सरफ़रोशी की तमन्ना

यह गज़ल भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रंतिवीरों का सिंहनाद हुआ करती थी. न जाने कितने ही वीर इसे गाते हुए खुशी-खुशी फांसी के फंदे पर झूल गए. मनोजकुमार की फिल्म शहीद में इसे मन्ना डे, मोहम्मद रफी और राजेन्द्र मेहता ने दिल लगाकर गाया है. आइये पहले गज़ल सुनते हैं -

गज़ल का मूल पाठ (उर्दू के कठिन शब्दों के हिन्दी अर्थ के साथ)

सरफ़रोशी (सर बेचना – विद्रोह करना) की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत (देश और समाज के लिये शहीद) मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
वाए (अफ़सोस) क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ (कमज़ोर) कुछ चलती नहीं
कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है

रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत (प्रेम की राह का साथी) रह न जाना राह में
लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी (रेगिस्ताान की सैर का मज़ा) दूरी-ए-मंज़िल में है

शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले
इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ (छुपा हुआ राज़) जादा-ए-मंज़िल (मंज़ि‍ल का रास्ता) में है

आज फिर मक़्तल (कत्लखाना) में क़ातिल कह रहा है बार बार
आएँ वो शौक़-ए-शहादत जिन के जिन के दिल में है

मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल (क़ातिल का हाथ) में है

माने-ए-इज़हार (व्यक्त करने पर रोक) तुम को है हया (लज्जा), हम को अदब (शिष्टता)
कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है

मय-कदा सुनसान ख़ुम (शराब रखने का बड़ा मटका) उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ (सर झुकाए-हारा हुआ) बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है

वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है

अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की हसरत इक दिल-ए-$बिस्मिल$ में है

बहुत से लोग सोचते हैं कि यह ग़ज़ल प्रसिध्द क्रांतिकारी और अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखी है, परन्तु सच यह है कि इसे पटना के शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा था. यह बात राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान पर शोध कर चुके सुधीर विद्यार्थी ने भी मानी है और प्रसिध्द इतिहासकार प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ ने भी इसकी तस्दीक की है. प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ के मुताबिक़, उनके एक दोस्त स्व. रिज़वान अहमद इस ग़ज़ल पर शोध कर चुके हैं, जिसे कई क़िस्तों में उन्होंने अपने अख़बार ‘अज़ीमाबाद एक्सप्रेस’ में प्रकाशित किया था. बिस्मिल अज़ीमाबादी के पोते मुनव्वर हसन के अनुसार यह ग़ज़ल आज़ादी की लड़ाई के वक़्त काज़ी अब्दुल गफ़्फ़ार की पत्रिका ‘सबाह’ में 1922 में छपी, तो अंग्रेज़ी हुकूमत तिलमिला गई और इसे ज़ब्त कर लिया गया.

बिस्मिल अज़ीमाबादी का असली नाम सैय्यद शाह मोहम्मद हसन था. वो 1901 में पटना से 30 किमी दूर हरदास बिगहा गांव में पैदा हुए थे. लेकिन अपने पिता सैय्यद शाह आले हसन की मौत के बाद वो अपने नाना के घर पटना सिटी आ गए, जिसे लोग उस समय अज़ीमाबाद के नाम से जानते थे. जब उन्होंने शायरी शुरू की तो अपना नाम बिस्मिल अज़ीमाबादी रख लिया और उसी नाम से मशहूर हुए. यह गजल उर्दू छन्द बहरे-रमल में लिखी गई है जिसे हिन्दी में अष्टपदीय गीतिका छन्द कहा जा सकता है. गज़ल के कुछ और शेर भी देखिए –

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिक़ोँ का आज जमघट कूच-ए-क़ातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

है लिये हथियार दुश्मन, ताक में बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं; सीना लिये अपना इधर।
खून से खेलेंगे होली, गर वतन मुश्किल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

हाथ, जिन में हो जुनूँ, कटते नहीं तलवार से;
सर जो उठ जाते हैं वो, झुकते नहीं ललकार से।
और भड़केगा जो शोला, सा हमारे दिल में है;
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

हम तो निकले ही थे घर से, बाँधकर सर पे कफ़न
जाँ हथेली पर लिये लो, बढ चले हैं ये कदम।
जिन्दगी तो अपनी महमाँ, मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब;
होश दुश्मन के उड़ा, देंगे हमें रोको न आज।
दूर रह पाये जो हमसे, दम कहाँ मंज़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

जिस्म वो क्या जिस्म है, जिसमें न हो खूने-जुनूँ;
क्या लड़े तूफाँ से, जो कश्ती-ए-साहिल में है।
सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।

दरअसल, यह ग़ज़ल मैनपुरी षडयन्त्र व काकोरी काण्ड में शामिल होने वाले भारत के महान क्रान्तिकारी नेता रामप्रसाद $बिस्मिल$ की ज़ुबान पर हर वक़्त रहती थी. वर्ष 1927 में सूली पर चढ़ते समय भी यह ग़ज़ल उनकी ज़ुबान पर थी. बिस्मिल के इंक़लाबी साथी जेल से पुलिस की लारी में जाते हुए, कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने पेश होते हुए और लौटकर जेल आते हुए एक सुर में इस ग़ज़ल को गाया करते थे. $बिस्मिल$ की शहादत के बाद इसे स्वतन्त्रता सेनानियों की नौजवान पीढ़ी जैसे शहीद भगत सिंह तथा चन्द्रशेखर आजाद आदि के साथ भी जोड़ा जाता रहा है.

