छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन
Freedom movement in Chhattisgarh
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छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन - (हिन्‍दी में)

Freedom movement in Chhattisgarh - (In English)

छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन

जनचेतना का विकास

रायपुर, बिलासपुर तथा अनेक अन्य स्थानो पर रीडिंग क्लब, वाद-विवाद समिति, साहित्य समिति आदि का गठन हुआ. इनसे छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय चेतना का विकास प्रारंभ हो गया.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों का प्रारंभ

छत्तीसगढ़ का संबंध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ सर्वप्रथम कांग्रेस के सन् 1891 नागपुर के अधि‍वेशन से हुआ जिसमें यहां के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. छत्तीसगढ़ पर कांग्रेस का प्रभाव 1905 की नागपुर प्रांतीय परिषद से देखा जा सकता है. 1906 की जबलपुर प्रांतीय परिषद में दादा साहब खापर्डे का स्वदेशी आंदोलन प्रस्‍ताव स्वीकृत हुआ. इसी समय रायपुर में कांग्रेस की शाखा स्थापित हुई. इसकी स्थापना में बैरिस्टर सी.एम. ठक्कर का महत्व्पूर्ण योगदान था.

पं. सुंदरलाल शर्मा का योगदान

पं. सुंदरलाल शर्मा को छत्तीसगढ़ का राजा राम मोहन राय माना जाता है. वे राजिम के निकट चमसूर गांव के रहने वाले थे. वे 1906 में कांग्रेस के सदस्य बने और आजीवन कांग्रेस से जुड़े रहे. उन्होने 1907 में सर्वप्रथम कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया. 1906 में उन्होने सम्मित्र मंडल बनाया जिससे वे समाज सुधार तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास का काम करते थे. उन्होने अनेक खादी आश्रम बनाए, राजिम में संस्कृत पाठशाला बनाई, अछूतोध्दार के लिए रायपुर में सतनामी आश्रम की स्थापना की. उन्होने धमतरी में कण्‍डेल सत्याग्रह का नेतृत्व किया और इसमें गांधी जी को भी आमंत्रित किया. उन्हे कई बार जेल जाना पड़ा. उन्होने जेल से जेल पत्रिका का संचालन भी किया.

राष्ट्रीय चेतना के विकास में समाचार पत्रों की भूमिका

वर्ष 1900 में माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ मित्र समाचार पत्र का प्रकाशन पेण्ड्रा से प्रारंभ किया. यह पत्र 1903 तक चला. इसके अतिरिक्त पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी की सरस्वाती (1900), सप्रे जी का हिन्दी ग्रंथ प्रकाशन मंडली (1905) व हिन्द‍ केसरी (1907), ठाकुर प्यारेलाल सिंह का अरुणोदय (1921-22), पं. सुंदरलाल शर्मा का कृष्ण जन्मस्थान समाचार पत्र – जेल पत्रिका (1922-23), रायपुर कांग्रेस कमेटी की कांग्रेस पत्रिका (1937) आदि ने राष्ट्रीय चेतना के विकास का काम किया. इनमें सबसे तेज़ सप्रे जी का हिन्द केसरी था. सप्रे जी ने अपने समाचार पत्र में बाल गंगाधर तिलक के केसरी में प्रकाशित दो मराठी लेखों का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया. यह लेख थे – देश का दुर्देव एवं बम्ब गोले का रहस्य. इनमें ब्रिटिश शासन की आलोचना थी और भारतीय जनता को अह्वान था कि वे अपने कर्तव्य का पालन करें. सरकार ने सप्रे जी को इन लेखो के प्रकाशन के लिए 1908 में गिरफ्तार कर लिया. सप्रे जी से कहा गया कि वे लिखित रूप में माफी मांगें. वालनराव लाखे सप्रे जी से जेल में मिले और उन्हे कहा कि उनके भाई ने कहलवाया है कि यदि वे माफी नहीं मागेंगे तो उनके भाई आत्महत्या कर लेंगे. सप्रे जी ने हताशा में माफीनामे पर हस्ताक्षर कर दिये. सरकार ने उन्हें बिना ट्रायल के 2 नवंबर 1908 को मुक्त कर दिया. इस कार्य से उनका बहुत विरोध हुआ. शहर में उनकी तस्वी्रें जलाई गईं. सप्रे जी एक माह तक जनता के सामने आने का साहस नहीं कर सके. माखनलाल चतुर्वेदी जी ने भी कर्मवीर में छत्तीसगढ़ की अनेक घटनाओं का प्रमुखता से प्रकाशन किया. रायपुर ज़ि‍ला परिषद ने उत्थान (1935-37) और बिलासपुर ज़ि‍ला परिषद ने विकास (1920-30) नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया. इनसे भी राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ.

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में गरम और नरम दल

सन् 1907 में सूरत कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का गरम दल और नरम दल में विभाजन हो गया था. छत्तीसगढ़ में भी इसका प्रभाव पड़ा. दादा साहब खापर्डे, माधवराव सप्रे, डा. मुंजे आदि गरम दल में थे जबकि पं. रविशंकर शुक्ल, हरिसिंह गौर, डा. मधोलकर आदि नरम दल में थे. रायपुर सम्मेलन में दादा सहब खापर्डे ने सुझाव दिया कि सम्मेहन का प्रारंभ वन्दे मातरम गाकर किया जाये. इस समय वन्दे मातरम को बैन किया जा चुका था और इसे गाने पर सज़ा का प्रावधान था. नरम दल ने सुझाव का विराध किया तो दादा साहब खापर्डे सम्मेलन छोड़कर चले गये और उन्होने इसी दिन रायपुर में हनुमन मंदिर के सामने एक जनसभा की. दूसरे दिन भी बूटी के बाड़े में एक जनसभा की गई. बाद में राष्ट्रीय स्तर पर गरम और नरम दल में समझौता होने पर छत्तीसगढ़ में भी समझौता हो गया.

बिलासपुर

बिलासपुर में राघवेन्द्र राव, कुंजबिहारी अग्निहोत्री, बैरिस्टर छेदीलाल आदि प्रमुख नेता थे.

राजनांदगांव

राजनांदगांव के प्रमुख सूत्रधार ठाकुर प्यारेलाल सिंह थे. उन्हो़ने यहां सरस्वती पुस्तकालय बनाया था. इनके नेतृत्व में 1920 में बी.एन.सी. मिल्स के मजदूरों ने 36 दिन की सफल हड़ताल की थी. उन्हे अनेक बार जेल जाना पड़ा और इन्हें राजनांदगांव रियासत से निर्वासित भी किया गया.

धमतरी

धमतरी का कण्डेाल सत्याग्रह छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम में बड़ा महत्वहपूर्ण है. यहां के प्रमुख नेता मालगुजार बाबू छोटेलाल श्रीवास्व, नारायणराव मेधावाले, नत्थूजी जगताप आदि थे.

दुर्ग

दुर्ग जिले में धनश्याम गुप्ता, रामप्रसाद देशमुख, आदि थे.

छत्तीसगढ़ में होमरूल

जब तिलक ने एनीबेसेंट के साथ मिलकर होमरूल लीग की स्थापना की, तो छत्तीसगढ़ में भी उसकी शाखाएं खोली गई. इसमें मूलचंद बागड़ी, माधवराव सप्रे और लक्षमणराव उदयगीरकर ने उल्लेखनीय प्रयास किये.

गोखले का रायपुर आगमन

मई 1918 में गोपालकृष्ण गोखले रायपुर आये थे. उन्होने वामनराव लाखे के निवास पर रायपुर में एक सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें पं. रविशंकर शुक्ला, लक्षमणराव उदयगीरकर, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, नारायणराव मेघावाले पं. सुंदरलाल शर्मा आदि में भाग लिया. सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि स्वराज हमारा जन्मासिध्द अधिकार है का प्रचार गांव-गांव में किया जाये. इस योजना के अंतर्गत अनेक गांवों में भाषण हुए और पर्चे बांटे गये.

रोलट एक्ट का विरोध

छत्तीसगढ़ में भी अन्य स्थानों की तरह रोलट एक्ट का विरोध हुआ. जलियांवाला बाग की घटना का ज़बरदस्त विरोध किया गया.

खिलाफत आंदोलन और छत्तीसगढ़

17 मार्च 1920 को एक जनसभा में कांग्रेस की खिलाफत उपसमिति गठित की गई. इस सभा में असगर अली ने हिन्दू भाइयों को मुसलमानों से सहानुभूति रखने पर धन्यवाद दिया तो प्रत्युत्तर में पं. रविशंकर शुक्ल ने कहा कि अब हम हिन्दू और मुसलमान नहीं बल्कि सच्चे अर्थों में हिन्दुस्तानी हैं.

बी.एन.सी. मिल्स हड़ताल

राजनांदगांव में ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने बी.एन.सी. मिल्स के मजदूरों को संगठित करके 36 दिन की हड़ताल 1920 में कराई. इस हड़ताल में वी.वी.गिरी जो उस सयम मजदूर नेता थे और बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, भी राजनांदगांव आये थे. अंत में मजदूरों के हित में समझौता हुआ. बाद में ठाकुर साहब को रियासत से निष्कासित करने का आदेश दिया गया, जो बाद में राज्यटपाल के हस्तक्षेप से निरस्त हुआ.

