कंकाल, जोड़ एवं पेशि‍यां

हमारे शरीर में अनेक कोमल अंगों को सुरक्षा की आवश्यकता होती है। सुरक्षा के लिये यह कोमल अंग शरीर के कुछ कड़े अंगों के भीतर रहते हैं। हमारा शरीर लुंज-पुंज न हो जाये इसलिये भी शरीर में कड़ेपन की आवश्यकता होती है। यह कड़ापन शरीर को हड्डियां प्रदान करती हैं। यदि पूरे शरीर में एक ही हड्डी होती तो हमारे शरीर में लचीलापन नहीं होता और हम अपने अंगों को हिला-डुला नहीं पाते। इसलिये शरीर में बहुत सी हडिडयां होती हैं, जो आपस में विभिन्न प्रकार के जोड़ो व्दारा जुड़ी होती हैं। शरीर की सभी हड्डियां मिलकर कंकाल कहलाती हैं। मनुष्य के कंकाल का एक चित्र देखि‍ये –

हमारे शरीर का सबसे कोमल और महत्वुपूर्ण भाग हमारा मस्तिष्क होता है। सुरक्षा के लिये मस्तिष्क हडि्डयों के एक डिब्बे के अंदर बंद होता है जिसे हम खोपड़ी कहते हैं। आप चाहें तो खोपड़ी की हड्डियों को छूकर उनका कड़ापन महसूस कर सकते हैं। हमारे चेहरे के भीतर खोपड़ी किस प्रकार महसूस कर सकते हैं उसे इस चित्र से समझिये –

हमारी खोपड़ी बहुत सारी छोटी-छोटी हड्डियों से मिलकर बनी होती है। यह हड्डियां एक दूसरे से हमेशा के लिये इस प्रकार जुड़ी होती हैं कि इन्हें आसानी से अलग नहीं किया जा सकता। नीचे के चित्र मे खोपड़ी की हड्डियों को अलग-अलग दिखाया गया है –

हमारा ऊपरी जबड़ा खोपड़ी का ही भाग होता है, परंतु निचला जबड़ा अलग होता है और एक हिल सकने वाले जोड़ के व्दारा खोपड़ी से जुडा होता है। निचले जबड़े के हिल सकने कारण ही हम अपना भोजन चबा पाते हैं –

हमारे शरीर की सबसे महत्वपूर्ण हड्डी रीढ़ की हड्डी है। पूरे शरीर के भार को यही वहन करती है। हमारी खोपड़ी रीढ़ की हड्डी के सबसे ऊपर रखी रहती है। हाथों और पैरों की हड्डियां भी रीढ़ से ही जुड़ी होती हैं। रीढ़ की हड्डी एक हड्डी न होकर बहुत सारी हड्डियों का समूह है –

रीढ़ दरअसल छल्ले के आकार वाली बहुत सारी छोटी-छोटी हड्डियों से मिलकर बनी होती है। इन छल्ले के आकार वाली छोटी हड्डियों को कशेरुक कहते हैं। मस्तिष्क से निकलकर हमारी सबसे महत्व पूर्ण तंत्रिका मेरुरज्जु इन्हीं छल्लों के अंदर से होकर नीचे तक आती है। यह छल्लेे मेरुरज्जु को सुरक्षा देते हैं।

कशेरुक एक दूसरे से छोटे-छोटे जोड़ों व्दारा जुड़े होते हैं, और थोड़ा बहुत हिल-डुल सकते हैं। इसी कारण हम अपनी पीठ को कुछ हद तक मोड़ सकते हैं और नीचे झुक सकते हैं। यदि रीढ़ में एक ही लम्बी हड्डी होती तो नीचे झुकना और मुड़ना संभव नहीं होता।

हमारी रीढ़ से निकलकर, वक्ष (छाती या सीना) को घेरे हुए बहुत सी लंबी हड्डियों का एक पिंजरा सा बना होता है। इन्हें पसलियां कहते हैं। पसलियां पीछे की तरफ कशेरुकों से जुड़ी होती हैं, और सामने की तरफ एक लंबी और सीधी हड्डी से जुड़ी होती हैं, जिसे वक्षअस्थि (स्टर्नम) कहा जाता है। हमारे शरीर के सारे कोमल अंग, जैसे हृदय, फेफड़े आदि सुरक्षा के लिये इस पिंजर के अंदर रहते हैं।हमारे हाथ और पैर रीढ़ से इस प्रकार जुड़े होते हैं, कि उन्हें स्थिरता भी मिले साथ ही चलने-फिरने की पूरी स्वतंत्रता भी हो। इसके लिये हड्डियों का एक समूह रीढ़ को धेरकर गोलाकार रूप में रहता है। इसे मेखला कहते हैं। बाहों के लिये अंस मेखला (पैक्टोरल गर्डल) और जांघों के लिये श्रोणी मेखला (पैल्विक गर्डल) होती है।

अंस मेखला में एक हंसुली के आकार की हड्डी होती है जिसे हंसली या क्लैविकल कहा जाता है। यह आगे की ओर वक्षअस्थि या स्टर्नम से जुड़ी होती है। वक्षअस्थि पसलियों के माध्यम से रीढ़ से जुड़ी होती है। हंसली, पीछे की ओर, स्कैपुला नामक हड्डी से जुड़ी होती है। इसी स्कैपुला में कंधे का जोड़ होता है, जिससे बांह की हड्डियां जुड़ी होती हैं।

इसी प्रकार कमर के स्थान पर श्रोणी मेखला में कुल्हे के हड्डी होती है, जो पीछे की तरफ रीढ़ से जुड़ी होती है। इसमें कूल्हे का जोड़ होता है, जिसके व्दारा जांघ की हड्डी जुड़ी होती है।

जोडों के प्रकार हमारे शरीर की आवश्यकता के अनुसार हड्डियों के बीच विभिन्न प्रकार के जोड़ होते हैं। हमारे कूल्हे एवं कंधे पर सबसे अधिक गति की आवश्यकता होती है, इसलिये यहां पर कंदुक-खल्लिका जोड़ होता है। इसे एक बिजली के बल्ब को नारियल के खोल में डालकर समझा जा सकता है। इन जोडों को नीचे के चित्रों से बेहतर समझा जा सकता है –

    

हमारी कोहनी केवल एक ओर मुड़ सकती है, दूसरी ओर नहीं। इसका जोड़ दरवाजें के कब्जे की तरह होता है, और इसे कब्जा जोड़ कहा जाता है –

हमारा सिर दायें-बांये भी घूम सकता है। यह इसलिये है कि हमारी खोपड़ी एक्सिस नामक कशेरुक के साथ पिवट जोड़ बनाती है जिसके कारण यह घूर्णन गति कर सकती है –

हमारे शरीर में और भी अनेक प्रकार के जोड़ हैं जिससे हम विभिन्न प्रकार की गति कर सकते हैं।

उपास्थि हमारे शरीर में हड्डी की तुलना में कुछ लचीली रचनाएं भी होती हैं, जिन्हें उपास्थि या कार्टिलेज कहते हैं। आप अपने कान और नाक को छूकर इसे अनुभव कर सकते हैं।

पेशियां - हड्डियां और जोड़ मात्र होने से गति करना संभव नहीं है। गति के लिये हमें हड्डियों पर बल लगाने की आवश्यकता होती है। यह बल पेशियों से लगता है। इसीलिये जब हम किसी जोड़ पर गति करते हैैं, तो उससे संबंधित पेशियां फूल जाती हैं, और आसानी से देखी जा सकती हैं –

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