मलिक मुहम्म्द जायसी

मलिक मुहम्म्द जायसी निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के जायस नामक स्थान पर हुआ था। उन्होने अपनी पुस्तक आखरी कलाम ने लिखा है –

जायस नगर मोर अस्थानू। नगरक नांव आदि उदयानू॥
तहां देवस दस पहुने आएऊं। भा वैराग बहुत सुख पाएऊं॥

अर्थात् मेरा स्थान जायस नगर है जिसका पुराना नाम उदयान भी है। मैं वहां दस दिन के मेहमान के रूप में जन्मा था (क्यों कि यह जीवन नश्वर है), और वहीं पर वैराग्य प्राप्त होने से मुझे बुहत सुख मिला।

उनके पिता एक छोटे जमींदार – मलिक राजे अशरफ थे। ऐसा माना जाता है कि इन्हें अमेठी के राजा का संरक्षण प्राप्त था। पद्मावत, अखरावट, आख़िरी कलाम, कहरनामा, चित्ररेखा आदि इनके प्रसिध्द ग्रंथ हैं, जिसमें पद्मावत प्रमुख है। जायसी की भाषा अवधी है एवं उन्होने अपनी कविता में मुख्यत: दोहा, चौपाई आदि छंदों का प्रयोग किया है। कुछ लोगों का मानना है कि जायसी ने अपने के काव्य‍ के लिये फारसी लिपि का प्रयोग किया था, क्योंकि उनके समय तक उर्दू का उदय नहीं हुआ था, परंतु कुछ लोगों का कहना है कि उन्होने अपना काव्य जनसाधारण के लिये लिखा था इस लिये नागरी का ही उपयोग किया होगा।

जायसी का पद्मावत यूं तो प्रेमकथा है, परंतु उन्होने स्व‍यं ही कहा है कि यह एक प्रकार का रूपक है जो आत्मा के परमात्मा से मिलन की कथा कहता है। उन्होने स्वयं पद्मवत में लिखा है –

मैं एहि अरथ पंडितन्ह बूझा । कहा कि हम्ह किछु और न सूझा ॥
चौदह भुवन जो तर उपराहीं । ते सब मानुष के घट माहीं ॥
तन चितउर मन राजा कीन्हा। हिय सिंहल बुधि पद्मिनि चीन्हा॥
गुरु सुआ जेहि पंथ दिखावा। बिन गुरु जगत को निरगुन पावा॥
नागमती यह दुनिया–धंधा।बाँचा सोइ न एहि चित बंधा।।
राघव दूत सोई सैतानू।माया अलाउदीं सुलतानू।।

अर्थात् - मैने इसका अर्थ पंडितों से पूछा तो उन्होने कहा कि हमे तो इसके सिवा कुछ समझ नहीं आता कि जो इस ब्रह्मांड के चौदह भुवन है वे सभी मनुष्य के इस शरीर में ही हैं। चित्तौड़ हमारा तन या शरीर है, राजा रत्नथसेन हमारा मन हैं, हमारा हृदय सिंहल व्दीप है, पद्मावती बुध्दि है, हीरामन तोता गुरू है, नागमती यह नश्वर दुनिया या मोह है, राघव आत्मा को पथभ्रष्ट करने वाला शैतान है और सुलतान अलाउद्दीन माया है। परंतु कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कथा के उत्तरार्ध को ऐतिहासिक बनाने के कारण रूपक पूरी तरह से बंध नहीं पाया है।

