों में यौन संबंध भी बनते हैं और जीनवसाथी का चुनाव भी होता है. यहां पर युवाओं को जीवन के लिये आवश्यक कौशल भी सिखाए जाते हैं. धीरे-धीरे यह परंपरा अब समाप्त होती जा रही है.

    प्रमुख जनजातियों के युवा गृह

    1. मुड़िया – घोटुल
    2. उंराव – धुमकुरिया
    3. भारिया – रंगबंग
    4. बिरहोर - गितुओना

    घोटुल

    1. यह वेरियर एल्विन की पुस्तक द मुरिया एण्ड देयर घोटुल से प्रसिध्द हो गया.
    2. माड़िया लोगो में घोटुल परंपरा का पालन होता है जिसमे गांव के सभी कुंवारे लड़के लड़कियां शाम होने पर गांव के घोटुल घर में रहने जाते हैं.
    3. कहते हें कि घोटुल की शुरुआत लिंगोपेन नामक देवता ने की थी.
    4. लड़कों को चेलिक और लड़कियो को मुटियारिन कहा जाता है.
    5. घोटुल में लड़कों का प्रमुख सिरदार कहलाता है. एक पद कोटवार का भी होता है. यह दोनो ही पद आम तौर पर बड़े कुवांरे लड़कों को दिये जाते हैं. सिरदार घोटुल का प्रमुख होता है और कोटवार उसे वहां की व्यवस्था संभालने में मदद करता है.
    6. लडकियों की प्रमुख को बेलोसा कहते हैं.
    7. सबसे पहले सारे लड़के घोटुल में प्रवेश करते हैं उसके बाद लड़कियां प्रवेश करती हैं.
    8. कोटवार सभी लड़कियों को अलग अलग लड़कों में बाट देता है.
    9. कोई भी जोड़ा दो या तीन दिनो से ऊपर एक साथ नहीं रहता.
    10. इसके बाद लड़कियां लड़कों के बाल सवांरती है और हाथों की मालिश करके उन्हे तरोताजा करती है.
    11. उसके बाद सभी घोटुल के बाहर नाचते हैं.
    12. नाच में विवाहित औरते हिस्सा नहीं ले सकती लेकिन विवाहित पुरुष ले सकते हैं.
    13. आम तौर पर वे वाद्य बजाते हैं.
    14. नाच में हर लड़के एक हाथ एक लड़की के कंधे पर और दूसरी की कमर पर होता है.
    15. यह आग के चारॊ ओर घेरा बना कर नाचते हैं. नृत्य के समय के साथ तेज होता जाता है.
    16. सबसे पसंदीदा गीत रेला है.

    धुमकुड़िया

    1. धूमकुड़िया उराँव जनजाति का युवागृह होता है.
    2. धुमकुडि़या के सदस्यों के 3 आयुवर्ग है –
      1. 13 वर्ष से कम – पूना जोरंवार
      2. 13 से 18 वर्ष – मथजुरिया जोरंवार
      3. 18 वर्ष से अधिक – धांगर
    3. धुमकुड़ि‍या के प्रमुख को धांगर महतो करते हैं.
    4. लड़कियों की वरिष्ठतम सदस्या जो प्राय: विधवा होती है को मुखि‍या बनाया जाता है और उसे बड़किन धंगारिन कहते हैं.
    5. धुमकुड़िया को कुड़ुख भाषा में जोंख एड़पा कहते हैं एवं महिलाओं की ईकाई को पेल्लो एड़पा यानी युवतीगृह कहते हैं.
    6. यह एक प्रकार के प्रशिक्षण केंद्र के तरह काम करता है.
    7. धुमकुड़िया आदिवासी समाज का ह्रदय है, धुमकुड़िया के कार्य-क्रम में गावों में हरेक व्यक्ति की चाहे वह लड़का हो या लड़की, चरित्र निर्माण, व्यवहारिक ज्ञान और परम्परा का गौरव रखने की शिक्षा देने के लिए पूरा स्थान है.

