भाषा सिखाने की विधियां – भाषा का मौखिक और मूर्त रूप

काफी दिनों से सोच रहा हूं कि भाषा की शिक्षा के संबंध में आप सब से कुछ बात करूं. अन्‍य कोई भी विषय सीखने के लिये भाषा का ज्ञान आवश्यक है, इसलिये प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा के शिक्षण पर विशेष ध्‍यान देना अनिवार्य है.

मैंने प्रायः देखा है कि स्कूलों में भाषा शिक्षण के नाम पर एक बच्‍चे को पाठ्य पुस्‍तक लेकर कक्षा के सामने पाठ पढ़ने को कहा जाता है, और बाकी बच्‍चों को उसके पीछे पाठ को दोहराने को कहा जाता है. इसके अतिरिक्‍त पाठ्य पुस्तक में लिखे हुए पाठ को कॉपी में लिखना आदि सिखाया जाता है. भाषा सिखाने में हमारा प्रयास अक्‍सर वर्णमाला सिखाने में, बारहखड़ी रटाने में, व्याकरण के नियम समझाने में और शब्दों के अर्थ रटाने में रहता है. उच्चारण पर भी बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है. आइये विचार करते हैं कि क्या भाषा सिखाने का यही तरीका सर्वोत्तम है या भाषा किसी अन्य तरीके से बेहतर सिखायी जा सकती है.

भाषा की उत्‍पत्ति ध्‍वनि से हुयी है

भाषा के दो स्वरूप हैं - मौखिक और लिखित. लिखित भाषा को हम लिपि भी कह सकते हैं. भाषा की उत्‍पत्ति लेखन से नहीं बल्कि, ध्वनियों के माध्यम से अपने विचार अन्‍य लोगों तक पहुंचाने के प्रयास से हुई है. कहते हैं कि मधुमक्खियों से लेकर डॉल्फिन तक एक दूसरे के साथ विभिन्न प्रकार की ध्वनियों के माध्यम से बातचीत करते हैं. मनुष्य में भी भाषा का जन्म ध्वनियों, हावभाव और बॉडी लैंगुएज के व्दारा विचार संप्रेषण के प्रयासों से हुआ है. भाषा की उत्‍पत्ति मौखिक ही है. भाषा शब्द भाष् धातु से बना है, जिसका अर्थ ही बोलना है.

बच्‍चा भाषा कैसे सीखता है

बच्चे जो कुछ सुनते हैं, वही दोहराते है. प्रारंभ में बच्‍चा सबसे अधिक समय अपनी मां के साथ बिताता है. जब बच्‍चे को बोलना बिल्‍कुल भी नहीं आता है उस समय भी मां बच्‍चे से लगातार बातें करती है. मां बच्‍चे को इशारे से बताती है कि वह उसकी मां है, और अक्‍सर ‘मां’ शब्‍द का उच्‍चारण भी करती है. इसीलिये बच्‍चा अक्‍सर पहला शब्‍द ‘मां’ ही बोलता है. इसी प्रकार बच्‍चा ‘बाबा’, ‘भइया’, ‘पानी’, ‘खाना’ जैसे शब्‍द बोलना सीखता है. जैसे-जैसे बच्‍चा बड़ा होता है, वह अन्‍य लोगों के बोले हुये शब्‍दों को सुनकर उनका अर्थ समझने का प्रयास करता है और धीरे-धीरे सार्थक वार्तालाप प्रारंभ कर देता है. भाषा सीखने की प्रक्रिया में ‘सुनना’ अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण क्रिया है. इसीलिये आपने देखा होगा कि जो बच्‍चे जन्‍म से बहरे होते हैं वे गूंगे भी होते हैं. सुन नही सकने के करण वे बोलना भी नही सीखते हैं.

बच्चे की प्रारंभिक बातचीत माता-पिता, भाई-बहन और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ होती है. धीरे-धीरे बच्चा आस-पड़ोस के लोगों से बातचीत करना सीखता है. इसी प्रकार खेल-खेल में बच्‍चा भाषा के कठिन स्वरूप को भी सीख जाता है. ध्‍यान देने की अवश्‍यकता है कि इस प्रकार भाषा सीखने में बच्चे को न तो वर्णमाला रटनी होती है न ही शब्दों के अर्थ को रटना होता है, बल्कि सार्थक वार्तालाप से बच्‍चा भाषा का ज्ञान अर्जित कर लेता है. आप सब यह बात तो स्वीकार करेंगे ही कि जब बच्चा पहली कक्षा में प्रवेश लेता है और पहली बार स्कूल आता है तब भी उसे भाषा का इतना ज्ञान तो होता ही है कि वह आपस में और आपके साथ बातचीत कर सके. हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए कि हम इसी बातचीत को आगे बढ़ाते हुए उसमें धीरे-धीरे ऐसे शब्दों, वाक्यों आदि का समावेश करते चलें जो बच्चे को पहले से नहीं आते हैं.

भाषा सिखाने के लिए बातचीत करना सबसे महत्वपूर्ण है. कक्षा में बहुधा इससे ठीक उल्टी बात होती है. कक्षा में अक्‍सर बच्चों से चुप रहने के लिए कहा जाता है. पाठ्यपुस्तक के पाठ को दोहराते रहना रटंत की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है. पाठ को बिना समझे दोहराना नीरस भी होता है, और बच्‍चों को भाषा सीखने के लिये बिल्‍कुल भी प्रेरित नहीं करता. भाषा का उद्देश्‍य ही विचारों का संप्रेषण है. इसलिये जब तक बच्‍चों को सार्थक वार्तालाप के लिये उत्‍साहित और प्रेरित नहीं किया जायेगा तबतक उन्‍हें भाषा का शिक्षण रुचिकर नहीं लगेगा.

वर्णमाला और बारहखड़ी रटाने से कोई लाभ नही होता

भला सोचिये कि वर्णमाला या बारहखड़ी को रटना बच्‍चों के लिये कितना नीरस और दुष्‍कर कार्य है. बच्‍चे शायद यह सोचते होंगे कि इस प्रकार वर्णमाला और बरहखड़ी को रटने से कोई लाभ नहीं है, क्‍योंकि उनका उपयोग वे अपने वार्तालाप में नही करते हैं. क्या बेहतर यह नहीं होगा कि हम बच्चों से उन विषयों पर बात करें जो उन्‍हें रुचिकर लगते हैं, और इसी प्रक्रिया से हम उन्‍हें भाषा सिखायें. यह प्रक्रिया सामान्‍य रूप से समाज में भाषा सीखने की प्रक्रिया से मिलती-जुलती होगी और अधिक उपयोगी होगी. हम बच्‍चों से उनके उनके परिवार और परिवेश के संबंध में बात कर सकते हें. बच्‍चों से पूछें कि उन्होंने आज सुबह या कल क्या किया था, घर में भोजन क्या बना था, वे कौन से खेल खेलते हैं, आदि. इस प्रकार की बातें बच्चों के लिए रुचिकर होंगी और हर बच्चा बेहतर तरीके से कक्षा की गतिविधियों में भाग लकर भाषा सीख सकेगा. यह प्रक्रिया बच्चों को रटंत से दूर ले जाएगी.

कक्षा में मौखिक भाषा सिखाने के लिये कुछ गविधियों के सुझाव निम्‍नानुसार हैं -

  1. बच्चों से उनके परिवेश के बारे में प्रश्न करना.
  2. बच्चों से कहें कि वे एक दूसरे से उनके परिवार के बारे मे जानकारी लें और फिर कक्षा के समक्ष बताएं.
  3. बच्चों से कहा जाए कि वह कोई कहानी सुनाएं.
  4. बच्चों से किसी महापुरुष, किसी खेल, किसी त्योहार आदि के संबंध में बोलने के लिये कहा जाए.
  5. शिक्षक कक्षा में बच्चों को कोई कहानी सुनाएं और फिर उस कहानी के संबंध में प्रश्न करें.
  6. कक्षा की दीवारों पर लिखी कहानियों, आद‍ि का उपयोग भी बच्चों के साथ सार्थक बातचीत करने में किया जा सकता है.
  7. कक्षा की दीवारों पर बने चित्रों पर भी बातचीत की जा सकती है.
  8. हम कक्षा में कोई पोस्टर या मुस्कान लाइब्रेरी में उपलब्ध पुस्तकों लाकर उनके माध्यम से भी बच्चों से बातचीत कर सकते हैं.

भाषा के खेल

इन गतिविधियों को करने से हम बच्चों को रटंत से दूर ले जा सकेंगे. भाषा की बेहतर समझ बच्‍चों में विकसित होगी. धीरे-धीरे बच्चों के साथ भाषा के खेल भी खेले जा सकते हैं. उदाहरण के लिए समानार्थी और विरुध्‍दर्थी शब्‍दों के खेल. शब्दों का वाक्य में प्रयोग करने के खेल. मुहावरों आदि के खेल. स्‍क्रेबल जैसे खेल जिनके व्दारा बच्‍चों को शब्‍द बनाया सिखाया जा सकता है.

हावभाव और बॉडी लेंगुएज का महत्‍व

भाषा के मूर्त रूप को समझाने के लिए हमें बच्चों के साथ हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज के संबंध में भी बात करनी होगी. एक ही शब्द को अलग-अलग हावभाव और बॉडी लैंग्वेज के साथ बोलने पर उसके अर्थ अलग-अलग हो सकते हैं. उदाहरण के लिए यदि हम ‘अच्छा’ शब्द का उपयोग समान्‍य रूप से उपयोग करें तो उसका साधारण अर्थ है – ठीक, भला, उपयुक्‍त आदि, परंतु यदि हम ‘अच्छा’ शब्द का उच्चारण प्रश्नवाचक रूप में करें तो उसका अर्थ यह होगा कि‍ हम प्रश्‍न कर रहे हैं कि बताई गई बात सही है अथवा नहीं. इसी प्रकार हम ‘अच्छा’ शब्द को उच्चारण और हाव-भाव बदलकर व्यंग्‍यात्मक भी बना सकते हैं. आप समझ ही गये होंगे कि हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज से एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ निकल सकते हैं. इसलिये बच्‍चों को हाव-भाव ओर बॉडी लेंगुएज के बारे में सिखाना बहुत महत्‍वपूर्ण है.

उच्‍चारण और व्‍याकरण पर बहुत अधिक फोकस करने का विपरीत प्रभाव हो सकता है

मैने देखा है कि हम अक्‍सर कक्षा में बच्‍चों को सही उच्‍चारण सिखाने पर बहुत अधिक ध्‍यान देते हैं. दरअसल कौन सा उच्‍चारण सही है यह अपने आप में विवाद का विषय हो सकता है. उच्‍चारण बहुधा परिवेश के साथ बदल जाता है. हाल ही में मैं एक स्‍कूल में गया. वहां एक बच्‍चे के साथ बातचीत में मैने उसके पिता का नाम पूछा. बच्‍चे ने कहा कि उसके पिता का नाम ‘परेम’ है. वहां उपस्थि‍त शिक्षिका ने तत्‍काल बच्‍चे से कहा कि ‘परेम’ नहीं ‘प्रेम’ बोलो, परन्‍तु बच्‍चा लगातार ‘परेम’ ही बोलता रहा. मैने देखा कि वह बच्‍चा अन्‍य शब्‍दों का उच्‍चारण सही कर रहा था, परन्‍तु ‘प्रेम’ को ‘परेम’ ही बोल रहा था. तब मुझे लगा कि शायद उसके घर में उसके दादा-दादी उसके पिता को ‘परेम’ ही कहते होंगे, इसलिये उसे ‘परेम’ ही सही लगता है. आपने देखा होगा कि एक ही शब्‍द के उच्‍चारण अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग होते हैं. बिहार में अक्‍सर ‘ड़’ वर्ण का उच्‍चारण ‘र’ किया जाता है. इसी प्रकार अन्‍य प्रदेशों में भी उच्‍चारण बदल जाता है. मानक हिन्‍दी में मानक उच्‍चारण भी निर्धारित हैं, और शायद आगे की कक्षाओं में विद्यार्थी यह मानक उच्‍चारण सीख भी जायेंगे, परन्‍तु प्रारंभिक कक्षाओं में मानक उच्‍चारण पर बहुत अधिक आग्रह करने से भाषा सीखना अरुचिकर और कठिन हो सकता है. मेरा मानना है कि बच्‍चे को उसके परिवेश के अनुसार उच्‍चारण करने देना चाहिये, परन्‍तु शिक्षक जब बच्‍चे के साथ बात करें तो स्‍वयं मानक उच्‍चारण का ही प्रयोग करें. ऐसा करने से धीरे-धीरे बच्‍चा मानक उच्‍चारण सीख जायेगा. यही बात व्‍याकरण के लिये भी है. हमने भाषा का उपयोग करने के लिये व्‍याकरण के नियम नहीं रटे थे, बल्कि दूसरों से सुनकर हम स्‍वयमेव सही व्‍याकरण का उपयोग करने लगे. शिक्षक हर समय बच्‍चे को व्‍याकरण के नियम रटाने और उसकी बातचीत में टोका-टोकी करने का प्रयास न करें, परन्‍तु स्‍वयं सही व्‍याकरण का उपयोग कक्षा में की जाने बाली बातचीत में करें तो बच्‍चा स्‍वयं ही सही व्‍याकरण सीख जायेगा.

लिखित भाषा

मौखिक भाषा के साथ लिपि सिखाना आवश्‍यक है, जिससे बच्‍चा पुस्‍तकों में उपलब्‍ध ज्ञान के भंडार का उपयोग कर सके और स्‍वयं भी लिखकर अपने विचार सारे संसार तक पहुंचा सके. लिपि सीखने में पढ़ना और लिखना दोनो सि‍खाना होगा. इनके लिये भी बहुत सी तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है परंतु उनके बारे में अगली बार बात करेंगे.