पद्मावत की कथा इस प्रकार है - सिंहल व्दीप के राजा की पुत्री पद्मावती (पद्मिनी का अर्थ है कमल जैसी; पद्मिनी नायिका भेद में सर्वश्रेष्ठ नायिका भी मानी जाती है) बहुत सुंदर थी। उसके तोते का नाम हीरामन था। एक दिन बिल्ली से बचने के लिये वह तोता भागा। उसे एक बहेलिए ने फँसाकर एक ब्राह्मण को बेच दिया, जिसने उसे चित्तौड़ के राजा रतनसिंह राजपूत को बेच दिया। इस तोते से पद्मिनी के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन सुनकर, राजा उसे प्राप्त करने के लिये अनेक वनों और समुद्रों को पार करके सिंहल पहुँचा। तोते ने पद्मावती को उसके प्रेम का संदेश दिया। पद्मावती राजा से मिलने आई। राजा उसे देखकर उसके तेज से बेहोश हो गया। पद्मावती ने उसके हृदय पर चंदन से यह लिख दिया था कि उसे वह तब पा सकेगा जब वह सिंहलगढ़ पर चढ़कर आएगा। तोते की सहायता से वह सिंहलगढ़ गया जहां सिंहल के राजा ने पहले तो उसे सूली देने का आदेश दिया परंतु तोते से उसका प्रेम जानने के बाद उसने पद्मावती का विवाह रतनसिंह के साथ कर दिया। रतनसिंह की पहली पत्नी नागमती ने किसी प्रकार एक पक्षी से अपने विरह का वर्णन उसके पास भिजवाया। तब रतनसिंह पद्मावती को लेकर चित्तौड़ लौट आया। रतनसिंह में अपनी सभा के राघव नाम के पंडित को झूठ बोलने के कारण निकाल दिया था। उसने सुल्तान अलाउद्दीन से पद्मावती के सौंदर्य की बड़ी प्रशंसा की। अलाउद्दीन ने पदमावती को पाने के लिये चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। बहुत दिनो तक भी जीत न पाने के कारण अलाउद्दीन ने धोखे का संदेश भेजा, और रतनसिंह जब बाहर निकला तो अलाउद्दीन ने उसे बंदी बना लिया। पद्मावती दु:खी होकर अपने पति को छुड़ाने के लिये अपने सामंतों गोरा तथा बादल के साथ सोलह सौ डोलियाँ सजाकर और उनमें राजपूत सैनिकों को रखकर दिल्ली गई। राजपूत रतनसिंह को लेकर निकल भागे। जिस समय वह दिल्ली में बंदी था तब कुंभलनेर के राजा देवपाल ने पद्मावती से प्रेम प्रस्ताव किया था। यह सुनकर रतनसिंह में देवपाल को युध्द में मार दिया परंतु स्वयं भी घायल हुआ और घर पहुँचते ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। पद्मावती और नागमती ने जौहर कर लिया। अलाउद्दीन भी पीछा करता हुआ चित्तौड़ पहुँचा, किंतु उसे राख ही मिली।

पद्मावत में कवि ने काव्य के सभी अंगों को बहुत सुंदर ढ़ग से सजाया है। महाकाव्य होने के कारण इसमें सभी रस हैं।

प्रारंभ में ईश्वर की विनयपूर्ण स्तुति है

सुमिरौं आदि एक करतारू । जेहि जिउ दीन्ह कीन्ह संसारू ॥
कीन्हेसि प्रथम जोति परकासू । कीन्हेसि तेहि पिरीत कैलासू ॥
कीन्हेसि अगिनि, पवन, जल खेहा । कीन्हेसि बहुतै रंग उरेहा ॥
कीन्हेसि धरती, सरग, पतारू । कीन्हेसि बरन बरन औतारू ॥
कीन्हेसि दिन, दिनअर, ससि, राती । कीन्हेसि नखत, तराइन-पाँती ॥
कीन्हेसि धूप, सीउ औ छाँहा । कीन्हेसि मेघ, बीजु तेहिं माँहा ॥
कीन्हेसि सप्त मही बरम्हंडा । कीन्हेसि भुवन चौदहो खंडा ॥
कीन्ह सबै अस जाकर दूसर छाज न काहि ।पहिलै ताकर नावँ लै कथा करौं औगाहि ॥

