भारतीय कृषि
Indian Agriculture
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भारतीय कृषि - (हिन्‍दी में)

Indian Agriculture - (In English)

भारतीय कृषि

भारत में कृषि का योगदान सकल घरेलू उत्पाद में केवल 17.6% है परन्तु इससे भारत की लगभग 58.2% आबादी को रोज़गार मिलता है. कृषि क्षेत्र का अर्थव्यवस्था में बड़ा महत्व है –

  1. खाद्य सुरक्षा इसी से मिलती है.
  2. उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है.
  3. रोज़गार का सबसे बड़ा स्रेात है.
  4. ग्रामीण आय का सबसे बड़ा स्रोत है जिससे ग्रामीण क्षेत्र की क्रय शक्ति बढ़ती है और बाज़ार को लाभ होता है.
  5. निर्यात से होने वाली आय में कृषि क्षेत्र का हिस्सा 10.23% है.
  6. भारत दुनिया में दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक है.
  7. वर्ष 2016-17 में भारत में खाद्यान्न के उत्पादन का अनुमान 275.11 मिलियन टन था और वर्ष 2017-18 में यह बढ़कर 277.49 मिलियन टन होने का अनुमान है.

शब्दावली –

मिश्रित श्यसन (Mixed Cropping) – विभिन्न प्रकार की फसलें एक ही खेत में एक साथ लेने को कहते हैं, उदाहरण के लिये कपास के साथ भिंडी उगाना

मिश्रित कृषि (Mixed Farming) – कृषि के साथ पशुपालन, रेशम कीट, मधुमक्खी पालन, मछली पालन आदि किया जाये तो उसे मिश्रित कृषि कहते हैं.

स्थानांतरित या झूम खेती (Shifting cultivation) – आदिवासी समुदाय व्दारा जंगल के वृक्ष काटकर खेती की जाती है, और कुछ समय बाद भूमि की उर्वरकता कम होने पर दूसरे स्थान पर वृक्ष काटकर खेती की जाती है तो उसे झूम खेती कहते हैं.

वाणिज्यिक या नकदी फसलें – उन व्यापारिक फसलों को कहते हैं जि‍नका उद्देश्य व्‍यापार करके धन अर्जित करना होता है. उदाहरण के लिये कपास, तम्बाकू, अफीम, चाय, गन्ना, तिलहन आदि.

खरीफ – बरसात के मौसम की फसल, आम तौर पर जून-जुलाई में बोई जाती है और अक्टूबर-नवंबर में कटाई होती है. धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, मूंगफली, अरहर आदि.

रबी – यह जाड़े की फसल है. अक्टूबर-नवंबर में बुवाई करके मार्च-अप्रेल में कटाई होती है. गेहूं, चना, मटर, अलसी, सरसों आदि.

ज़ायद – यह गरमी की फसल है. तरबूज, ककड़ी, खीरा आदि.

उर्वरक – कृषि के लिये उर्वरक का बड़ा महत्व है. भारत उर्वरकों को सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता भी है. भारत के लिये अनुशंसित N:P:K का अनुपात 4:2:1 है.

सिंचाई – 10,000 हेक्टेयर से अधिक सिंचाई क्षमता वाली योजनाएं वृहत योजनाएं कहलाती हैं, 2000 से 10,000 हेक्टेयर तक की योजनाएं मध्यम और 2000 हेक्टेयर से कम सिंचाई क्षमता वाली योजनाएं लघु योजनाएं कहलाती हैं.

कृषि साख – 15 माह से कम समय का ऋण – अल्प अवधि ऋण कहलाता है, 15 माह से 5 वर्ष की अवधि का ऋण मध्य अवधि का ऋण और 5 वर्ष से अधिक अवधि का ऋण दीर्घकालीन ऋण कहलाता है.

कृषि जोत का वगीकरण – सीमान्त जोत – 1 हेक्टेयर तक, लघु जोत – 1 से 2 हेक्टेयर, अर्ध मध्यम जोत – 2 से 4 हेक्टेयर, मध्य‍म जोत – 4 से 10 हेक्टेयर, वृहत जोत – 10 हेक्टेयर से अधिक. कृषि गणना के अनुसार भारत में 2010-11 में कृषि जोतों का औसत आकार 1.16 हेक्टेयर है. छत्तीसगढ़ में कृषि जोतों का औसत आकार 1.5 हेक्टेयर है. नागालैंड में कृषि जोतों का आकार सबसे अधिक है और केरल में सबसे कम. देश में 67% सीमान्त और लघु कृषक हैं और उनके पास कृषि का केवल 29% रकबा है.