कंडेल सत्याग्रह

सन् 1920 की दूसरी छमाही में हुए कण्‍डेल सत्याग्रह ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया. ब्रिटिश सरकार ने रुद्री और मुरुमसिल्ली में महानदी पर बांध बनाए जिसकी नहर धमतरी में कण्डेल से निकली थी. नहर का पानी लेने के लिये 10 वर्ष का अनुबंध आवश्यक था. इसकी राशि बहुत अधिक होने के कारण ग्रामवासी इसमें रुचि नहीं ले रहे थे. नहर विभाग ने एक दिन बिना ग्रामवासियों की मांग के ही नहर में पानी प्रवाहित कर दिया. गांव वालों ने इसपर भी अनुबंध से इंकार कर दिया तो सरकार ने उनपर पानी चोरी का आरोप लगाकर 4033 रुपये का सामूहिक जुर्माना लगा दिया. जब सरकार ने बलपूर्वक जुर्माना वसूल करना प्रारंभ किया तो जनता ने विद्रोह कर दिया. एक सभा की गई जिसमें पं. सुंदरलाल शर्मा, नारायणराव मेघावाले और छोटेलाल श्रीवास्तव ने भाग लिया. तय किया गया कि जुर्माने का भुगतान न किया जाये और असके विरोध में सत्याग्रह किया जाये. अनेक लोग गिरफ्तार कर लिए गए. सत्याग्रह कई महीने चला. जब सरकार के अत्याचार बहुत बढ़ गए तो आंदोलन का नेतृत्व गांधी जी को सौंपने का निर्णय किया गया. पं. सुंदरलाल शर्मा गांधी जी को आमंत्रित करने कलकत्ता गए. जब सरकार को पता लगा तो उन्हे आंदोलन के देशव्यापी हो जाने का भय सताने लगा. रायपुर के डिप्टी कमिश्नर ने स्थल पर जाकर जुमार्ना माफ कर दिया. इस प्रकार महात्मा गांधी के आने के पहले ही आंदोलन सफल हो गया. गांधी जी ने कण्डेल जाकर लोगों को बधाई दी.

गांधी जी की छत्तीसगढ़ यात्राएं

प्रथम यात्रा -

पं. सुदरलाल शर्मा कण्डेल सत्याग्रह का नेतृत्व करने के लिये गांधी जी को आमंत्रण देने कलकत्ता गए. गांधी जी ने आमंत्रण स्वी‍कार कर लिया परन्तु उनके आने के पहले ही आंदोलन सफल हो गया. 20 दिसंबर 1920 को महात्मा गांधी रायपुर पं. शर्मा के साथ रेल्वे स्टेशन पर उतरे. उनके साथ खिलाफत आंदोलन के नेता मौलाना शौकत अली भी थे. गांधी जी ने रायपुर में आज के गांधी चौक पर सभा की. दूसरे दिन वे कार से धमतरी पहुंचे. मकईबंध चौक पर उनका स्वागत हुआ. जानी हुसेन बाड़ा में जनसभा हुई. भारी भीड़ के कारण गुरूर के एक कच्छी व्यापारी ने उन्हें अपने कंधे पर बिठाकर मंच तक पहुंचाया. गांधी जी ने दोपहर का भोजन नत्थूजी जगपात के यहां किया. धमतरी के जमीन्दार बाजीराव कृदत्त ने तिलक स्वराज फंड के लिये 501 रुपये भेंट किए. वापसी में कुरुद में भी गांधी जी ने जनता को संबोधित किया. रायपुर वापस आकर ब्राह्मणपारा में आनंद वाचनालय में महात्मा गांधी ने महिलाओं को संबोधित किया. महिलाओं ने तिलक स्वराज फंड में लगभग 2000 रुपये कीमत के गहने भेंट किए.

दूसरी यात्रा -

गांधीजी आपने व्दि‍तीय छत्तीसगढ़ प्रवास पर 22 नवम्बर से 28 नवंबर 1933 तक कुल 5 दिन रुके थे. 22 नवम्बर को वे दुर्ग जिले में आये थे. गांधीजी के इस दौरे की व्यस्था मुख्यतया पं. रविशंकर शुक्ल तथा राजेन्द्र सिंह के हाथों में थी. गांधी जी का यह कार्यक्रम हरिजनों के उत्थान हेतु आयोजित किया गया था. दुर्ग में महात्मा गांधी जी श्री घनश्याम जी गुप्त के आतिथ्य में थे. वहां आते ही गांधी जी ने पूछा कि दुर्ग में देखने योग्य क्या है, तो गुप्त जी ने उनसे उस पाठशाला का जिक्र किया जहां 1926 से सवर्ण तथा हरिजनों के बालक एक ही टाट पटटी पर बैठकर पढ रहे थे. उसी दिन संध्या के समय दुर्ग के मोती बाग तालाब के मैदान में एक बृहद जनसभा हुई. गांधी जी के दर्शनार्थ लगभग 50,000 लोगों की भीड एकत्र हुइ थी. जनसभा में पहले श्री शिशुपाल सिंह यादव और उदय प्रसाद श्री बोडेगांव वाले का कविता पाठ हुआ तत्पश्चात गांधी जी का भाषण हुआ. इस यात्रा में धमतरी के हजारीलाल जैन उनकी कार ड्राइव कर रहे थे. 23 नवंबर को गांधी जी कुम्हारी होकर रायपुर पहंचे. यहां आमापारा चौक पर भीड़ ने उनका स्वागत किया. इस दौरे में उनकी अंग्रेज़ शिष्या मीराबेन, झाबुआ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ठक्कर बापा और उनके निज सचिव महादेव देसाई साथ थे. रायपुर में वे पं. रविशंकर शुक्ल के घर रुके. 23 नवंबर को गांधी जी ने तत्कालीन विक्टोरिया गार्डन (वर्तमान मातीबाग) में स्वदेशी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया. 24 नवंबर को उन्होने लारी स्कूल (वर्तमान सप्रे स्कूल) में जनसभा को संबोधित किया. इसके बाद पं. सुदरलाल शर्मा व्दारा संचालित सतनामी आश्रम का निरीक्षण किया और मौदहापारा में हरिजनों को संबोधित किया. इसी दिन पुरानी बस्ती के एक मंदिर को हरिजनों के लिए खोला गया. इस यात्रा में गांधी जी ने पं. सुदरलाल शर्मा की प्रशंसा करते हुए अपने से बड़ा और अपना गुरू निरूपित किया. 25 नवंबर को गांधी जी धमतरी गए. मकईबंध चौक पर उनका स्वागत किया गया. उनहोने मराठी कन्या शाला में एक जनसभा को संबोधित किया और बाबू छोटेलाल के निवास पर महिलाओं को संबोधित किया. अनेक महिलाओं ने हरिजन फंड के लिए अपने आभूषण अर्पित कर दिए. नगरपालिका की ओर से नत्थू जगपात ने गांधी जी को अभिनंदन पत्र भेंट किया जिसे गांधी जी ने नीलाम करवाया और उसे उनकी ड्राइविंग कर रहे हजारीलाल जैन ने खरीद लिया. नारायणराव मघावाले ने शहर की जनता की ओर से हरिजन फंड के लिये 501 रुपये भेट किए. गांधी जी ने धमतरी तसहील को छत्तीसगढ़ की बारदोली कहा. वे सतनामी मोहल्ले में गए जहां उन्होने भोजन किया. इसके बाद माखन नाई से हजामत बनवाई. वापसी में किसी ने एक पोटली गांधी जी पर फेंकी जिसमें चावल, हल्दी और दो पैसे का सिक्का था. इसे उन्होने वापसी में राजिम में नीलाम करवाया जिससे 101 रुपये प्राप्त हुए.

25 नवंबर को गांधी बिलापुर पहंचे और ठाकुर छेदीलाल ने जरहाभाटा चोक पर उनका स्वागत किया. उन्होने कुंजबिहारी अग्निहोत्री के यहां भोजन किया और विश्राम किया. दूसरे दिन उन्होने विशाल जनसभा की. उस स्थान का नाम अब गांधी चौक पड़ गया है. यहां भी महिलाओं ने आभूषण भेंट दिए. इसके बाद गांधी जी वापस रायपुर पहुंचे और 28 नवंबर को रेल से गोंदिया होकर बालाघाट गए. अपनी इस यात्रा में गांधीजी को हरिजन फंड के लिए कुल चौहत्तर हजार रुपये प्राप्त हुए जिसमें सबसे अधिक 1450 रुपये रायपुर में एकत्र हुए. गांधी जी के इस प्रवास से प्रभावित होकर पं. रामदयाल तिवारी ने गांधी मीमांसा नामक ग्रंथ लिखा जो उन्होने 1936 में पूरा किया.