Tribes of Chhattisgarh

Tribal languages of Chhattisgarh

  1. 45% Proto Australoid features are found in all tribes of Chhattisgarh.
  2. Munda, Korba, Manjhi,, Kharia, Gadba, Birhor, Sanwara etc. speak languages of Australoid family.
  3. Main languages of Dravid family are Gondi or Koya, Kudukh of Uraons, Dorla and Parja etc.
  4. The tribes who have adopted Chhattisgarhi as their language are Kanwar, Bijhwar, Bhunjia, Dhanwar, Bhaina, Baiga and Halba etc.
  5. The richest languages of tribes of Chhattisgarh are Gondi, Halbi and Munda. Gondi and Halbi also have a rich literature.
  6. The only newspaper of the State published in tribal languages Gondi and Halbi as Bastaria which is published from Jagdalpur.

Research and Books on Tribes of Chhattisgarh

  1. One of the first researcher on Tribes of Chhattisgarh was Verrier Elwin who has written books like The Baiga, The religion of Indian Tribes, The Murias and their Ghotul, The Agaria, Muria murder and suicide etc.
  2. Another researcher was W B Gearson who has written – The muria Gond of Bastar.
  3. Ex-collector of Bastar and fanour social scientist Brhamdev Sharma has written any books – Adivasi Vikas – Ek Saidhantik Vivechan, Adivasi Swashasan etc.
  4. Other books – Bastar Bhushan by Kedarnath Thakur,Adivasiyon ke beechby Shrichand Jain etc.

Jewelry of Tribes of Chhattisgarh

  1. Lurki – It is worn in ears and is made of bronze, silver, copper etc. It is also called Karna Phool or Khinwa.
  2. Kardhan– It is made of silver, gilat or fake silver. It is quite heavy and is worn in the waist as a belt by women. It is also called kardhani.
  3. Sutia– It is worn in the neck. It is made of Alluminium, Gilat, silver bronze etc. It is solid and heavy.
  4. Bahunta– It worn on the arm like an armband both by men and women. It is made of silerm gilat etc. In Bhaina tribe it is called a Pahunchi. Bhunjia call it a Banoria.
  5. Bichhia–It is worn on the toes. It is made of silver. Baigas call it Chutki.
  6. Ainthi – It is worn on the wrist. It is made of silver of gilat. It is also called Kakna or Guletha.
  7. Bandha– It is worn in the neck. It is made of old coins of silver.
  8. Phuli – It is worn in the nose and is made of silver or bronze. It is also made of gold. It is also called a long.
  9. Dhamel– It is a solid ornament worn in the neck. It is made of silver of gilat and is also called Saria or hansuli.
  10. Nagkori– It is worn on the wrist.
  11. Khonchni– It is worn in the head and is put in the hair. In Bastar Muria boys make it with wood. In many places it is also made of silver and gilat and also sometime made of stone. Now-a-days it is also made of plastic and used as a comb when it is called a Kakwa.
  12. Mundri – It is a ring worn in fingers. Made metal, Baig women llaos call it a chutki.
  13. Sudra/Surra–It is worn in the neck. It is made of gilat or silver.

Different types of marriages in tribes of Chhattisgarh

  1. Paithul Marriage– It is called Dhuku in Agaria tribe and Paidhu in Baiga tribe. It is popular in the tribes of Bastar. In this the girl enters the house of the boy of her choice and when the boy accepts her in spite of the opposition of the family the marriage is accepted by the society. Dhuku marriage also happens in Korba tribe.
  2. Lamsena – In this the young boy has to live and work in the family of the girls for many years to prove his strength and worth. This is accepted form of marriage in tribes of entire Chhattisgarh.The boy is allowed to live with the girl as her husband but the formal marriage happens after many years many-a-times after the birth of children. This type of marriage is seen in Kanwar, Gond, Bhil, Maria, Binjhwar, Agaria, Korbaetc. Kanwars call it Gharjan and Binjhwars call itt Gharjia.
  3. Guranwat – In this type of marriage girls of two families are married to the boys of each others families. Both teh marriages are held together. This is also quite common in the entire state. In Birhors it is called Golat marriage.
  4. Bhageli– This is marriage by the choice of the girl. When parents of the girls do not accept the relationship. The girl runs away from her family in the night and comes to the home of her over. There she stands under the thatched roof of the home. The boy pours water on her head and the mother of the boy them brings her into the house. The headman of the village then takes her responsibility and informs the parents of the girl that she has run away. After this the Bhanwars are held after pitching the madwa in the night. In most cases the parents of the girl also accept the marriage after taking food grains and gifts.
  5. Chadh Marriage – This is the traditional marriage in which the grrom comes to the home of the bride with a marriage party and the entire ceremony is held as per tradition. After this the groom takes the bride with him to his home.
  6. Pathoni Marriage – In this type of marriage the bride comes to the home of the groom with a marriage party where the marriage ceremony is held under a Mandap and then the bride takes the groom to her home. This type of marriage is seen in a very small way in Gonds.
  7. Udaria – This type of marriage is more like elopement. This is also called Ugharia. This is a love marriage in which the girl meets the boy in a market or some public place along with her friends even when her parents do not agree to the marriage. They go to the homeof a relative where a temporary marriage is done. After this with the help of panches and relatives the parents of the girl are made to accept the marriage and then permanent marriage is done.
  8. Parigandhan – This is marriage by purchasing the bride. It is doen mostly in Khirwar tribe.
  9. Haldi-Pani – It is widow or widower remarriage.
  10. Ar-Uto – Widow remarriage.
  11. Paisotur – Kidnapping of the bride by the groom.
  12. Pota – Marriage of a married woman with another man.