भूमि सुधार कार्यक्रम – संकुचित अर्थ में इसका तात्पर्य है – छोटे किसानों और कृषि मजदूरों के लाभ के लिये भूमि के स्वामित्व का पुर्ननिर्धारण. व्यापक अर्थ में भू-धारण की व्यवस्था में संराचनात्मक सुधार.

भूमि सुधार के उपाय

  1. ज़मीन्दाारी उन्मूलन
  2. काश्त्कारी सुधार, उदाहरण के लिए लगान का नियमन, पट्टों की सुरक्षा, पट्टेदारों को स्वातमित्व का अधि‍कार आदि.
  3. जोतों की अधिकमत सीमा का निर्धारण – सीलिंग – यह सीमा अलग-अलग राज्य में अलग-अलग है.
  4. चकबंदी
  5. भू-दान

किसान क्रेडिट कार्ड फसल ऋण की प्रक्रियाओं का सरलीकरण

राष्ट्रीय कृषि बीमा योजनाप्रकृतिक आपदाओं जैसे सूखा, बाढ़, ओला, चक्रवात, कीट आदि से होने वाली हानि के लिये किसानो को कवरेज. यह योजना भारतीय कृषि बीमा निगम क्रियांवित करती है. यह सभी किसानों पर लागू है बिना कर्जदार और कर्जदार तथा सभी जोतों वाले किसान. इसमें खाद्यान्न, तिलहन, गन्ना, आलू, कपास, अदरक, प्याज, हल्दी, मिर्च आदि को कवरेज है. छोटे और सीमान्त किसानों के लिए 10% अनुदान है. यह योजना 25 राज्यों और 2 संघ शासि‍त प्रदेशों में क्रियांवित है.

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर.के.वी.वाई.) 11 वीं पंचवर्षीय योजना से लागू. कृषि एवं संबंधित क्षेत्र के लिये अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता. इसका उद्देश्य 11 वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि एवं संबंधित क्षेत्र में 4% वार्षिक वृध्दि का था. अब इसमें आंशिक परिवर्तन करते हुए किसानों की आय को दुगना करने का लक्ष्य भी शामिल किया गया है.

प्राथमिक क्षेत्र की क्रांतियां –

  1. हरित क्रांति – खाद्यान्न के लिये 1960 के दशक से प्रारंभ
  2. श्वेत क्रांति – दुग्ध
  3. नीली क्रांति – मछली
  4. पीली क्रांति – तिलहन
  5. गुलाबी क्रांति – झींगा मछली

बागवानी भारत विश्व में मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है. फलों के उत्पादन में भारत का ब्राज़ील के बाद दूसरा स्थान है. प्रमुख फल आम, केला, पपीता, चीकू, अनार, आंवला, नारियल आदि हैं. सब्ज़ी उत्पादन में भारत का स्थान चीन के बाद दूसरा है. भारत काजू का सबसे बड़ा निर्यातक है.

पशुपालन एवं डेयरी भारत दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है. विश्व में सबसे अधिक मवेशी भारत में हैं. दुनिया की कुल भैंसों का 57% गाय-बैलों का 14% भारत में है. भारत में 9.9 करोड़ भैंसे तथा 18.5 करोड़ गाय-बैल हैं.

मत्‍स्‍य पालन मछली उत्पाादन में भारत का स्थान विश्व में तीसरा है. राष्ट्र मंडल देशों में पहला स्थान है.

समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीदी की योजना

सरकार कुछ फसलों के लिये समर्थन मूल्य घोषित करती है. इसका तात्पर्य यह है कि यदि बाज़ार में प्रचलित मूल्य समर्थन मूल्य से कम हो तो सरकार इस बात की गारंटी देती है कि वह समर्थन मूल्य पर किसान की फसल खरीद लेगी. यह योजना अनेक फसलों के लिए लागू है परन्तु वास्तव में खरीदी का प्रबंध केवल गेहूं, धान, मक्का आदि‍ कुछ फसलों के लिये ही है. इन फसलों के लिये भी यह योजना केवल कुछ राज्यों जैसे पंजाब, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में ठीक प्रकार से चल रही है. अनेक बड़े राज्यों में जैसे उत्तर पदेश, बिहार आदि में इन फसलों की खरीदी की भी अच्छी व्यवस्था नहीं है. समर्थन मूल्य का निर्धारण किसान की लागत और न्यनूतम लाभ को जेाड़ कर कृषिगत लागत एवं मूल्य आयोग (Commission on Agricultural Costs and Prices -CACP) की अनुशंसा पर किया जाता है.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली इस योजना का उद्देश्य निम्न आय वर्ग के लोगों को उचित मूल्य पर दैनिक उपभोग की वस्तुएं, विशेषकर खाद्यान्न उपलब्ध कराना है. इसे लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहते हैं. यह कार्य भारतीय खाद्य निगम व्दारा किया जाता है. यह 1 जून 1997 से लागू है. इसे खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम 2013 के व्दारा कानूनी जामा भी पहनाया गया है. छत्तीसगढ़ खाद्यान्न सुरक्षा कानून लागू करने वाला देश का पहला राज्य है. छत्तीसगढ़ में यह कानून 2012 में बना था.

सर्वप्रिय योजना यह योजना केन्द्र सरकार ने 21 जुलाई 2000 में प्रारंभ की थी जिसमें गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों को बुनियादी जरूरतों की 11 वस्तुाएं उचित मूल्य की दुकानों से बेची जाती हैं. इसमें दाल, तेल, चाय, आयेाडीन नमक, डिटरजेंट, साबुन, कापियां, टूथपेस्ट आदि शामिल हैं.

उपार्जन मूल्य (Procurement Price) वह मूल्य है जिसपर सर्वजनिक वितरण प्रणाली के अंर्तगत वितरण के लिये वस्तुएं क्रय की जाती हैं.

जारी मूल्य (Issue Price) वह मूल्य है जिसपर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वस्तुएं जनता को बेची जाती हैं.

बफर स्टाकअपातकाल में उपयोग के लिये खाद्यान्न का जो न्यूनतम स्टाक भारतीय खाद्य निगम व्दारा रखा जाता है उसे बफर स्टाक कहते हैं.

भंडारण वैज्ञानिक भंडारण के लिये केन्द्रीय भंडार गृह निगम काम करती है.

कृषि क्षेत्र की प्रमुख समस्याएं भारत में गेहूं, फल-सब्जी, दूध आदि का उत्पादन दुनिया में सबसे अधिक होता है, परन्तु यह कड़वी सचाई है कि इन चीज़ों में भी भारत की उत्पादकता बहुत कम है. चावल की उत्पादकता भारत में 2.4 टन/हे, चीन में 4.7 टन/हे और ब्राज़ील में 3.6 टन/हे है. चावल उत्पादकता में भारत का स्थान विश्व में 47 वां है. गेहूं की उत्पादकता भारत में 3.15 टन/हे और चीन में 4.9 टन/हे है. देश में कृषि आय में लगातार कमी आयी है. वर्ष 1950 में जी.डी.पी. का 50% कृषि से आता था जो 2015-16 में घटकर 17.5% रह गया है. दूसरी ओर देश की आधे से भी अधिक आबादी आजीविका के लिये खेती पर ही निर्भर हैं. मूलत: यही बात किसानों की गरीबी और कष्ट का कारण है.

कृषि क्षेत्र में कम उत्पादकता के प्रमुख कारण हैं

  1. कम रकबे के खेत – भारत में 86% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से भी कम खेती है. गरीबी के कारण यह किसान पर्याप्त निवेश नहीं कर पाते.