छत्तीसगढ़ में असहयोग आंदोलन

गांधी जी के आह्वान पर छत्तीसगढ़ में भी असहयोग आंदोलन हुआ. इसमें अनेक कार्य हुए –

  1. न्यायालयों का बहिष्कार – ठाकुर प्यारेलाल सिंह पं. रामदयाल तिवारी, राघवेन्द्र राव एन.आर. खानखोज, ठाकुर छेदीलाल डी.के. मेहता आदि ने वकालत छोड़ दी.
  2. पदवियो का त्याग – वामनराव लाखे ने राय साहब की उपाधि छोड़ दी. जनता ने उन्हें सार्वजनिक स्थल पर लोकप्रिय की उपाधि दी. बैरिस्टर कल्याणजी, मोराजी थेकर तथा सेठ गोपीकिशन ने राय साहब की उपाधि छोड़ दी. काजी शेरखां ने अपनी खान साहब उपाधि त्याग दी.
  3. कौंसिल और चुनावों का बहिष्कार किया गया.
  4. विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार – 1 अगस्त 1921 को रायपुर में विशाल जुलूस निकालकर विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई. प्रभूलाल काबरा और रत्नाकर झा ने अपनी पत्नियों यहित विदेशी वस्त्रों की होली जलाई. अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही कार्यक्रम हुए.
  5. खादी का प्रचार – 1921 में कांग्रेस ने गरीबों को 460 चरखे भेंट किए. 11 अक्टूतबर 1921 को रावणभाटा में खादी प्रर्दशनी लगाई गई. धमतरी के मालगुजार छोटेलाल श्रीवास्तव ने अपने निवास पर अगस्त 1921 में खादी उत्पादान केन्द्र प्रारंभ किया. बिलासपुर में देवतादीन तिवारी ने खादी की दुकान खोली और कैलाश सक्सेना ने नार्मल स्कूल के पास स्वदेशी स्टोर्स खोला.
  6. मद्य निषेध - यह भी असहयोग आंदोलन का महत्वपूर्ण अंग था. लोगों ने आबकारी नीलामी का भी बहिष्कार किया.
  7. पं. सुंदरलाल शर्मा ने 1921 में क्षेत्रीय युवको को प्रशिक्षण देने के लिये सत्याग्रह आश्रम बनाया.
  8. राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना – छत्तीसगढ़ में भी पूरे देश की तरह अंग्रेज़ी स्कूल छोड़ने वाले छात्रों के लिए राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना की गई.
  9. राष्ट्रीय पंचायत – अदालतों का बहिष्कार करने के बाद लोगों को न्याय सुलभ कराने के लिये पंचायतों का गठन किया गया. रायपुर में 4 मार्च 1921 को गठित पंचायत के मंत्री सेठ जसकरण डागा बनाए गए. यही पंचायत 15 अक्टूबर 1931 तक काम करती रही और इसने 85 मामलों का निपटारा किया.
  10. राष्ट्रीय नेताओं का आगमन – 1921 में डा राजेन्द्र प्रसाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और सुभद्रा कुमारी चौहान रायपुर आये.

सिहावा नगरी जंगल सत्याग्रह

जनवरी 1922 में धमतरी के सिहावा में आदिवासी जनता ने बेगारी एवं कम मजदूरी भुगतान के विरुध्द आंदोलन किया. अंग्रेज़ों ने इसका बलपूर्वक दमन किया. 33 सत्याग्रहियों को तीन माह और 6 को पांच माह के कठोर कारावास की सज़ा दी गई. इसमें प्रमुख थे हरखराम सोम, विशंभर पटेल, पंचल सिंह सोम और शोभाराम साहू. इस समय सभी कांग्रेसी अधिवेशन में भाग लेने अहमदाबाद गए थे. वहां से लौटकर पं. सुंदरलाल शर्मा नारायणराव मेघावाले छोटेलाल श्रीवास्तव आदि के आने से लोगों के उत्साह में वृध्दि हुई. नेताओं में कांग्रेस की केन्द्रीय समिति से स्वीकृति आने तक आंदोलन को स्थगित रखने का आग्रह किया. इस बीच वन विभाग ने न्यूनतम मजदूरी की मांग स्वीकार कर ली इसलिये आंदोलन वापस ले लिया गया. बाद में पं. शर्मा एवं मेघावाले को भी इस संबंध में गिरफ्तार किया गया.

रायपुर ज़ि‍ला राजनीतिक सम्मेलन में पुलिस से टकराव

मई 1922 में रायपुर ज़ि‍ला राजनीतिक सम्मेलन का आयोजन छिंदवाड़ा के वकील यू.बी. घाटे की अध्यक्षता में किया गया. व्यवस्था यह थी कि आयोजन समिति के व्दारा जारी पास के बिना कोई भी व्याक्ति सम्मेलन में प्रवेश नहीं करेगा. तत्कातलीन डिप्टी कमिश्नर क्लार्क और पुलिस कप्तान जोन्स ने 5 नि:शुल्क पास की मांग की जिसे आयोजन समिति ने अस्वीकार कर दिया. जब एक मजिट्रेट और पुलिस ने सम्मेलन में प्रवेश करना चाहा तो रविशंकर शुक्ल और वामनराव लाखे ने उन्हे रोक दिया. शुक्ल जी को गिरफ्तार कर लिया गया. शहर का माहौल तवानपूर्ण हो गया. अगले दिन माखनलाल चतुर्वेदी ने भाषण दिया और सप्रे के नेतृत्व में व्दारिकाप्रसाद मिश्र सहित 200 लोगों ने गिरफ्तारी दी. अगले दिन डिप्टी कमिश्नर और पुलिस कप्तान ने पुन: प्रवेश करना चाहा तो सप्रे जी ने उन्हे रोक दिया और कहा कि प्रवेश की अनुमति परिषद के मंत्री और गर्वनर ही दे सकते हैं. क्लार्क ने पूछा कि यह दूसरा गवर्नर कौन है तो उन्होने कहा प्रांतीय कांग्रेस अध्यक्ष ई. राधवेन्द्र राव. क्लार्क ने राव को बुलवाया परन्तु उन्होने आने से इंकार कर दिया. अंतत: दोनो अधिकारियों ने टिकट लेकर ही सभा में प्रवेश किया.

स्वराज दल और छत्ती‍सगढ़

राष्ट्रीय स्तर पर मोतीलाल नेहरू और देशबंधु चितरंजन दास ने काउंसिल में प्रवेश कर सरकार का विरोध करने के लिये स्वराज दल का गठन किया. 1923 में कांग्रेस ने इसे स्वीकार कर चुनाव में समर्थन देने का निर्णय किया. 1923 में चुनाव में रविशंकर शुक्ला, शिवदास डागा, ई राघवेन्द्र राव, बैरिस्टर छेदीलाल आदि ने कांग्रेस कमेटी छोड़कर स्वराज दल का समर्थन किया. मध्यप्रांत में स्वराज दल को पूर्ण बहुमत मिला और बैरिस्टर छेदीलाल ने काउंसिल में प्रवेश किया. गवर्नर ने स्वराज दल के डा. मुंजे को सरकार बनाने का न्योता दिया परंतु उनके व्दारा अस्वीकार कर देने पर अल्पमत सरकार बना कर कार्य प्रारंभ किया. 1924 में अल्पमत मंत्रिमंडल के विरुध्द राघवेन्द्र राव में अविश्वास प्रस्ताव रखा जो बहस के बाद 24 के विरुध्द 44 मतों से पारित हो गया. 1925 में देशबंधु चितरंजन दास की मृत्यु के बाद स्वराज दल में फूट पड़ गई. राधवेन्द्र राव की अध्यक्षता में स्वतंत्र दल बनाया गया. 1926 के चुनाव में इस दल से राव साहब और छेदीलाल विजयी हुए. राव साहब को पहले शि‍क्षा मंत्री बनाया गया और बाद में उन्होने मुख्यमंत्री की रूप में भी काम किया. 1929 में राव साहब और छेदीलाल में मतभेद हुआ और ठाकुर छेदीलाल कांग्रेस में वापस आ गए. बाद में राव साहब भी कांग्रेस में वापस आ गए.

झंडा सत्याग्रह

इस सत्याग्रह के लिये छत्तीसगढ़ से बहुत से लोग नागपुर गए. बुहत से लोगों को गिरफ्तार भी किया गया.

काकीनाड़ा अधिवेशन और छत्तीसगढ़ से पैदल यात्रा

1923 में कांगेस के अधिवेशन में भाग लेने धमतरी से 25 कार्यकर्ता पैदल गए.

धमतरी में हिन्दू मुस्लिम दंगा

1924 में धमतरी मे हिन्दू मुस्लिम संघर्ष हुआ जिसमें दोनो पक्ष के तीन-तीन लोग घायल हुए. पं. सुंदरलाल शर्मा ने समझौता कराया.

प्रथम सविनय अवज्ञा आंदोलन

इसके अंतर्गत देश के अन्य हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से चार प्रकार के कार्यक्रम हुए –

  1. नमक बनाना
  2. महिलाओं व्दारा शराब और विदेशी वस्तुओं की दुकानो पर धरना देना
  3. अस्पृश्‍यता का त्याग
  4. सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार
  5. 15 अप्रेल को सेठ गोविन्द दास की अध्यक्षता में प्रांतीय सम्मेलन हुआ जिसमें रविशंकर शुक्ला ने हाइड्रोक्लोरिक एसिड और सोडा से नमक बनाकर कानून तोड़ा. रायपुर में इस आंदोलन को योजनाबध्द रूप से चलाने का श्रेय पांच लोगो को दिया जाता है जिन्हे जनता पाण्डव के नाम से पुकारती थी. यह थे – धर्मराज – वामनराव लाखे, भीम- लक्ष्मी नारायण महंत, अर्जुन – ठाकुर प्यारेलाल सिंह, नकुल – मौलाना अब्दुल रऊफ, सहदेव – शिवदास डागा. इसी प्रकार के आंदोलन अन्य शहरों में भी हुए.