अर्थात् - सर्व प्रथम मैं उस एकमात्र ईश्वर का स्मरण करता हूं, जिसने यह संसार बनाया है; प्रकाश बनाया, कैलाश बनाया, आग, हवा, जल आदि बनाये; धरती, स्वर्ग और पाताल बनाये और सभी प्रकार के पशु-पक्षी बनाये; दिन और सूर्य, रात और चंद्रमा बनाये; नक्षत्र और तारे बनाये; धूप और छांव बनायी बादल भी बनाये; जिसने इस ब्रह्मांड के सात व्दीप और चौदह भुवन बनाये; ऐसे ईश्वर का नाम लेकर मैं कथा प्रारंभ कर रहा हूं।

पद्मावती के सौदर्य का नख-शिख वर्णन -

केश -

बेनी छोरि झार जौं बारा । सरग पतार होइ अँधियारा ॥
कोंपर कुटिल केस नग कारे । लहरन्हि भरे भुअंग बैसारे ॥

अर्थात् - जब उसने अपनी वेणी खोल दी तो उसके केशों से स्वर्ग से पाताल तक अंधेरा हो गया। ऐसा लगता था जैसे उसके केश काले-काले नागों की लहरें हैं।

मांग –

बरनौं माँग सीस उपराहीं । सेंदुर अबहिं चढा जेहि नाहीं ॥
बिनु सेंदुर अस जानहु दीआ । उजियर पंथ रैनि महँ कीआ ॥

अर्थात् - उसके सिर की मांग का वर्णन करता हूं, जिसपर अभी सिंदूर नहीं लगा है। बिना सिंदूर के ऐसा लगता है जैसे उजियारे रास्ते पर रात हो गई है।

भौंहें –

भौहैं स्याम धनुक जनु ताना । जा सहुँ हेर मार विष-बाना ॥
हनै धुनै उन्ह भौंहनि चढे । केइ हतियार काल अस गढे ?॥

अर्थात् – काली भौंहे जेसे किसी ने धनुष तान दिया हो और विष के बाण मारने वाली हो। उन भौंहों को चढ़ा रखा है। यह हथियार किसे मारने के लिये बनाये हैं?

नैन (आंखें) –

नैन बाँक,सरि पूज न कोऊ । मानसरोदक उथलहिं दोऊ ॥
राते कँवल करहिं अलि भवाँ । घूमहिं माति चहहिं अपसवाँ ॥

अर्थात् – उसके बांके नैनों जैसे दूसरे नहीं हैं। यह नैन मानसरोवर के जल से भरे हैं। उसकी आंखों की काली पुतलियां कमल में बैठे काले भंवरे की तरह चंचल हैं जैसे भंवरा उड़ जाना चाहता है।

नासिका –

नासिक खरग देउँ कह जोगू । खरग खीन, वह बदन-सँजोगू ॥
नासिक देखि लजानेउ सूआ । सूक अइ बेसरि होइ ऊआ ॥

अर्थात् - नासिका इतनी तीखी है जैसे खड्ग हो और उसे देख कर तोता भी लजा जाता है क्यों कि पाद्मावती की नासिका तोते की चोंच से भी सुंदर है।

होठ –

हीरा लेइ सो विद्रुम-धारा । बिहँसत जगत होइ उजियारा ॥
भए मँझीठ पानन्ह रँग लागे । कुसुम -रंग थिर रहै न आगे ॥
अस कै अधर अमी भरि राखे । अबहिं अछूत, न काहू चाखे ॥

अर्थात् – उसके दांत हीरे के समान सफेद हैं और होठ लाल हैं। इसलिये जब वह हंसती है तो ऐसा लगता है कि सुबह की लाली के बाद दिन निकल आया है और जगत में उजियारा हो गया है। पान के रंग से उन अधरों में ऐसा गाढ़ा लाल रंग लगा है कि फूलों का रंग भी उनके सामने नहीं टिक सकता। इन अधरों में अमृत भरा हुआ है और अभी तक इन्हें किसी ने छुआ नहीं हैं और चखा नहीं है।