  2. कृषि साख की अनुपलब्धतादेश में 40% से अधिक कृषि ऋण अनौपचारिक स्रोतों से लिये जाते हैं. ऐसे ऋण बहुत महंगे पड़ते हैं. खेती में निवेश के अलावा हारी-बीमारी, शादी-ब्याह, तीज-त्योहार आदि के लिये भी किसानों को ऋण लेना पड़ता है. ऋण के बोझ तले दबे किसान आत्महत्या तक करने को बाध्य हो जाते हैं. ऋण माफी तात्कालिक उपाय हो सकता है, परंतु यदि बड़े नीतिगत सुधार नहीं हुए तो किसानों का पुन: ऋणग्रस्त होना निश्चित ही है.
  3. उन्नत प्रौद्योगिकी की अनुपलब्धता भारत के गरीब किसान खेतों की तैयारी, बुवाई, सिंचाई, खाद, फसल कटाई, मिंजाई, भंडारण, परिवहन और विक्रय आदि की उन्नत प्रौद्योगिकी का उपयोग नहीं कर पाते. गरीबी के कारण उन्नत प्रौद्योगिकी तक उनकी पहुंच नही हैं.
  4. बाज़ार तक किसानो की पहुंच न हो पाना छोटे और गरीब किसान न तो बड़े बाज़ारों तक अपना उत्पाद पहुंचा पाते हैं और न ही उनमें उत्पाद को लंबे समय तक रखने की आर्थिक क्षमता होती है. छोटे किसान फसल आने के समय उसे औने-पौने दामों पर बेचने के लिय मजबूर हैं. फसल को किसानो व्दारा सड़क पर फेंक देने गन्ना खेतों में ही जला देने जैसी घटनाएं इसलिये होती हें कि फसल बेचने में होने वाले खर्च की भरपाई भी कभी-कभी मुश्किल हो जाती है. सरकार 20 से अधिक फसलों के लिये समर्थन मूल्य घोषित करती है, परन्तु गेहूं और धान के अलावा अन्य फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदने का पूरा प्रबंध न होने के कारण किसानों को अपनी फसल कम दामों पर बेचना पड़ती है. गेहूं और धान की खरीदी भी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में ठीक प्रकार से नहीं हो पाती है. सरकार कमीशन आफ एग्रीकल्चरल कास्ट एंड प्राइसेज़ (सी.ए.सी.पी.) की अनुशंसा पर समर्थन मूल्य तय करती है परन्तु छोटे किसानो की लागत उससे कई बार बहुत अधिक होती है. समर्थन मूल्य मिल भी जाये तो भी उत्पादन कम होने के कारण कृषि आय से परिवार का पालन-पोषण करना कठिन होता है. केन्द्र सरकार की घोषित नीति बोनस के विरुध्द है जिसके कारण राज्य सरकारें यदि घोषित भी कर दें तो भी समय से बोनस नहीं दे पाती हैं.

किसानों की दशा सुधारने के लिये स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें -

  1. भू-सुधार - 1992 की एन.सी.एफ. रिपोर्ट के अनुसार आय के क्रम में रखने पर नीचे के 50% परिवारों के पास केवल 3% भूमि है जबकि ऊपर के 10% परिवारों के पास लगभग 54% भूमि है. 11.24% परिवार भूमिहीन हैं, और 60.63% परिवार सीमांत कृषक हैं. आयोग ने इस संबंध में अनेक सिफारिशें की हैं, जिनमें प्रमुख हैं – सीलिंग सरप्लस भूमि तथा वेस्टलैंड का वितरण किया जाये, कृषि भूमि के ओद्योगिक उपयोग पर पाबंदी लगे, किसानों को कामन प्रापर्टी में चराने के अधिकार मिलें, लेंड यूज़ एडवाइजरी सर्विस का गठन किया जाये, तथा कृषि भूमि के विक्रय को विनियमित किया जाये.
  2. सिंचाई- भारत में कुल कृषि क्षेत्र का लगभग 60% असिंचित क्षेत्र है जो पूरी तरह से वर्षा पर आधारित है. कुल कृषि उत्पादन का लगभग 45% असिंचित क्षेत्र से होता है. स्पष्ट ही है कि सिंचाई की कमी किसानों की प्रमुख समस्या है. इसके लिये यह आवश्यक है कि उपलब्ध जल का उचित वितरण हो और सूखे से निपटने के लिये जल संवर्धन की बड़ी योजना बनाई जाये। आने वाले समय में सिंचाई में बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता भी है।
  3. उत्पादकता इसे सुधारने के लिये पूरे देश में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं का एक जाल बनाना आवश्यक है. किसानों को आधुनिक प्रोद्योगिकी में प्रशिक्षित करना भी आवश्यक है. इसके अतिरिक्त आने वाले समय में सरकार को कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश का तेजी से बढ़ाना होगा, तभी हमारी उत्पादकता बढ़ेगी।
  4. कृषि ऋण तथा बीमा अक्सर फसल खराब होने पर या उचित बाज़ार मूल्य न मिल पाने के कारण किसान पूर्व के ऋण नहीं चुका पाते और डिफाल्टर हो जाते हैं. बहुत बार घर में हारी-बीमारी के कारण भी किसानों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि वे ऋण लौटाने में असमर्थ हो जाते हैं. ऐसे में उन्हें आगे ऋण मिलना तो बंद हो ही जाता है, साथ ही जमीन-जायदाद बिकने की नौबत आ जाती है. किसानों के ऋणों में ब्याज़ दर कम करने, दैवीय विपत्ति आने पर स्वयमेव कर्जमाफी की व्यवस्था करने की आवश्यकता है. फसल बीमा जैसे उपाय भी किये जाने चाहिये. किसानों के लिये सुलभ और सस्ते इलाज की व्यवस्था और परिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिये भी सुलभ तथा सस्ते कर्ज की व्यवस्था होनी चाहिये।
  5. खाद्य सुरक्षा फसल आने के समय गरीब किसानों को अपना लगभग सारा ही उत्पादन पुराने कर्ज को चुकाने और वर्तमान आवश्यकताओं की लिये बाज़ार में औने-पौने दामों में बेच देना पड़ता है. बाद में उन्हें अपने खाने के लिये वही खाद्यान्न ऊंचे दामों पर खरीदना पड़ता है. सूखे के समय तो अनेक क्षेत्रों में भुखमरी तक की नौबत आ जाती है.
  6. लघु और सीमान्त किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते अधिक से अधिक फसलों के लिये न केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किये जांय बल्कि इस मूल्य पर खरीदने की ऐसी व्यवस्था की जाय कि फसल बेचने के लिये किसानों को अपने गांव से अधिक दूर न जाना पड़े. उन्हें तत्काल ही भुगतान भी मिल जाय. ऐसा कानून बनाया जाये कि गोदाम की रसीद के आधार पर किसान ऋण ले सकें जिससे किसान को अपनी फसल तत्काल न बेचनी पड़े और वे बाज़ार में दाम बढ़ने का इंतज़ार कर सकें. किसानों की सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देना भी आवश्यक है जिससे किसानों की प्रतिस्पर्घा करने की शक्ति बढ़ सके और वे अपने उत्पादन को सही मूल्य पर बेच सकें।

Indian Agriculture

The contribution of agriculture in GDP of India is only 17.6% but 58.2% population is engaged in agriculture. Agriculture sector is very important for the economy –

  1. It gives food security.
  2. It gives raw material for industries.
  3. Major source of employment.
  4. Major source of rural income which increases rural purchasing power and helps the market.
  5. Agriculture has a 10.23% share in export income.
  6. India is the largest producer of pulses in the world.
  7. The production of food grains was approximately 275.11 Million Tons in 2016-17 and is estimated to increase to 277.49 MT in 2017-18.

Terminology

Mixed Cropping Different crops in the same field, e.g. growing ocra and cotton together.

Mixed Farming Other activities like animal husbandry, sericulture, apiculture, fisheries along with agriculture.

Shifting cultivation Tribal people fell clear the forest for agriculture and after some time when the fertility of the soil decreases shift to another area by clearing forest in that area. It is also called Jhum cultivation.

Commercial or cash crops Those crops which are grown for the purpose of commerce and getting cash by selling them, e.g. cotton, tobacco, opium, sugarcane, oil seeds etc.

Kharif This is the crop of the rainy season which is sown in June-July and harvested in October-November, e.g. Paddy, Jowar, Bajra, Maize, cotton, groundnut, arhar etc.

RabiThis is the crop of winter season which is sown in October-November and harvested in March-April, e.g. Wheat, Peas, gram, alsi, mustard etc.

Zaid This is the crop of summer months e.g. Water melon, melon, cucumber etc.

Fertilizer Fertilizers are very important for agriculture. India is the biggest producer and biggest consumer of fertilizers in the world. The recommended proportion of N:P:K for India is 4:2:1.

Irrigation irrigation projects with command area of more than 10,000 hectares are called Major projects, those with a command area of 2000 to 10,000 hectares are called medium projects and less than 2000 hectares are called minor projects.

