संत कबीर साहेब और गुरू की महत्ता पर उनके दोहे

कबीर का जन्म- सन् 1398 में काशी में और मृत्यु सन् 1518 में मगहर में मानी जाती है। कबीर मध्यकालीन भारत के भक्त कवि, और समाज सुधारक थे। इनके नाम पर कबीरपंथ नामक संप्रदाय भी प्रचलित है। कबीरपंथी इन्हें एक अलौकिक अवतारी पुरुष मानते हैं। संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। डॉ. हज़ारी प्रसाद व्दिवेदी ने लिखा है कि साधना के क्षेत्र में वे युग - युग के गुरु थे, उन्होंने संत काव्य का पथ प्रदर्शन कर साहित्यक्षेत्र में नव निर्माण किया था। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगा स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में- हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये।

कबीरपंथियों में इनके जन्म के विषय में यह पद्य प्रसिध्‍द है-

चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसात को पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥
घन गरजें दामिनि दमके बूँदे बरषें झर लाग गए।
लहर तलाब में कमल खिले तहँ कबीर भानु प्रगट भए॥


कबीर की रचनाओं में अनेक भाषाओं के शब्द मिलते हैं यथा - अरबी, फ़ारसी,पंजाबी, बुन्देलखंडी, ब्रजभाषा, खड़ीबोली आदि के शब्द मिलते हैं इसलिए इनकी भाषा को पंचमेल खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद कबीर के शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। मगहर में कबीर की समाधि है।
संत कबीर साहेब ने ढ़ोंग और आडंबर के विरुध्दं बहुत से दोहे लिखे हैं, परन्तु उनके विषय में फिर कभी चर्चा करेंगे। इस अध्‍याय में कबीर साहेब व्दारा गुरू की महिमा पर लिखे गये दोहों का रसास्वादन करते हैं -

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने,गोविंद दियो बताय॥


भगवान और गुरू दोनो सामने खड़े हो तो किसके पैर पहले पड़ना चाहिये - कबीर साहेब कहते हैं कि पहले गुरू के पैर पड़ो जिन्होने भगवान के बारे में बताया, अर्थात बिना गुरू के भगवान भी नहीं मिलते।

गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान॥


ज्ञान प्राप्त करने के लिये गुरू को अपना सिर तक दान में दे देना चाहिये अर्थात जान तक दे देनी चाहिये - यह सीख न मानकर कितने ही अभिमानी मूर्ख संसार से बह गये, अर्थात तर नहीं पाये।

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त॥


गुरु में और पारस - पत्थर के अन्तर को सभी जानते हैं। पारस तो लोहे को सोना ही बनाता है, परन्तु गुरु शिष्य को अपने समान महान बना लेता है।

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम - जनम का मोरचा, पल में डारे धोय॥


चेला तो कुबुध्दि की कीचड़ से भरा है, जिसके जन्म –जन्मांतर की बुराई को गुरु ज्ञान के जल से पल भर में ही धो देते हैं।

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि - गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥


गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य घड़े के समान है। कुम्हार जिस प्रकार घड़े को गढ़ने के लिये अंदर हाथ का सहारा देता है और बाहर से चोट करता है, वैसे ही गुरू भी शिष्य की अंतर आत्मा को सहारा देते हैं जबकि बाहर से डांट-डपट कर शिष्य को अच्छा बनाते हैं।

गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान॥


गुरु के समान कोई दानी और शिष्य के समान मांगने वाला नहीं है। तीनो लोकों की सम्पत्ति से भी बढ़कर ज्ञान का दान गुरु ने शिष्य को दिया है।

जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर।
एक पलक बिखरे नहीं, जो गुण होय शरीर॥


गुरु वाराणसी में रहते हों और शिष्य समुद्र के किनारे रहता हो अर्थात गुरू और शिष्य एक दूसरे से दूर भी हों तो भी शिष्य में गुरु का दिया गुण होगा, जो वह गुरु को एक पल के लिये भी नहीं भूलेगा।

गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं॥


गुरु का आदर करके और उनकी आज्ञा मानकार चलने वाले शिष्य को तीनों लोकों मे किसी से भी भय नहीं है

गुरु मूरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे, गुरु मूरति की ओर॥


गुरु का रूप चन्द्रमा के समान है और शि‍ष्य के नेत्र चकोर जैसे हैं जो आठो पहर गुरु – मूर्ति को ही देखते रहते हैं।

