रामचरित मानस में श्रंगार रस

गोस्वामी तुलसीदास जी रचित रामचरित मानस मूलत: भक्तिरस की रचना है, परंतु इसमें अनेक स्थानों पर श्रंगार रस का बड़ा ही मनोहर चित्रण हुआ है। राम और सीता के बीच पुनीत प्रेम का चित्रण तुलसीदास जी ने बहुत ही अच्छी तरह से किया है। कुछ प्रसंग नीचे दिये गये हैं -

सीमा स्वयंवर के पूर्व जब सीता गौरी पूजन के लिये जाती हैं और राम उसी वाटिका में फूल तोड़ने जाते हैं तो वहां पर अनायास ही दोनो एक दूसरे को देखते हैं और प्रथम दृष्टि में ही प्रेम का उदय होता है। सीता को देखने का राम पर क्या असर होता है पहले वह दखिये –

कंकन किंकिन नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामुहृदयँ गुनि।।
मानहु मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व विजय कहँ कीन्ही ।।
अस कहि फिर चितएते हिओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा।।
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल।।
देखि सीय सोभा सुख पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।।
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रकट देखाई।।
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई।।
सब उपमा कबि रहे जुठारी । केहि पटतरौं बिदेहकुमारी।।

इस चौपाई में ‘क’ वर्ण और ‘न’ वर्ण का अनुप्रास अलंकार के रूप में सुंदर प्रयोग है। राम लक्षमण से कह रहे हें कि कंगनों की मधुर ध्वनि से ऐसा प्रतीत होता है जैसे कामदेव विश्व को जीतने का संकल्प करके डंका बजा रहे है। इतना कह कर राम ने सीता की ओर देखा तो चंद्रमा के समान सुंदर उनके मुख को निहारते रह गए। उनके नयन मानो चकोर बन गये हों। निमि जनक जी के पूवर्ज थे और उनका निवास पलकों में माना जाता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि पुत्री और दामाद के प्रेम को देखना उचित न समझ कर निमि पलकों को छोड़कर चले गये जिसके कारण पलकों ने झपकना बंद कर दिया और राम सीता को एकटक निहारते रहे। हृदय मे तो राम सीता की प्रशंसा करते हैं परंतु उनकी सुंदरता से प्रभावित राम के मुंह से बोल नहीं निकल पाते। सीता को बनाने में ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता दिखा दी है। सीता को देख कर लगता है जैसे संदरता रूपी घर में दि‍ये की लौ जल रही है। तुलसीदास जी कहते हैं कि सभी उपमाएं तो कवियों ने पहले से ही दे रखी हैं मैं कौन सी नई उपमा देकर सीता जी की सुंदरता का वर्णन करूं।

अब देखिये कि सीता ने राम को देखा तो उनके मन में किस प्रकार के भाव उत्पन्न हुए –

चितवति चकति चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता।।
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमलसित श्रेनी।।
लता ओट तब सखन्हि लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए।।
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने।।
थके नयन रघुपति छवि देखे। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषे।।
अधिक सनेह देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।।
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हेस पलक कपाट सयानी।।
जब सिय सखन्हि प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी।।

सीता चकित सी चारों ओर देख रही है परंतु उन्हें दोनो राजकुमार कहीं दिखाई नहीं देते। वे जहां देखती हैं उन्हेंन कमल ही कमल दिखाई देते हैं। तब सखियों ने उन्हें एक लता की ओट में दिखाया। राम के रूप को देखकर सीता के नेत्र ललचाने लगे और उन्हें ऐसा लगा जैसे खजाना मिल गया हो। राम को देखकर सीता के नयन शिथिल हो गये। पलकों ने झपकाना बंद कर दिया। शरीर बेकाबू हो गया। ऐसा लगा जैसे शरद ऋतु में चकोरी बेसुध होकर चंद्रमा को देख रही हो। सीता ने राम को अपने हृदय में बसाकर अपने नयनों के किवाड़ बंद कर दिये। सखियों ने जब सीता को प्रेमबस जाना तो सकुचा गईं।

इसे दूरदर्शन पर प्रसारित रामानंद सागर के रामयण सीरियल में बहुत सुदर ढ़ंग से दिखाया गया है। आप अपनी डिवाइस पर इंटरनेट चालू करके यू-ट्यूब पर उपलब्‍ध इसका एक वीडियो देख सकते हैं -

राम के वन गमन के समय का प्रसंग है जिसमें सीता के राम के प्रति प्रेम का बड़ा मार्मिक चित्रण गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है। राम सीता को सब प्रकार से समझाते हैं कि सीता को उनके साथ वन नहीं जाना चाहिये और संबंधियों के साथ सुखपूर्वक राजभवन में रहकर राम के वनवास के समय को व्यतीत करना चाहिये। सीता राम की अवज्ञा न करते हुए भी उन्हें बड़े मार्मिक ढंग से बताती हैं कि किस प्रकार बिना राम के सीता के लिये सारे सुख व्यर्थ हैं और राम के प्रेम के बिना वे जी भी नहीं सकती हैं -