Agriculture credit Loans of less than 15 months duration are called short term loans, those of 15 months to 5 years duration are called medium term loans and more than 5 years are called long term loans.

Classification of Agriculture farms Farms smaller than 1 hectare are called marginal farms, those from 1 to 2 hectare are small farms, 2-4 hectares are small-medium farms, 4 to 10 hectares are large-medium farms and more than 10 hectares are called big farms. According to agriculture census in India in 2010-11 the average farmsize in India was 1.16 hectares. Average farm size in Chhattisgarh is 1.5 hectares. Farm sizes re larges in Nagaland and smallest in Kerala. 67% farmers in the country are small and marginal farmers and they have only 29% of agricultural farmland area.

Land Reforms In a narrow meaning it means re-determination of land ownership for the benefit of small and marginal farmers. In wider meaning it means structural reforms in land ownership pattern.

Land reforms in India

  1. Zamindari abolition
  2. Farming reforms e.g. regulation of land revenue, security of tenure, ownership rights to tenants etc.
  3. Ceiling on the maximum size of farms – It is different for different states.
  4. Consolidation of land holdings.
  5. Bhoodan

Kisan Credit CardThis is to simplify the process of crop loans.

Nation Agriculture Insurance Scheme It provides coverage to farmers against natural disasters like drought, floods, cyclone, insects and pests etc. It is implemented by the Agriculture Insurance Corporation of India. All farmers are covered in it whether they have taken loans or not. Crops of food grains, oil seeds, sugarcane, potato, cotton, ginger, onion, turmeric, chillies, etc. are covered in this scheme. Small and marginal farmers get a subsidy of 10%. This scheme is functional in 25 states and 2 Union Territories. Rashtriya Krishi Vikas Yojna (RKVY) is implemented from the 11th five year plan. Under this scheme additional central assistance (ACA) is provided for agriculture and allied sectors. The target was a 4% annual growth in agriculture sector. Now in partial modification the target of doubling incomes f farmers has been added.

Revolutions in the Primary sector

  1. Green revolution – For food grains – started in the decade of 1960.
  2. White revolution – Milk
  3. Blue revolution – Fisheries
  4. Yellow revolutions – Oil seeds
  5. Pink revolution – Prawns

Horticulture India is the biggest producer and exporter of spices in the world. India is second after Brazil in fruit production. Main fruits are mango, papaya, banana, chiku, pomegranate, anwla, coconut etc. India is second after China in vegetable production. India is the largest exporter of cashew nuts.

Animal husbandry and dairyIndia is the largest producer of milk in the world. Largest numbers of cattle are in India. It has 57% of world’s buffalos, 14% of cows. India has 9.9 crore buffaloes and 18.5 crore cows and bullocks.

Fisheries India is third in the world in fish production and first in Commonwealth countries.

Price Support scheme

Government announces minimum support price for certain crops. It means that if the market price goes below the support price then Government gives a guarantee to purchase at the support price from farmers. This scheme is available for many crops but actual procurement arrangements are made only from some crops like wheat, paddy maize etc. and that too only in a few states like Punjab, Madhya Pradesh and Chhattisgarh. Many large states like UP and Bihar do not have a good procurement system. Minimum support price is announced by the Government on the recommendation of Commission on Agricultural Costs and Prices –CACP.

Public Distribution SystemThe objective of this scheme is to provide essential commodities specially food grains to the poor at reasonable prices. It is called Targeted Public Distribution System. It is managed by Food Corporation of India. It is being implemented from 1st June 1997. It was given statutory status by the Food Security Act, 2013. Chhattisgarh was the first state in the country to pass its Food Security Act, which was passed by the State Assembly in 2012.

Sarwapriya Scheme This scheme was stared on 21st July 2000. Under his scheme 11 basic commodities like pulses, oil, tea, iodized salt, detergent, soap, copies, toothpaste etc, are sold at reasonable price to the poor from fair price shops.

Procurement Price is the price at which commodities are procured by the Government for PDS.

Issue Price is the price at which commodities under PDS are issued to the fair price shops for sale to the public.

Buffer StockThis is the stock of food grains kept for emergencies by Food Corporation of India.

Warehousing Scientific warehousing is done by the Central warehousing corporation of India.