अंत में आंकलनकर्ताओं से कुछ बात

छत्‍तीसगढ़ के स्‍कूलों में हम सबने मिलकर ‘सुघ्‍घर पढ़वइया’ योजना प्रारंभ की है. इस योजना के तहत आप अपने आस-पास के अन्‍य स्‍कूलों का आंकलन करने जायेंगे. मेरा आंकलनकर्ताओं से एक ही आग्रह है कि आंकलन का उद्देश्‍य फेल करना नही बलिक पास होने का अवसर प्रदान करना है. आंकलन करने वालों को सबसे पहले बच्‍चों से मित्रता करनी होगी, और उन्‍हें उनकी पसंद की गतिविधियां चुनने का अवसर देना होगा. ध्‍यान रखिये की इस सबके केन्‍द्र में बच्‍चे हैं, न कि हम सब. बच्‍चों से बात करें और फिर यह तय करें कि किस प्रकार की गितिविधि से आप बच्‍चों को वह करने के का अवसर दे पायेंगे जो वे कर सकते हैं. उदाहरण के लिये भाषा के आंकलन में एक गतिविधि सुझायी गयी है कि एक डब्‍बे में सभी बच्‍चों के नाम की पर्चियां डाल दें और फिर बच्‍चों से एक-एक पर्ची निकाल कर उसपर लिखा नाम पढ़ने को कहें और उस बच्‍चे के संबंध में कुछ बताने को कहें. इस गतिविधि में बच्‍चे के पास कोई ‘चॉइस’ नहीं है. हो सकता है कि बच्‍चा उस शब्‍द को न पढ़ पाये जो उस पर्ची पर लिखा है, या उस बच्‍चे के बारे में उसे विशेष जानकारी नही है इसलिये उसके बारे में वह कुछ न बोल पाये. इसके स्‍थान पर यह भी तो किया जा सकता है कि हम बच्‍चों से कक्षा में उपस्थित अपनी पसंद के किसी भी बच्‍चे के बारे में कुछ कहने के लिये कहें. इस प्रकार बच्‍चे को ‘चॉइस’ मिल जायेगी और शायद वह बेहतर प्रदर्शन कर पायेगा. य‍ह केवल एक उदा‍हरण है. तात्‍पर्य केवल इतना है कि आंकलनकर्ता मशीनी तरीके से उन्‍हें दी गई आंकलन पुस्तिका के टूल्‍स का उपयोग न करें, बल्कि उसके पीछे के भावार्थ को समझ कर बच्‍चों की वास्‍तविक क्षमताओं का आंकलन उन्‍हें अधिक से अघिक ‘चॉइस’ देकर करें. हमारा उद्देश्‍य बच्‍चों को फेल करना नही है बल्कि उन्‍हें बेहतर करने की प्रेरणा देना है.

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Comments :

Dr. Jaybharti Chandrakar SCERT C.G. Raipur On: 30/01/2023

आदरणीय सर जी, आपके हिंदी भाषा शिक्षण संबंधी विचार अत्यंत ही महत्वपूर्ण है और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह चिंतनीय है। *भाषा भावों और विचारों की अभिव्यक्ति है और विचारों के आदान-प्रदान का साधन है। भाषा ही एक ऐसा शस्त्र है,जिसकी समझ होने से हम अनेक विषयों को सीख सकते हैं और भाषा में यदि हम सक्षम होते हैं तो निश्चित ही अन्य विषयों में हमारी समझ बन जाती है इसलिए भाषा सीखनी बहुत ही जरूरी है।प्रारंभिक शिक्षा ही भाषा शिक्षण आधार है । * हमारे शिक्षक भाषा शिक्षण प्रारंभिक कक्षाओं में कर रहे किंतु यदि वे खेल आधारित गतिविधियों के माध्यम से खेल-खेल में प्रत्येक कौशलों हेतु रोचक गतिविधि बनाकर कक्षा शिक्षण करें तो निश्चित ही बच्चे सीखेंगे।साथ ही बच्चों की भाषायी दक्षता में समझ विकसित होगी और वे समझ के साथ सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना सीखने लगेंगे।

Dr. Jaybharti Chandrakar SCERT C.G. Raipur On: 30/01/2023

आदरणीय सर जी, आपके हिंदी भाषा शिक्षण संबंधी विचार अत्यंत ही महत्वपूर्ण है और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह चिंतनीय है। *भाषा भावों और विचारों की अभिव्यक्ति है और विचारों के आदान-प्रदान का साधन है। भाषा ही एक ऐसा शस्त्र है,जिसकी समझ होने से हम अनेक विषयों को सीख सकते हैं और भाषा में यदि हम सक्षम होते हैं तो निश्चित ही अन्य विषयों में हमारी समझ बन जाती है इसलिए भाषा सीखनी बहुत ही जरूरी है।प्रारंभिक शिक्षा ही भाषा शिक्षण आधार है । * हमारे शिक्षक भाषा शिक्षण प्रारंभिक कक्षाओं में कर रहे किंतु यदि वे खेल आधारित गतिविधियों के माध्यम से खेल-खेल में प्रत्येक कौशलों हेतु रोचक गतिविधि बनाकर कक्षा शिक्षण करें तो निश्चित ही बच्चे सीखेंगे।साथ ही बच्चों की भाषायी दक्षता में समझ विकसित होगी और वे समझ के साथ सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना सीखने लगेंगे।

Dr. Jaybharti Chandrakar SCERT C.G. Raipur On: 30/01/2023

आदरणीय सर जी, आपके हिंदी भाषा शिक्षण संबंधी विचार अत्यंत ही महत्वपूर्ण है और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह चिंतनीय है। *भाषा भावों और विचारों की अभिव्यक्ति है और विचारों के आदान-प्रदान का साधन है। भाषा ही एक ऐसा शस्त्र है,जिसकी समझ होने से हम अनेक विषयों को सीख सकते हैं और भाषा में यदि हम सक्षम होते हैं तो निश्चित ही अन्य विषयों में हमारी समझ बन जाती है इसलिए भाषा सीखनी बहुत ही जरूरी है।प्रारंभिक शिक्षा ही भाषा शिक्षण आधार है । * हमारे शिक्षक भाषा शिक्षण प्रारंभिक कक्षाओं में कर रहे किंतु यदि वे खेल आधारित गतिविधियों के माध्यम से खेल-खेल में प्रत्येक कौशलों हेतु रोचक गतिविधि बनाकर कक्षा शिक्षण करें तो निश्चित ही बच्चे सीखेंगे।साथ ही बच्चों की भाषायी दक्षता में समझ विकसित होगी और वे समझ के साथ सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना सीखने लगेंगे।

Vidya dange SCERT C .G Raipur On: 30/01/2023

//youtu.be/o8Z8qLsGb8E मौखिक भाषा विकास स्थानीय भाषा एवं परिवेश की सामग्री के आधार पर

नारायण प्रसाद साहू On: 30/01/2023

सादर नमस्कार इस लेख में भाषा सीखने के सारगर्भित सिद्धांतों से मैं सर्वथा सहमत हूं भाषा सीखने सिखाने की सरल प्रविधि में मूर्त से अमूर्त की ओर तथा अमूर्त से मूर्त की ओर बढ़ना वर्णमाला के माध्यम से विभिन्न परिभाषिक शब्दों का ज्ञान शब्द भंडार में वृद्धि करता है जिसके माध्यम से शब्द और वाक्य रचना की जटिलता समाप्त होती है और हम अनुच्छेद की यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न करवा पाते हैं भाषा सीखने की जिन दो स्वरूप क्रमशः लिखित एवं मौखिक की चर्चा की गई है वह वर्णमाला सीखने से ही प्रारंभ हो जाती है।

जी आर मंडावी,डाइट नारायणपुर On: 30/01/2023

आदरणीय महोदय सादर प्रणाम।आपका लेख निश्चित ही सारगर्भित है,बच्चों को बोलने अपने बात रखने का अधिक अवसर देने से बच्चों के साथ जुड़ाव प्रगाढ़ होगा।साथ ही अपनत्व का भाव ही बच्चों को सीखने सिखाने की प्रक्रिया में सहायक सिद्ध

G.R.Mandavi ,डाइट नारायणपुर On: 30/01/2023

आदरणीय सर प्रणाम। आपका लेख निश्चित ही सभी शिक्षकों

G.R.Mandavi ,डाइट नारायणपुर On: 30/01/2023

आदरणीय सर प्रणाम। आपका लेख निश्चित ही सभी शिक्षकों

G.R.Mandavi ,डाइट नारायणपुर On: 30/01/2023

आदरणीय सर प्रणाम। आपका लेख निश्चित ही सभी शिक्षकों

G.R.Mandavi ,डाइट नारायणपुर On: 30/01/2023

आदरणीय सर प्रणाम। आपका लेख निश्चित ही सभी शिक्षकों

G.R.Mandavi ,डाइट नारायणपुर On: 30/01/2023

आदरणीय सर प्रणाम। आपका लेख निश्चित ही सभी शिक्षकों

G.R.Mandavi ,डाइट नारायणपुर On: 30/01/2023

आदरणीय सर प्रणाम। आपका लेख निश्चित ही सभी शिक्षकों

विजय कुमार साहू On: 29/01/2023

सर जी सादर प्रणाम ! आपका लेख पढ़ा जो कि शिक्षण कार्य में हमारे लिए अत्यंत उपयोगी है । साथ ही प्रेरणादाई भी हम शिक्षण अधिगम की क्रिया में आपके सुझाए गए विधियों और तरीकों का उपयोग करते है जो की अत्यंत प्रभावी होता है। बच्चों के रुचि के अनुरूप उन्हें शिक्षण कार्य से जोड़े रखने से बच्चों को हम अधिक देर तक सीखने सीखने की क्रिया से जोड़े रख पाते हैं क्योंकि सीखने की क्रिया बच्चों के लिए अत्यंत जटिल और उबाउ होता है इसलिए हमे बीच बीच में अपने विधियों और तरीकों में बदलाव करते रहना होता है । इस तरह से हम हम अपने बच्चों के साथ सहज वातावरण बनाते हुए शिक्षण उद्देश्यों को पूरा कर पाने में सफल होते है। निरंतर आपके मार्गदर्शन और आर्शीवाद के लिए सादर आभार अभिनंदन...

विजय कुमार साहू On: 29/01/2023

सर जी सादर प्रणाम ! आपका लेख पढ़ा जो कि शिक्षण कार्य में हमारे लिए अत्यंत उपयोगी है । साथ ही प्रेरणादाई भी हम शिक्षण अधिगम की क्रिया में आपके सुझाए गए विधियों और तरीकों का उपयोग करते है जो की अत्यंत प्रभावी होता है। बच्चों के रुचि के अनुरूप उन्हें शिक्षण कार्य से जोड़े रखने से बच्चों को हम अधिक देर तक सीखने सीखने की क्रिया से जोड़े रख पाते हैं क्योंकि सीखने की क्रिया बच्चों के लिए अत्यंत जटिल और उबाउ होता है इसलिए हमे बीच बीच में अपने विधियों और तरीकों में बदलाव करते रहना होता है । इस तरह से हम हम अपने बच्चों के साथ सहज वातावरण बनाते हुए शिक्षण उद्देश्यों को पूरा कर पाने में सफल होते है। निरंतर आपके मार्गदर्शन और आर्शीवाद के लिए सादर आभार अभिनंदन...

विजय कुमार साहू On: 29/01/2023

सर जी सादर प्रणाम ! आपका लेख पढ़ा जो कि शिक्षण कार्य में हमारे लिए अत्यंत उपयोगी है । साथ ही प्रेरणादाई भी हम शिक्षण अधिगम की क्रिया में आपके सुझाए गए विधियों और तरीकों का उपयोग करते है जो की अत्यंत प्रभावी होता है। बच्चों के रुचि के अनुरूप उन्हें शिक्षण कार्य से जोड़े रखने से बच्चों को हम अधिक देर तक

Alka Shukla On: 29/01/2023

प्रिंट रिच वातावरण से भाषा सीखने की प्रक्रिया। आसन हो जाती है।कि शालाओ में प्रिंट रिच वातावरण तैयार किया गया है।उच्चारण संबंधी बिंदुओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।प्रारम्भिक अभ्यास अंत तक याद रहता है।उच्चारण त्रुटि पूर्ण होने पर बच्चा त्रुटि पूर्ण लिखता भी है।भयमुक्त वातावरण में शिक्षा देना अत्यंत आवश्यक है।भययुक्त वातावरण से भाषयी विकास, अभिव्यक्ति की क्षमता का अभावपया जाता है।भय मुक्त वातावरण बनानेके लिए शिक्षकों की बच्चों के विषयों में बातचीत करनी चाहिए ,उनके माता ,पिता, या आसपास के वातावरण के विषय मे चर्चा करनी चाहिये।ताकि बच्चे खुलकर अपबी बात रख सके ।भय युक्त वातावरण में बच्चे स्कूल आना पसंद नही करते।युक्त

Alka Shukla On: 29/01/2023

प्रिंट रिच वातावरण से भाषा सीखने की प्रक्रिया। आसन हो जाती है।कि शालाओ में प्रिंट रिच वातावरण तैयार किया गया है।उच्चारण संबंधी बिंदुओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।प्रारम्भिक अभ्यास अंत तक याद रहता है।उच्चारण त्रुटि पूर्ण होने पर बच्चा त्रुटि पूर्ण लिखता भी है।भयमुक्त वातावरण में शिक्षा देना अत्यंत आवश्यक है।भययुक्त वातावरण से भाषयी विकास, अभिव्यक्ति की क्षमता का अभावपया जाता है।भय मुक्त वातावरण बनानेके लिए शिक्षकों की बच्चों के विषयों में बातचीत करनी चाहिए ,उनके माता ,पिता, या आसपास के वातावरण के विषय मे चर्चा करनी चाहिये।ताकि बच्चे खुलकर अपबी बात रख सके ।भय युक्त वातावरण में बच्चे स्कूल आना पसंद नही करते।युक्त

Alka Shukla On: 29/01/2023

प्रिंट रिच वातावरण से भाषा सीखने की प्रक्रिया। आसन हो जाती है।कि शालाओ में प्रिंट रिच वातावरण तैयार किया गया है।उच्चारण संबंधी बिंदुओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।प्रारम्भिक अभ्यास अंत तक याद रहता है।उच्चारण त्रुटि पूर्ण होने पर बच्चा त्रुटि पूर्ण लिखता भी है।भयमुक्त वातावरण में शिक्षा देना अत्यंत आवश्यक है।भययुक्त वातावरण से भाषयी विकास, अभिव्यक्ति की क्षमता का अभावपया जाता है।भय मुक्त वातावरण बनानेके लिए शिक्षकों की बच्चों के विषयों में बातचीत करनी चाहिए ,उनके माता ,पिता, या आसपास के वातावरण के विषय मे चर्चा करनी चाहिये।ताकि बच्चे खुलकर अपबी बात रख सके ।भय युक्त वातावरण में बच्चे स्कूल आना पसंद नही करते।युक्त

Alka Shukla On: 29/01/2023

प्रिंट रिच वातावरण से भाषा सीखने की प्रक्रिया आसन हो जाती है।कि शालाओ में प्रिंट रिच वातावरण तैयार किया गया है।उच्चारण संबंधी बिंदुओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।प्रारम्भिक अभ्यास अंत तक याद रहता है।उच्चारण त्रुटि पूर्ण होने पर बच्चा त्रुटि पूर्ण लिखता भी है।भयमुक्त वातावरण में शिक्षा देना अत्यंत आवश्यक है।भययुक्त वातावरण से भाषयी विकास, अभिव्यक्ति की क्षमता का अभावपया जाता है।भय मुक्त वातावरण बनानेके लिए शिक्षकों की बच्चों के विषयों में बातचीत करनी चाहिए ,उनके माता ,पिता, या आसपास के वातावरण के विषय मे चर्चा करनी चाहिये।ताकि बच्चे खुलकर अपबी बात रख सके ।भय युक्त वातावरण में बच्चे स्कूल आना पसंद नही करते।युक्त