    आंदोलन के दौरान जंगल सत्याग्रह

    गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस ने यह फैसला किया कि जहां नमक बनाने की सुविधा नहीं है वहां अन्य कानून तोडा जाये और जंगल में जंगल कानून तोड़ा जाये. छत्तीसगढ़ में वन सामग्री के उपयोग पर प्रतिबंध था. इसलिये जंगल कानून तोड़कर इसका विरोध किया गया. इसे जंगल सत्याग्रह कहा जाता है –

    1. गट्टासिल्ली सन् 1930 में धमतरी के सिहावा के ठेमली नामक गांव के लगभग 800 मवेशी को आरक्षित वन में चरने के कारण पकड़कर गट्टासिल्ली कांजी हाउस में डाल दिया गया. नारायण मेघावाले, जगताप एवं छोटेलाल 25 सत्याग्रहियों के साथ गट्टासिल्ली पहुंचे. वे कांजीहाउस के सामने लेट गए. पुलिस ने उनपर खौलता हुआ पानी डालना शुरू कर दिया पर वे फिर भी नहीं हटे. अंतत: प्रशासन को मवेशियों को नि:शुल्क वापस करना पड़ा.
    2. रुद्री-नवांगांव 22 अगस्‍त 1930 को रुद्री में आरक्षित वन की घास काटकर जंगल कानून का उल्लंघन करने का निर्णय किया गया. इसका नेतृत्व मेघावाले और जगताप करने वाले थे, परन्तु उन्हे पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया. पूरे क्षेत्र में धारा 144 लगा दी गई. पं. शर्मा को भी रुद्री के रास्ते पर अभनपुर से गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद कमान छोटेलाल के हाथ में आई. उन्होने गोविन्दराव डाभावाले के नेतृत्‍व में एक जत्था भेजा. इसे भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. यहां पर लगभग 500 हजार लोग एकत्रित हो गए. पुलिस ने लाठीचार्ज किया. एक पुलिस वाले को चोट लग गई. पुलिस ने गोली चला दी जिसमें संन्धु कुम्हार नामक एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई और अनेक लोग घायल हो गए. घायलों में भी एक व्यक्ति रलू की मृत्यु हो गई. सरकार ने चोरी का अभि‍योग लगाकर कारावास के साथ बेंत मारने की सज़ा देना आरंभ कर दिया परन्तु सत्याग्रह चलता रहा. अंत में 5 मार्च 1931 को गांधी इरविन समझौते के बाद आंदोलन समाप्त हुआ.
    3. महासमुंद (तमोरा) और बालिका दयावती का शौर्य सितंबर 1930 में महासमुंद में जंगल सत्याग्रह का निर्णय हुआ था. इसके नेता शंकरराव गढ़ेवाल और यति यतनलाल जैन को पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया. एक जत्थे ने भगवती प्रसाद मिश्रा के नेतृत्‍व में तमोरा के लिए प्रस्थान किया. वहां गिरफ्तारि‍यां होती रहीं पर आंदोलन चलता रहा. एक दिन 10 हजार की भीड़ एकत्रित हो गई. तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी एम.पी. दुबे ने उन्हे रोका तो एक वीर बालिका दयावती ने उन्हे तमाचा मार दिया. इससे गोली चलने की संभावना उत्पन्न‍ हो गई परन्तु वहां उपस्थित मालगुजार ने स्थिति को संभाल लिया.
    4. अन्य स्थानों पर जंगल सत्या‍ग्रह इनमें लभरा ग्राम, मोहबना-पोंडी, पोंडी ग्राम, बांधाखार, सारंगढ़ और उदयपुर के जंगल सत्याग्रह महत्वपूर्ण हैं.

    सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा चरण

    गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद गांधी जी ने दोबारा सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया. शासन ने तुरंत दमन शुरू कर दिया. छत्तीसगढ़ में नेताओं के कैद हो जाने के पर भी आंदोलन को चलाते रखने के लिये 8 डिक्टेटर नामजद किए गए. यह थे. पं. रविशंकर शुक्ल, पं. सुंदरलाल शर्मा, शंकरराव गनौदवाले, श्रीमती राधाबाई पं. रामनारायण मिश्र हर्षुल, माधवप्रसाद परगनिहा, बह्मदेव दुबे और लक्ष्मीप्रसाद तिवारी. सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद शंकरराव गनौदवाले ने कमान संभाली. आंदोलन लगातार चलता रहा. महिलाओं ने भी सक्रियता दिखाई. राजनीतिक बंदियों ने जेल में खादी के वस्त्रों की मांग की, जिसपर उनपर कोड़े बरसाए गए.

    पत्र बम योजना

    रामनारायण हर्षुल ने अंग्रेज़ों की चापलूसी करने वाले लोगों को मानसिक तौर पर आतंकित करने के लिये पत्र बम की योजना बनाई. दो स्याही सोख कागजों के मध्य फास्फोरस चिपकाकर महीन विस्फोटक बनाया गया. इस अनूठे तरीके से कई लोगों का हाथ मुंह जल जाने की खबरें अखबारों में प्रकाशित हुईं, पर इससे कोई विशेष क्षति नहीं होती थी. हर्षुल को गिरफ्तार कर लिया गया और उनपर मुकदमा चलाकर उन्हें एक वर्ष का कठोर कारावास दिया गया. दुर्ग जिले में 6 से 12 अप्रेल 1932 तक सत्याग्रह अथवा बलिदान सप्‍ताह मनाया गया. इस दौरान लगातार धरने आंदोलन और पिकेटिंग जारी रहे. 5 अगस्त 1932 को रायपुर में बंदी दिवस मनाया गया. इस आंदोलन में ब्रह्मदेव दुबे को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

    रायपुर में वानर सेना और बालक बलीराम आज़ाद का शौर्य

    रायपुर के ब्राह्मण पारा में मात्र 14 वर्ष के बलीराम दुबे आज़ाद ने बच्चों का एक दल बनाया जिसे वानर सेना का नाम दिया गया. यति यतनलाल जैन इस सेना के संचालक थे. इस सेना का प्रमुख काम स्वतंत्रता से संबंधित पोस्टर पर्चों का वितरण करना, संदेश पहुंचाना और छोटी सभाएं करना था. पुलिस ने बर्बरता पूर्वक इसे कुचलना प्रारंभ कर दिया. पुलिस इन बच्चो को पकड़कर नगर से 3-4 मील बाहर छोड़ आती थी जहां से पैदल आते-आते शाम हो जाती थी जिससे इनके काम नहीं हो पाते थे. बाद में पुलिस ने इन्हें बेंतों से पीटना भी प्रारंभ कर दिया. 28 अगस्त 1932 को बर्बरता की पराकाष्ठा में लोगो पर लाठीचार्ज किया और गिरफ्तारी की. बच्चो को भी नहीं छोड़ा गया. बलीराम आज़ाद और रामाधार नाई को कैद कर 9 माह की जेल दी गई. इससे पहले भी आज़ाद को 13 मार्च 1932 को भाषण देते हुए पकड़े जाने पर बेंत से पीटा गया था. संभवत: इन्ही आज़ाद के नाम पर ब्राह्मणपारा के समीप चौक का नाम आज़ाद चौक पड़ा है. पं. रविशंकर शुक्ल के बड़े पुत्र भगवतीचरण भी वानर सेना की गतिविधियों में सन्लग्न थे और उन्हें भी जलियांवाला बाग से संबंधित सामग्री के वितरण में बेंत से पीटा गया था.

    खादी दमन

    डिप्टी कमिश्नर ने आदेश दिया था कि खादी पहने किसी भी व्यक्ति को न छोड़ा जाये.

    कुछ अन्य घटनाएं

    अंग्रेज़ों ने 11 नवंबर 1930 को रायपुर जिला कौंसिल को 3 साल के लिये स्थगित कर दिया था. शासन ने 8 मार्च 1934 को इसे बहाल कर दिया. 7 अप्रेल 1934 को गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की समाप्ति की घोषणा की. 15-16 दिसंबर 1935 को पं. नेहरू रायपुर ज़ि‍ला कौंसिल की बैठक में आये थे. 1935 में प्रशासनिक दृष्टि से बरार को मध्यप्रांत में मिला दिया गया.

    प्रांतों में स्वायत्ता के लिये 1937 के चुनाव

    1935 के भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत 1937 में चुनाव हुए. मध्यप्रांत में भी कांग्रेस बहुमत से आई. 14 जुलाई 1937 को डा. नारायण भास्कर खरे मध्यप्रांत के मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए. पं. रविशंकर शुक्ल को शिक्षा मंत्री बनाया गया. उन्होने शिक्षा के लिये विद्यामंदिर योजना प्रारंभ की. दल मे मतभेद होने के कारण श्री खरे को त्यागपत्र देना पड़ा और 29 जुलाई 1938 को पं. रविशंकर शुक्‍ल ने मुख्यमंत्री का कार्यभार ग्रहण किया. व्दितीय विश्वयुध्द में बिना विधान मंडल की सहमति के शामिल करने के विरोध में कांग्रेस कार्यकारिणी के आदेश पर मंत्रिमंडल ले त्यागपत्र दे दिया.