कुच -

हिया थार कुच कंचन लारू। कनक कचोरि उठे जनु चारू।

अर्थात् - हृदय के थाल में कुच सोने का लड्डू है। या फिर आटे की कचौरी फूल रही है (उठते हुए स्तन तलने पर फूलती हुई बदामी रंग की, कचौरी जैसे लगते हैं)। या यह कहें कि उसके स्तन सोने के सुंदर उठे हुए काटोरे जैसे हैं।

वियोग का वर्णन देखिये

पद्मावती का वियोग वर्णन -

पद्मावति तेहि जोग सँजोगा । परी पेम-बसे बियोगा ॥
नींद न परै रैनि जौं आबा । सेज केंवाच जानु कोइ लावा ॥

अर्थात् – प्रेम में पड़ी हुई पद्मावती को वियोग के कारण रात में नींद नहीं आती थी और उसे ऐसा लगता था कि उसकी सेज पर किसी ने केवांच (एक प्रकार का फल जिसके शरीर पर लग जाने से पूरे शरीर में खुजली होने लगती है) लगा दिया है।

नागमती के वियोग का तो और भी मार्मिक वर्णन है –

नागमती चितउर-पथ हेरा । पिउ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा ॥
नागर काहु नारि बस परा । तेइ मोर पिउ मोसौं हरा ॥
सुआ काल होइ लेइगा पीऊ । पिउ नहिं जात, जात बरु जीऊ ॥
भएउ नरायन बावन करा । राज करत राजा बलि छरा ॥
करन पास लीन्हेउ कै छंदू । बिप्र रूप धरि झिलमिल इंदू ॥
मानत भोग गोपिचंद भोगी । लेइ अपसवा जलंधर जोगी ॥
लेइगा कृस्नहि गरुड अलोपी । कठिन बिछोह, जियहिं किमि गोपी?॥
सारस जोरी कौन हरि, मारि बियाधा लीन्ह ? ।
झुरि झुरि पींजर हौं भई , बिरह काल मोहि दीन्ह ॥

अर्थात् - नागमती चित्तौड़ का रास्ता बार-बार देखती है कि मेरे पति गए तो वापस नहीं आये। मेरे पति किसी नारी के बस में हो गए है जिसने मेरे पति को मुझसे छीन लिया है। तोता काल के समान, मेरे पति नहीं, मेरी जान को ही ले गया है। जैसे वामन बनकर नारायण ने राजा बलि का राज छीन लिया था और ब्राह्मण का रूप धरके कृष्ण ने कर्ण के कवच कुंडल छल से ले लिये थे। जैसे कृष्ण को गरुड़ ले गया था तो गापियां उनके विछोह में कैसे रही थीं। यह मुझ पर कैसी विपत्ति का गई है और विरह के कारण मैं पिंजर (हड्डियों का ढ़ांचा) बन गई हूं।

षट् ऋतु वर्णन -

जायसी ने ऋतुओं का बहुत की सुंदर वर्णन किया है। कुइ उदाहरण देखिये –

बसंत -

प्रथम वसंत नवल ऋतु आई । सुऋतु चैत बैसाख सोहाई ॥
चंदन चीर पहिरि धरि अंगा । सेंदुर दीन्ह बिहँसि भरि मंगा ॥

ग्रीष्म -

ऋतु ग्रीषम कै तपनि न तहाँ । जेठ असाढ कंत घर जहाँ ॥
पहिरि सुरंग चीर धनि झीना । परिमल मेद रहा तन भीना ॥

वर्षा –

रितु पावस बरसै, पिउ पावा । सावन भादौं अधिक सोहावा ॥
पदमावति चाहत ऋतु पाई । गगन सोहावन, भूमि सोहाई ॥
कोकिल बैन, पाँति बग छूटी । धनि निसरीं जनु बीरबहूटी ॥
चमक बीजु, बरसै जल सोना । दादुर मोर सबद सुठि लोना ॥