Alka Shukla On: 29/01/2023

मैंने शाला निरीक्षण के दौरान पाया किबच्चे सामूहिक दोहराव के दौरान वर्ण माला,और बढ़ खड़ी रात लेते है।लेकिन वर्णों की ओहचन कर पाना मुश्किल होता हैं।अतः समझ कर उच्चारण द्धारा वर्णो की पहचान करना रटने की प्रवृत्ति से अधिक उचित है।कक्षा में मौखिक भाषा सिखाने के लिये आपके द्वारा बताई गई गतिविधियों एवं सुझाव उचित है कक्षा अध्यापन के दौरान अनेक शालाओं के शिक्षकों द्वारा इसका समावेश किया जाता हैं।जैसे -कहानी, बच्चों के परिवेश के बारे में प्रश्न करना, त्यौहारों पर चर्चा, चित्रों पर चर्चा ।जी की उचित है।भाषा के खेल-सहायक शिक्षण सामग्री(कार्ड बोर्ड पर लिखे गए )वर्णो एवं शब्दो के द्वारा खेल खेल में भाषा सिखायी जाती हैवर्णो को जोड़कर शब्द बनाना,शब्दो को तोड़कर वर्णो की पहचान और शब्दों की पहचान कराई जाती हैं।इससे बच्चों को भाषा सीखने में आसानी होती है।शालाओ में प्रिंट रिच वातावरण बच्चों के भाषा विकास में अत्यंत आवश्यक है ।प्रिंट रिच वातावरण से भाषा सीखने की पई में ना

Alka Shukla On: 29/01/2023

आदरणीय महोदय आपके दिये गए ब्लॉग भाषा सीखने की वविधियाँ, भाषाके स्वरूप मौखिक औऱ लिखित, बच्चे कैसे सीखते हैं सकारात्मक हैं मौखिक भाषा मे बातचीत करना,कहानी सुनाना, कविता,आदि भाषा सीखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।इस बात से भी सहमत हूं कि वर्ण माला और बारह खड़ी रटना नीरस कार्य है।मैंने शाला निरीक्षण के दौरान पाया कि बच्चे सामूहिकशाला व करना द्वारा

Alka Shukla On: 29/01/2023

आदरणीय महोदय,आपके द्वारा दिये गए ब्लॉक भाषा सिखाने की विधियां, भाषा के स्वरूप,।मख

Alka Shukla On: 29/01/2023

आदरणीय महोदय,आपके द्वारा दिये गए ब्लॉक भाषा सिखाने की विधियां, भाषा के स्वरूप,।मख

SANTOSH KUMAR PATEL डाइट धरमजयगढ़ On: 29/01/2023

सरजी प्रणाम।आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ।हर बच्चे के लिए भाषा को अच्छे से सीखना बहुत आवश्यक है,क्योंकि बच्चा भाषा द्वारा रचे वातावरण में जीता और बड़ा होता है।अगर बच्चा भाषा को अच्छे से सीख जाए तो बाकी विषय को सीखना आसान हो सकता है।भाषा उपयोग द्वारा ही बेहतर सीखी जा सकती है अतः यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भाषा की कक्षा में भाषा का भरपूर उपयोग का अवसर बच्चे को मिल सके।भाषा के शिक्षक को यह भी ध्यान रखना है कि बच्चों के पास भाषा सीखने की असीम क्षमता होती है और भाषा समग्रता से सीखी जा सकती है टुकड़ो में नहीं।अतः सीखने के शुरुवाती दौर में व्याकरण और नियमों को सीखने पर जोर कम दें।बच्चे अपनी भाषा के व्याकरण और नियम स्वयं बना लेते हैं।वर्णमाला या शब्दों को रटाने की तुलना में सार्थक भाषाई गतिविधियों पर कक्षा में ज्यादा जोर हो।

S.sangeeta प्रा चार्य डाईट जशपुर से On: 28/01/2023

सर साधुवाद, चिंतन किया तो गिजुभाई जी की पढ़ी किताबों की याद आती है , आज तक का अनुभव यही कहता है कि 1* विचारधारा की सफ़लता जमीनी स्तर पर करने से होगी /2* सीखने और सिखाने में स्वतंत्रता

S.sangeeta प्रा चार्य डाईट जशपुर से On: 28/01/2023

सर साधुवाद, चिंतन किया तो गिजुभाई जी की पढ़ी किताबों की याद आती है , आज तक का अनुभव यही कहता है कि 1* विचारधारा की सफ़लता जमीनी स्तर पर करने से होगी /2* सीखने और सिखाने में स्वतंत्रता

S.sangeeta प्रा चार्य डाईट जशपुर से On: 28/01/2023

सर साधुवाद, चिंतन किया तो गिजुभाई जी की पढ़ी किताबों की याद आती है , आज तक का अनुभव यही कहता है कि 1* विचारधारा की सफ़लता जमीनी स्तर पर करने से होगी /2* सीखने और सिखाने में स्वतंत्रता

Ramhari Sharaf diet Korba On: 28/01/2023

बच्चा जन्म के पूर्व से ही ध्वनियों को अपनी माँ से सुनते रहता है और जन्म के साथ ही उसका परिचय इस भौतिक जगत से होता है अपने माता पिता ,दादा दादी भाई बहन की बातों को सुनकर दोहराना शुरु करता है और यहीं से मौखिक़ भाषा बोलना शुरु करता है।मेरे विचार से घर में भी प्रिंट रिच वातावरण के लिए अभिभावकों को प्रेरित करें और वे बच्चों से अधिक से अधिक उस पर बात करें जिससे बच्चा वस्तुओं को समझते हुए बोलना सीखे और जब बच्चा स्कूल की दुनियां में प्रवेश करे तो पुनः उसको एक ऐसा प्रिंट रिच वातावरण मिले जो उसकी मातृभाषा के साथ साथ पुस्तकीय भाषा मे भी लिखा हो।बच्चों चल शिक्षकों को उनके परिवेश के बारे मे अधिक से अधिक बातचीत करना चाहिए।जब बच्चा सुनकर बोलना सिख जाये तब शिक्षण सिद्धांत का प्रयोग करते हुए भाषा के शब्दावली से परिचय कराया जाना चाहिए ।इस प्रकार हम बच्चों मे भाषाई कौशल का विकास कर सकते हैँ और लक्ष्यों की प्राप्ति आसानी से कर सकते हैँ।

Rekharani jatwar On: 28/01/2023

बच्चे जब हमारे पास स्कूलों में सर्वप्रथमडरे,सहमे होते हैं इसलिए उनके अंदर से भय को दूर करने के लिए उनसे उनके संदर्भ से संबंधित सामान्य बातचीत जैसे पारिवारिक, सामाजिक, बच्चे की रूचि, पर्यावरण आदि से संबंधित बातें करेंगे तो बच्चे के अंदर जो भय छिपा है वह दूर होगा और बच्चे हमसे एवं स्कूल के परिवेश से बिना भय के जुड़ने लगेगा और इस प्रकार उनमें मौखिक भाषा का विकास होगा।जब बच्चे हमसे जुड़ जायेंगे तो हम भाषा के पेडागाजी की ओर लेजाते हुए चित्र,कविता, कहानियां एवं अन्य भाषाई खेल गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में भाषाई कौशल जैसे सुनना, बोलना, पढ़ ना,लिखना का विकास कर सकते हैं।ना

Rekharani jatwar On: 28/01/2023

बच्चे जब हमारे पास स्कूलों में सर्वप्रथमडरे,सहमे होते हैं इसलिए उनके अंदर से भय को दूर करने के लिए उनसे उनके संदर्भ से संबंधित सामान्य बातचीत जैसे पारिवारिक, सामाजिक, बच्चे की रूचि, पर्यावरण आदि से संबंधित बातें करेंगे तो बच्चे के अंदर जो भय छिपा है वह दूर होगा और बच्चे हमसे एवं स्कूल के परिवेश से बिना भय के जुड़ने लगेगा और इस प्रकार उनमें मौखिक भाषा का विकास होगा।जब बच्चे हमसे जुड़ जायेंगे तो हम भाषा के पेडागाजी की ओर लेजाते हुए चित्र,कविता, कहानियां एवं अन्य भाषाई खेल गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में भाषाई कौशल जैसे सुनना, बोलना, पढ़ ना,लिखना का विकास कर सकते हैं।ना

Rekharani jatwar On: 28/01/2023

बच्चे जब हमारे पास स्कूलों में सर्वप्रथमडरे,सहमे होते हैं इसलिए उनके अंदर से भय को दूर करने के लिए उनसे उनके संदर्भ से संबंधित सामान्य बातचीत जैसे पारिवारिक, सामाजिक, बच्चे की रूचि, पर्यावरण आदि से संबंधित बातें करेंगे तो बच्चे के अंदर जो भय छिपा है वह दूर होगा और बच्चे हमसे एवं स्कूल के परिवेश से बिना भय के जुड़ने लगेगा और इस प्रकार उनमें मौखिक भाषा का विकास होगा।जब बच्चे हमसे जुड़ जायेंगे तो हम भाषा के पेडागाजी की ओर लेजाते हुए चित्र,कविता, कहानियां एवं अन्य भाषाई खेल गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में भाषाई कौशल जैसे सुनना, बोलना, पढ़ना

Rekharani jatwar On: 28/01/2023

बच्चे जब हमारे पास स्कूलों में सर्वप्रथमडरे,सहमे होते हैं इसलिए उनके अंदर से भय को दूर करने के लिए उनसे उनके संदर्भ से संबंधित सामान्य बातचीत जैसे पारिवारिक, सामाजिक, बच्चे की रूचि, पर्यावरण आदि से संबंधित बातें करेंगे तो बच्चे के अंदर जो भय छिपा है वह दूर होगा और बच्चे हमसे एवं स्कूल के परिवेश से बिना भय के जुड़ने लगेगा और इस प्रकार उनमें मौखिक भाषा का विकास होगा।जब बच्चे हमसे जुड़ जायेंगे तो हम भाषा के पेडागाजी की ओर लेजाते हुए चित्र,कविता, कहानियां एवं अन्य भाषाई खेल गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में भाषाई कौशल जैसे सुनना, बोलना, पढ़ना

Rekharani jatwar On: 28/01/2023

बच्चे जब हमारे पास स्कूलों में सर्वप्रथम आते हैं तो डरे,सहमे होते हैं इसलिए उनके अंदर से भय को दूर करने के लिए उनसे उनके संदर्भ से संबंधित सामान्य बातचीत जैसे पारिवारिक, सामाजिक, बच्चे की रूचि, पर्यावरण आदि से संबंधित बातें करेंगे तो बच्चे के अंदर जो भय छिपा है वह दूर होगा और बच्चे हमसे एवं स्कूल के परिवेश से बिना भय के जुड़ने लगेगा और इस प्रकार उनमें मौखिक भाषा का विकास होगा।जब बच्चे हमसे जुड़ जायेंगे तो हम भाषा के पेडागाजी की ओर लेजाते हुए चित्र,कविता, कहानियां एवं अन्य भाषाई खेल गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में भाषाई कौशल जैसे सुनना, बोलना, पढ़ना

Aabha Singh DIET Pendra On: 28/01/2023

आदरणीय सर जी आपके विचारों से मैं सहमत हूँ।एक बच्चा जब विद्यालय आता है तो उसकी मौखिक भाषा संबधी पकड़ मजबूत होती है वह यह अच्छी तरह जानता है कि उसे बड़ों से कैसे बात करनी है छोटों से कैसे बात करनी वाक्य में कब कहाँ क्या परिवर्तन करना है वह अच्छी तरह जानता है यह सभी बातें अपने अनुभव से सीखता है।मौखिक भाषा को लिपि तक लाने में कठिनाई होती है।अतः बच्चे की भाषा को महत्व देते हुए सिखाने का प्रयास किया जाय वाक्य को शब्दों में तोड़ना शब्द को अक्षर में तोड़ना और जोड़ना सिखाया जाय तो सफलता मिलेगी।अर्थ सहित सीखने का अवसर दिया जाता है तो बच्चे ज्यादा सीखते हैं।

Aabha Singh DIET Pendra On: 28/01/2023

आदरणीय सर जी मैं आपके भाषा शिक्षण से संबंधित विचारों से से पूरी तरह सहमत हूँ। यह बात बिल्कुल सही है कि बच्चे को लिंग ,वचन ,काल आदिव्यक लिं

Aabha Singh DIET Pendra On: 28/01/2023

आदरणीय सर जी मैं आपके भाषा शिक्षण से संबंधित विचारों से से पूरी तरह सहमत हूँ। यह बात बिल्कुल सही है कि बच्चे को लिंग ,वचन ,काल आदिव्यक लिं

Aabha Singh DIET Pendra On: 28/01/2023

आदरणीय सर जी मैं आपके भाषा शिक्षण से संबंधित विचारों से से पूरी तरह सहमत हूँ। यह बात बिल्कुल सही है कि बच्चे को लिंग ,वचन ,काल आदिव्यक लिं

Laxmi malya On: 28/01/2023

बच्चों को उनके रुचि अनुरूप पठन पाठन और शिक्षण गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में सर्वांगीण विकास कर सकते हैं और बच्चों में जिज्ञासा पैदा करने के लिए खेल खेल के माध्यम से शाला में ठहराव ला सकते हैं

Laxmi malya On: 28/01/2023

बच्चों को उनके रुचि अनुरूप पठन पाठन और शिक्षण गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में सर्वांगीण विकास कर सकते हैं और बच्चों में जिज्ञासा पैदा करने के लिए खेल खेल के माध्यम से शाला में ठहराव ला सकते हैं

Laxmi malya On: 28/01/2023

बच्चों को उनके रुचि अनुरूप पठन पाठन और शिक्षण गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में सर्वांगीण विकास कर सकते हैं और बच्चों में जिज्ञासा पैदा करने के लिए खेल खेल के माध्यम से शाला में ठहराव ला सकते हैं

Laxmi malya On: 28/01/2023

बच्चों को उनके रुचि अनुरूप पठन पाठन और शिक्षण गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में सर्वांगीण विकास कर सकते हैं और बच्चों में जिज्ञासा पैदा करने के लिए खेल खेल के माध्यम से शाला में ठहराव ला सकते हैं

Laxmi malya On: 28/01/2023

बच्चों को उनके रुचि अनुरूप पठन पाठन और शिक्षण गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में सर्वांगीण विकास कर सकते हैं और बच्चों में जिज्ञासा पैदा करने के लिए खेल खेल के माध्यम से शाला में ठहराव ला सकते हैं

ओंकार नाथ तिवारी On: 28/01/2023

आदरणीय सर जी को प्रणाम आपके द्वारा बच्चों की शिक्षा हेतु भाषा शिक्षा एवं उसकी विधियों के संबंध में उद्धृत विचार अत्यंत ही उपयोगी एवं अनुकरणीय है निश्चित रूप से सभी विषयों का ज्ञान रखने एवम जानकारी के लिए भाषा शिक्षण बहुत आवश्यक है क्योंकि सभी विषयों के लेखन का माध्यम भाषा ही है इसलिए बच्चों को भयमुक्त होकर अधिक से अधिक क्रियात्मक विधि के एवम प्रयोगात्मक विधि के माध्यम से भयमुक्त होकर भाषा के प्रयोग एवं उपयोग पर जोर देना चाहिए भाषा सिखाते समय बच्चों को भयमुक्त होकर अपनी बातों को कहने का अवसर प्रदान करना चाहिए और अपने विचारों को शुद्ध भाषा में मानक भाषा में व्यक्त करते हुए बच्चों की मातृभाषा के साथ मानक भाषा में भी शिक्षण की व्यवस्था अत्यंत ही उपयोगी होगी आपका विचार अत्यंत ही सार्थक एवं उपयोगी है हम इस पर ही कार्य कर रहे हैं भविष्य में भी आपके विचारों के अनुरूप एवं सुझाव भाषा शिक्षण पर और भी अधिक प्रयास करेंगे हमारे संस्थाओं में बहु भाषा शिक्षण के माध्यम से इस पर अनेक प्रशिक्षण आयोजित किए गए हैं जिस पर हमने विद्यालय के शिक्षकों को भाषा शिक्षण के लिए बच्चों को सीखने की क्षमता विकसित करने के लिए अधिक से अधिक प्रयास करने हेतु कहा है धन्यवाद