Gond

Gond is the main tribe of India. They are found in the central part of the country mainly in the Vindhyachal Satpura plateau, plains of Chhattisgarh, and hilly tracts along the banks of Godawari. They are of Autraloid arogin and Dravid family. They moved northwards along the Godawari basin and spread to the hills of central India. Their language is Gondi which is a Dravidian language.

Gond Gods and Goddesses and religion –

  1. Badadev (The creator), Dulha Dulhi Dev (The God of marriage), Panda-Pandin (The healer), Budhadev also known as Budhal Pen (The ancestor), Narayan Dev (Sun God) and Bhivasu are the main Gods of Gonds.
  2. In addition Village Gods, Khermai (Village Goddess) Thakur Dev, Khila Muthva, Marsen (The God who protects the village border), and other Gods for protection of crops, people, cattle, rains etc.
  3. These Gods are propitiated by chicken and goat sacrifice.
  4. Gonds believe in Magic, ghosts etc.
  5. Since Gonds have been under the influence of Hindu religion for a long time many of them have accepted Hindu Gods, customs and dress.
  6. According to custom the dead are buried with their head towards south. Kojji is celebrated on the third day after death and Kunda Milan is done tenth day after death.
  7. Main festivals of Gonds are Navakhani, Bindri, Bakpanthi, jawra, Madai, Chherta, Larukaj etc.
  8. Main dances of Gonds are Karma, Saila, Bhadoni, Birha, Kahrwa, Sajni, Sua, Diwani, Gedi etc.

Marriage –

  1. Like other Australoid tribes Gonds are also divided into two groups for marriage purposes and all the branches within one group are called a brotherhood (Bhai-Band). They do not intermarry in the group.
  2. There is the custom of elopement for marriage. Entire village participates in the marriage ceremony. A feast is generally held for several days and group dancing is common. There is also the custom of bride price for which bullocks and cloths are given.
  3. Marriage among cousins (maternal and paternal cousins) is accepted. It is called Dudh Lautana.

Agriculture –

  1. Gonds are mainly farmers. Traditionally they do Dahia farming in which forests are burnt for agriculture. They shift to another area after the fertility of the soil is reduced. After Government ban on shifting cultivation this practice has stopped.
  2. Entire land of the village belongs to the communityand is given to families as per need.