    छुईखदान जंगल सत्याग्रह

    छुईखदान में स्टे‍ट कांग्रेस की स्थापना 1938 में हुई. वहां पर इस वर्ष जंगल सत्याग्रह प्रारंभ किया. सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया गया. इनमें समारू बरई प्रमुख थे.

    बदराटोला जंगल सत्याग्रह

    1939 में स्टेट कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने डोंगरगढ़ के निकट बदराटोला में जंगल सत्याग्रह का आयोजन किया. अहिंसक आंदोलन पर लाठियां बरसाई गईं. निहत्थे आदिवासियों पर गोली चलाई गई जिसमें 27 वर्षीय रामाधीन गोंड शहीद हो गए और अनेक घायल हो गए.

    व्यक्तिगत सत्याग्रह

    अक्टूबर 1940 में गांधी जी के आह्वान पर देश में व्‍यक्त्गित सत्याग्रह प्रारंभ हुआ. महात्मा गांधी ने 500 व्यक्तिगत सत्याग्रहियों को अनुमति दी थी, जिसमें से 50 रायपुर के थे. बाद में और लोगों को अनुमति मिलने से महाकौशल के कुल 2761 सत्याग्रहियों में से 473 रायपुर के तथा 107 दुर्ग के थे. सरकार ने दमन की नीति अपनाई और सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर लिया. सरकार को आंदोलन के आगे झुकना पड़ा और सलाहकार कौसिल बनाई गई. इसके बाद सरकार ने सत्याग्रहियों को छोडना आरंभ कर दिया और दिसंबर 1941 तक सभी को रि‍हा कर दिया.

    क्रिप्स मिशन की असफलता और डा राघवेन्द्र राव

    उस समय डा राव भारत सरकार (वायसराय की कौंसिल में) गृह रक्षा सदस्य थे. क्रिप्स योजना को असफल करने में इनका बड़ा योगदान था.

    रायपुर षडयंत्र केस

    रायपुर के अवधियापारा निवासी श्री परसराम सोनी रायपुर कान्सपिरेसी केस के नायक थे. उन्होने गिरीलाल लोहार से पि‍स्तौल, रिवाल्वर बनाने और चालाने का प्रशिक्षण लिया. उन्होने बम बनाना भी सीखा. बंगाल-नागपुर रेल्वे के ट्राली निर्माता श्री अमृतलाल से औजार, लोहे का सामान और तकनीकी सहायता ली. सी.पी. मेडिकल स्टोर के सहायक सेल्समेन श्री होरीलाल से ज़रूरी रसायन प्राप्त किए एवं बड़े व्यापरियों से आर्थिक सहायता प्राप्त की. हथियारों के रखरखाव के लिये ईदगाहभाठा एवं रावणभाठा को चुना गया. एक बार रावणभाठ में अचानक बम विस्फोट हो गया और उसकी आवाज़ राजकुमार कालेज के प्राचार्य मि. पियर्स को सुनाई पड़ी. उन्होने ने पुलिस में रिपोर्ट कर दी. इसके बाद मालवीय रोड पर ओरियण्टल होटल के मालिक ने उन्हें जगह प्रदान की. इस कांसपिरेसी में श्री रणवीर शास्त्री , सुधीर मुखर्जी, दशरथलाल दुबे, प्रेमचंद वासनिक, क्रांति‍कुमार भारतीय, कुंजबिहारी चौबे आदि शामिल थे. इनके बीच एक शिवनंदन नामक व्यक्ति पुलिस का मुखबिर था. उसकी सूचना पर परसराम सोनी को भरी रिवाल्वर के साथ सदर बाज़ार एवं एडवर्ड रोड को जोड़ने वाली सड़क से गिरफ्तार कर लिया गया. इनके घर की तलाशी में विस्फोटक एवं अन्य आपत्तिजनक सामान मिले. इसके बाद गिरिलाल लोहार, डा. सूर और मंगल मिस्त्री को कैद कर लिया गया. अगले दिन रणवीर शास्त्री भी पकड़े गए. इसके बाद सुधीर मुखर्जी, भूपेन्द्रनाथ मुखर्जी, सुरेन्द्रनाथ दास, सीताराम शास्त्री , कृष्ण राम थिटे, क्रांतिकुमार भारतीय, दशरथलाल दुबे, कुंजबिहारी चौबे आदि को भी गिरफ्तार कर लिया गया. इनका मुकदमा पी. भादुड़ी, बेनी प्रसाद तिवारी, अहमद अली, चांदोरकर, पेढ़ारकर, चुन्नीलाल अग्रवाल जैसे प्रख्यात अधिवक्ताओं ने लड़ा. 9 माह मुकदमा चला जिसके बाद 27 अप्रेल 1943 को निम्नलिखित सज़ाएं दी गईं – गिरिलाल – 8 साल, परसराम सोनी - 7 साल, सुधीर मुखर्जी – 2 साल, क्रांतिकुमार भारतीय – 2 साल, एवं अन्य को भी इससे कम सज़ाएं हुईं. रायपुर के ज़ि‍ला एवं सत्र न्यायालय के निर्णय के विरुध्द नागपुर उच्च न्यालयालय में अपील हुई जिसमें न्यायमूर्ति नियोगी ने दस में से चार अभियुक्तों को छोड़ दिया. इस बीच सरदार भगतसिंह के अनन्य मित्र जयदेव कपूर 1946 में रायपुर आये. उनका अभिनंदन करने गांधी चौक में एक सभा हुई जिसमें जनता ने प्रस्ताव पारित कर परसराम सोनी और गिरीलाल लोहार को मुक्त करने का आग्रह किया. इस प्रस्ताव के अनुरूप क्रांतिकुमार भारतीय और सुधीर मुखर्जी (जिन्हे हाई कोर्ट ने छोड़ दिया था) जनता का पक्ष रखने राजधानी नागपुर गए जहां मुख्य्मंत्री पं. शुक्ल ने तत्काल उनका आग्रह स्वीकार करके इन राजबंदियों को रिहा कर दिया. 26 जून 1946 को परसराम सोनी और गिरिलाल रिहा कर दिये गये.

    भारत छोड़ो आंदोलन

    बम्बई में 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के बाद वापस आते समय छत्तीसगढ़ के सभी वरिष्ठ नेताओं को मलकापुर में गिरफ्तार कर लिया गया. इससे जनता उत्तेजित हो गई. 9 अगस्त को रायपुर के सभी स्कूल कालेज और बाज़ार बंद रहे. सिटी कोतवाली के पास भीड़ को हवाई फायर करके हटाया गया. 10 अगस्त को श्री रणवीर शास्त्री के नेतृत्व में जुलूस निकला. शास्त्री जी गिरफ्तार कर लिये गए. आंदोलन लगातार चलता रहा. बिलासपुर में भी अनेक लोग गिरफ्तार हुए.

    रायपुर डायनामाइट कांड

    बिलखनारायण अग्रवाल जबलपुर से आये थे. उनके पास शक्तिशाली डायनामाइट था. उन्होने ईश्वरीचरण शुक्ला , नागरदास बावरिया, नारायणदास राठौर एवं जयनारायण पांडे के सथ मिलकर रायपुर जेल की दीवार को उड़ाकर राजबंदियो को छुड़ाने की योजना बनाई. डायनामाइट जेल की पिछली दीवार में लगाया गया और उसमें आग लगा दी गई, परन्तु दीवार को मात्र थोड़ी सी क्षति हुई. इन सबको शंका के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया परंतु आरोप सिध्द न होने से वे छूट गए. 1944 में ईश्वरीचरण शुक्ल एवं नाराणयणदास राठौर को टेलीफोन के कनेक्शन काटने और लेटर बाक्स जलाने के आरोप में पुन: गिरफ्तार कर लिया गया.

    1945-46 के चुनाव

    1946 में पुन: चुनाव हुए. मध्यप्रांत में कांग्रेस को 112 में से 84 सीटे मिलीं. 27 अप्रेल 1946 को पं. रविशंकर शुक्ल ने दूसरी बार मध्य्प्रांत एवं बरार के मुख्य मंत्री की शपथ ली. व्दारका प्रसाद मिश्र गृह मंत्री बने. धनश्याम गुप्त विधान सभा अध्य‍क्ष चुने गए. इस सरकार ने तत्काल राजनीतिक बंदियो की मुक्ति, वारंटो के निरस्तीकरण एवं पूर्व शासन व्दारा वसूल किए गए जुर्माने की वापसी के काम किए. अंतत: 15 अगस्त 1947 को भारत स्वातंत्र हुआ.

    ,u>स्वतंत्रता दिवस समारोह –

    मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल ने राजधानी नागपुर में सीताबर्डी के किले पर तिरंगा झंडा फहराया. रायपुर में पुलिस लाइन में खाद्य मंत्री आर.के. पाटिल ने झंडारोहण किया. दुर्ग में घनश्याम गुप्त और बिलासपुर में राम गोपाल तिवारी ने ध्वज फहराया. रायपुर के बैजनाथपारा में हिन्दुओं एवं मुस्लिमों के बीच कुछ छिटपुट घटनाएं हुईं परन्तु इन्हें शीघ्र सुलझा लिया गया.