ओंकार नाथ तिवारी On: 28/01/2023

आदरणीय आदरणीय सर जी को प्रणाम l भाषा एवं भाषा शिक्षण की उपयोगिता एवं महत्ता पर आपके विचार उपयोगी एवं अनुकरणीय है वास्तव में बच्चा अपनी प्रारंभिक भाषा अपने परिवार एवं आसपास के परिवेश से ही सीखता है जिसमें कहीं से भी ध्वनि वर्ण एवं व्याकरण की शिक्षा नहीं दी जाती है फिर भी बच्चा सुनकर सही ध्वनि और व्याकरण सम्मत भाषा का ही प्रयोग करता है वर्तमान समय में बच्चों को भाषा का ज्ञान सिखाने के लिए आपके द्वारा सुझाई गई विधि और उपाय उपयुक्त है जिसमें बच्चा भयमुक्त होकर भाषा को सीखता है अनेक प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से वह नई-नई बातों के माध्यम से शब्दों एवम वाक्यों को सीखता है और इसी से से

ओंकार नाथ तिवारी On: 28/01/2023

आदरणीय आदरणीय सर जी को प्रणाम l भाषा एवं भाषा शिक्षण की उपयोगिता एवं महत्ता पर आपके विचार उपयोगी एवं अनुकरणीय है वास्तव में बच्चा अपनी प्रारंभिक भाषा अपने परिवार एवं आसपास के परिवेश से ही सीखता है जिसमें कहीं से भी ध्वनि वर्ण एवं व्याकरण की शिक्षा नहीं दी जाती है फिर भी बच्चा सुनकर सही ध्वनि और व्याकरण सम्मत भाषा का ही प्रयोग करता है वर्तमान समय में बच्चों को भाषा का ज्ञान सिखाने के लिए आपके द्वारा सुझाई गई विधि और उपाय उपयुक्त है जिसमें बच्चा भयमुक्त होकर भाषा को सीखता है अनेक प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से वह नई-नई बातों के माध्यम से शब्दों एवम वाक्यों को सीखता है और इसी से से

जे पी पुष्प डाइट पेंड्रा On: 28/01/2023

आपके विचारो से पूर्णतः सहमत इसी विचारों और भावनाओं पर आधारित प्रारंभिक क्लास का पाठ्यक्रम भी बना है परन्तु शिक्षक जिस पेटर्न पर पढ़ कर आया है उस पेटर्न में ही कमफोर्ट महाशुस करता है टीचर्स को इस कांसेप्ट को अपनाना ही होगा ताकि भाषा को सीखने की प्रक्रिया तेज गति से हो उनके घर के भाषा को ही आगे बढ़ाते हुए लिपि को उन शब्दों में खोजना और उच्चारण करना सीखा दे जैसे घर किन किन अक्षरों से मिलकर बना है कप का उच्चारण जो उनकी घर का भाषा है उसे ही उच्चारण पूर्ण जोड़ना तोड़ना सीखा दे विभिन्न गतिविधि और है भाव से इतना कर ले तो समस्या हल हो सकती है जब लिपि को अपने घर के भाषा बोली से जोड़ लेता है तो उसे भाषा को समझ भाषा की लेखन दोनो आ जायेगी

Manoj ranghati diet Narayanpur On: 28/01/2023

आदरणीय सर प्रणाम आपके अनुभव की बातों से हमें प्रोत्साहन मिला और हमें बच्चों की मातृभाषा को लेकर और उनसे आपसे बातचीत कर एक मित्रता पूर्ण व्यवहार कर एक सुखद पारिवारिक वातावरण हम उनको प्रदान कर सकें साथ ही साथ उन बच्चों की परिवार में रहते हुए बहुत सारी जो बातें वह सीख चुके हैं उन बातों से उन अनुभवों से उनके सीखने के अवसरों को हम साझा करें उनके साथ परिवेश वातावरण के अनगिनत चीजों से जो बच्चे परिचित है उनसे मित्रता पूर्ण व्यवहार कर हम बच्चों में अभिव्यक्ति क्षमता का अवसर प्रदान कर सकते हैं छोटी-छोटी गीत कविताओं कहानियों आदि के माध्यम से चित्र आधारित कठपुतली प्रदर्शन विधि आदि के माध्यम से उन बच्चों में झिझक दूर करते हुए उनकी अभिव्यक्ति सीखने के कौशल को हम बढ़ावा दे सकते हैं और भाषा सीखने की गति को हम नई दिशा प्रदान कर सकते हैंरिक

Manoj ranghati diet Narayanpur On: 28/01/2023

आदरणीय सर प्रणाम आपके अनुभव की बातों से हमें बहुत प्रोत्साहन । और हम बच्चों की मात्रिभाषा को लेकर उन बच्चों के आपसी बातचीत को सुनकर और उन्हें विभिन्न तरीके से हम उनसे घुलमिल कर बातचीत कर उनसे मित्रता पूर्ण व्यवहार कर हम उन बच्चों को एक पारिवारिक वातावरण हम प्रदान कर सकते हैं और एक अच्छा परिवेश हम तैयार कर सकते हैं ताकि बच्चे उस परिवेश में अपने आपको सुखद महसूस कर सकें और उन बच्चों में परिवेश वातावरण ला

Sarita Dubba On: 28/01/2023

आदरणीय सर यहां पर जो भी अनुभव बातें साझा की गई है ,वह सब बातें सराहनीय है । जिन परिस्थितियों में बच्चों के घर की भाषा स्कूल की भाषा से अलग हो या बच्चे स्कूल की औपचारिक भाषा अच्छी तरह नहीं समझते हो, बच्चों को अपनी भाषा में बोलने के लिए प्रोत्साहन मिलना चाहिए । क्योंकि, भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है,ंबच्चों को समग्र व धाराप्रवाह बोलने का मौका मिलना चाहिए । बच्चे शुरू में अपनी भाषा में ज्यादा बोले, उसमें हिंदी के शब्दों का कुछ इस्तेमाल हो, फिर धीरे-धीरे हिंदी का इस्तेमाल ज्यादा होता जाए।, शुरुआत में अगर जोर शुद्धता पर ज्यादा दिया जाए तो बच्चे डर डर कर ,अटक अटक कर बोलेंगे, यह सोच कर कि कहीं गलती ना हो जाए। बच्चों को स्कूली भाषा में सरल और आसानी से समझ में आने वाले संदर्भ में बहुत बातचीत सुनने को मिले। जहां जरूरत हो,साथ में बच्चों के घर की भाषा का इस्तेमाल हो। प्रारंभिक कक्षाओं में इन सभी विषयों जैसे पर्यावरण,गणित आदि के सीखने में भाषा केंद्र भूमिका निभाती है

K.C.Gupta On: 27/01/2023

आदरणीय सर को प्रणाम, सर आपके द्वारा ब्लॉग में भाषा सीखने की विधियां एवं भाषा का मौलिक और मूर्त रूप में व्यक्त चिंतन से हम सभी शिक्षकों को एक नई सोच प्रदान की है विद्यालयों के निरीक्षण के दौरान हम सभी डाइट के अकादमिक सदस्य इन विषयों पर विद्यालयों के शिक्षकों से चर्चा तो करते थे परंतु आपके विचारों के अनुसार अब हमें प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा के संबंध में नए विचार प्रदान किए जिसका हम सभी डाइट के अकादमी सदस्य इस दिशा में कार्य करेंगे और आगे भी आपके दिए निर्देशों का पालन ग्राउंड स्तर पर करते रहेंगे।

K.C.Gupta On: 27/01/2023

आदरणीय सर को प्रणाम, सर आपके द्वारा ब्लॉग में भाषा सीखने की विधियां एवं भाषा का मौलिक और मूर्त रूप में व्यक्त चिंतन से हम सभी शिक्षकों को एक नई सोच प्रदान की है विद्यालयों के निरीक्षण के दौरान हम सभी डाइट के अकादमिक सदस्य इन विषयों पर विद्यालयों के शिक्षकों से चर्चा तो करते थे परंतु आपके विचारों के अनुसार अब हमें प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा के संबंध में नए विचार प्रदान किए जिसका हम सभी डाइट के अकादमी सदस्य इस दिशा में कार्य करेंगे और आगे भी आपके दिए निर्देशों का पालन ग्राउंड स्तर पर करते रहेंगे।

K.C.Gupta On: 27/01/2023

आदरणीय सर को प्रणाम, सर आपके द्वारा ब्लॉग में भाषा सीखने की विधियां एवं भाषा का मौलिक और मूर्त रूप में व्यक्त चिंतन से हम सभी शिक्षकों को एक नई सोच प्रदान की है विद्यालयों के निरीक्षण के दौरान हम सभी डाइट के अकादमिक सदस्य इन विषयों पर विद्यालयों के शिक्षकों से चर्चा तो करते थे परंतु आपके विचारों के अनुसार अब हमें प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा के संबंध में नए विचार प्रदान किए जिसका हम सभी डाइट के अकादमी सदस्य इस दिशा में कार्य करेंगे और आगे भी आपके दिए निर्देशों का पालन ग्राउंड स्तर पर करते रहेंगे।

Arifhussain Siddiqui On: 27/01/2023

बच्चों को विशेषकर का प्रारंभिक स्तर की कक्षाओं में संवाद द्वारा छत्तीसगढ़ी मातृभाषा के आधार उनके जीवन से जुड़े रोल प्ले द्वारा स्वतंत्र रुप से व इसके पश्चात क्रमशः उच्चारण व आयु अनुरूप वर्तनी सुधार कर लेखन कौशल कवर करते करते भाषा सुधार के भाषा सुधार कर चारों कौशलों को शनै: शनै प्राप्त किया जा सकता है इससे कम अवधि में ही छोटी कक्षाओं में सीखने सिखाने के लिए महत्वपूर्ण गीत गतिविधि व एकांकी युक्त खेल स्मरण शक्ति बढ़ाने के साथ साथ जीवन भर के लिए स्थायी सीखना होता है , मुझे अपनी प्रारम्भिक कक्षा 5 वीं की सहायक वाचन पुस्तक की एकांकी शिशुपाल का वध के सारे संवाद आज तक भलिभांति प्रकार से याद है ंंऔर उस समय से ही बिना वर्तनी मिस्टेक के लिखते बनते हैं बालवाड़ी के 5 कार्नर में कम से कम एक कार्नर इस पर नाटक कोना इस पर अवश्य होना चाहिए इस आयु समूह के बच्चे बिना सिखाते ही बड़े से रूचि ले लेकर अपने घर पड़ोस व पर्यावरण से जुड़े पात्रों का बड़ा मनोहारी व ज्वलंत अभिनय करते हैं अंग्रेजी भाषा शिक्षण में भी इसके ग्रामर व वोकेब को रोल प्संले प्रेषण व पजल गेम द्वारा रुचिपूर्च स्थायी व प्रभाव कारी ढंग से भाषा शिक्षण में सहजता से सिखाया जा सकता है ।

Arifhussain Siddiqui On: 27/01/2023

बच्चों को विशेषकर का प्रारंभिक स्तर की कक्षाओं में संवाद द्वारा छत्तीसगढ़ी मातृभाषा के आधार उनके जीवन से जुड़े रोल प्ले द्वारा स्वतंत्र रुप से व इसके पश्चात क्रमशः उच्चारण व आयु अनुरूप वर्तनी सुधार कर लेखन कौशल कवर करते करते भाषा सुधार के भाषा सुधार कर चारों कौशलों को शनै: शनै प्राप्त किया जा सकता है इससे कम अवधि में ही छोटी कक्षाओं में सीखने सिखाने के लिए महत्वपूर्ण गीत गतिविधि व एकांकी युक्त खेल स्मरण शक्ति बढ़ाने के साथ साथ जीवन भर के लिए स्थायी सीखना होता है , मुझे अपनी प्रारम्भिक कक्षा 5 वीं की सहायक वाचन पुस्तक की एकांकी शिशुपाल का वध के सारे संवाद आज तक भलिभांति प्रकार से याद है ंंऔर उस समय से ही बिना वर्तनी मिस्टेक के लिखते बनते हैं बालवाड़ी के 5 कार्नर में कम से कम एक कार्नर इस पर नाटक कोना इस पर अवश्य होना चाहिए इस आयु समूह के बच्चे बिना सिखाते ही बड़े से रूचि ले लेकर अपने घर पड़ोस व पर्यावरण से जुड़े पात्रों का बड़ा मनोहारी व ज्वलंत अभिनय करते हैं अंग्रेजी भाषा शिक्षण में भी इसके ग्रामर व वोकेब को रोल प्संले प्रेषण व पजल गेम द्वारा रुचिपूर्च स्थायी व प्रभाव कारी ढंग से भाषा शिक्षण में सहजता से सिखाया जा सकता है ।

Arifhussain Siddiqui On: 27/01/2023

बच्चों को विशेषकर का प्रारंभिक स्तर की कक्षाओं में संवाद द्वारा छत्तीसगढ़ी मातृभाषा के आधार उनके जीवन से जुड़े रोल प्ले द्वारा स्वतंत्र रुप से व इसके पश्चात क्रमशः उच्चारण व आयु अनुरूप वर्तनी सुधार कर लेखन कौशल कवर करते करते भाषा सुधार के भाषा सुधार कर चारों कौशलों को शनै: शनै प्राप्त किया जा सकता है इससे कम अवधि में ही छोटी कक्षाओं में सीखने सिखाने के लिए महत्वपूर्ण गीत गतिविधि व एकांकी युक्त खेल स्मरण शक्ति बढ़ाने के साथ साथ जीवन भर के लिए स्थायी सीखना होता है , मुझे अपनी प्रारम्भिक कक्षा 5 वीं की सहायक वाचन पुस्तक की एकांकी शिशुपाल का वध के सारे संवाद आज तक भलिभांति प्रकार से याद है ंंऔर उस समय से ही बिना वर्तनी मिस्टेक के लिखते बनते हैं बालवाड़ी के 5 कार्नर में कम से कम एक कार्नर इस पर नाटक कोना इस पर अवश्य होना चाहिए इस आयु समूह के बच्चे बिना सिखाते ही बड़े से रूचि ले लेकर अपने घर पड़ोस व पर्यावरण से जुड़े पात्रों का बड़ा मनोहारी व ज्वलंत अभिनय करते हैं अंग्रेजी भाषा शिक्षण में भी इसके ग्रामर व वोकेब को रोल प्संले प्रेषण व पजल गेम द्वारा रुचिपूर्च स्थायी व प्रभाव कारी ढंग से भाषा शिक्षण में सहजता से सिखाया जा सकता है ।

