सजीवों में पोषण

प्रत्येक जीवधारी को जीवित रहने के लिए पोषण की अवश्यकता होती है। हरे पौधे अपने पोषण के लिए मिट्टी में उपस्थित पोषक तत्व लेकर प्रकाश की सहायता से पानी और कार्बन-डाई-आक्साइड से अपना भोजन (स्टार्च) बनाते हैं और इस प्रक्रिया में अक्सीजन उत्सर्जित करते हैं। इस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) कहते हैं। पौधों का हरा रंग उनमें उपस्थित पर्ण-हरित (क्लोरोफिल) नामक पदार्थ के कारण होता है, जो प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक है। इसे देखने के लिये एक प्रयोग किया जा सकता है –

एक बीकर में एक तालाब से निकाला हुआ हरे रंग का पौधा रखें और बीकर में पानी भर लें। तालाब में पाया जाने वाला हाइड्रिला नामक पौधा इस प्रयोग के लिए बहुत उपयुक्त है। इसके बाद एक कीप को पौधे के ऊपर उल्टा करके रख दें और एक परखनली को पानी से भरकर, कीप के ऊपर उल्टा करके रख दें। अब इस उपकरण को कुछ देर धूप में रखें। आप देखेंगे कि प्रकाश संश्लेषण के कारण पौधे से आक्सीजन गैस बुलबुलों के रूप में निकलती है और परखनली में एकत्रित हो जाती है। यह गैस आक्सीजन है इसे सिध्द करने के लिये यदि हम एक माचिस की जलती हुई तीली इसके पास लायेंगे तो वह और तेजी से जलने लगती है। अब यदि इस उपकरण को हम काले रंग के कागज़ से पूरी तरह से ढ़ंक कर रखें तो इसमें आक्सीजन गैस नहीं बनती। इससे यह सिध्द होता है कि प्रकाश संश्लेषण के लिए प्रकाश आवश्यक है।

परजीवी पौधे जिन पौधों में पर्ण-हरित नहीं होता वे अपना भोजन स्व्यं नहीं बना सकते हैं। ऐसे पौधे अपने भोजन के लिए अन्य पौधों पर निर्भर करते हैं। यह पौधे परजीवी पौधे कहलाते हैं। यह अक्सर दूसरे पौधों के ऊपर उगते हें या फिर उनसे लिपटे रहते हैं और इनकी जड़ें उन पौधों के तने के भीतर घुस कर पोषण को चूस लेती हैं जिनपर यह निर्भर करते हैं। अमरबेल एक परजीवी पौधे का उदाहरण है। नीचे चित्र में एक परजीवी पौधा दिखाया गया है जो एक बड़े वृक्ष के ऊपर उगा हुआ है और उससे अपना पोषण चूस रहा है।

कुछ पौधे मरे हुए जीवों से अपना पोषण प्राप्त करते हें। ये मृत जीवों पर उगते हैं। उदाहरण के लिए फफूंद और मशरूम। इन्हें मृतोपजीवी कहा जाता है।

कुछ अन्य पौधे कीटों और अन्य जंतुओ को पकड़कर एवं उन्हें खाकर अपना भोजन प्राप्त करते हैं। इन्हें कीटभक्षी पौधे कहा जाता है। इनके कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं। ड्रासेरा या वीनस फ्लाई ट्रेप कीटों और मख्खियों को पकड़ लेता है –

पिचर प्लांट में एक लोटे जैसी पत्ती होती है जिसमे एक ढ़क्कन जैसा भी बना होता है। कोई कीट यदि लोटे (पिचर) में गिर गया तो उसपर ढ़क्कन बंद हो जाता है और पौधा पत्ती से बने हुए लोटे में उसका पाचन करके उसमें से पोषक तत्वों का अवशोषण कर लेता है।

इसी प्रकार कुछ पौधे तो अपने जाल में बड़े प्राणियों को भी फांस लेते हैं। नीचे चित्र में इसी प्रकार एक पौधे के व्दारा एक मेंढ़क को पकड़ना दिखाया गया है।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जो पौधे दूसरे पौधे से पोषण प्राप्त करते हैं वे उन्हें भी कुछ लाभ देते हैं। उदाहरण के लिये दालों के पौधों की जड़ों में कुछ बैक्टीरिया रहते हैं जिनसे इन जड़ों में गठाने बन जाती हैं। यह बैक्टीरिया इन जड़ो से अपने लिये पोषण प्राप्त करते हें, परंतु यह बैक्टीरिया हवा की नाइट्रोजन को नाइट्रोजन के ऐसे यौगिकों में बदल देते हैं जो दाल के पौधे के लिये प्रोटीन बनाने में उपयोगी है। इस प्रकार दाल का पौधा और बैक्टीरिया एक दूसरे की सहायता कर रहे हैं। ऐसे जीवों को सहजीवी कहते हैं। इसे नीचे चित्र में दिखाया गया है।

जंतुओं में पोषणजंतु स्वयं अपना भेजन नहीं बना सकते इसलिये वे अपने पोषण के लिये या तो पौधों पर निर्भर करते हैं या फिर अन्य जंतुओं पर। विभिन्न प्रकार के जंतुओं में अपने भोजन को पकड़ने के लिये अलग-अलग प्रकार की रचानाएं होती हैं।

एक कोशीय जंतु अमीबा अपने कूटपादों से पैरामीशयम को पकड़कर खा लेता है। इसे नीचे चित्र में दिखाया गया है -

हाइड्रा अपने स्‍पर्शकों (टेंटिकि‍ल्स) से भोजन को पकड़ता है –

मेढ़क अपनी लंबी जीभ से कीट-पतंगों को पकड़कर खा लेता है –

मच्छर के पास ऐसे अंग होते हैं जिन्हें वह किसी व्यक्ति के शरीर में घुसाकर खून चूस सकता है –

मनुष्य का पाचन तंत्र बहुत विकसित होता है। हम अपना भोजन अपने मुंह से अंदर लेते हैं। इसे हम अपने दांतो से चबाकर छोटे टुकड़ों में बदल देते हैं। मुंह में ही पाचन का कार्य प्रारंभ हो जाता है।

सर्वप्रथम लार ग्रंथियों से लार निकलकर भोजन में मिलती है। लार भोजन में उपस्थित स्टार्च को शकर में बदल देती है। इसीलिये यदि हम रोटी का टुकड़ा देर तक मुंह में रखकर चबाते र‍हें तो हमें उसमें हल्की मिठास लगने लगती है।

इसके बाद भोजन ग्रास नली से होकर आमाशय में जाता है। आमाशय के बाद भोजन छोटी आंत और बड़ी आंत में जाता है। यहां पर यक्रत और अन्य ग्रंथियों से पाचक रस निकलकर भोजन को पचाते हैं और उसमें से निकले पोषक तत्व आंत व्दारा शरीर में अवशोषित हो जाते हैं। बचा हुआ पदार्थ मल कहलाता है, जो मलव्दार से बाहर निकल जाता है।

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