Freedom movement in Chhattisgarh

Development of awareness

Many reading clubs, debating societies, literary organizations etc. were formed in Raipur, Bilaspur and other places which created awareness among the people.

Beginning of the activities of Indian National Congress

Chhattisgarh got associated with Congress for the first time in the Nagpur convention in 1891, but major activities started with Nagpur Provincial council in 1905. The Swadeshi resolution of Dada Sahab Khaparde was accepted in the Jabalpur Provincial Council in 1906. Around this time the Raipur branch of Congress was established. Barrister C.M. Thakkar played an important role in it.

Contribution of Pt. Sundarlal Sharma

Pt. Sunderlal Shrama is known as Raja Rammohan Roy of Chhattisgarh. He belonged to Chamsul village near Rajim. He became a member of the Congress in 1906. He represented Chhattisgarh in the Surat Convention of Congress in 1907. He created the Sammitra Mandal in 1906 for social reforms. He also did a lot of work for improvement of the lot of Harijans. he established a satmani Ashram and also many Kahdi ashrams. he started a Sanskrit school in Rajim. he led the Kandel movement in Dhamtari and invited Mahatma Gandhi. He had to go to jail many times. He published a Jail magazine from the jail. Role of Newspapers– Madhavrao Sapre started the Chhattisgarh Mitra Newspaper from Pendra. This paper continued till 1903. After this other papers like Saraswati of Padumlal Punnalal Bakshi (1900), Hindi Granth Prakashn Mandlai (1905) and Hind Kesri (1905) of Madhavrao Sapre, Arunoday (1921-22) of Thakur Pyarelal Singh, krishna janmasthan Samachar Patra (Jail Patrika (1922-23), Congress Patrika (1937) of Raipur Congress Committee etc. worked to develop feeling of Nationalism. The Hind Kesari of Madhav Rao Sapre was the most effective. Sapre ji published Hindi translations of two articles of Balgangadhar Tilak published in Kesari. These articles were Desh Ka durdev and Bomb Gole ka Rahasya. In these articles there was criticism of the British Government and call to the people to do their National duty. MadhavRao sapre as arrested in 1908 for publishing these articles. Government wanted that Sapre ji should apologize in writing. Wamanrao Lakhe met Sapre ji in Jail and told him that his brother had sent a message that he will commit suicide if Sapre Ji did not apologize. Sapre ji signed the apology in desperation. He was released without a trial. This incident reduced his prestige in the eyes of the people. His photos were burnt in the city. Sapre ji could not come out to meet the people for month. Makhanlal Chturvedi published many things about Chhattisgarh in Karmaveer. Raipur Zila Parishad brought out a magazine named Utthan (1935-37) and Bilaspur Zila Parishad published the magazine Vikas. All these developed Nationalism among the people.

Extremists and Moderates in Congress

In 1907 in Surat convention there was division in the Congress in extremists and moderates. In Chhattisgarh as well there was a similar division. Dada sahab Khaparde, Madhav Rao Sapre and Dr Munje were in the extremist group and Ravishankar Shukla, Harisingh Gour, Dr Madholkar were moderates. In the Raipur convention Dada sahab Khaparde suggested that the convention should begin by singing Vandematram. This suggestion was opposed by the moderates as vandematram was banned by the Government and there was punishment for singing it. Dada Sahab Khaparde boycotted the convention. He addressed a separate public meeting near Hanuman temple on the same day. Next day as well he addressed a public meeting in Booti Bada. Later there was reconciliation between the two factions at the National level as well as at the State level.

Bilaspur

Raghvendra Rao, Kunjbihari Agnihotir, Barrister Chhedilal etc. were the mainleaders in Bilaspur.

Rajnandgaon

The main leader of Rajnandgaon was Thakur Pyarelal. He started the Saraswati library here. He also led a labor strike of 36 days in BNC Mills. He was sent to Jail many times. He was also deported from Rajnandgaon.

Dhamtari

Kandel satyagrah of Dhamtari is very important in the history of freedom struggle. The main leaders of Dhamtari were Malgujar Babu Chhotelal Shrivastav, Narayanrao Meghawale, Natthuji Jagtap etc.

Durg

Ghanshyam Gupta, Ramprasad Deshmukh were the main leaders in Durg.

Homerule in Chhattisgarh

When Tilak started the Homerule league with Anne Besant, its branches were opened in Chhattisgarh as well. The efforts of Mulchand Bagdi, Madhavrao Sapre and Laxmanrao Udaigirkar are worth mentioning.

Raipur visit of Gokhale

Gopla Krishan Gokhale cameto Raipur in May 1918. He held a meeting at the residence of Wamanrao Lakhe in which Pt. Ravishankar Shukla, Laxmanrao Udaigirkar, Thakur Pyarelal Singh, Narayanrao Meghawale, Pt. Sunderlal Sharma etc. participated. It was decided in the meeting that “Swaraj Hamara Janmasidh Adhikar Hai” (Freedom is my birthright) should be spread to very village. Speeches were organized and pamphlets were distributed in villages under this scheme.

Opposition of Rowlatt Act

Rowlatt Act was opposed in Chhattisgarh as well. There was opposition to the incident of Jaliwanwala Bagh as well.

Chhattisgarh and Khilafat Movement

A congress subcommittee was made on 17th March 1920 for Khilafat movement in a public meeting. In this meeting Asgar Ali thanked Hindu brothers for sympathy towards Muslims. In reply Pt. Ravishankar Shukla said that we are not longer Hindus and Muslims and that we have now truly become Indians.

BNC Mills strike

Thakur Pyarelal Singh organized the labor of BNC Mills in Rajnandgaon and conducted a successful strike for 36 days in 1920. Mr V V Giri who was a labor leader at that time and later became the President of India visited Rajnandgaon. In the end an agreement was reached in favour of the labor. Later Thakur Sahab was deported from the Rajnadgaon State. The deportation order was later cancelled after the intervention of the Governor.

Kandel Satyagrah

In the second part of 1920 the Kandel Satyagrah became fanous throughout India. The British has made a dam in Rudri and Murumsilli in Dhamtari. The canal of these dams went through Kandel. A tem years agreement was made mandatory to take water from the canal for which a huge fees was to be paid. The farmers were not in a position to pay this fee. The irrigation department released water into the canal without any demand from the farmers and raised a demand for payment of dues. The farmers refused to pay. The Government then decided to recover the money by force and imposed a common fine of Rs 4033 on the whole village. A public meeting was organized in which Pt. Sunderlal Sharma, Narayanrao Meghawale and Chhotelal Shrivastav participated. It was decided not to pay the fime and organize a Satyagrah against it. Many people were arrested. When the torture by the government became too much Pt. Sundarlal Sharma decided to hand over the leadership of the movement to Mahatma Gandhi. He went to Calcutta to invite Gandhi ji. When the government found this out, they were afraid that the movement could have National implications. The Deputy Commissioner visited the spot and cancelled the fine. Thus the movement was successful even before Mahatma Gandhi came here. Gandhiji congratulated the people when he went to Kandel.

Gandhiji’s Chhattisgarh Visits

First Visit -

Pt. Sunderlala Sharma invited Mahatma Gandhi to lead the Kandel movement but the movement was successful even before he came. Mahatma Gandhi came to Raipur railway station along with Pt. Sharma and Maulana Shukat Ali on 20th December 1920. A public meeting was held at the place where there is Gandhi Chowk today. Next day he went to Dhamtari by car. He was received at the Mkaibandh Chowk. The public meeting was held at Jani Husain Bada. The crowd was so much that he was taken to the stage on the shoulders of a Kachhi trader. Gandhi ji had lunch at the home of Nathuji Jagtap. The Zamindar of Dhamtari Bajirao Kridutt gave Rs 501 for Tilak Swaraj fund. While returning Gandhiji addressed a rally at Kurud. In Raipur he addressed a meeting of women in Anand reading room in Brahmanpara. The women donated jewelry worth Rs 2000 for Tilak Swaraj Fund.

Second Visit

Gandhiji came to Chhattisgarh for his second visit for 5 days from 22nd to 28th November. He came to Durg on 22nd November. The arrangements were made mainly by Ravishankar Shukla and Rajendra Singh. This programme of Gandhiji was for the purpose of welfare of harijans. Mahatma Gandhi was hosted by Ghanshyam Gupta in Durg. He asked what is worth seeing in Durg as soon as he reached there. Gupta ji told him that there was a primary school where high caste and harijan children were studying sitting on the same tatpatti from 1926. On the same evening a huge public meeting was organized in Moti Bag Talab ground. Approximately 50000 people collected. First there was poetry recitation by Shishupla Singh Yadav and Udaiprasad Bodegaonwale. After that Mahatma Gandhi gave his speech. Hajarilal Jain drove Gandhiji’s car throughout this visit. On 23rd NOvember Gandhiji came to Raipur via Kumhari. He was given a grand reception at Amapara chowk. Gandhi ji was accompanied on this visit by his English disciple Meerabain, the freedom fighter from Jhabua Thakkar bapa and his private secretary Mahadev Desai. He stayed at the home of Ravishankar Shukla in Raipur. He inaugurated a swadeshi exhibition in Victoria garden (now Moti Bagh) on 23rd November. On 24th November he addressed a public meeting in Lawrie School (Now Sapre school). After this he inspected the Satnami ashram of Sunderlal Sharma. he addressed harijans in Maudhapara. On the same day a temple in Purani Basti was opened for harijans. Mahatma Gandhi said in this visit that Sunderlal Sharma was not only elder to him, he was also his guru. On 25th November Gandhiji went to Dhamtari. He was given a reception in Makaibandh Chowk. He then addressed a pubic meeting in Marathi girls school. He addressed women in the home of Babu Chhotelal. Many women donated their jewelry for harijan fund. Nathu Jagtap gave an abhinandal patra from the municipality which Gandhiji auctioned. It was purchased by hajarilal Jain his driver. Narayanrao Meghawale donated Rs 501 from teh public of the town for the harijan fund. Gandhiji called it the Bardoli of Chhattsigarh. He had lunch in the satnami mohalla and got a shve from makhan barber. When he was returning someone threw a bundle at Gandhiji which contained haldi, rice and a coin of 2 paise. Gandhiji got it auctioned and it fetched Rs 101.