Arifhussain Siddiqui On: 27/01/2023

बच्चों को विशेषकर का प्रारंभिक स्तर की कक्षाओं में संवाद द्वारा छत्तीसगढ़ी मातृभाषा के आधार उनके जीवन से जुड़े रोल प्ले द्वारा स्वतंत्र रुप से व इसके पश्चात क्रमशः उच्चारण व आयु अनुरूप वर्तनी सुधार कर लेखन कौशल कवर करते करते भाषा सुधार के भाषा सुधार कर चारों कौशलों को शनै: शनै प्राप्त किया जा सकता है इससे कम अवधि में ही छोटी कक्षाओं में सीखने सिखाने के लिए महत्वपूर्ण गीत गतिविधि व एकांकी युक्त खेल स्मरण शक्ति बढ़ाने के साथ साथ जीवन भर के लिए स्थायी सीखना होता है , मुझे अपनी प्रारम्भिक कक्षा 5 वीं की सहायक वाचन पुस्तक की एकांकी शिशुपाल का वध के सारे संवाद आज तक भलिभांति प्रकार से याद है ंंऔर उस समय से ही बिना वर्तनी मिस्टेक के लिखते बनते हैं बालवाड़ी के 5 कार्नर में कम से कम एक कार्नर इस पर नाटक कोना इस पर अवश्य होना चाहिए इस आयु समूह के बच्चे बिना सिखाते ही बड़े से रूचि ले लेकर अपने घर पड़ोस व पर्यावरण से जुड़े पात्रों का बड़ा मनोहारी व ज्वलंत अभिनय करते हैं अंग्रेजी भाषा शिक्षण में भी इसके ग्रामर व वोकेब को रोल प्संले प्रेषण व पजल गेम द्वारा रुचिपूर्च स्थायी व प्रभाव कारी ढंग से भाषा शिक्षण में सहजता से सिखाया जा सकता है । कहानी पर जाएगी द्वारा संवादों और गतिविधि के दौरान ही सुख सुधार कर बाद में पड़ोसी खाजाना ज्यादा प्रभाव कारी व स्थाई होता है

Arif hussain Siddiqui On: 27/01/2023

बच्चों को स्तरानुरुप प्रारांभिक स्तर की शालाओं में जीवन से जुड़े पात्रों की संवाद अदायगी द्वारा बिना औपचारिक शिक्षण के स्वतंत्र रूप से और कक्षा में गतिविधि और रोल प्ले के माध्यम से पढ़ाना ज्यादा प्रभावकारी व स्थायी होता है इस गतिविधि के माध्यम से सिखाना ज्यादा प्रभावकारी रहता है

Arif hussain Siddiqui On: 27/01/2023

बच्चों को स्तरानुरुप प्रारांभिक स्तर की शालाओं में जीवन से जुड़े पात्रों की संवाद अदायगी द्वारा बिना औपचारिक शिक्षण के स्वतंत्र रूप से और कक्षा में गतिविधि और रोल प्ले के माध्यम से पढ़ाना ज्यादा प्रभावकारी व स्थायी होता है इस गतिविधि के माध्यम से सिखाना ज्यादा प्रभावकारी रहता है

Sushil Rathod On: 26/01/2023

आदरणीय सर, आपके ब्लॉग हमेशा ही शिक्षक को अध्ययनशील एवं मननशील होने की प्रेरणा देते हैं और प्रदेश के शिक्षकों को अपनी प्रतिक्रिया के अवसर भी देते हैं। शैक्षिक चेतना से शिक्षकों को जोड़े रखने के आपके सतत प्रयासों को नमन। आदर्श स्थिति तो यही होगी कि यदि विद्यार्थी की मातृभाषा का एक विषय के रुप में अध्यापन किया जाय एवं उसकी मातृभाषा में ही सारे विषयों का अध्यापन किया जाए किंतु यह व्यावहारिक तौर पर इतना सरल नहीं है। जनगणना 2011 के आंकड़े बताते हैं कि पूरे देश में 1369 मातृभाषाएं है जिनमें मुख्य भाषाएं 122 हैं तथा इनमें से केवल 36 भाषाएं ही शालाओं में पढ़ाने का माध्यम हैं। देश में 35% विद्यार्थी उस माध्यम में पढ़ाई करते हैं जिसे वे बिल्कुल नहीं समझते हैं। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यदि बात करें तो यहाँ करीब 93 से अधिक भाषाएँ या उनकी किस्में बोली जाती हैं। राज्य की प्राथमिक शालाओं के करीब 5% बच्चे ही घर में हिंदी बोलते हैं जबकि 95% से अधिक बच्चों की घर की भाषा शाला में पढाई जाने वाली भाषा से भिन्न है। अब यदि विद्यार्थी की मातृभाषा के स्थान पर किसी अन्य भाषा का अध्यापन किया जा रहा है तो पढ़ाई जाने वाली भाषा द्वितीय भाषा होगी और यदि हमारी यह अपेक्षा है कि विद्यार्थी के सोचने और बोलने का प्रवाह उसकी मातृभाषा जैसा ही हो तो भाषा सीखने का स्वाभाविक रूप भाषा अर्जन जैसा ही होना चाहिए जो कि अचेतन (subconscious), अनौपचारिक और भयमुक्त होता है। भाषा अर्जन की पहली शर्त है कि वह भाषा जिसे विद्यार्थी को सीखना है, उसके वातावरण एवं व्यवहार में उसी तरह विद्यमान हो जैसे उसकी मातृभाषा घर में है.। यदि ऐसा नहीं है तो एक नयी भाषा में विद्यार्थी की स्व अभिव्यक्ति सशक्त होना बेहद कठिन है और उसके rote learning पर शिफ्ट होने की आशंका बहुत अधिक है।. यदि स्कूल की भाषा उसके घर या परिवेश की भाषा है तो उसे सीखना सहज होता है। हमारे छत्तीसगढ़ राज्य में अधिकांश शालाएं हिंदी माध्यम की हैं और कुछ अंग्रेजी माध्यम की। हम भलीभांति जानते हैं कि विद्यालय और पाठ्यपुस्तकों की भाषा विद्यार्थी के घर और परिवेश की भाषा नहीं है तो यह आवश्यक होगा कि हम सबसे पहले विद्यार्थी में लक्ष्य भाषा के प्रति रूचि पैदा करें, उन्हें ज्यादा से ज्यादा लक्ष्य भाषा (हिंदी/अंग्रेजी) सुनने के अवसर उपलब्ध कराएं और वह भी कुछ इस तरीके से हो कि बच्चों के लिए रुचिकर एवं आकर्षक हो। मुझे लगता है कि विद्यार्थी को प्रारंभिक कक्षाओं में प्रथम दो तीन माह, केवल लक्ष्य भाषा में ही, उसकी आयु एवं रुचि अनुरूप कार्टून फ़िल्में दिखाई जानी चाहिए, कहानियां, कवितायेँ, गीत सुनाएँ जाने चाहिए, चित्र दिखाए जाने चाहिए तथा इन सभी पर अनौपचारिक चर्चा की जानी चाहिए, विद्यार्थियों को लक्ष्य भाषा निर्देश युक्त खेल खिलाएं जाने चाहिए इसके बाद ही पाठ्यपुस्तक और औपचारिक शिक्षण पर आना चाहिए। समय सारणी में भाषा के लिए अन्य विषयों की तुलना में ज्यादा समय दिया जाना चाहिए क्योंकि भाषा की समझ अन्य विषयों में भी विद्यार्थी के प्रदर्शन को प्रभावित करती है। शिक्षक से उच्चारण, व्याकरण सम्बन्धी भाषाई शुद्धता निश्चित ही अपेक्षित है क्योंकि देश के असंख्य विद्यार्थियों के लिए वह आज भी सीखने का वह एक मात्र स्त्रोत है, यदि शिक्षक ‘श’ एवं ‘ष’ को ‘स’ उच्चारित करता रहा तो बच्चे इसे किससे और कहाँ सीखेंगे। शिक्षक लक्ष्य भाषा में ही विद्यार्थियों से बात करें किंतु विद्यार्थी के अपनी भाषा में दिए गए responses को पूरी सहजता से स्वीकार करें। बहुत आवश्यक हो तो विद्यार्थी की भाषा में भी बात करें ताकि संवाद टूटने न पाएं परन्तु ऐसा ना हो कि स्त्रोत भाषा (बच्चे की मातृभाषा या घर की भाषा) अधिकतम और लक्ष्य भाषा (पाठ्यपुस्तक की भाषा) न्यूनतम हो जाए। बच्चे तो पेड़, पशु, पक्षी, सभी से बात करते हैं, बच्चे उन बच्चों के साथ भी खेल लेते हैं जो उनकी भाषा नहीं समझते हैं. यदि शिक्षक मित्रवत है तो लक्ष्य भाषा में शिक्षक का बात करना कहीं भी बाधा नहीं बनेगा. बच्चों को सुनने में केवल शिक्षक अपनी दिलचस्पी दिखाएं। विद्यार्थी को कभी भी ऐसा नहीं लगना चाहिए कि लक्ष्य भाषा को न जानना, या ना बोल पाना कहीं कोई बड़ी बाधा है। स्टीफन क्रैशन के द्वितीय भाषा अर्जन के सिद्धांत अंतर्गत पांच परिकल्पनाओं में से एक है Affective Filter Hypothesis यही बात कहती है कि जब विद्यार्थी का anxiety level कम तथा motivation ऊंचा होगा तो ही विद्यार्थी का आत्मविश्वास बढ़ता है, उसके मन में स्वयं की अच्छी self image बनती है और वह भाषा अर्जन कर पाता है। अतः शिक्षक निःसंदेह सही उच्चारण, व्याकरण के साथ बात करें किंतु विद्यार्थी को अपनी बात कहने के दौरान इन त्रुटियों पर बार बार टोके नहीं और ना ही इसके लिए डांट डपट करें। बच्चा 6 वर्ष की उम्र में अपनी भाषा में advanced fluency के साथ कक्षा पहिली में प्रवेश लेता है। बच्चे के घर की भाषा एक संसाधन है और हमें उसकी विचार प्रक्रिया और अभिव्यक्ति को बाधित नहीं करना है। यदि हमारा व्यव्हार उसके आत्मविश्वास को बढ़ने वाला रहा तो बच्चा लक्ष्य भाषा को सीख ही लेगा। प्रारंभिक कक्षाओं में सीधे वर्णमाला, गिनती से अध्यापन की शुरुआत करना विद्यार्थियों में पढाई के प्रति अरुचि पैदा करना है क्योंकि वर्णमाला के अक्षर, बारहखड़ी, अंक संकेत हैं और बिना सन्दर्भ के अमूर्त हैं. अतः इसे घंटो घंटो रटवाना शिक्षण की पूरी प्रक्रिया को बोझिल और अरुचिकर बनाना है। हमें आवश्यकता है हिंदी शिक्षण में आए नये approach पर समझ बनाने की। बच्चा जब कक्षा पहिली में आता है तो वह native speakers जैसी advanced fluency के साथ आता है इसलिए भाषा के चारो कौशल पर एक साथ काम किया जाना या integrated approach को ही अपनाया जाना चाहिए। समस्या तब आती है जब हम अ, आ, इ, ई को पढ़ने लिखने को ही पठन कौशल मानते हैं जबकि को reading की शुरुआत अपने चारों ओर विद्यमान वस्तुओं, चित्रों को देखकर समझने से होती है और वहीँ लेखन की शुरुआत दीवाल, रेत, कागज़ पर scrubbling (गोदागादी) से होती है। बच्चे से यदि आप पूछे उसने क्या लिखा या बनाया है तो उसके पास हमेशा उत्तर होगा। आवश्यकता हमें ही है उसे समझने और स्वीकार करने की। हमारे प्रदेश में 65% से अधिक प्राथमिक स्तर के विद्यार्थी छत्तीसगढ़ी बोलते हैं जो कि हिंदी का अपभ्रंश या इसके निकट मानी जाती है। यह हमारे लिए एक plus point है यदि हम हिंदी शिक्षण की प्रारंभिक कक्षाओं में शुरुआत सही ढंग से कर सकें। विश्वास है कि आने वाले समय में ASER, NAS जैसे देश के विश्वसनीय शैक्षणिक सर्वे जो की एक तरह से आईना है, उसमें हम अपने प्रयासों की सुन्दर तस्वीर देख पायेंगे। सुशील राठोड़, SCERT, Chhattisgarh

