लोक मानस के कवि - अमीर खुसरो

अमीर खुसरो हिन्दवी या हिन्दी के पहले कवि माने जाते हैं। उनका वास्तविक नाम अबुल हसन था। उन्हें अमीर की उपाधि जलालुद्दीन खिलजी ने दी थी। सुल्तान कैकुबाद ने उन्हें मुलुकशुअरा(राष्ट्रकवि)की उपाधि दी थी। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटयाली गांव में हुआ था। उनके पिता सैफुद्दीन, लाचन जाति के तुर्क थे। वे 4 वर्ष की आयु में दि‍ल्ली आ गये थे। 8 वर्ष की आयु में वे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य बन गये थे। वे 20 वर्ष की आयु तक कवि के रूप में बहुत प्रसिध्द हो गये थे। वे दिल्ली सल्तनत के अनेक सुल्तानों के दरबार में रहे। वे फारसी, तुर्की, संस्कृत, अरबी, हिन्दी आदि के ज्ञाता थे। हिन्दी के प्रति उनका बड़ा प्रेम था। एक स्थान पर उन्होने कहा है - तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब अर्थात् - मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ, हिन्दवी में जवाब देता हूँ। उन्होने हिन्दनवी के प्रेम में यह भी कहा है –

चूं मन तूती-ए-हिन्दम अर रासत पुर्सी,
ज़मन हिन्दवी पुर्स ता नग्ज गोयम।

अर्थात् अगर सही समझो तो मैं हिन्दुस्तान की तूती हूँ। अगर तुम मुझसे मीठी बातें करना चाहते हो तो हिन्दवी में बात करो।


हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य होने के नाते वे सूफी थे जिसका प्रभाव उनकी कविता में साफ दिखता है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया पर उनकी भक्ति इतनी थी कि उनकी मृत्यु पर अमीर खुसरो ने कहा –

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस।

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हज़रत निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु के 6 महीने के भीतर अमीर खुसरो की मृत्यु भी हो गई। उनकी मज़ार भी उनके गुरू हज़रत निजामुद्दीन औलिया की मज़ार के पास ही है। अमीर खुसरो ने शायरी में गज़ल और कव्वाली को जन्म दिया। इसी प्रकार संगीत में सितार और तबला वाद्य यंत्र भी उन्हीं के बनाये हुए हैं। अमीर खुसरो के गीत, गज़ल, पहेलियां, दोहे, ढ़कोसले, दुसुखने, उलटबासियां आदि प्रसिध्द हैं। उनकी मुख्य काव्य रचनायें तुहफा-तुस-सिग़र, वसतुल-हयात, ग़ुर्रातुल-कमाल, नेहायतुल-कमाल आदि हैं। अमीर खुसरो की कविता भारत के लोक साहित्य का अभिन्न अंग है।

अमीर खुसरो के काव्य के कुछ उदाहरण

कव्वाली यह सूफी परंपरा के अंर्तगत भक्ति संगीत की प्रमुख धारा है, जिसे अमीर खुसरो ने प्रारंभ किया था। भारत में यह बहुत लोकप्रिय है। अमीर खुसरो की एक प्रसिध्द कव्वाली देखिये –

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके
प्रेम भटी का मदवा पिलाइके
मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ
बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजव
अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
ख़ुसरो निजाम के बल बल जाए
मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके॥

नुसरत फतेह अली खान से यु-ट्यूब पर इसे सुने अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करके –

गीत

इस गीत में एक पुत्री की मन:स्थिति का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है –

काहे को ब्याहे बिदेस,
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

भैया को दियो बाबुल महले दो-महले
हमको दियो परदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ
जित हाँके हँक जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ
घर-घर माँगे हैं जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

कोठे तले से पलकिया जो निकली
बीरन में छाए पछाड़
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँ
भोर भये उड़ जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

तारों भरी मैनें गुड़िया जो छोडी़
छूटा सहेली का साथ
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

डोली का पर्दा उठा के जो देखा
आया पिया का देस
अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस

अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस
अरे, लखिय बाबुल मोरे

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दोहे

अमीर खुसरो के दोहे रहस्‍यवाद अति उत्तम उदाहरण हैं, जिनमे प्रेम के वर्णन के बहाने ईश्वर की आराधना की गई है। कुछ उदाहरण देखिये –

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग।।

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने, सांझ भयी चहु देस।।

खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहिं होत सहाय।।

गज़ल

अमीर खुसरो की इस गज़ल में एक लाइन फारसी और एक लाइन हिन्दवी में लिखने का बहुत सुंदर उदाहरण है -

ज़िहाल-ए मिस्कीं (गरीब की दुर्दशा) मकुन (नहीं) तगाफ़ुल (लापरवाही),
दुराये नैना बनाये बतियां ।
कि ताब-ए-हिजरां (विरह को सहन करना की शक्ति) नदारम (नहीं होना) ऎ जान,
न लेहो काहे लगाये छतियां ।

मुझ गरीब की दुदर्शा के प्रति लापरवाही न करो और बातें बनाकर मुझसे नज़रें न फेरो। मेरे अंदर विरह को सहन करने की शक्ति नहीं है। मुझे सीने से क्यों नहीं लगा लेते हो।

शबां-ए-हिजरां (विरह की रात) दराज़ (लंबी) चूं (जैसे) ज़ुल्फ़
वा रोज़-ए-वस्लत (मिलन का दिन) चो (छूना) उम्र कोताह (छोटा),
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां ।

विरह की रात जुल्फों की तरह लंबी है और मिलन का दिन बहुत छोटा है। ए सखि मै अपने पति को देखे बिना अंधेरी रातें कैसे काटूं।