सुनि मृदु वचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।
सीतल सिख दाहक भई कैसे। चकइहि सरद चंद निसि जैसे।।
उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।।
बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।।
लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देवि बडि अविनय मोरी।।
दीन्हस प्रानपति माहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परमहित होई।।
मैं पुनि समझ दीखि मन माही। पिय बियोग सम दुख जग नाही।।

अपने प्रियतम के मधुर वचन सुनकर सीता की आंखे भर आईं। उन्हें वे मधुर वचन भी उसी प्रकार लगे जैसे चकवी को शीतल चांदनी भी जलाने वाली लगती है। सीता ने सोचा कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़कर जाना चाहते हैं। बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को रोककर सास के चरण छूकर वे बोलीं कि मेरी अविनय को क्षमा करें। मेरे प्राणपति ने मुझे वही सीख दी है जिसमें मेरा हित हो परंतु मैने अपने मन में देखकर समझ लिया है कि पति के वियोग से बढ़कर कोई दुख नहीं है।

प्राननाथ करुनायतन, सुंदर सुखद सुजान।
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु, सुरपुर नरक समान।।
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुहृदय समुदाई।।
सासु ससुर गुरु सुजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।।
जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहिं तरनिहु ते ताते।।
तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सब सोक समाजू।।
भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।।
प्राननाथ तुम बिन जाग माही। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाही।।
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।।
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारे। सरद बिमल बिधु बदनु निहारे।।

सीता राम से कहती हैं कि हे मेरे अति सुंदर और प्रेम करने वाले और सुख देने वाले प्राणनाथ आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नरक के समान है। माता पिता आदि जितने भी स्‍नेह के नाते हैं, पति के बिना ये सभी स्त्री को सूर्य की तरह तपाने वाले हैं। शरीर, धन, पृथ्वी, नगर, राज्य आदि सभी शोक का समाज हैं। भोग, रोग के समान हैं और आभूषण भार रूप हैं। संसार यम की यातना जैसा है। आपके बिना मेरे लिये जगत में कोई सुख नहीं है। जैसे बिना जीव के देह और बिना पानी के नदी हैं वैसे ही बिना पुरुष के स्त्री है। आपके चंद्रमा के समान मुख को देखने से ही मुझे सारे सुख प्राप्त होंगे।

अयोध्या कांड में जब गांव की स्त्रियां सीता से पूछती हैं कि यह दोनो सुंदर पुरुष तुम्‍हारे कौन हैं तो जिस प्रकार सीता लजाकर, शर्माकर उन्हें उत्तर देती हैं वह श्रंगार रस की पराकष्ठा है –

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहो को आहिं तुम्हारे।।
सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसकानी।।
तिन्हसहिं बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहूँ सकोच सकुचति बर बरनी।।
सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।
सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।।
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढ़ांकी। पिय तन चितई भौंह कर बांकी।।
खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निजपति कहेउ तिन्हहिं सियँ सयननि।।
भई मुदित सब ग्राम बधूटी। रंकन्ह राय रासि जनु लूटी।।

गांव की स्त्रियां सीता से पूछती हैं कि यह करोड़ों कामदेव को लजाने वाले तुम्हारे कौन हैं। यह सुनकर सीता शर्मा गईं, और मन ही मन मुस्कुराईं। बड़ा संकोचकर मृग के नयनों वाली सुंदर सीता कोयल जैसी प्रिय वाणी में बोलीं - जो सहज स्वभाव के सुंदर और गोरे हें वे मेरे छोटे देवर लक्षमण हैं। फिर संकोच के कारण बड़े जतन से अपने मुंह को आंचल से छुपाकर अपने पति की ओर भंवे तिरछी करके इशारा करते हुए खंजन पक्षी की आंखों जैसे सुंदर नेत्रों को तिरछा करके कहा – ‘‘और यह मेरे पति हैं’’

अरण्यदकांड में सीता हरण के पश्चात् राम जब आश्रम लौटकर आते हैं और सीता को वहां नहीं पाते हैं तो सीता के विरह में पागल के समान पेड़-पौधों तक से सीता का पता पूछने लगते हैं। विरह वेदना का इससे अच्छा चित्रण कहां मिलेगाॽ