Dr. Yogesh Sheohare, Additional Director, SCERT, Chhattisgarh On: 25/01/2023

आदरणीय सर, आपके द्वारा लिखे गए ब्लॉग ‘भाषा सिखाने की विधियाँ - भाषा का मौखिक और मूर्त रूप’ में व्यक्त चिंतन सकारात्मक है | आपके द्वारा हिंदी शिक्षण पर की गई बात पेडागाजी आधारित है| राज्य शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा सृजित पाठ्यपुस्तकें शिक्षणशास्त्र पर आधारित हैं | पुस्तकों के सृजन पश्चात शिक्षकों को समय-समय पर पाठ्यपुस्तक आधारित प्रशिक्षण भी दिया जाता है, जिसमें पेडागाजी का ध्यान अवश्य रखा जाता है परंतु अधिकतर शिक्षक अंततः अपनी ही समझ के अनुसार कक्षा अध्यापन करते हैं | अत: शिक्षणशास्त्र आधारित भाषा संदर्शिका निर्माण कर नए सिरे से प्रशिक्षण पर विचार किया जाना आवश्यक है | इस विषय पर आपके ब्लॉग को केंद्र में रखते हुए एस.सी.ई.आर.टी., शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय रायपुर एवं डाइट रायपुर के अकादमिक सदस्यों के द्वारा चर्चा की गई जिसका विवरण अवलोकनार्थ सादर प्रस्तुत है | प्राथमिक शालाओं में भाषा का शिक्षण शास्त्र किस तरह ब्लॉग के तथ्यों का समर्थन करता है - • प्राथमिक शालाओं में बच्चों की भाषा सीखने की प्रक्रिया को जानना बेहद जरुरी है और महत्वपूर्ण भी है | इस पर सतही तौर पर काम करने की बजाय बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ विचार करना होगा और काम भी करना होगा | जैसा कि प्रमुख सचिव महोदय के लेख में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई है | • प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा शिक्षण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत पर आधारित आपका ब्लॉग भाषा अर्जन की नैसर्गिक प्रक्रिया पर बल देता है | इस प्रक्रिया में हम अपने आसपास के वातावरण, माता-पिता और अपने से बड़ों के संपर्क में रहकर भाषा सीखते है | चाम्स्की के अनुसार भाषा अर्जन की क्षमता बालकों में जन्मजात होती है | वाइगोत्सकी ने भी माना है कि भाषा का अर्जन परिवेश और समाज के माध्यम से सहज रूप से करता है | • जब हम प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा शिक्षण करते हैं तो वहां सिलेबस होता है, पाठ्यपुस्तकें होती है और सिखाने वाला शिक्षक होता है | यदि ये तीनों मिलकर भाषा सीखने की नैसर्गिक प्रकिया – अनुकरण, अभ्यास, पुनरावृति और सहजता को प्रोत्साहित करें तो आपकी मंशा के अनुरूप हम बच्चों को भाषा सिखाने में हम सफल हो पाएंगे | • प्रारंभिक कक्षाओं में वर्णमाला और बारहखड़ी रटवाने पर ज़ोर, उच्चारण की शुद्धता और व्याकरण सीखने का दबाव निश्चित रूप से भाषा सीखने की प्राकृतिक प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं | आपने अपने ब्लॉग में इस बात को रेखांकित किया है | आपके इस ब्लॉग से शिक्षा जगत से जुड़ें लोगों को एक बार पुन: प्रारंभिक कक्षाओं के सिलेबस और पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा की प्रेरणा मिलेगी और भविष्य में शिक्षकों के प्रशिक्षण के नए आयामों पर भी चर्चा करने में मदद मिलेगी | क्या हमारी पाठयपुस्तकें ब्लॉग में उल्लेखित भाषा शिक्षणशास्त्र का अनुकरण करती हैं? प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा की पाठ्यपुस्तकें प्रमुख सचिव महोदय की मंशा अनुरूप हैं यदि हम कक्षा पहली के हिंदी विषय की पाठ्यपुस्तक का अवलोकन करें तो पाएंगे कि पेज क्रमांक 1-31 तक कहीं भी वर्णमाला सीखने-सिखाने की बात नहीं की गई है बल्कि इसकी शुरुआत चित्रों और कविताओं के माध्यम से की गई है | इन चित्रों और कविताओं का चयन इस प्रकार से किया गया है कि हर बच्चा उसमें सहभागी होकर अपनी बात कर सके | आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षक इन चित्रों और कविताओं पर इस तरह से प्रश्न करें कि हर बच्चा अपने पूर्वज्ञान और अनुभव को जोड़ते हुए अपनी बात कह सकें | आगे के पृष्ठों में सन्दर्भ के आधार पर वर्णों का परिचय कराया गया है जो कि क्रमानुसार न होकर संदर्भानुसार है | इसके अतिरिक्त हमारी पाठ्यपुस्तकों में निम्नांकित विशेषताएं देखी जा सकती हैं – • पाठ्यपुस्तकों में चित्र आधारित चर्चा हेतु अनेक अवसर दिए गए हैं | • चित्रों के माध्यम से किसी कहानी को भी समझने का अवसर दिया गया है | • बच्चों की कल्पनाशीलता को स्थान दिया गया है | • पाठों के माध्यम से विषयवस्तु पर चर्चा हेतु अवसर प्रदान किये गए हैं | • कहानियों को सुनकर, समझकर प्रतिक्रिया देने हेतु बच्चों को प्रेरित किया गया है | • हावभाव के माध्यम से बच्चें अपनी बात रख सकें इस तरह की कविताओं को शामिल किया गया है | • सुनी गई बातों को अपने शब्दों में दोहराने के अनेक अवसर उपलब्ध कराएँ गए हैं | • खेल-खेल के माध्यम से अपनी बातों को व्यक्त करने के अवसर दिए गए हैं | • अभिनय एवं रोल प्ले की भी बात पुस्तक में की गई हैं | • पाठ्यपुस्तकें शिक्षकों को आकलन के विकसित स्वरुप का विचार प्रदान करती हैं | • इस तरह से पाठ्यपुस्तकें गतिविधि आधारित हैं, जो कि विद्यार्थियों में कल्पनाशीलता, सृजनात्मकता, संवाद क्षमता को विकसित करती है और अभिव्यक्ति के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराती हैं | भाषा शिक्षण की वर्तमान स्थिति - • सामान्यत: शिक्षक प्रशिक्षित होकर भी शिक्षण के परम्परागत तरीकों से आज भी जुड़ें हुए हैं| अधिकतर शिक्षक आज की परिस्थितियों में शिक्षा और शिक्षणशास्त्र में आ रहें बदलावों के प्रति अद्यतन नहीं है | • कक्षा में शिक्षण का स्वरुप आज भी सामान्यत: शिक्षक केन्द्रित है, अत: विद्यार्थियों के लिए संवाद, सृजनशीलता के अवसर नगण्य होते हैं | • निर्धारित समयावधि में पाठ्यक्रम पूरा करने की बाध्यता होने की वजह से सामान्यत: शिक्षक कक्षा में गतिविधि आधारित शिक्षण को कम महत्व देकर अपना पूरा ध्यान पाठ्यक्रम को पूरा करने में लगाते हैं | • स्थानीय भाषा की जानकारी के अभाव में बहुत से शिक्षक सामान्यत: बच्चों की घर की भाषा को महत्त्व नहीं दे पाते हैं | • सामान्यत: शिक्षक आज भी विद्यार्थियों की भाषायी त्रुटियों जैसे- मात्रा, उच्चारण, व्याकरण सम्बन्धी अशुद्धियों को सुधारने पर अधिक ध्यान देते है जिससे बच्चों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति बाधित होती है | • अधिकतर भाषा शिक्षक विषयवस्तु को दैनिक जीवन/आसपास के परिवेश से न जोड़कर पाठ्यपुस्तक आधारित शिक्षण पर ही केन्द्रित होते हैं | भाषा शिक्षण की भावी रणनीति - आदरणीय प्रमुख सचिव महोदय के द्वारा बच्चों के भाषा सीखने-सिखाने की वर्तमान यथार्थ परिस्थितियों पर जो चिंता व्यक्त की गई है, वह उचित है | राज्य की सभी शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाएं भाषा शिक्षण के अपेक्षित स्तर प्राप्ति हेतु प्रतिबद्ध हैं | एस.सी.ई.आर.टी. तथा अधीनस्थ संस्थाएं अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उपर्युक्त बिन्दुओं को समाहित करते हुए शीघ्र ही कार्यशाला एवं शिक्षक प्रशिक्षणों की श्रृंखला प्रारंभ करेंगी | Dr. Yogesh Sheohare Additional Director SCERT, Chhattisgarh

Jyoti Magar On: 24/01/2023

Sir You have written the problem and solution as well for the students.

Jyoti Magar On: 24/01/2023

Respected sir, it is really inspiring thought for us about language. When I was student of middle school I was very poor to pronounce the word of English and Hindi too,and it was the reason to be quite in class room

Jyoti Magar On: 24/01/2023

Respected sir, it is really inspiring thought for us about language. When I was student of middle school I was very poor to pronounce the word of English and Hindi too,and it was the reason to be quite in class room

Lalit Sahu, SCERT On: 24/01/2023

आदरणीय सर, भाषा की शिक्षा के संदर्भ में इतनी गहरी और गूढ़ बातें बड़े ही सहज एवं सरल शब्दों में पढ़ने को मिला जो कि जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले प्राथमिक विद्यालयों के हर शिक्षकों को न केवल एक मुक्कमल समझ बनाने बल्कि अपने सीख एवं अनुभवों के और भी मोतियों को इस माला मे जोड़ते हुए भाषा सीखने-सिखाने की एक नई दृष्टि का भी अपने-अपने संदर्भों में सूत्रपात कर सकते है । उपरोक्त समस्त बातें न केवल भाषा की प्रकृति के संदर्भ में बल्कि हर शिक्षक को यह भी मार्ग दिखा रहा कि बच्चों के मूलभूत भाषायी कौशलों के विकास में किस तरह से काम किया जा सकता है । यह लेख भाषा शिक्षण के दोनों पहलुओं को इंगित करता है जो यह बता रहा कि भाषा शिक्षण में एक शिक्षक को क्या-क्या करना चाहिए एवं क्या-क्या नहीं करना चाहिए । प्रारंभिक कक्षाओं में उच्चारण, शुद्धता, व्याकरण एवं मानकता का आग्रह निश्चित तौर पर सीखने में बाधा ही डालती है इसलिए एक समय अंतराल के पश्चात बच्चों के स्तरानुरूप इस दिशा में आगे बढ़ा जाय । व्याकरण जो कि एक खास तरह का पैटर्न होता है और जिसे हर इन्सानों में इस Universal Grammar को सीखने की जन्मजात क्षमता होती है, को बच्चा देर-सबेर सीख ही लेता है भाषा कि प्रकृति/फ़िलासफ़ी है क्या चीज़, इसे समझना शिक्षकों के लिए बहत ज़रूरी है । यदि शिक्षक इसे समझते हैं तो उन्हे बच्चों के साथ काम करना और आसान हो जाता है । सैद्धान्तिक तौर पर यदि इसे समझे तो, यह समझ एक शिक्षक को अपने परिवेश के अनुसार, बच्चों के स्तर अनुरूप (Age appropriate) शिक्षण प्रक्रिया खुद तैयार करने में मदद करता है । भाषा शिक्षण के उद्देश्य की भी स्पष्टता भी शिक्षकों को होनी चाहिए कि क्यो भाषा सिखायी जा रही है इसलिए आकलन इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । वैसे तो आपके द्वारा सुझाए गए गतिविधियां अपने आप में पर्याप्त है फिर भी यदि इसके इनके स्वरूप में कुछ और जोड़ना चहुंगा । बच्चों से बातचीत अपने आप मे एक प्रभावी उपकरण है, जिसमें---- 1. बच्चों के अनुभवों को सुनना, 2. किस्से कहानियों को आधे सुनाते हुए उसे रोककर उनके आगे की कहानी बनाने या उसमें उनके कल्पना के अनुरूप कहानी को जिस भी अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, के अवसर बच्चों को देना । 3. चित्रों को देखकर बच्चों को अपनी भाषा में उसका वर्णन करने कहा जा सकता है । 4. चित्र बनाने के लिए कहना एवं उस चित्र पर अपने विचार देना 5. चित्रों पर बच्चों द्वारा दिये हुए विचारों को शिक्षकों द्वारा समर्थन देना, जिससे बच्चा अपने आप में सम्मानित महसूस करता है एवं प्रेरित होते हुए सीखने के लिए लालायित रहता है। आदि । NCERT की बरखा series (Pocket Books) की बहुत छोटी पतली किन्तु आकर्षक लगाने वाली पुस्तकें भी बहुत मददगार हो सकती है । यहाँ इस लिंक पर क्लिक कर access कर सकते हैं । https://ncert.nic.in/dee/barkha-series.php?ln= उपरोक्त सभी बातों के लिए शिक्षक, अपने आप को कितना तैयार करते है ये एक गंभीर विषय भी है। एक शिक्षक को पढे-लिखे हुए शिक्षक से पढ़ते-लिखते हुए शिक्षक की तरह होना होगा ललित साहू SCERT

Smt Hirmati bhardwaj lohandiguda jagdalpur On: 24/01/2023

आदरणीय श्री शुक्ला सर जी को सादर प्रणाम करते हुए🙏🙏 आदरणीय सर जी आपने प्रारंभिक कक्षाओं से बच्चों के भाषाई विकास को लेकर जो बात स्पष्ट की है वो एक बहुत बड़ी समस्या है और अधिकतर सभी स्कूलों में देख ने को मिलती है।जैसा कि आपने कहा बच्चे जब स्कूल में आते हैं उसके पहले ही बहुत सी बातों को सुनकर और सीखकर भी आते हैं और उन्हें स्कूल में उचित माहौल नहीं मिलने के कारण भाषा ज्ञान में पिछड़ जाते हैं। और स्कूल में अच्छा माहौल और सहयोग मिल जाए तो वो भाषाई कौशल में दक्ष भी हो पाते हैं पिछले पांच, छः सालों में कक्षा पहली से भाषा के पाठ्य पुस्तकों में जो बदलाव हुए हैं साथ ही पाठ्य सामग्री में क्षेत्र अनुसार स्थानीय भाषा का समायोजन किया गया है । और पाठ को सरल और रुचिकर बनाया गया है ,इससे पहले की अपेक्षा काफी सुधार स्कूलों में देखने को मिल रहा है।जैसा कि आप कह रहे थे अधिकतर स्कूलों में वर्णमालाओं को सीखने के बाद बच्चों को बारहखड़ी और व्याकरण को रटाया जाता है जिससे बच्चों को सीखने में सालभर लग जाता है फिर भी बच्चे नहीं सीख पाते थे। मैं आदरणीय सर जी को अवगत कराना चाहूंगी कि हम बस्तर जैसे पिछड़े क्षेत्रों में रहकर कार्य करते हैं जहां भाषा की बहुत ही ज्यादा समस्या होती है , बच्चे हिंदी भी नहीं समझ पाते, शिक्षकों को गोंडी, हल्बी नही आती उस क्षेत्र में रहकर कार्य करना काफी चुनौती भरा होता है। उसके बावजूद भी कुछ शिक्षक बच्चों को भाषा सिखाने में डंटे हुए हैं हमारे बस्तर में भाषा को सरल तरीके से सिखाने के लिए व बच्चे पहली कक्षा में ही पढ़ना सीख जाए इसके लिए बहुत से कार्य जिला मिशन और शिक्षकों के द्वारा किए जा रहे हैं शिक्षकों के लिए भाषा को लेकर प्रशिक्षण आयोजन किए जा रहे हैं पाठ्य पुस्तकें और उसके गतिविधियों के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित किए जा रहे हैं। मैं स्वयं भी इस पर काम रही हूं और इसका परिणाम भी मुझे मिल पा रहा है बच्चे कक्षा पहली में ही छोटे छोटे वाक्यों को पढ़ना सीख रहे हैं, और जिस तरह से स्कूलों में प्रिंट रिच वातावरण, स्मार्ट क्लास मुस्कान पुस्तकालय की सुविधा, खेल आधारित गतिविधियां का उपयोग, स्वतंत्र माहौल, रुचि अनुसार शिक्षण स्थानीय भाषा का प्रयोग स्कूलों में हो रहा है इससे बहुत कुछ सुधार स्कूलों में देखने को मिल रहा है।स्कूलों में कक्षा संचालन की प्रक्रिया या पुरानी पद्धति का बदलाव बहुत आवश्यक है हम शिक्षकों को नई नई गतिविधियों और सरल से सरल तरीकों का उपयोग , स्वतंत्र माहौल उपलब्ध कराना उन्हें सीखने के अवसर देना, आदि के द्वारा शिक्षण कार्य करना होगा तभी हम बच्चों में भाषाई विकास ला सकेंगें जो सभी विषयों को सीखने का मूल आधार है ।र

Smt Hirmati bhardwaj lohandiguda jagdalpur On: 23/01/2023

आदरणीय श्री शुक्ला सर जी सादर प्रणाम करते हुए🙏🙏 आदरणीय सर जी आपने प्रारंभिक कक्षाओं से बच्चों के भाषाई विकास को लेकर जो बात स्पष्ट की है वो एक बहुत बड़ी समस्या है और अधिकतर सभी स्कूलों में देखने को मिलती है।जैसा

