भक्त रैदास

रैदास निर्गुण भक्ति धारा के कवि हैं। वे कबीर के समकालीन थे। उनका जन्म चर्मकार जाति में हुआ था। वे अपने जीवनकाल में ही महान संत और गुरू के रूप में पूजे जाने लगे थे। वे बनारस में रहते थे, तथा रामानंद जी के शिष्य थे। ऐसा माना जाता है कि मीराबाई भी रैदास की शिष्या थीं। मीरा ने स्वयं लिखा है –

गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी।
सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली।

संत रैदास के 40 पद गुरू गृंथ साहब में भी मिलते हैं। संत रैदास ने समाज सुधार का बहुत कार्य किया। उन्होने दलितों को पूजा का अधिकार दिलाया। वे हिन्दू एवं मुसालमान में भी कोई अंतर नहीं मानते थे। उनकी रचनाओं में समाज सुधार की यह भावना स्पष्ट रूप से दिखती है। जांति-पांति, आडंबर और कर्मकांड में उनका विश्वास नहीं था। कहते हैं कि एक बार उन्हें किसी को समय से जूते बनाकर देने थे, इसलिये वे गंगा स्नान के लिये नहीं जा सके। उन्होंने कहा – मन चंगा तो कठौती में गंगा।

संत रैदास के कुछ दोहे देखिये जिनमें समाज-सुधार के सुर स्पष्ट‍ रूप से दिखते हैं –

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

कृष्ण, करीम, राम, हरि, राघव आदि सभी को जब तक एक नहीं मनोगे और वेद, कुरान आदि सभी धर्म गृंथों को एक समान नहीं मानोगे तब तक तुम्हें ईश्वर नहीं मिलेंगे।

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।

ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य और अपना अभिमान त्याग देने से ही मिलती है, जिस प्रकार बड़ा सा हाथी शक्कर के दाने चुनकर नहीं खा पाता परंतु छोटी सी चींटी इन दानों को खा लेती है।

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

रैदास कहते हें कि जिस प्रकार सोने में और सोने से बने हुए कंगन में कोई अंतर नहीं हैं उसी प्रकार हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई अंतर नहीं है।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं है, सभी में एक ही रक्त और मांस है। रैदास दोनो ही को एक समान देखते हैं।

हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।

ईश्वर जैसा हीरा छोड़कर जो किसी दूसरे की चाहत करेंगे, रैदास कहते हें कि वे लोग निश्चित रूप से नरक में ही जायेंगे।

वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।

वर्णआश्रम (जाति-पांति) को छोड़कर जो उनके पैरों की धूल लेगा रैदास की विमल वाणी उसके सभी संदेहों को समाप्त कर देगी।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

जातियों के भीतर और ढ़ेर सारी जातियां हैं जैसे केले के पत्तों के भीतर और पत्ते होते हैं। रैदास कहते हें कि जब तक जाति समाप्त नहीं होगी तब तक सभी मनुष्य‍ एक दूसरे से नहीं जुड़ पायेंगे।

भक्त रैदास के कुछ भक्ति पद रैदास के अनेक भजन शास्त्रीय रागों में गाये गये हैं।

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै रैदासा॥

यह प्यारा सा भजन अनुप जलोटा की आवाज़ में यू-ट्यूब पर सुनने के लिये अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करें –

।। राग गौड़।।

ऐसे जानि जपो रे जीव। जपि ल्यो राम न भरमो जीव।। टेक।।
गनिका थी किस करमा जोग, परपूरुष सो रमती भोग।।१।।
निसि बासर दुस्करम कमाई, राम कहत बैकुंठ जाई।।२।।
नामदेव कहिए जाति कै ओछ, जाको जस गावै लोक।।३।।
भगति हेत भगता के चले, अंकमाल ले बीठल मिले।।४।।
कोटि जग्य जो कोई करै, राम नाम सम तउ न निस्तरै।।५।।
निरगुन का गुन देखो आई, देही सहित कबीर सिधाई।।६।।
मोर कुचिल जाति कुचिल में बास, भगति हेतु हरिचरन निवास।।७।।
चारिउ बेद किया खंडौति, जन रैदास करै डंडौति।।८।।

मुझे इस भजन का ओशो सिध्दार्थ औलिया का एक विडियो यू-ट्यूब पर मिला है। इस भजन को यू-ट्यूब पर सुनने के लिये अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करें –

।। राग विलावल।।

गोबिंदे तुम्हारे से समाधि लागी। उर भुअंग भस्म अंग संतत बैरागी।। टेक।।
जाके तीन नैन अमृत बैन, सीसा जटाधारी, कोटि कलप ध्यान अलप, मदन अंतकारी।।१।।
जाके लील बरन अकल ब्रह्म, गले रुण्डमाला, प्रेम मगन फिरता नगन, संग सखा बाला।।२।।
अस महेश बिकट भेस, अजहूँ दरस आसा, कैसे राम मिलौं तोहि, गावै रैदासा।।३।।

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