पद्मिनी और नागमती की सती होने का बड़ा ही मार्मिक वर्णन कवि ने किया है

पद्मावति पुनि पहिरि पटोरी । चली साथ पिउ के होइ जोरी ॥
सूरुज छपा, रैनि होइ गई । पूनो-ससि सो अमावस भई ॥
छोरे केस, मोति लर छूटीं । जानहुँ रैनि नखत सब टूटीं ॥
सेंदुर परा जो सीस अघारा । आगि लागि चह जग अँधियारा ॥
यही दिवस हौं चाहति, नाहा । चलौं साथ, पिउ ! देइ गलबाहाँ ॥
सारस पंखि न जियै निनारे । हौं तुम्ह बिनु का जिऔं, पियारे ॥
नेवछावरि कै तन छहरावौं । छार होउँ सँग, बहुरि न आवौं ॥
दीपक प्रीति पतँग जेउँ जनम निबाह करेउँ ।
नेवछावरि चहुँ पास होइ कंठ लागि जिउ देउँ ॥

अर्थात् - जब पद्मावती कपड़े पहन कर आने पति के शव के साथ जोड़ी बनाकर चली, तब सूरज छिप गया और रात हो गई, और पूर्णिमा का चंद्रमा होते हुए भी अमावस हो गई। बाल खुले हुए थे, मोतियों की माला छूट गई। उसके माथे पर लगा हुआ लाल सिंदुर इस अंधेंरे संसार में आग लगाना चाहता मालूम हो रहा था। उसने कहा कि मेरे पति आज के दिन मैं तुम्हारे गले में बाहें डालकर साथ जाना चाहती हूं। मेरे प्यारे, मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकती। मैं अपना शरीर त्याग दूंगी और तुम्हारे साथ ही जल जाऊंगी और फिर लौट के नहीं आऊंगी। जैसे पतंगा दीपक पर जलकर अपनी जान दे देता है वैसे ही में भी तुम्हारे गले लगकर निछावर हो जाऊंगी।

संसार के आसार होने के संबंध में राजा रत्नतसेन के बैकुठवास खंड में बहुत सुंदर तरीके से कहा है -

तौ लही साँस पेट महँ अही । जौ लहि दसा जीउ (जीव) कै रही ॥
काल आइ देखराई साँटी (संटी- छड़ी)। उठी जिउ चला छोडिं कै माटी ॥
काकर लोग, कुटुँब, घर बारू । काकर अरथ दरब संसारू ॥
ओही घरी सब भएउ परावा । आपन सोइ जो परसा, खावा ॥
अहे जे हितू साथ के नेगी । सबै लाग काढै तेहि बेगी ॥
हाथ झारि जस चलै जुवारी । तजा राज, होइ चला भिखारी ॥
जब हुत जीउ, रतन सब कहा । भा बिनु जीउ, न कौडी लहा ॥
गढ सौंपा बादल कहँ गए टिकठि (अरथी) बसि देव (राजा)।
छोडी राम अजोध्या, जो भावै सो लेव ॥

अर्थात् - जब तक सांस रही तब तक जीव की दशा थी। जब मृत्यु आई तो संटी दिखाकर जीव छोड़कर चला गया। कुटुंब, लोग, घर-बार, संसार सब पराये हो गये। जो साथी थे वे सभी चले गये, जैसे कोई जुआरी सब कुछ हार कर हाथ झाड़कर चला जाये या कोई राजा भिखारी बन जाये। राजा ने चित्तौड़ गढ़ बादल को सौंप दिया और अरथी पर लेटकर चले गये। जब राम ने ही अयोध्या छोड़ दी तो अब चाहे कोई ले ले।

जायसी की पद्मावत् प्रेम और निगुर्ण भक्ति का अनुपम काव्य है।

पद्मावती की कथा पर श्यायम बेनेगल के दूरदर्शन पर प्रसारित प्रसिध्द सीरियल - भारत एक खोज के एपिसोड को यू-ट्यूब पर देखने के लिये अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करें –



समाप्त

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