देवीनारायण पटेल On: 23/01/2023

आदरणीय गुरुदेव प्रारम्भिक कक्षाओं में भाषा सीखने के लिए सभी अक्षरों को सामूहिक रूप से सिखाने के बजाय किताब जो दी गई है उसके आधार पर एवं स्थानीय परिवेश स्थानीय भाषा से जोड़ते हुए सिखाएं। बच्चों को भाषा सीखने में आसानी होती है। कक्षा 1 ली में ही बच्चे किताब पढ़ना सिख जाते हैं।

Sharda Bhoyar On: 23/01/2023

आदरणीय सर जी को प्रणाम। आप हमारे कार्य क्षेत्र के प्रेरणास्रोत हैं।आपके दिशानिर्देश व मार्ग दर्शन हमें सदैव उर्जावान बनाते हैं।हिन्दी भाषा की ध्वनि,

रिंकल बग्गा On: 23/01/2023

FLN प्रशिक्षण में हमने मेंटर्स को बताया कि आप अपने क्लास रुम से बारहखड़ी की चार्ट निकाल दीजिए। इसको बच्चे रुचि से नही बल्कि डर के पढ़ते है। बच्चों को पढ़ने के लिए छोटे-छोटे शब्द कार्ड दीजिए, जिनमें चित्र और उस चित्र से संबंधित शब्द लिखे हो। इसको इसको बच्चे अच्छे से पढ़ते हैं और अपने विचार प्रकट करते हैं। इन छोटे छोटे शब्दों से बच्चे मात्रा भी सीखते जाते हैं। यह बहुत ही सरल गतिविधि है इनसे बच्चे समझ के साथ पढ़ना,आत्मसात करना जल्दी सीखते हैं।

Sharda Bhoyar On: 23/01/2023

आदरणीय सर जी को प्रणाम। आप हमारे कार्य क्षेत्र के प्रेरणास्रोत हैं।आपके दिशानिर्देश व मार्ग दर्शन

Santosh Kumar Baghel On: 23/01/2023

आपका लेख वास्तव मे बच्चों के भाषायी शिक्षण के लिए

Santosh Kumar Baghel On: 23/01/2023

आपका लेख वास्तव मे बच्चों के भाषायी शिक्षण के लिए

Santosh Kumar Baghel On: 23/01/2023

आपका लेख वास्तव मे बच्चों के भाषायी शिक्षण के लिए

chandrawali sahu On: 23/01/2023

सर जी आपके बहुत हि प्रेरणादायी है , सर हम अक्सर अपनी शालाओं मे देखते है , कि बच्चों को अगर भाषा कि स्वंत्रता मिलती है तो उनके सम्प्रेषण भी खुलकर आते है , और हम बच्चों को टोकना शुरू कर दे तो बच्चों मे झिझक आ जाती जिससे बच्चे अपने विचार खुलकर नहीं रख पाते, कभी कभी बच्चों कि भाषा संबंधी गलतियों को भी हमें नजरअंदाज करने चाहिए , ताकि बच्चे आगे बढ़कर हमारी पढ़ाई का हिस्सा बने, अगर हम उनकी गलतियां हि गिनाते रहे तो बच्चे के मन मे यह बात घर कर जाती है कि वो जो बोलेगा गलत हि बोलेगा और फिर वाह दूरिया बनाना शुरू कर देता है , आदरणीय सर जी आपके विचार को मैं अपनी शाला मे अन्य शिक्षक साथियो से चर्चा करूंगी और सर जी हमारी शाला मे बच्चे आकलन के लिए तैयार है, अब आपके मार्गदर्शन मे आकलन पूर्ण हो जाए तो हमारे बच्चों को और भी बहुत कुछ सीखने को माई जाएगा । chandrawali sahu primary school ranitarai district block rajnandgaon

प्रदीप कुमार गुप्ता On: 23/01/2023

आदरणीय सर जी बिल्कुल सत्य है भाषा शिक्षण प्रारंभिक शिक्षा के लिए अमृत के समान है।

Poonam Gaikwad On: 23/01/2023

आपका विचार वंदनीय है सर जी SCERT ke प्रशिक्षण में हमने बहुत कुछ सीखा है हम सभी इस पर पर पूरी लगन से काम करने की कोशिश करेंगे बस ऐसे ही हमे आपका मार्गदर्शन मिलता रहे

Praveen On: 23/01/2023

मेरा मानना है क़ी आज़ के समय मे स्कूल बच्चो मे हुनर होना चाहिए।जिससे वो अपना स्वयं का रोजगाऱ प्राप्त कर सके।क्योंकि सरकारी नौकरी मिलना इतना आसान नहीं है लेकिन आपके पास स्किल होंगी तो आप कही भी जॉब और खुद का रोजगार कर सकते हो.तो ऐसा कुछ करिये क़ी सभी स्कूलों मे ऐसा हो जाए जिससे बच्चे तुरंत स्कूल पासआउट हो केअपना रोजगार कर sake.

Poonam Gaikwad On: 23/01/2023

भाषा शिक्षण के प्रति आपका विचार और प्रयास वंदनी जी

Poonam Gaikwad On: 23/01/2023

भाषा शिक्षण के प्रति आपका विचार और प्रयास वंदनीय हैसर जी

Poonam Gaikwad On: 23/01/2023

भाषा शिक्षण के प्रति आपका विचार और प्रयास वंदनीय है सर जी

Ajay On: 23/01/2023

आदरणीय सर विषय - एक ही ग्राम पंचायत मे संचालित हाई स्कूल (9th 10th) और मिडिल स्कूल के संचालन के संबंध मे सुझाव महोदय एक ही ग्राम पंचायत मे संचालित हाई स्कूल और मिडिल स्कूल अलग अलग शाला भवन मे संचालित हो रहे है और कही कही दोनो शालाओ मे विषय शिक्षक की कमी है जिसके कारण दोनो शालाओ मे सभी विषय का अध्यापन कार्य नही हो पा रहा है अत: सादर निवेदन है की दोनो शालाओ के एक ही शाला भवन मे संचालित करने का विचार करे। जैसे हमारे ग्राम मे दो स्कूल संचालित है दोनो स्कूल अलग अलग भवन मे मिडिल और हाई स्कूल संचालित हो रहा है मिडिल मे कुल 4 शिक्षक है और हाई स्कूल मे 5 शिक्षक है दोनो स्कूल मिला कर कक्षा 6 से 10 के लिए कुल 9 शिक्षक है लेकिन सभी विषय के लिए विषय शिक्षक नही है इसके अतिरिक पास के ग्राम पंचायत जहाँ मिडिल स्कूल संचालित है वहा 2 ही शिक्षक है। इस तरह अगर हाई स्कूल और मिडिल स्कूल को एक ही भवन मे संचालित किया जाए तो शिक्षक और विषय शिक्षक की कमी नही होगी धन्यवाद

Smt.sushila patel On: 23/01/2023

भाषा शिक्षण के प्रति आपकी दूरदर्शिता एवं वैचारिक चिंतन चिंतन वंदनीय है सर जी आपके कुशल मार्गदर्शन में हम सभी इस दिशा में हमेशा प्रयासरत रहेंगे ,,

Smt.sushila patel On: 23/01/2023

भाषा शिक्षण के प्रति आपकी दूरदर्शिता एवं वैचारिक चिंतन चिंतन वंदनीय है सर जी आपके कुशल मार्गदर्शन में हम सभी इस दिशा में हमेशा प्रयासरत रहेंगे ,,

Manju Das On: 23/01/2023

Bilkul sahi bataya hai aapne...hm jarur se prayas krenge ki ki bachcha rtn padhti se dur htkr apne teachers ke sath v any logon ke sath apni privesh v any visyon pr baat kre or apni bhasha me improve kr ske... dhanyawad sir ji

SATISH BYOHARE On: 23/01/2023

शिक्षक शिक्षार्थी तक सहायता के साथ संदर्भित तथ्यो को विषय के अनुसार पहुंचा सके शिक्षार्थियों में उस तथ्यों से संबंधित जानकारी के अनुसार व्यवहरात्मक परिवर्तन हो यह सीखने सिखाने की प्रक्रिया का विशिष्ट उद्देश्य है प्रायः शिक्षार्थी निष्क्रिय रह कर वर्ग में अरुचि से अपनी सहभागीता करते हैं जिससे अपेक्षा अनुरूप अधिगम विकसित नहीं होता शिक्षक द्वारा निर्देशात्मक शिक्षण एवं शिक्षार्थी की निष्क्रिय भागीदारी अधिगम सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में बाधक है । कहा भी गया है -हम पढ़ते हैं -याद करने की कोशिश करते हैं हम देखते हैं -विश्वास बढ़ता है हम करते हैं -समझ विकसित होती है। अतः करके सीखने में शिक्षक शिक्षार्थियों की सहभागिता सक्रियता से होती है और करने से अनुभव प्राप्त होता है जो सीखने के अनुरूप अधिगम विकसित होने में सहायक होता है।

Manju Das On: 23/01/2023

Bilkul sahi bataya hai aapne...hm jarur se prayas krenge ki ki bachcha rtn padhti se dur htkr apne teachers ke sath v any logon ke sath apni privesh v any visyon pr baat kre or apni bhasha me improve kr ske... dhanyawad sir ji

अखिलेश कुमार त्रिपाठी On: 23/01/2023

सादर अभिवादन, बुद्धि और ज्ञान किसी भाषा की मोहताज नहीं होती, प्राथमिक कक्षाओं में बच्चे को उसकी मातृभाषा में सिखाया जाना ज्यादा प्रभावी होगा साथ हिंदी और अंग्रेजी का प्राथमिक ज्ञान दिया जाना उचित होगा जिससे वह उच्च प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर पहुंचते पहुंचते अपने ज्ञान को इस भाषा में स्थानांतरित कर सके ।🙏

अखिलेश कुमार त्रिपाठी On: 23/01/2023

सादर अभिवादन, बुद्धि और ज्ञान किसी भाषा की मोहताज नहीं होती, प्राथमिक कक्षाओं में बच्चे को उसकी मातृभाषा में सिखाया जाना ज्यादा प्रभावी होगा साथ हिंदी और अंग्रेजी का प्राथमिक ज्ञान दिया जाना उचित होगा जिससे वह उच्च प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर पहुंचते पहुंचते अपने ज्ञान को इस भाषा में स्थानांतरित कर सके ।🙏

अखिलेश कुमार त्रिपाठी On: 23/01/2023

बुद्धि और ज्ञान किसी भाषा की मोहताज नहीं होती, प्राथमिक कक्षाओं में बच्चे को उसी बोली भाषा में

Himanshu Jha On: 23/01/2023

Respected Dr. Alok Sir आपने अत्यंत महत्वपूर्ण विषय भाषा सिखाने पर उठाया है. ध्वनि ही मुख्य माध्यम है. मातृ भाषा या छत्तीसगढ़ जैसे विशिष्ट क्षेत्र में, जहाँ लोक बोलियां भी हैं, हिन्दी ,अंग्रेज़ी भाषा शिक्षण पर अच्छा कार्य किया जा सकता है ...

Himanshu Jha On: 23/01/2023

Respected Dr. Alok Sir आपने अत्यंत महत्वपूर्ण विषय भाषा सिखाने पर उठाया है. ध्वनि ही मुख्य माध्यम है. मातृ भाषा या छत्तीसगढ़ जैसे विशिष्ट क्षेत्र में, जहाँ लोक बोलियां भी हैं, हिन्दी ,अंग्रेज़ी भाषा शिक्षण पर अच्छा कार्य किया जा सकता है ...

Himanshu Jha On: 23/01/2023

Respected Dr. Alok Sir आपने अत्यंत महत्वपूर्ण विषय भाषा सिखाने पर उठाया है. ध्वनि ही मुख्य माध्यम है. मातृ भाषा या छत्तीसगढ़ जैसे विशिष्ट क्षेत्र में, जहाँ लोक बोलियां भी हैं, हिन्दी ,अंग्रेज़ी भाषा शिक्षण पर अच्छा कार्य किया जा सकता है.

Himanshu Jha On: 23/01/2023

Respected Dr. Alok Sir आपने अत्यंत महत्वपूर्ण विषय भाषा सिखाने पर उठाया है. ध्वनि ही मुख्य माध्यम है. मातृ भाषा या छत्तीसगढ़ जैसे विशिष्ट क्षेत्र में, जहाँ लोक बोलियां भी हैं, हिन्दी ,अंग्रेज़ी भाषा शिक्षण पर अच्छा कार्य किया जा सकता है.

Sanjay Kumar dhruw On: 23/01/2023

क्षमा चाहता हूं,,,राय नहीं आपका लेख है

Sanjay Kumar dhruw On: 23/01/2023

लेकिन वर्तमान ग म न र पद्धति भाषा की शास्त्रीय पद्धति को नुक़सान पहुंचाने का काम करेगी,,,, आपकी राय भी उचित है किंतु बच्चों की भाषाई आधार भूत समझ से दूर किया जा रहा है।

रवि कान्त मिश्रा On: 23/01/2023

बहुत ही सुन्दर और उच्च कोटि भाषा शिक्षण के प्रति आपका विचार प्रस्तुत है, भाषा ही ज्ञान के संप्रेषण का आधार है, इस लेख से भाषा शिक्षण के प्रति एक नई उर्जा मिली है।

रवि कान्त मिश्रा On: 23/01/2023

बहुत ही सुन्दर और उच्च कोटि भाषा शिक्षण के प्रति आपका विचार प्रस्तुत है, भाषा ही ज्ञान के संप्रेषण का आधार है, इस लेख से भाषा शिक्षण के प्रति एक नई उर्जा मिली है।

रवि कान्त मिश्रा On: 23/01/2023

बहुत ही सुन्दर और उच्च कोटि भाषा शिक्षण के प्रति आपका विचार प्रस्तुत है, भाषा ही ज्ञान के संप्रेषण का आधार है, इस लेख से भाषा शिक्षण के प्रति एक नई उर्जा मिली है।

रवि कान्त मिश्रा On: 23/01/2023

बहुत ही सुन्दर और उच्च कोटि भाषा शिक्षण के प्रति आपका विचार प्रस्तुत है, भाषा ही ज्ञान के संप्रेषण का आधार है, इस लेख से भाषा शिक्षण के प्रति एक नई उर्जा मिली है।

Vijeta Dewani On: 23/01/2023

होता है। उसके बाद बच्चा अपने-आप को विद्यालय को अपना मानता है। और शिक्षक बच्चे का सर्वागीण विकास करने का प्रयास करते हैं। बच्चे को अपने मन की बात जिस तरह से भी अभिव्यक्त करने हेतु प्रयास हो। उनके पालक भी सहयोग करे तब उनका विकास निश्चित ही हैं। इसलिए समय समय पर मातृ सम्मेलन कर बच्चे के सर्वागीण विकास हेतु प्रयास करना चाहिए। भाषायी कौशल ही अन्य सभी क्षेत्रो मे आगे बढ़ाता हैं।

Vijeta Dewani On: 23/01/2023

आदरणीय सर यहां पर जो भी अनुभव, बाते साझा की गई हैं वह सब बाते सराहनीय है। हम यही प्रयास करते हैं कि बच्चे पूर्णतः सीख पाए। मैंने अनुभव किया कि मातृ भाषा से सर्वप्रथम ही बच्चा का ध्यानाकर्षण होता है। प्राथमिक स्तर पर तो यही प्रयास ह है।

Vijeta Dewani On: 23/01/2023

आदरणीय सर यहां पर जो भी अनुभव, बाते साझा की गई हैं वह सब बाते सराहनीय है। हम यही प्रयास करते हैं कि बच्चे पूर्णतः सीख पाए। मैंने अनुभव किया कि मातृ भाषा से सर्वप्रथम ही बच्चा का ध्यानाकर्षण होता है। प्राथमिक स्तर पर तो यही प्रयास होता है।

Vijeta Dewani On: 23/01/2023

आदरणीय सर यहां पर जो भी अनुभव, बाते साझा की गई हैं वह सब बाते सराहनीय है। हम यही प्रयास करते हैं कि बच्चे पूर्णतः सीख पाए। मैंने अनुभव किया कि मातृ भाषा से सर्वप्रथम ही बच्चा का ध्यानाकर्षण होता है। प्राथमिक स्तर पर तो यही प्रयास होता है।

bagbahra chatttishgarh On: 23/01/2023

भाषा ही महत्वपूर्ण है... भाषा ज्ञान के बिना अन्य विषयों की समझ मुश्किल है... मैं अपनी कक्षा में भाषा शिक्षण पर अधिक ध्यान देता हूँ जिसका लाभ बच्चों को प्रत्यक्ष रूप से मिल रहा है...