History

  1. Many Gond kings ruled in Gondwana from 15th to 17th Century.
  2. These kings built many forts, tanks and memorials. Many are known for their successful administrative abilities.
  3. At that time their rule extended to central India, Easter Uttar Pardesh and Bihar.
  4. There were four main Gond empires in the 15th Century. These were Kherla, Garh Mandla, devgarh and Chandagarh.
  5. The Gond King Bakht Buland Shah had established Nagpur and shifted his capital from Devgarh to Nagpur.
  6. Gond queen Durgawati is very famous. The tales of her valor are still sung with pride in Gondi, Halbi and Bhatri folk songs.
  7. King Sangram Shah was a brave Gond King who extended his kingdom and built new forts. In 1541 after his death Kunwar Dalpat Shah increased the army and extended the kingdom further.
  8. According to legend Gond religion was established by Pari Kupar Lingo at the time of Shambhu Shek. According to the storytellers of Gond religion the time of Shambhu Shek of Mahadev was before the advent of Aryans. 88 generations of Mahadevs are mentioned in Gondi songs (Pata). Shambhu-Mula is in the first generation, Shambhu-Gaura in the middle and Shambhu-Parvati in the last generation. Mainly Shambhu-Mula, Shambhu-Gonda, Shambhu-Saiyya, Shambhu-Ramla, Shambhu-Biro, Shambhu-Raiyya, Shambhu-Anedi, Shambhu-Thamma, Shambhu-Gawra, Shambhu-Bela, Shambhu-Tulsa, Shambhu-Ama, Shambhu-Girja, Shambhu-Sati and Shambhu-Parvati are mentioned as couples. Along with these Mahadevs, many Lingos (religious gurus) are also mentioned in stories.

Gondi Languge

  1. According to Gondi legend the Gondi Language was created by the sound of the Damru of Shambhu Shek. The language is called Gondeani or Gondvani.
  2. Being an ancient language, Gondi is a complete language in itself.
  3. It has its own script and grammar. Gondi writers have also pulbished literature in the language.

Gond tribe in Chhattisgarh

Gonds are the largest tribe of Chhattisgarh as per population. They live in Bastar, Dntewada, Narayanpur, Komdagain, Kanker, Sukma, Janjgir-Champa and Durg. They call temselves Koya or Koytor which means Hill people. 4 princely states in Chhattisgarh out of 14 were Gond States, These were Kawardha, Raigarh, Sarangarh, and Sakti.

Baiga

  1. Baiga means a priest. These were traditional priests of Gonds.
  2. They have been given the status of Primitive Tribe in Chhattisgarh.
  3. Their main sub-tribes are Narotia, Bharotia, Raimaina, Kanthmaina, Remaina etc.
  4. Joint family system is found among Baigas. Mukaddam is the head of the village.
  5. They have a good knowledge of forest and herbal medicines. They also believe in magical cures.
  6. They love tattoos.
  7. Their main occupation is Jhum cultivation and hunting.
  8. They consider tiger to be their younger brother.
  9. The Lamjhena, Lamia and Lamsena marriages are found in Baigas.
  10. They wear ornaments made of Bronze, copper and Aluminum.
  11. The main folk dances are Dadaria which is danced during Dussehra festival and Pardhoni dance during weddings.
  12. They mainly live in dense forests of Chada in Mandla district of Madhya Pradesh.
  13. Main dance forms are Baigani, Karma, Dussehra, Bilma and Pardhoni. Other dances are Ghoda Paithai, Baiga Jharpat, Reena and Fag. At the time of wedding during Pardhoni dance the relatives and friends of the groom make an elephant in the courtyard of the bride and also use masks in the dance.

Uraon Tribe

  1. They live in Raigrah, Jashpur, Surguja and Bilaspur.
  2. They are named after animals, birds, fish and trees.
  3. Free sex before marriage is accepted but free sex is not permitted after marriage.
  4. Divorce, and widow remarriage is prevalent.
  5. Their main God is Dharmesh the Sun God.
  6. Menwear a dhoti and women wear Sari. Ornaments of bronze and beads are popular.
  7. Head of the village is called Manjhi. Many village together form a Parha. The head of the Parha is the Parha Raja who sttles disputes among people.
  8. They have converted to Christianity in large numbers.
  9. Main festivals are Sarhul and Katihari. Sarhul is held at the time of flowering of the Sal tree.
  10. Karma is danced at the time of paddy sowing.
  11. Their language is Kurukh
  12. The education level of Uraons is very high and many of them are on high Government posts.

Korba Tribe

  1. They live in Korba, Bilaspur, Surguja, Surajpur and eastern part of Raigarh district.
  2. They are divided into Dihari and Pahari Korba. Dihari Korbas are agriculturists. The are therefore also called Kisan Korbas.
  3. Pahari Korbas are also called Benbarias.
  4. They have their own Panchayat called Maiyari.
  5. Their main festival is Karma.
  6. Pahari Korbas have been given the status of primitive tribes.
  7. Men wear shirt and vest and women wear white sari.
  8. Their favourite drink is Hadia made from rice.
  9. They believe that plough causes pain to earth therefore they do shifting cultivation called Bewar.
  10. Their main Gods are Budha Dev, Khudia Dev, Khudia Rani, Thakur Dev, Karam Dev etc.
  11. Main festivals are Karma, Navakhani, Dewari, Sohrai, Holi etc. Singri is celebrated once in five years. Women make murals on the wall in this festival.
  12. Funeral is called Vanadhavi in which Kumari Bhat is the feast.

