संत कबीर की वाणी के कुछ और पहलू

कबीर एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मस्जिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर की वाणी का संग्रह बीजक के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और साखी। रमैनी और सबद गाए जाने वाले गीत या भजन के रूप हैं। साखी शब्द साक्षी शब्द का अपभ्रंश है। इसका अर्थ है - 'आँखों देखी अथवा भली प्रकार समझी हुई बात।' कबीर की साखियाँ दोहों में लिखी गई हैं जिनमें भक्ति व ज्ञान के उपदेश हैं। कबीर ने उलटबांसियाँ भी कही हैं। पहली बार सुनने में प्राय: ये चौंकाने वाली व निरर्थक जान पड़ती हैं, लेकिन इनका गहन अध्ययन करने पर इनका गूढ़ अर्थ समझ आता है और ये सार्थक लगती हैं।

कबीर ने आडंबर और पोंगापंथ की अलोचना बहुत अच्छे ढ़ंग से की है -

पाहन पुजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।
ताते या चाकी भली, पीस खाए संसार।।


पत्थर पूजने से यदि ईश्वर मिल जाये तो मैं पहाड़ की पूजा करूं। इससे तो चक्की अच्छी है जिसका पीसा हुआ आटा सारा संसार खाता है।

मूंड मुंडाए हरि मिले, तो सब लैं मूंड मुडाय।
बार-बार के मूंडते, भेड़ न बैकुंठ जाय।।


यदि सर मुंडा लेने से ईश्वर मिल जाये तो सभी सर मुंडा लेंगे और बार-बार मूंडने के कारण भेड़ तो निश्चित ही बैकुंठ जायेगी।

कॉंकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ मुल्ला बॉंग दे, क्‍या बहिरा हुआ खुदाय।।


कंकड़-पत्थरों को जोड़ कर ऊंची सी मस्जिद बना ली है और उसपर चढ़कर मुल्ला ज़ोर से आवाज़ लगाता है, तो क्या खुदा बहरा हो गया है कि उसे साधारण आवाज़ सुनाई नहीं देती हैॽ

माला फेरत जुग भया, मिटा ना मन का फेर।
कर का मनका छाड़ि के, मन का मनका फेर॥


माला फेरते हुए बहुत समय हो गया पर मेरा मन साफ नहीं हुआ इसलिये माला फेरने से कोई लाभ नहीं है, ईश्वर को पाना है तो अपने मन को साफ करो। यहां पर यमक अलंकार का भी बहुत सुंदर उदाहरण है।

साखियां – यह कदाचित साक्षी का अपभ्रंश है। यह अच्छे काम करने की सीख देती हैं -

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो मन खोजा अपना, मुझ-सा बुरा न कोय।।


मैंने संसार में बुरे लोगों को खोजने का प्रयास किया तो कोई बुरा मिला ही नहीं, परंतु स्वैयं मेरा मन ही सबसे बुरा निकला। तात्पर्य यह है कि आप भला तो जग भला।

सॉंच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै सॉंच है, ताके हिरदै आप।।


सच के समान कोई तपस्या नहीं है और झूठ के बाराबर कोई पाप नहीं है। ईश्वर उसी हृदय में वास करते हैं जिस हृदय में सत्य का निवास है।

सोना, सज्जन, साधुजन, टूटि जुरै सौ बार।
दुर्जन कुंभ-कुम्हार के, एकै धका दरार।।


सज्जन सोने के समान होते हैं जो सौ बार भी टूटने से जुड़ जाता है, और दुर्जन घड़े के समान हैं जो एक ही धक्के से टूट जाता है और फिर नहीं जुड़ता।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।


अति किसी भी चीज में अच्छी नहीं है। न अति का बोलना अच्छा है और न अति का चुप रहना, जैसे अति वर्षा भी बुरी है और अति धूप भी।

काल्हि करै सो आज कर, आज करै सो अब्ब।
पल में परलै होयगी, बहुरि करैगो कब्ब।


जो काम कल करना है उसे आज ही करो, और जो आज करना है उसे तुरंत करो। यदि पल भर में प्रलय आ गई तो फिर कब उस काम को करोगे। अर्थात भविष्य निश्चत नहीं है इसलिये जो करना है अभी कर लो।

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।


बुराई करने वालों को अपने आंगन में ही कुटिया बनाकर अपने पास रखना चाहिये। अपनी निंदा सुनकर यदि हम स्वयं को सुधार लेते हें तो बिना पानी और साबुन के ही हमारा स्वभाव साफ (अच्छा) हो जायेगा।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।


जब तक मेरा अहं था तब तक भगवान मुझे नहीं मिले, और अब भगवान मिल गये है तो मेरा अहं चला गया है। प्रेम की गली इतनी संकरी होती है कि दोनो उसमें नहीं रह सकते।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ग्यान।
मोल करो तलवार के, पड़ा रहन दो म्यान।।


साधु की जाति नहीं पूछ चाहिये, उसका ज्ञान देखना चाहिये जैसे तलवार की धार का मोल करना उचित है म्यान का नहीं, जिसमे तलवार रखी जाती है।