Gandhiji reached Bilaspur on 25th November. Thakur Chhedilal received him at Jarhabhata Chowk. He lad lunch at the home of Kunjbihari Agnihotri and took rest there. He then addressed a public meeting at the place which is now called Gandhi Chowk. Here also women donated jewelry. Gandhji returned to Raipur on 28th November and went to Balaghat via Gondia by rail. In this vist a total of Rs 74000 were collected for the harijan fund and the largest collection of Rs 1450 was in Raipur. Randayal Tiwari inspired by this visit of Gandhiji stared work on his book Gandhi Meemansa which he completed in 1936.

Non-cooperation movement in Chhattisgarh

Non-cooperation movement took place on in Chhattisgarh as well -

  1. Boycott of Courts – Thakur Pyarelal Singh, Pt. Ramdayal Tiwari, Raghvendra Rao, N R Khankhoj, Thakur Chhedilal, D K Mehta etc. left their legal practice.
  2. Renunciation of titles – Wananrao Lakhe renounced his title of Rao Sahab. Pubic called him Lokpriya in a public meeting. Barrister Kalyanhi Morarji Thekar and Seth Gopikishan also renounced their titles of Rao Sahab. Kazi Sher Khan renounced the title of Khan Sahab.
  3. There was boycott of the election to the Council.
  4. Boycott of foreign goods – Foreign goods were burn after taking out a procession on 1st August 1921 in Raipur. Prabhulal Kabra and Ratnakar Jha long with their wives burnt foreign cloths. Similar programmes were organized in other places as well.
  5. Khadi – Congress distributed 460 looms to the poor in 1921. On 11th October 1921 a khadi exhibition was organized in Rawanbhata. The Malgujar of Dhamtari Chhotelal Shrivastav started manufaturing khadi at his home in August 1921. In Bilaspur Devtadeen Tiwari opened a khadi shop and Kailash Saxena opened a swadeshi store near Normal School in Bilaspur.
  6. Prohibition – This wa san important part of non-cooperation. People boycotted excise auctions.
  7. Pt. Sunderlal Sharma started a Satyagrah ashram to train youth in satyagrah in 1921.
  8. Rashtriya Schools – Rashtriya Schools were opened in Chhattisgarh ike the rest of the country for the children who left English schools.
  9. Rashtriya Panchayat – After the boycott of the courts a Rashtriya Panchayat was made for easy availability of justice to people on 4th March 1921 in Raipur. Seth Jaskaran Daga was its secretary. This Panchyat worked till 15th October 1931 and disposed of 85 cases in this period.
  10. Visit of National Leaders – Dr Rajendra Prasad, Chakraverty Rajgoplachari and Subhadra Kumari Chowhan visited Raipur in 1921.

Sihawa Nagri Jungle Satyagrah

The people of Sihawa in Dhamtari protested against the begari and low wages in January 1922. The British suppressed the protest. 33 protestors were given three months and 6 were given 5 months rigorous imprisonment. The main among them were Harakhram Som, Vishanbher Patel, Panchal Singh Som and Shobharam Sahu. At thsi time all the congress men had gone to Ahmadabad to take part in the convention. When Pt. Sunderlal Sharma, Narayanrao Meghawale and Chhotelal Shrivastav returned, the people were energized but the leaders advised that the movement be kept on hold till permission was received from the central committee of the Congress. Meanwhile the forest Department accepted the demand of just wages and the movement ended. However later Pt. Sharma and Meghawale were arrested in connection with this movement.

Confrontation with the police in Raipur district convention

Raipur district political convention was held in May 1922. This was presided over by U B Ghate the advocate from Chhindwara. It was decided that no one will be allowed to enter without a pass issued by the organizing committee. The Deputy Commissioner Clark and Police captain Jones asked for 5 free passes but their request was rejected by the committee. When one magistrate tried to enter along with police, he was stopped by Ravishankar Shukla and Wamanrao Lakhe. Shukla was arrested. The city became very tense. Next day Makhanlal Chaturvedi gave a speech and 200 people along with Dwarika Prasad Mishra courted arrest under the leadership of Sapre. When the Deputy Commissioner and Police captain wanted to enter again the next day they were stopped by Sapre who told them that the permission to enter can nly be given by the governor and secretary of the council. Clark asked who this new Governor was, to which Sapre replied that he was E Raghvendra Rao the president of the provincial Congress Committee. Clark called Rao but he refused to come. Finally both officers purchased tickets to enter the convention.

Swaraj Party and Chhattsgarh

At the National level Motilal Nehru and Deshbandhu Chitranjan Das formed the Swaraj party to enter the council and oppose the government from within. The congress agreed to support it in elections in 1923. In the elections of 1923 में Ravishankar Shukla, Shivdas Daga, E Raghvendra Rao, Barrister Chhedilal etc. left the congress committee to contest elections from swaraj party. The Swaraj party won the election and Governor invited the leader of the Party Dr Munje to form the Government. Dr. Munjje refused the invitation. After this the Governor made a minority Government. In 1924 E Raghvendra Rao presented a no no confidenec motion against the minority Government which was passes after discussion by 44 votes against 24. In 1925 after the death of Deshbandhu Chitranjan Das there differences appeared in the Swaraj party and Swatanra Party was formed under E Raghvendra Rao. In 1926 Rao sahab and Barrister Chhedilal of this party won the elections. Rao sahab was first made education minister and then he also served as the Chief Minister. In 1929 after differences with Rao sahab, Chhedilal retuned to Congress. Later Rao sahab also returned to congress.

Flag Satyagrah

Many people went to Nagpur from Chhattisgarh for thsi Satyagrah. May were arrested. March to Kakinada convention – In 1923, 25 congress workers went marching for the Kakinada convention from Dhantari.

Hindu Muslim Riot in Dhamtari

In 1924 there was a small Hindu Muslim Riot in Dhamtari in which 3 persons from each side were injured. Pt. Sunderlal Sharma was able to broker peace quickly.

First Civil Disobedience Movement

Like the other parts of the country the main things in this movement in Chhattisgarh were–

  1. Making of salt
  2. Dharna on the liquor shops and foreign goods shops by women
  3. End of untouchability
  4. Boycott of Government institutions

Provincial meeting was organized under the chairmanship of Seth Govinddas on 15th April in which Ravishankar Shukla broke the salt law by making salt with Hydrochloric acid and soda. Five persons are credited with running the movement systematically in Raipur. They were called the five Pandavas – Dharmaraj – Wamanrao lakhe, Bhim – Laxminarayan Mahant, Arjun – Thakur Pyarelal Sing, Nakul – Maulana Abdul Rauf and Sahdeo – Shivdas Daga. Similar movements took place in other cities as well.

Jungle Satyagrah during Civil Disobedience Movement

After the arrest of Mahatma Gandhi the Congress decided that wherever it was not possible to make salt, other laws could be broken and forest laws should be broken in jungles. There was prohibition on the use of forest produce in Chhattisgarh so it was decided to break the forest laws. This is calledt he Jungle Satyagrah –

  1. Gattasilli In the year 1930 in Village Themli of Sihawa of Dhamtari 800 cattle were cought by the forest Department for grazing in the reserved forest. They were kept in the Gattasilli Kanji house. Narayan Meghawale, Jagtap and Chhotelal went ot Gattasilli with 25 revolutionaries. When the police tired to disperse them they laid on the ground in front of the Kanji House. The police poured boiling water on them but they did not disperse. Finally the administration returned the cattle without payment of any fine.
  2. Rudri Nawagaon It was decided to break the forest law by cutting grass from the reserve forest of Rudri Nawagaon on 22nd August 1930. The leadership of the movement was with Meghawale and Jagtap. They were arrested and section 144 was imposed in the whole area. Pt. Sharma was also arrested on way to Rudri in Abhanpur. Now the leadership came to Chhotelal who sent a group under the leadership of Govindrao Dabhawale. This group was also arrested by thepolice but 500 people collected here. Police resorted to lathi Charge. One policeman was injured after which the police fired on the crowd and one person named Sandhu Kumrah died on the spot. many were injured. One more person – Ralu among teh injured died later. The Government started the punishment of caning along with imprisonment. The Satyagrah continued. It finally ended after the Gandhi Inrvin pact of 5th March 1931.
  3. Mahasamund (Tamora) and the bravery of DayawatiA decision was taken to organize a jungle satyagrah in Mahasamund in September 1930. It was led by Shankarrao Gadhewal and Yati Yatanlal Jain. Both were arrested. One group of Satyagarhis went led by Bhagwati Prasad Mishra to Tamora. People were arrested there but the Satyagrah continued. One day a crowd of 10 thousand collected. When the sub-divisional officer M.P. Dubey stopped them a brave little girl Dayawati slapped him. There was a possibility of firing at this stage but this was prevented by the Malgujar present there.
  4. Jungle Satyagrah at other places The main among them were Labhra, Mohbana Pondi, Pondi village, Bandhakahr, Sarangarh and Udaipur.
  5. Second Phase of Civil Disobedience Movement

    After the failure of round table conference Gandhiji restarted civil disobedience movement. Government suppressed it with a heavy hand. 8 dictators were nominated in Chhattisgarhj os that the movement continues even after the leaders are arrested. These were – Pt. Ravishankar Shukla, Pt. Sunderlal Sharma, Shankarrao Ganodwale, Smt. Radhabai, Pt.Ramnarayan Mishra Harshul, Madhavprasad Parganiha, Bhamhadev Dubey and Laxmiprasad Tiwari. Shankarrao Ganodwale assumed the leadership of the movement after big leaders were arrested. he movement continued. Women also actively participated in the movement. Political prisoners asked for khadi cloths in jail for which they were whipped.