इस गज़ल को राम प्रसाद $बिस्मिल$ के साथ जोड़कर बड़े रोचक किस्से भी बन गए हैं. एक किस्सा यूं है कि एक बार अशफाक उल्ला खाँ बिस्मिल के पास किसी काम से आर्य समाज मन्दिर शाहजहाँपुर गये. दोनो गहरे मित्र थे. संयोग से उस समय अशफाक जिगर मुरादाबादी की यह गजल गुनगुना रहे थे-

'कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में है।
जो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है।।'

बिस्मिल यह शेर सुनकर मुस्करा दिये तो अशफाक ने पूछ ही लिया-'क्यों राम भाई! मैंने मिसरा कुछ गलत कह दिया क्या?'

इस पर बिस्मिल ने जबाब दिया- 'नहीं मेरे कृष्ण कन्हैया! यह बात नहीं। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूँ मगर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब की पुरानी जमीन पर घिसा पिटा शेर कहकर कौन-सा बडा तीर मार लिया. कोई नयी रंगत देते तो मैं भी इरशाद कहता.'

अशफाक को बिस्मिल की यह बात जँची नहीं. उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा- 'तो राम भाई! अब आप ही इसमें गिरह लगाइये, मैं मान जाऊँगा आपकी सोच जिगर और मिर्ज़ा गालिब से भी परले दर्जे की है.'

उसी वक्त राम प्रसाद $बिस्मिल$ ने ये शेर कहा-

'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है ज़ोर कितना बाजु-कातिल में है?'

यह सुनते ही अशफाक उछल पड़े और बिस्मिल को गले लगा के बोले- 'राम भाई! मान गये. आप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं.'

एक किस्सा यह भी है कि - काकोरी कांड में गिरफ्तार होने के बाद कोर्ट में सुनवाई के दौरान जज ने बिस्मिल को गलती से मुलजिम की जगह मुलाजिम कह दिया तो बिस्मिल ने यह शेर कहे -

$मुलाजिम हमको मत कहिए, बड़ा अफसोस होता है,
अदालत के अदब से हम यहां तशरीफ लाए हैं.
पलट देते हैं हम मौजे-हवादिस अपनी जुर्रत से
कि हमने आंधियों में भी चिराग अक्सर जलाए हैं$

देश के लिये कुबार्नी देने बाले अमर शहीद राम प्राद बिस्मिल की अंतिम रचना यह कही जाती है -

मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या.
दिल की बर्वादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या !

मिट गईं जब सब उम्मीदें मिट गए जब सब ख़याल,
उस घड़ी गर नामावर लेकर पयाम आया तो क्या !

ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में
फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या

काश! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते
यूं सरे-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या

आख़िरी शब दीद के काबिल थी $बिस्मिल$ की तड़प
सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या!

सरफरोशी की तमन्ना भारत के लिये क्राति का पैगाम लेकर आई थी. देश के पापुलर कल्चर में इस गज़ल का बहुत ऊंचा मकाम है. फिल्मों में सबसे पहले इसे 1954 में आई फिल्म शहीदे आज़म भगत सिंह में मोहम्मद रफी ने गाया था. आइये सुनते हैं –

यह फिल्म‍ ज्यादा नहीं चली, पर इसके बाद आई मनोज कुमार की इसी नाम की फिल्म‍ सुपरहिट हो गई. मनोज कुमार की फिल्म में यह ग़ज़ल बहुत ही मार्मिक ढ़ग से फिल्माई गई थी, जिसे हम ऊपर देख चुके हैं. इसके बाद अनेक फिल्मों में इस गज़ल को दिखाया गया है. जब कभी यह ग़ज़ल स्क्रीन पर बजती है तो, देखने वालों के देशभक्ति से रोंगटे खड़े हो जाते हैं. फिल्म लीजेंड आफ भगत सिंह में इसे ए.आर. रहमान ने संगीत में ढ़ाला है -

फिल्म रंग दे बसंती में इसका कविता के रूप में बहुत सटीक ढ़ंग से उपयोग किया गया है -

अनुराग कश्यप की फिल्म गुलाल में इस महान देशभक्तिपूर्ण गज़ल की पैरोडी बनाकर और पीयुष मिश्रा व्दारा अभिनीत एक अर्धपागल पात्र से गवाकर वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति पर गहरा व्यंग्य किया गया है –

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