यकायक (अचानक) अज़ (से) दिल, दो (देना) चश्म-ए-जादू (आंखों का जादू)
ब सद फ़रेबम (सौ तरह के फरेब) बाबुर्द (मिल जाना) तस्कीं (तस्कीैन, राहत),
किसे पडी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां ।

अचानक ही उनकी नज़रों का जादू सौ तरह की फरेब करके मेरे दिल पर चल गया है और राहत नहीं मिलती। कोई तो जाकर मेरे पति को मेरी हालत के बारे में बताये।

चो (जैसे) शमा सोज़ान (जली हुई शमा), चो ज़र्रा (कण) हैरान
हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह ।
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां ।

जलती हुई शमा की तरह मैं हैरान होकर प्रेम की ज्वाला में पड़ी हुई हूं। न नींद आती है, न शरीर को चैन है। वह न तो आते हें और न ही पत्र भेजते हैं।

बहक्क-ए-रोज़े (बहक्क - हक से, रोज – दि‍न) , विसाल-ए-दिलबर (प्रेमी से मिलन)
कि दाद (तारीफ) मारा, गरीब खुसरो ।
सपीत मन के, दुराय राखूं
जो जाय पाऊं, पिया कि खतियां ।

जिस दिन गरीब खुसरो अपने प्रेमी से मिलेगा वह अपने मन की बाते मन में ही रखेगा और किसी को बतायेगा नहीं।

इस ग़ज़ल को यू-ट्यूब पर छाया गांगुली की आवाज़ में सुनने के लिये अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करें –

इसी को उस्ताद शुजात खां साहब की आवाज़ में सुनें –

पहेलियां -

अमीर खुसरों की पहेलियां दो प्रकार की हैं –

बूझ पहेली – यह वे पहे‍लियां हैं जिनका उत्तर पहेली में ही छिपा रहता है। उदाहरण के लिये –

गोल मटोल और छोटा-मोटा,
हर दम वह तो जमीं पर लोटा।
खुसरो कहे नहीं है झूठा,
जो न बूझे अकिल का खोटा।।

उत्तर - लोटा।

श्याम बरन और दाँत अनेक,
लचकत जैसे नारी।
दोनों हाथ से खुसरो खींचे
और कहे तू आ री।।

उत्तर - आरी।

हाड़ की देही उज् रंग,
लिपटा रहे नारी के संग।
चोरी की ना खून किया
वाका सर क्यों काट लिया।

उत्तर - नाखून।

बाला था जब सबको भाया,
बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
खुसरो कह दिया उसका नाव,
अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।

उत्तर - दिया।

बिन-बूझ पहेली – इनका उत्तर पहेली के भीतर नहीं होता –

एक नार कुँए में रहे,
वाका नीर खेत में बहे।
जो कोई वाके नीर को चाखे,
फिर जीवन की आस न राखे।।

उत्तर – तलवार

एक थाल मोतियों से भरा,
सबके सर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे,
मोती उससे एक न गिरे।

उत्तर – आसमान

अमीर खुसरों ने दोहा पहेलियां भी लिखी हैं –

उज्जवल बरन अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान।
देखत मैं तो साधु है, पर निपट पार की खान।।

उत्तर - बगुला (पक्षी)

कह मुकरियां

यह कुछ-कुछ पहेलियों की तरह हर हैं। किसी बात को कह कर मुकर जाना कह-मुकरियां है। कुछ उदाहरण देखिये -

लिपट लिपट के वा के सोई
छाती से छाती लगा के रोई
दांत से दांत बजे तो ताड़ा
ऐ सखि साजन? ना सखि जाड़ा!

रात समय वह मेरे आवे
भोर भये वह घर उठि जावे
यह अचरज है सबसे न्यारा
ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!

नंगे पाँव फिरन नहिं देत
पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत
पाँव का चूमा लेत निपूता
ऐ सखि साजन? ना सखि जूता!

खुसरो की कुछ मुकरियां यू-ट्यूब पर देखने के लिये अपनी डिवाइस का इंटरनेट चालू करें –

ढ़कोसले या अनमेलियां या आडंबर यह ऊल-जलूल बातें हैं जिनका कोई अर्थ नहीं हैं। अमीर खुसरो ने इसे एक विधा के रूप में विकसित किया था। कुछ मजेदार उदाहरण देखिये –

खीर पकाई जतन से और चरखा दिया जलाय।
आयो कुत्तो खा गयो, तू बैठी ढोल बजाय, ला पानी पिलाय।

भैंस चढ़ी बबूल पर और लपलप गूलर खाय।
दुम उठा के देखा तो पूरनमासी के तीन दिन।

बी मेहतरानी दाल पकाओगी या नंगा ही सो रहूं।

गोरी के नैना ऐसे बड़े जैसे बैल के सींग।

दु:सुखने यह ऐसी पहेलियां हें जिनमें दो प्रश्न पूछे जाते हें परंतु दोनो का उत्तर एक ही है। कुछ उदाहरण हैं –

गोश्त क्यों न खाया?
डोम क्यों न गाया?

उत्तर—गला न था

जूता पहना नहीं
समोसा खाया नहीं

उत्तर— तला न था

अनार क्यों न चखा?
वज़ीर क्यों न रखा?

उत्तर— दाना न था( अनार का दाना और दाना=बुध्दिमान)

रोटी जली क्यों? घोडा अडा क्यों? पान सडा क्यों ?
उत्तर— फेरा न था

पंडित प्यासा क्यों? गधा उदास क्यों ?

उत्तर— लोटा न था

अमीर खुसरो भारत के लोक मानस में बसे हुए हैं। उनकी रचनाओं को कव्वालों, लोक गायकों और आम लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी बचाये रखा है।

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