सजीवों में परिवहन

एककोशीय जीवों में भोजन, पानी उत्सर्जी पदार्थ आदि विसरण के व्दारा कोशिका के भीतर और बाहर जाते हैं। उन्हें किसी विशिष्ट परिवहन तंत्र की आवश्यकता नहीं होती। बहुकोशीय जीवों में भोजन, पानी, उत्सर्जी पदार्थ आदि को एक अंग से दूसरे अंग तक पहुंचाने के लिये परि‍वहन तंत्र की आवश्यकता होती है।

पौधों में परिवहनपौधों में पानी तथा खनिज और लवण आदि का मिट्टी से अवशोषण जड़ों व्दारा किया जाता है। जड़ों से इन्हें पौधे के अन्य भागों तक ज़ाइलम नामक उत्तक से पहुंचाया जाता है। ज़ाइलम उत्तक लंबी कोशिकाओं से बना होता है जो एक पाइप की तरह काम करती हैं, और पानी तथा खनिज, लवण आदि को पौधे के अन्य भागों तक पहुंचाती हैं।

ज़ाइलम व्दारा ही पानी खनिज और लवण पत्तियों तक पहुंचते हैं, जहां सूर्य के प्रकाश की उपस्थि‍ति में पानी और कार्बन-डाई-आक्साइड मिलकर ग्लूकोस बनाते हैं। इस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहा जाता है।

प्रकाश संश्लेषण से बने हुए भोजन को पत्तियों से पौधों के अन्य अंगों तक ले जाने का कार्य फ्लोयम नामक उत्तक करता है। पौधे के तने में ज़ाइलम बीच में तथा फ्लोयम बाहर की ओर होता है।

जा़इलम के कार्य को देखने के लिये एक प्रयोग कर सकते हैं। बालसम का एक पौधा उखाड़कर उसे एक पानी भरे बीकर में एक स्टैंड की सहायता से खड़ा करके रख दें। अब इस पानी में थोड़ी सी लाल स्याही मिला दें। कुछ समय बाद देखने पर आपको पौधे के तने और पत्तियों में लाल रंग दिखाई पड़ेगा। यह इस कारण है कि लाल रंग का पानी ज़ाइलम व्दारा जड़ों से होकर तने और पत्ति‍यों तक पहुंच गया है।

अब आप यदि तने को किसी रेज़र ब्लेड से काटकर देखेंगे तो तने में आपको लाल रंग के धब्बे से नज़र आयेंगे। यह ज़ाइलम उत्तक हैं जिनसे होकर लाल रंग का पानी ऊपर जा रहा है।

ज़ाइलम के कार्य को समझने के लिये एक और प्रयोग किया जा सकता है। एक कड़े तने वाली शाखा लें, जैसे बबूल। अब इसमें बाहर से छाल, कार्क, आदि का एक वलय काटकर इस प्रकार हटा दें कि शाखा के अंदर के हिस्से में जहां पर जाइलम उत्तक होते हैं, वहां चोट न पहुंचे। इसी प्रकार एक दूसरी शाखा लेकर उसमें से केवल अंदर के हिस्से को ऐसे काटकर निकाल दें कि बाहर का हिस्सा ठीक रहे। दोनो शाखाओं को पानी से भरे बीकर में रखें। आप देखेंगे कि कुछ समय बाद जिस शाखा में अंदर का हिस्सा निकाल दिया गया था, उसकी पत्तियां मुरझा जाती हैं, परंतु जिस शाखा में बाहर का हिस्सा निकाला गया था उसकी पत्तियां स्वस्थ रहती हैं। ऐसा इसलिये हुआ कि अंदर के हिस्से में ज़ाइलम होता है, जिससे पानी पत्तियों तक पहुंचता है। जब जाइलम को निकाल दिया गया तो पत्तियों तक पानी पहुंचना बंद हो गया और पत्तियां मुरझा गईं। बाहर के हिस्से को निकालने पर ज़ाइलम ठीक से कार्य करता रहा और पत्तियां स्वस्थ रहीं।

जंतुओं में परिहवन जंतुओं में परिवहन रक्त के व्दारा होता है। रक्त एक संयोजी उत्तक है। बहुत से अकशेरुकी जंतुओं में रक्त लाल नहीं होता, तथा यह अन्य उत्तकों के बीच में रहकर सीधे कोशिकाओं के संपर्क में रहता है। यह रक्त विसरण व्दारा कोशिकाओं से उत्सर्जी पदार्थ ले लेता है और भोजन आदि पदार्थ और आक्सीजन कोशिकाओं को देता है। मनुष्यों तथा अन्य कशेरुकी जंतुओं में रक्त नलिकाओं के अंदर बहता रहता है।

मनुष्य के रक्त में बहुत प्रकार की कोशि‍काएं हेाती हैं जो एक तरल पदार्थ -प्लाज़मा में तैरती रहती हैं। लाल रक्त कोशिकाओं के कारण ही रक्त का रंग लाल होता है। इन कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन नामक लाल रंग का एक पदार्थ होता है जो आक्सीजन को एक स्था‍न से दूसरे स्थान तक ले जाता है। श्वेत रक्त कोशि‍काएं रंगहीन होती हैं, परंतु स्लाइड पर स्टेन करने से यह नीली दिखाई देती हैं। इनसे हमारे शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता मिलती है। प्लेटलेट्स बहुत छोटी कोशिकाएं होते हैं, जो चोट आदि लगने पर रक्त का थक्का जमाने में सहायता करते हैं जिससे रक्त का बहना रुक जाये।

रक्त के नलिकाओं में संचरण करने के लिये एक पंप की आवश्यकता होती है। हृदय हमारे शरीर का पंप है जो रक्त का परिसंचरण करता रहता है। जिन नलिकाओं से रक्त हृदय से अन्‍य अंगो में जाता है उन्हें धमनी कहते हैं। जिन नलिकाओं से रक्त अन्‍य अंगों से वापस हृदय में जाता है उन्हें शिरा कहते हैं।

धमनियों और शिराओं के बीच बहुत सी अत्यंत बारीक नलिकाएं होती हैं जिन्हें केशिका कहा जाता है। रक्त और अन्य उत्तकों की कोशिकाओं के बीच आक्सीजन, कार्बन-डाई-आक्साइड, भोजन और उत्सर्जी पदार्थों का आदान-प्रदान इन्हीं केशिकाओं में हेाता है।नीचे के चित्रों में हृदय की संरचना और कार्यों को दिखाया गया है –



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