Maria Tribe

  1. The live in Narayanpur, Bastar, Kondagaon, and Bilaspur.
  2. They are a sub-tribe of Gonds.
  3. Bhumia, Bhihar and Pando are their other sub-tribes. “Bhimsen” is their main God.
  4. They dance with wearing horns on their head so they are also called Bison Horn Maria.

Halba Tribe

  1. They live in Bastar, Raipur, Kondagaon, Sukma, Dantewada and Durg districts.
  2. Their main sub-tribes are Bastaria, Bhateria, Chhattisgarhia etc.
  3. They are called halba because they plough the fields using a plough (Hal)
.

Abhujhmaria

  1. This is a sub-tribe of Maria Tribe.
  2. They consider themselves to be the descendents of Kursturunga.
  3. They live in Abujhmarh of Narayanpur.
  4. They are primitive tribes.
  5. They do shifting cultivation called Pedda.
  6. Their main Goddess is Bhumi Devi.
  7. The village elders are Gaita, Gunia and Badde.
  8. Navakhani, Bidri, Madai and Danke are their main festivals.
  9. Gaur dance is their most famous dance.
  10. Abujhmarh is the remotest and most backward area of Chahttsgarh
  11. Means of communication have not reached this area.

Muria Tribe

  1. Muria tribe of Bastar is known for sense of art and culture and diversity in art forms.
  2. Their dances are Kaksar, Mandri and Gedi. These dances are famous for their sensitive portrayal of human relationships in their songs.
  3. A folk theatre form of dance with the story of ancient hunt is also prevalent in this tribe.
  4. Gedi dance is without songs. It is a very fast dance. It is the main dance of Ghotul. Women do not take part in it.
  5. Kaksar is a religious song and dance. Men wear bells of bronze or iron in their waste and also wear a beautiful headdress and umbrella.
  6. The head of a Muria Pargana is called Manjhi.
  7. Every village has a youth home or Ghotul.
  8. They worship Muria mata and Thakur Dev and Mahadev.
  9. Some cloths and coins are also buried with the dead for use in afterlife. A pillar is also erected in the memory of he dead.
  10. Their main festivals are Madai, Navakhani, Jatra, Sesa etc.
  11. They are experts in wood, bamboo craft and in painting.
  12. Their main languages are Gondi and Halbi.

Korku Tribe

  1. Korku means a group of humans.
  2. They put a fence of bamboo around their villages.
  3. They consider themselves to be a descendent of Rajputs.
  4. They worship Mahadevand moon.
  5. Sidoli is done for funeral. Dead are buried and a wood pillar is erected in the memory of dead.
  6. They live in Raigarh, Surguja, Balrampur and Jashpur districts.
  7. Their main sub-tribes are Mowasi, Bawari, Rooma, Nahala, Bodoya etc.
  8. Bride price is prevalent in this tribe.
  9. Divorce and widow remarriage is also allowed.

Binjhwar Tribe

  1. They live in Bilaspur, Raipur, Baloda Bazar districts.
  2. They worship Vidhyachal Vasini Devi.
  3. They consider themselves to be the descendent on Barah Bhai Betkar, the son of Vindhyachal Vasini Devi.
  4. Veer Narain Singh was from this tribe.

Kamar Tribe

  1. They live in Raipur, Bilaspur, Raigarh, Durg, Gariyaband, Rajnandgaon, Janjgir-Champa, Jashpur, Koria, Surguja etc.
  2. Their main God is Dulha Dev.
  3. They are mainly agricultural labour.
  4. They are experts in wood and bamboo craft.
  5. They have been given the status of Primitive Tribe.
  6. Those who live in hills are called Pahadpatia and those who live in plains are called Bandhrijia.
  7. Men keep long hair. They also carry bow and arrow and axe.
  8. Their houses are made of bamboo, grass and mud. They make a new house if someone dies.
  9. They do shifting cultivation called dahia.
  10. Touching of horse is prohibited for them. They worship Thakur Dev, Mahadev, Dulha Dev and Hanuman.
  11. The dead are buried. They believe in rebirth.