सबद का एक उदाहरण नीचे दिया है जिसे भजन की तरह से गाया जाता है -

मन लागो मेरो यार फकीरी में॥
जो सुख पावो राम भजन में, सो सुख नाही अमीरी में ।
भला बुरा सब को सुन लीजै, कर गुजरान गरीबी में ॥
मन लागो मेरो यार फकीरी में ॥

प्रेम नगर में रहिनी हमारी, भलि बलि आई सबूरी में ।
हाथ में कूंडी, बगल में सोटा, चारो दिशा जगीरी में ॥
मन लागो मेरो यार फकीरी में ॥

आखिर यह तन ख़ाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी में ॥
मन लागो मेरो यार फकीरी में ॥

यह भजन कालूराम बामनिया ने बहुत खूबसूरती से गाया है। अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करके इसे यू-ट्यूब पर देखिये –

ऐसे ही एक और भजन देखिये। यह भजन रहस्यवाद का उत्तम उदाहरण है। इसमें चादर को ओढ़ने और ठीक प्रकार से रखने के बहाने शरीर, आत्मा और परमात्मा से मिलन की बातें कह दी गई हैं -

झीनी झीनी बीनी चदरिया ॥
काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया ॥ १॥
इडा पिङ्गला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी चदरिया ॥ २॥
आठ कँवल दल चरखा डोलै,पाँच तत्त्व गुन तीनी चदरिया ॥ ३॥
साँ को सियत मास दस लागे, ठोंक ठोंक कै बीनी चदरिया ॥ ४॥
सो चादर सुर नर मुनि ओढी,ओढि कै मैली कीनी चदरिया ॥ ५॥
दास कबीर जतन करि ओढी, ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया ॥ ६॥

यह प्यारा भजन पंडित जसराज की आवाज़ में सुनने के लिये अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करें –

उलटबासियों के कुछ उदाहरण देखिये –

एकै कुँवा पंच पनिहारी। एकै लेजु भरै नौ नारी॥
फटि गया कुँआ विनसि गई बारी। विलग गई पाँचों पनिहारी॥


शब्दार्थ- एक कुएँ पर नौ पनिहारी पहुँची। रस्सी तो एक थी, पर नौ नारियाँ पानी भर रही थीं। कुँआ फट गया और बारी का खेत नष्ट हो गया। पाँचों पनिहारी अलग-अलग चली गईं।

भावार्थ- अन्तःकरण रूपी कुआँ एक है। इसमें से नौ कषाय-कल्मष पनिहारी की तरह पानी भरती हैं। आत्मा का भगवत् समर्पण होने पर वह मोह ग्रस्त अन्तःकरण फट जाता है। इस कुएँ में से पानी खींचकर पनिहारियों ने जो शाक-भाजी की क्यारी उगाई थी सो नष्ट हो जाती है। सारा खेल बिगड़ जाने पर पाँच पनिहारी पाँचों इन्द्रियाँ अलग-अलग चली जाती हैं।

राजा के जिया डाहें, सजन के जिया डाहें
ईहे दुलहिनिया बलम के जिया डाहें ।

चूल्हिया में चाउर डारें हो हँड़िया में गोंइठी
चूल्हिया के पछवा लगावतड़ी लवना।
ईहे दुलहिनिया ...

अँखियाँ में सेनुर कइली हो, पिठिया पर टिकुली
धइ धई कजरा एँड़िये में पोतें।
ईहे दुलहिनिया ...

सँझवे के सुत्तल भिनहिये के जागें
ठीक दुपहरिया में दियना के बारें।
ईहे दुलहिनिया ...

कहेलें कबीर सुनो रे भइया साधो
हड़िया चलाइ के भसुरू के मारें
ईहे दुलहिनिया ...


शब्दार्थ - यह दुल्हन पति के जी में डा(दा)ह भरती है। चूल्हे में चावल डालती है जब कि पकाने वाले पात्र में उपला। चूल्हे में आगे से नहीं पीछे से लकड़ी लगाती है। आँख में सिन्दूर लगाती है और पीठ पर बिन्दी। रह रह एँड़ियों पर काजल पोतती है। साँझ को ही सो जाती है और सुबह उठती है। भरी दुपहर में दीपक जलाती है। हँड़िया चला कर अपने भसुर (पति का बड़ा भाई) को मारती है।

भावार्थ - बहुत से भक्तिकालीन कवियों ने परमात्मा-आत्मा में प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी, प्रीतम-प्रेयसी का संबंध माना है. यहां भी लगता है कि जब आत्मा प्रभु के ध्यान लगी तो उसके कृत्य उलटबांसी को जन्म दे रहे हैं।

कबीर की उलटबासियां बिहार के लोकगीतों में रची बसी हैं। इसका एक उदाहरण – ‘‘साजन बचा ले आपन जान’’ भोजपुरी में यू-ट्यूब पर सुनने के लिये अपनी डिवाइस का इंटरनेट करें –

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