गुरु मूरति आगे खड़ी, दुतिया भेद कुछ नाहिं।
उन्हीं कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं॥


गुरु तुम्हारे पास हैं इसलिये और कोई भेद न मानकार उन्हीं को प्रणाम करो तो मन का सारा अंधकार मिट जायेगा।

ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास।
गुरु सेवा ते पाइए, सद् गुरु चरण निवास॥


ज्ञान, सन्त - समागम, प्रेम, सुख, दया, भक्ति और विश्वास यह सभी गुरु के चरणों में ही हैं और गुरु की सेवा से ही मिलते हैं।

सब धरती कागज करूँ, लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय॥


सारी पृथ्वी को कागज, सारे जंगल को कलम और सातों समुद्रों के जल को को स्याही बनाकर लिखने पर भी गुरु के गुण पूर्ण रूप से नहीं लिखे जा सकते।

पंडित यदि पढि गुनि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान।
ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, सत्त शब्द परमान॥


बड़े - बड़े शास्त्रों को पढकर जो अपने को विव्दान कहते हैं उन्हें भी बिना गुरू के ज्ञान नही मिलता है और ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिलती, ऐसा शास्त्रो का प्रमाण है।

कहै कबीर तजि भरत को, नन्हा है कर पीव।
तजि अहं गुरु चरण गहु, जमसों बाचै जीव॥


कबीर साहेब कहते हैं कि भ्रम को छोड़कर, छोटे बच्चे के समान गुरु के वचनो को दूध के समान पियो। इस प्रकार अहंकार को त्याग कर गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करने पर ही जीव यम से बचेगा।

सोई सोई नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम।
कहै कबीर गुरु प्रेम बिन, कितहुं कुशल नहिं क्षेम॥


अपने मन और शरीर से वही सब करो, जिससे गुरु के प्रति प्रेम बढ़े। कबीर साहेब कहते हैं कि गुरु के प्रेम बिन, कहीं कुशलक्षेम नहीं है।

करै दूरी अज्ञानता, अंजन ज्ञान सुदये।
बलिहारी वे गुरु की हँस उबारि जु लेय॥


ज्ञान का अंजन लगाकर गुरू शिष्य का अज्ञान दूर कर देते हैं। गुरुजनों की प्रशंसा है, जो हंसते हुए जीवो को भव से बचा लेते हैं।

सतगुरु सम कोई नहीं, सात दीप नौ खण्ड।
तीन लोक न पाइये, अरु इकइस ब्रह्मणड॥


सातों व्दीपों, नौ खण्डों, तीन लोकों और इक्कीस ब्रह्माण्डों में सद् गुरु के समान हितकारी कोई नहीं है।

जेही खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव।
कहैं कबीर सुन साधवा, करू सतगुरु की सेवा॥


जिस मुक्ति को ब्रह्मा, सुर, नर, मुनि और देवता तक नहीं खोज पाये वह गुरू की सेवा से ही प्राप्‍त हो सकती है।

केते पढी गुनि पचि मुए, योग यज्ञ तप लाय।
बिन सतगुरु पावै नहीं, कोटिन करे उपाय॥


कितने ही लोग शास्त्रों को पढकर, योग, यज्ञ और तप आदि करके ज्ञानी बनने का प्रयास करते हुए मी गए, परन्तु बिना सतगुरु के ज्ञान नहीं मिलता, चाहे कोई करोडों उपाय कर लो।

सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भाँडा तोड़ी करि, रहै निराला होय॥


तभी मानो की सद् गुरु मिल गये हैं जब तुम्हारे हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाये, भ्रम और भ्रम समाप्त हो जाये।

कबीर साहेब ने गुरू के सद् गुरू होने को भी बहुत महत्व दिया है और यह कहा है कि गुरू सोच समझकर ही करना चाहिये। गुरू के सद गुरु न होने पर शिष्य का बड़ा अहित भी हो सकता है।

जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फन्द॥


जिसका गुरु ही अविवेकी है उसका शिष्य तो महा अज्ञानी होगा ही। अज्ञानी शिष्य को अज्ञानी गुरु मिल जाये तो दोनो ही काल पड़ गये।

गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।
बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि॥


पानी छान कर पीना चाहिए और गुरू सोच समझ कर बनाना चाहिए। जो बिना विचारे गुरू बनाता है उसे चौराही लाख योनियो में घूमना पड़ता है, अर्थात उसे मुक्ति नहीं मिलती है।

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