आश्रम देख जानकी हीना। भए बिमल जस प्राकृत दीना।।
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।
लछिमन समुझाए बहु भांती। पूछत चले लता तरु पाँती।।
हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी। तुम्ह देखी सीता मृनयनी।।
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।
कुंंद कली दाणिम दामिनी। कमल सद ससि अहिभामिनी।।
बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।।
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।।
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाई जनु राजू।।
किमि सहिजात अनख तोहि पाही। प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाही।।
एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।।

जब आश्रम में जानकी नहीं मिलीं तो रामचंद्र जी अत्यंत व्याकुल हो गये और पेढ़ पौधों तक से पूछने लगे कि उन्होने सीता को देखा तो नहीं है। वे कहते हैं कि खंजन पक्षी, शुक कपोत, कमल, आदि सभी सीता के चले जाने से बड़े प्रसन्न हैं क्योंकि सीता उनसे भी अधिक सुंदर हैं और सीता के सामने उनकी सुंदरता तुच्छ है। राम कहते हें कि सीता तुमसे यह प्रतिस्‍पर्धा कैसे सही जाती है और तुम प्रकट क्यों नहीं हो जाती हो।

यह प्रसंग भी दूरदर्शन पर प्रसारित रामानंद सागर के रामायण सीरियल में बड़े मार्मिक ढ़ंग से दिखाया गया है। अपनी डिवाइस पर इंटरनेट चालू करके आप इसे यू-ट्यूब पर देख सकते हैं -

सीता के विरह का वर्णन सुदर कांड में देखिये। रावण जब सीता को डरा-धमका कर चला गया तो सीता रात के विरह में अपने प्राण देना चाहती हैं। वे कहती हैं कि विधि भी उनके प्रतिकूल हो गई है। स्वेयं को जलाने के लिये उन्हें आग मिलती नहीं और इसलिये उनका कष्ट समाप्त नहीं होता। आकाश के तारे भी अंगारे के समान होते हैं, परन्तु आज आकाश में कोई तारा भी नहीं है, और आग से भरा हुआ चंद्रमा भी मुझे हतभागी मान कर आग देता। हे अशोक के वृक्ष तेरे लाल रंग के नये पत्ते भी आग की ही तरह हैं, तू ही मुझे आग देकर मेरा शोक समाप्त कर और अपना नाम सत्‍य कर ले।

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
अवनि न आवत एकउ तारा॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी।
मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥

इस प्रसंग को अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करके डा. मधुकर आनंद का सुंदर कथक नृत्य यू-ट्यूब वीडियो के रूप में देखिये -

सुदरकांड में जब हनुमान जी सीता को राम का संदेश सुना रहे हैं, उसमें राम का विरह निवेदन और सीता के प्रति प्रेम का प्रदर्शन देखने योग्य है –

कहेउ राम वियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नवतरु किसलय मनहुँ कृसानू। काल निसा सम निसि ससि भानू।।
कुबलय बिपिन कुन्त बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेई पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेहुँ ते कछु दुख घटि होही। काहि कह्यें यह जान न कोई।
तत्वु प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मन मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानू प्रीति रसु एतनेहि माहीं।।
प्रभु संदेस सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।

राम कहते हैं कि हैं - सीता तेरे वियोग में मेरे लिये सभी कुछ विपरीत हो गया है। फूल मुरझा गये हैं। रात कालरात्रि के समान है और शीतल चंद्रमा तपते हुए सूर्य के समान है। कमल, भालों के समान हो गये हैं। बारिश का पानी खौलते हुए तेल के समय लगता है। जो कुछ पहले अच्छा लगता था वही अब तकलीफ देता है। ठंडी हवा सांपों की फुफकार जैसी लगती है। तेरे और मेरे प्रेम को तो केवल मेरा मन ही जान सकता है और मेरा मन तो सदा तेरे ही पास है। इतने में ही मेरे प्रेम का सार समझ ले।

इसी प्रकार लंका से वापस आकर हनुमान जी सीता का संदेश राम को देते हैं। इसमें भी सीता की तड़प और विरह का भाव छलकता हुआ दिखता है। विरह के वर्णन का यह अनुपम उदाहरण है –

नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेउ प्रभु चरना। दीनबंधु प्ररनतारित हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरहि छन माहिं सरीरा।।
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जलैं न पाव देह बिरहागी।।

सीता ने आंखों में आंसू भरकर कहा कि मैं तो मन क्रम वचन से आप ही को प्रेम करती हूं फिर किस अपराध के कारण आपने मुझे त्याग दिया है। हां, मै अपना एक अवगुण मानती हूं कि आपसे बिछड़ते ही प्राण क्यों नहीं निकल गये। परंतु यह तो नयनों का अपराध है। आपकी विरह में गर्म श्वास से एक ही छण में शरीर जल जाता, परंतु स्वयं को बचाने के लिये नयन लगातार पानी बहाते रहते हैं जिससे देह जल नहीं पाती।

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