Main problems of agriculture sector in IndiaThe production of wheat, fruit-vegetables, milk etc. is one of the highest in the World. However the productivity of even these things is very low in India. The Productivity of rice in India is 2.4 MT/Ha. The productivity of rice in China is 4.7 MT/ha, and in Brazil it is 3.6 MT/Ha. The rank of India in productivity of rice is 47th in the World. The productivity of wheat in India is 3.15 MT/Ha and in China it is 4.9 MT/ha. Agricultural income has decreased in the country over the years. In the year 1950, agriculture accounted for 50% of GDP which decreased to 17.5% in 2015-16. On the other hand more than half of the population of the country is still dependent on agriculture. This is the main reason of poverty and pain of farmers.

Main reasons for low productivity of agriculture in India are

  1. Small farm size86% farmers in India have holdings less that 2 Hectares. Farmers are therefore not able to invest adequately due to poverty.
  2. Non-availability of agricultural credit40% of agricultural loans in our country are from informal sources. These loans are very expensive. Farmers have to take loans for things other than farming as well e.g. illness, weddings, festivals, etc. Sometimes farmers suffering under excessive loans are even forced to commit suicides. Loan waiver can only be a temporary measure to help the farmers but if long term policy changes are not brought about, farmers will once again become burdened with high levels of loans.
  3. Absence of High Technology India does not use technology in most of agricultural operations like sowing, irrigation, fertilizer, harvesting, warehousing transportation and marketing of agricultural produce.
  4. Farmers do not have access to markets Small and poor farmers are not able to take their produce to markets. They do not have the capacity to keep their produce for long periods and wait for prices to rise. They are therefore forced to sell their produce at low prices. We have even seen incidents of farmers throwing their produce on the road of burning their crops because of low prices. Such incidents happen when prices are so low that farmers are not able to get even the money which they spent to grow their crops. Government announces MSP for more than 20 crops, but there is not proper arrangement for actually procuring from farmers except for wheat and paddy and farmers are forced to sell at low prices. The system of procuring even wheat and paddy is poor in many states like UP and Bihar. MSP is announced on the recommendation of CACP but the input cost of small and marginal farmers is sometimes much higher and it becomes difficult to manage the expenditure of heir families by agricultural income. The policy of central government is against bonus on procurement price so State Governments are also not able to give bonus to farmers.

Recommendations of Swaminathan Commission on agriculture -

  1. Land reforms – According to report of NFC of 1992 50% families with lowest income own only 3% land while 10% families with highest incomes own 54% land. 11.24% families are landless and 60.63% families are marginal farmers. The Commission has recommended – ceiling surplus land and wasteland should be distributed, industrial use of agricultural land should be banned, farmers should be allowed grazing rights on common land, land advisory service should be constituted and sale of agricultural land should be regulated.
  2. Irrigations - 60% farmlands in India are un-irrigated and depend wholly on rains. 45% of total agricultural production comes from rain fed areas. It is necessary to provide for proper distribution of water and make a plan for increase in irrigation. Big investment is needed for irrigation in India.
  3. Productivity Soil testing labs should be made and farmers should be trained in the use of technology. Government should also increase public sector investment in agriculture sector.
  4. Agriculture credit and Insurance Farmers are often not able to get proper price for their produce and are therefore not able to repay their loans and become defaulters. They do not remain eligible for fresh crop loans after that. Some times they have to spend huge money for illness and weddings etc. and are compelled to sell their land in distress. It is necessary to give loans to farmers at low interest rates and have a mechanism for automatic loan waivers in case of natural disasters. Farmers should also have access to cheap consumption loans.
  5. Food security It may seem paradoxical that farmers who produce food grains also need food security. They have to sell all their produce soon after harvest to repay their loans and fulfill family responsibilities. Later they have to buy the same food grain at high prices for their own consumption. It is necessary to create procurement systems for proper procurement at MSP and also have a mechanism for availability of food grains at reasonable prices in villages.
  6. Small and marginal farmers are not able to compete in the marketMSP should be declared for more corps and proper arrangements should be made for procurement on MSP. Farmers should be able to sell near their villages and should be paid immediately. Warehouse receipts should be made negotiable so that farmers can get loans on them and are not forced to sell at low prices and wait for prices to rise. Cooperatives of farmers should also be encouraged to make them more competitive.

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