    Letter bomb scheme

    Ramanarayan Harshul made a scheme to put to shame and terrorize those people who were pro-British. A thin explosive was amde by keeping phosphorus between two pieces of blotting paper. News of burns of hands and face of many people by this new method was published in many papers but this did not do any major damage to anyone. Harshul was arrested and given one year rigorous imprisonment. Balidan week or Satyagrah week was celebrated in Durg from 6th to 12th April 1932. Prisoner day was organized in Raipur on 5th August 1932. Brahmadev Dubey was also arrested in this movement.

    Vanar sena in Raipur and bravery of Baliram Azad

    A 14 year old boy Baliram Azad from Brahman Para created a group of children which was known as Vanar Sena. Yati Yantanlal Jain was directing the efforts of this group. These children were used to distribute posters, pamphlets etc and also to carry messages and organise small meetings. Police used to catch them and leave them 3-4 miles outside the city so that it took almost the whole day to walk back into the city and they were not able to do their work. Later police started canning them. On 13th March Baliram Azad was canned for speaking in a public meeting. On 28th August the police resorted to Lathicharge and did not spare even the children. Baliram Azad and Ramadhar Nai were arrested and jailed for 9 months. the Azad Chow near Brahman Para is probably named after Baliram Azad. Bhagwati Charan the eldest son of Ravishankar Shukla was also associated with the Vanar Sena and was canned for distribution of matrial related to jaliyanwala Bag incident.

    Khadi Suppression–

    The deputy commissioner had ordered that anyone wearing Kahdi should not be spared. Some other incidents – The British had suspendedthe Raipur district council for 3 years on 11th November 1930. It was reinstated under Ravishankar Shukla on 8th March 1934. Gandhiji declared end of civil dispobedience on 7th April 1934. Pt. Nehru came to Raipur to participate in teh district council meeting on 15-16 December 1935. In 1935 Berar was included in Central provinces.

    1937 elections for provincial autonomy

    Elections were held in 1937 under the Government of India Act of 1935. The Congress got majority in Central Provinces. Dr. Narayan Bhaskar Khare was elected Chief Minister of CentralProvinces on 14th July1937. Ravishankar Shukla was made the Education Minister. He started the Vidya Mandir scheme for education. On 29th July 1938, Mr. Khare had to resign due to differences in the party and Ravishankar Shukla took charge as Chief Minister. Congress Governments resigned on the direction of the Congress working committee because Government decided Indian participation in the World War without consulting the Legislative Assembly.

    Chhuikhadan Jungle Satyagrah –

    State Congress was established in Chhuikhadan in 1938. Jungle Styagrah was done here after this in 1938. Samaru Barai was the main leader of the movement.

    Badratola Jungle Satyagrah

    State Congress was established in 1939 in Rajnadgaon after which a Jungle Satyagrah was organized in Badratola near Dongargarh. The police lathi charged unarmed adivasis. and even fired on them. 27 years old Ramadhin Gond died in this firing and many people were injured.

    Individual Satyagrah

    Individual Satyagrah started in the country in October 1940 after teh call given by Mahatma Gandhi. Gandhiji had given permission for 500 Satyagrahis out of which 50 were from Raipur. Later when permission was granted for more people out of a total of 2761 satyagrahis in Mahakoshal, 473 were from Raipur and 107 from Durg. Government suppressed the movement and arrested the Satyagrahis. The Government had to bow to the pressure of the people and an advisory council was made. After this the Government released all the Satyagrahis by December 1941.

    Failure of Crips Mission and Dr. Raghvendra Rao

    Dr. Rao was member Home and defense in Government of India (Governor General’s Council) at that time. He played a major role in the failure of the Crips Mission.

    Raipur Conspiracy Case

    Parasram Soni who lived in Awadhiapara Raipur was the hero of this case. He learnt making and firing of pistols and revolvers from Girilal Lohar. He also learnt making of bombs. He got equipment and steel from Railway trolley maker of Bengal Nagpur Railway – Amritlal, got chemicals from Assitant sales man of C P Medical Store – Horilal and financial help from many big businessmen of Raipur. Idgahbhata and Rawanbhata area were chosen to keep the weapons but one day a bomb exploded and Mr. Pears the principal of Rajkumar College lodged a police compliant on hearing the sound. After this the owner of Oriental Hotel on Malviya Road gave space for the secret work. Shri Ranveer Shastry, Sudhir Mukherjee, Dashrathlal Dubey, Premchand Wasnik, Krantikumar Bhartiya, Kunj Bihari Chobey etc. were part of this conspiracy. In the meantime a police informer Shivnandan gave information to the police and Parasram Soni was arrested from the Road connecting Sadar Bazar with Edward Road with loaded revolver. Explosives and other illegal material was found on search of his house. After this Girilal Lohar, Dr. Sur and mangal Mistry were arrested. Next day Ranveer Shastry was also arrested. After this Sudhir Mukherjee, Surendra Nath das, Bhupendra Nath Mukherjee, Sitaram Shastry, Krishnaram Thite, Krantikumar Bhartiya, Dashrath Lal Dubey, Kunj Bihari Chowbey were arrested. Their case was fought by famous lawyers including P. Bhaduri, Beni Prasad Tiwari, Ahmad Ali, Chandorkar, Pendharkar, Chunnilal Agrawal etc. After a trial of 9 months the following sentences were passed on 27th April 1943 - Girilal – 8 years, Parasram Soni - 7 Years, Sudhir Mukherjee – 2 years, Krantikumar Bhartiya – 2 years, an a little less for others. The decision of District and Sessions judge Raipur was challenged in appeal before the Nagpur High Court. Justice Niyogi acquitted four accused out of 10. In the meantime Mr. Jaidev Kapur friend of Sardar Bhagat Singh came to Raipur and he was honoured by a public meeting in Gandhi Chowk. In this public meeting a resolution was passed requesting the Government to relase Parasram Soni and Girilal. Krantikumar Bhartiya and Sudhir Mukherjee who had been acquitted by the High Court went to Nagpur to present the resolution of the public to the Government. Chief Minister Ravishankar Shukla immediately accepted the request and released Parasram Soni and Girilal on 26th June 1946.

    Quit India Movement

    After the resolution of Quit India was passe on 8th August in 1942 all the senior leaders of Chhattisgarh were arrested in Malkapur. The public was very angry because of this. All schools, colleges and markets of Raipur remained closed on 9th August. The crowd near city Kotwali was dispersed by firing in the air. A procession was taken out led by Ranveer Shastry on 10th August after which he was arrested. The movement continued in all the cities of Chhattisgarh.

    Raipur Dynamite Case

    Bilakhnarayan Agrawal had come from jabalpur. He had a strong explosive with him. A plan was made with Isharicharan Shukla, Nagardas Bawaria, Narayandas Rathor and jainarayan Pandey to blow the wall of the Raipur Jail with Dynamite to help in the escape of Political prisoners. The Dynamite was put on the wall of the Jail and was ignited but it caused only minor damage. All Conspirators were arrested but latter were acquitted for lack of evidence. Ishwaricharan Shukla and Narayandas Rathor were rearrested in 1944 for cutting of telephone wires and destroying letter boxes.

    Election in 1945-46

    Elections were held again in 1946. Congress got 84 out of 112 seats in Central Provinces. Pt. Ravishankar Shukla became Chief Minister for the second time. Dwarika Prasad Mishra became the home minister. Ghansyam Gupta became the speaker of Vidhan Sabha. Thsi government immediately took action to release political prisoners, cancellation of warrants, and return of fine. Finally India got independence on 15th August 1947.

    Independence day function

    Chief Minister Ravishankar Shukla hoisted the Indian Flag on the Sitabardi Fort in Nagpur. Food Minister R K Patil hoisted flag in Police Line Raipur. Ghanshyam Guta hoisted the flag in Durg and Ramgopal Tiwari in Bilaspur. Some minor fights erupted between Hindus and Muslims in Baijnath para but they were soon controlled

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