Nagesia Tribe

  1. They live in Dipadih of Ambikapur (North-East), Lakhanpur, Anuppur, Rajpur, Pratappur, Sitapur etc.
  2. Their main occupationis agriculture. They are also loggers and live in forests.

Kanwar Tribe

  1. They live mainly in Bilaspur, Raipur, Raigarh, Janjgir-Champa and Surguja.
  2. They consider themselves to be descendents of Kauravas of Mahabharata.
  3. Same Gotra marriage and widow remarriage is not allowed.
  4. Their main God is Sagrakhand.
  5. They are farmers and agriculture labor.
  6. Their traditional occupation is serving in the army.
  7. They do agriculture, rope making, cot making etc.

Khairwar Tribe

  1. They live in Surguja, Surajpur, Balrampur, and Bilaspur districts.
  2. They are also called kathwars.
  3. They are named after their occupation of making Kattha (catechu) from Khair trees.
  4. Gahira Guruji was from this tribe.
  5. Chewra Kanwar, Rathia Kanwar and Tanwar are their branches.

Bhaina Tribe

  1. They live in the Satpura and Chhota nagpur forests, mainly in Bilaspur, Janjgir-Champa, Raigarh, Raipur and Bastar districts.
  2. This tribe has originated due to admixture of Baigas and Kanwar tribes.

Birhor Tribe

  1. Birhor means forest dwellers.
  2. They live in Jashpur and Raigarh districts.
  3. They mainly depend on hunting.
  4. They have the status of primitive tribe.
  5. Their economic status is very backward.

Other Tribes

Other tribes of Chhattisgarh are Kol, Parja, Pando, Gadba, Bhatra, Agaria (those who smelt iron ore), Dhanwar, Majhwar, Pardhan, Pardhi etc.

Youth Homes of Tribes

There is a tradition of youth homes for interaction and entertainment of youth in many tribes. Sexual relations are also made in these youth homes and people also select their life partner. They are also places for teaching life skills to the young people. This tradition is now however dying out.

Youth Homes of main tribes are

  1. Muria – Ghotul
  2. Uraon – Dhumkuria
  3. Bharia – Rangbang
  4. Birhor - Gituona

Ghotul

  1. This became famous from the book of Verrier Elwin – The Muria and theri Ghotul.
  2. Young unmarried boys and girls of Muria tribe go to the Ghotul in the evening.
  3. It is said that Ghotul was started by the God Lingopen.
  4. The boys are called Chelik and girls are called Mutiyarin.
  5. The head of the boys is called the Sirdar. There is also a Kotwar among boys who helps the sirdar in maintaining order in the Ghotul.
  6. Head of the girls is called the Belosa.
  7. First all the boys enter the Ghotul after which the girls enter.
  8. Kotwar distributes the girls among boys.
  9. No couple is allowed to be together for more than three to four days.
  10. Girls massage the head of the boys and dress their hair.
  11. After this all dance outside the Ghotul.
  12. Married women are not allowed to dance but married men can dance.
  13. Married men mostly play musical instruments.
  14. During the dance one hand of each boy is on the shoulder of one girl and on the waste of another girl.
  15. They dance in a circle around a fire. With time the dance becomes faster.
  16. Most popular song is Rela.

Dhmkuria

  1. This is the youth home of the Uraon tribe.
  2. Members of Dhumkuria are of three age groups –
    1. Less than 13 years – Poona Joramwar.
    2. 13 to 18 years – Mathjuria Joramwar
    3. More than 18 years – Dhangar
  3. The head of the Dhumkuria is called Dhangar Mahto.
  4. The head of the girls is the senior most girl and is generally a widow. She is called badki dhangarin.
  5. Dhumkuria is called Jonkh Edpa in the Kurukh language. The female unit is called Pello Edpa or Young women Home.
  6. This also works as a training center.
  7. Dhumkuria is the heart of the Uraon tribe. It has a place for learning life skills for all young men and women.