Vijeta Dewani On: 23/01/2023

आदरणीय सर जो भी यहां पर भाषा सीखने के लिए यहां है

Uttra Vastrakar On: 23/01/2023

आदरणीय सर जी सारी बाते सत्य है मेरे विचार से पाठ्यपुस्तक की सहायता से बच्चों को ,अन्य गतिविधियों तो उनमें रुचि ओ ध्यान आकर्षित करने ललल्ल है

Uttra Vastrakar On: 23/01/2023

आदरणीय सर जी सारी बाते सत्य है मेरे विचार से पाठ्यपुस्तक की सहायता से बच्चों को ,अन्य गतिविधियों तो उनमें रुचि ओ ध्यान आकर्षित करने का माध्यम है

Yad Ram Manjhi On: 23/01/2023

भाषा शिक्षा का आधार है भाषा के बिना शिक्षा की कल्पना असम्भव है! इस पर दूरगामी सोच जरूरी है!

Yad Ram Manjhi On: 23/01/2023

भाषा शिक्षा का आधार है भाषा के बिना शिक्षा की कल्पना असम्भव है! इस पर दूरगामी सोच जरूरी है!

FANINDRA KUMAR KHUNTE On: 23/01/2023

आदरणीय सर जी आपकी विचार विचारणीय है आपकी एक एक बात एक सत्य घटना कि और इंगित करता है हमें पाठयपुस्तक से बाहर निकल कर बच्चों को उनके रूचि व परिवेश के आधार पर निरन्तर का

FANINDRA KUMAR KHUNTE On: 23/01/2023

आदरणीय सर जी आपकी विचार विचारणीय है आपकी एक एक बात एक सत्य घटना कि और इंगित करता है हमें पाठयपुस्तक से बाहर निकल कर बच्चों को उनके रूचि व परिवेश के आधार पर निरन्तर का

FANINDRA KUMAR KHUNTE On: 23/01/2023

आदरणीय सर जी आपकी विचार विचारणीय है आपकी एक एक बात एक सत्य घटना कि और इंगित करता है हमें पाठयपुस्तक से बाहर निकल कर बच्चों को उनके रूचि व परिवेश के आधार पर निरन्तर का

अखिलेश मिश्र On: 23/01/2023

Resp sir आपका लेख निसन्देह भाषा शिक्षण हेतु आदर्श स्थिति के अनुकल ही है और यह होना ही चाहिए। सर् मैं जो निरन्तर महसूस करता हु वो यह है कि विगत दशक में हमने जो विज्ञान गणित,अंग्रेजी प्रक्षिणन में धयन केंद्रित किया उसके परीणाम स्वरुप भाषा शिक्षण, एवम भाषा शिक्षक दोनों ही शाला स्तर पर किनारे हो गए जो शिक्षक पढ़ने में कमजोर होता है वो ही भाषा शिक्षण करता है भाषा शिक्षण बहुत बहुत किनारे हो गया फिर क्षेत्रीय बोली कि समस्या ,अक्ल शिक्षक शाला, विभिन्न ऐसे डिग्री धारी शिखको का आना जिन्होने नॉकरी प्राप्त करने के लिए मात्र बीएड ded किया परंतु उन्हें भाषा शिक्षण की विधियों का ,काश शिक्षण का कोई ज्ञान नही यह तक कि बल मनोविज्ञान, और ब्लैकबोर्ड वर्क का ज्ञान भी नही अत्यंत दुःखद स्थिति है प्राथमिक शालाओ मो में मेरे क्षेत्र में में मुझे लगता है शाला में जिस भाषा मे शिखने शिखने की प्रक्रिया हो रही है वह बहुत बहुत ज्यादा सामान्य बात करने की आवश्यकता है छात्रों से ताकि उनके पास एक सब्द भंडार दिया जा सके फिर पढ़ना और शिखने सरल हो जता है आपके निर्देश ,मार्गदतन, अत्यंत उपयोगी है, हम पूरी तरह पालन करने और करवाने में लग रहे है

अखिलेश मिश्र On: 23/01/2023

Resp sir आपका लेख निसन्देह भाषा शिक्षण हेतु आदर्श स्थिति के अनुकल ही है और यह होना ही चाहिए। सर् मैं जो निरन्तर महसूस करता हु वो यह है कि विगत दशक में हमने जो विज्ञान गणित,अंग्रेजी प्रक्षिणन में धयन केंद्रित किया उसके परीणाम स्वरुप भाषा शिक्षण, एवम भाषा शिक्षक दोनों ही शाला स्तर पर किनारे हो गए जो शिक्षक पढ़ने में कमजोर होता है वो ही भाषा शिक्षण करता है भाषा शिक्षण बहुत बहुत किनारे हो गया फिर क्षेत्रीय बोली कि समस्या ,अक्ल शिक्षक शाला, विभिन्न ऐसे डिग्री धारी शिखको का आना जिन्होने नॉकरी प्राप्त करने के लिए मात्र बीएड ded किया परंतु उन्हें भाषा शिक्षण की विधियों का ,काश शिक्षण का कोई ज्ञान नही यह तक कि बल मनोविज्ञान, और ब्लैकबोर्ड वर्क का ज्ञान भी नही अत्यंत दुःखद स्थिति है प्राथमिक शालाओ मो में मेरे क्षेत्र में में मुझे लगता है शाला में जिस भाषा मे शिखने शिखने की प्रक्रिया हो रही है वह बहुत बहुत ज्यादा सामान्य बात करने की आवश्यकता है छात्रों से ताकि उनके पास एक सब्द भंडार दिया जा सके फिर पढ़ना और शिखने सरल हो जता है आपके निर्देश ,मार्गदतन, अत्यंत उपयोगी है, हम पूरी तरह पालन करने और करवाने में लग रहे है

अखिलेश मिश्र On: 23/01/2023

Resp sir आपका लेख निसन्देह भाषा शिक्षण हेतु आदर्श स्थिति के अनुकल ही है और यह होना ही चाहिए। सर् मैं जो निरन्तर महसूस करता हु वो यह है कि विगत दशक में हमने जो विज्ञान गणित,अंग्रेजी प्रक्षिणन में धयन केंद्रित किया उसके परीणाम स्वरुप भाषा शिक्षण, एवम भाषा शिक्षक दोनों ही शाला स्तर पर किनारे हो गए जो शिक्षक पढ़ने में कमजोर होता है वो ही भाषा शिक्षण करता है भाषा शिक्षण बहुत बहुत किनारे हो गया फिर क्षेत्रीय बोली कि समस्या ,अक्ल शिक्षक शाला, विभिन्न ऐसे डिग्री धारी शिखको का आना जिन्होने नॉकरी प्राप्त करने के लिए मात्र बीएड ded किया परंतु उन्हें भाषा शिक्षण की विधियों का ,काश शिक्षण का कोई ज्ञान नही यह तक कि बल मनोविज्ञान, और ब्लैकबोर्ड वर्क का ज्ञान भी नही अत्यंत दुःखद स्थिति है प्राथमिक शालाओ मो में मेरे क्षेत्र में में मुझे लगता है शाला में जिस भाषा मे शिखने शिखने की प्रक्रिया हो रही है वह बहुत बहुत ज्यादा सामान्य बात करने की आवश्यकता है छात्रों से ताकि उनके पास एक सब्द भंडार दिया जा सके फिर पढ़ना और शिखने सरल हो जता है आपके निर्देश ,मार्गदतन, अत्यंत उपयोगी है, हम पूरी तरह पालन करने और करवाने में लग रहे है

अखिलेश मिश्र On: 23/01/2023

Resp sir आपका लेख निसन्देह भाषा शिक्षण हेतु आदर्श स्थिति के अनुकल ही है और यह होना ही चाहिए। सर् मैं जो निरन्तर महसूस करता हु वो यह है कि विगत दशक में हमने जो विज्ञान गणित,अंग्रेजी प्रक्षिणन में धयन केंद्रित किया उसके परीणाम स्वरुप भाषा शिक्षण, एवम भाषा शिक्षक दोनों ही शाला स्तर पर किनारे हो गए जो शिक्षक पढ़ने में कमजोर होता है वो ही भाषा शिक्षण करता है भाषा शिक्षण बहुत बहुत किनारे हो गया फिर क्षेत्रीय बोली कि समस्या ,अक्ल शिक्षक शाला, विभिन्न ऐसे डिग्री धारी शिखको का आना जिन्होने नॉकरी प्राप्त करने के लिए मात्र बीएड ded किया परंतु उन्हें भाषा शिक्षण की विधियों का ,काश शिक्षण का कोई ज्ञान नही यह तक कि बल मनोविज्ञान, और ब्लैकबोर्ड वर्क का ज्ञान भी नही अत्यंत दुःखद स्थिति है प्राथमिक शालाओ मो में मेरे क्षेत्र में में मुझे लगता है शाला में जिस भाषा मे शिखने शिखने की प्रक्रिया हो रही है वह बहुत बहुत ज्यादा सामान्य बात करने की आवश्यकता है छात्रों से ताकि उनके पास एक सब्द भंडार दिया जा सके फिर पढ़ना और शिखने सरल हो जता है आपके निर्देश ,मार्गदतन, अत्यंत उपयोगी है, हम पूरी तरह पालन करने और करवाने में लग रहे है

अखिलेश मिश्र On: 23/01/2023

Resp sir आपका लेख निसन्देह भाषा शिक्षण हेतु आदर्श स्थिति के अनुकल ही है और यह होना ही चाहिए। सर् मैं जो निरन्तर महसूस करता हु वो यह है कि विगत दशक में हमने जो विज्ञान गणित,अंग्रेजी प्रक्षिणन में धयन केंद्रित किया उसके परीणाम स्वरुप भाषा शिक्षण, एवम भाषा शिक्षक दोनों ही शाला स्तर पर किनारे हो गए जो शिक्षक पढ़ने में कमजोर होता है वो ही भाषा शिक्षण करता है भाषा शिक्षण बहुत बहुत किनारे हो गया फिर क्षेत्रीय बोली कि समस्या ,अक्ल शिक्षक शाला, विभिन्न ऐसे डिग्री धारी शिखको का आना जिन्होने नॉकरी प्राप्त करने के लिए मात्र बीएड ded किया परंतु उन्हें भाषा शिक्षण की विधियों का ,काश शिक्षण का कोई ज्ञान नही यह तक कि बल मनोविज्ञान, और ब्लैकबोर्ड वर्क का ज्ञान भी नही अत्यंत दुःखद स्थिति है प्राथमिक शालाओ मो में मेरे क्षेत्र में में मुझे लगता है शाला में जिस भाषा मे शिखने शिखने की प्रक्रिया हो रही है वह बहुत बहुत ज्यादा सामान्य बात करने की आवश्यकता है छात्रों से ताकि उनके पास एक सब्द भंडार दिया जा सके फिर पढ़ना और शिखने सरल हो जता है आपके निर्देश ,मार्गदतन, अत्यंत उपयोगी है, हम पूरी तरह पालन करने और करवाने में लग रहे है

अखिलेश मिश्र On: 23/01/2023

Resp sir आपका लेख निसन्देह भाषा शिक्षण हेतु आदर्श स्थिति के अनुकल ही है और यह होना ही चाहिए। सर् मैं जो निरन्तर महसूस करता हु वो यह है कि विगत दशक में हमने जो विज्ञान गणित,अंग्रेजी प्रक्षिणन में धयन केंद्रित किया उसके परीणाम स्वरुप भाषा शिक्षण, एवम भाषा शिक्षक दोनों ही शाला स्तर पर किनारे हो गए जो शिक्षक पढ़ने में कमजोर होता है वो ही भाषा शिक्षण करता है भाषा शिक्षण बहुत बहुत किनारे हो गया फिर क्षेत्रीय बोली कि समस्या ,अक्ल शिक्षक शाला, विभिन्न ऐसे डिग्री धारी शिखको का आना जिन्होने नॉकरी प्राप्त करने के लिए मात्र बीएड ded किया परंतु उन्हें भाषा शिक्षण की विधियों का ,काश शिक्षण का कोई ज्ञान नही यह तक कि बल मनोविज्ञान, और ब्लैकबोर्ड वर्क का ज्ञान भी नही अत्यंत दुःखद स्थिति है प्राथमिक शालाओ मो में मेरे क्षेत्र में में मुझे लगता है शाला में जिस भाषा मे शिखने शिखने की प्रक्रिया हो रही है वह बहुत बहुत ज्यादा सामान्य बात करने की आवश्यकता है छात्रों से ताकि उनके पास एक सब्द भंडार दिया जा सके फिर पढ़ना और शिखने सरल हो जता है आपके निर्देश ,मार्गदतन, अत्यंत उपयोगी है, हम पूरी तरह पालन करने और करवाने में लग रहे है

अखिलेश मिश्र On: 23/01/2023

Resp sir आपका लेख निसन्देह भाषा शिक्षण हेतु आदर्श स्थिति के अनुकल ही है और यह होना ही चाहिए। सर् मैं जो निरन्तर महसूस करता हु वो यह है कि विगत दशक में हमने जो विज्ञान गणित,अंग्रेजी प्रक्षिणन में धयन केंद्रित किया उसके परीणाम स्वरुप भाषा शिक्षण, एवम भाषा शिक्षक दोनों ही शाला स्तर पर किनारे हो गए जो शिक्षक पढ़ने में कमजोर होता है वो ही भाषा शिक्षण करता है भाषा शिक्षण बहुत बहुत किनारे हो गया फिर क्षेत्रीय बोली कि समस्या ,अक्ल शिक्षक शाला, विभिन्न ऐसे डिग्री धारी शिखको का आना जिन्होने नॉकरी प्राप्त करने के लिए मात्र बीएड ded किया परंतु उन्हें भाषा शिक्षण की विधियों का ,काश शिक्षण का कोई ज्ञान नही यह तक कि बल मनोविज्ञान, और ब्लैकबोर्ड वर्क का ज्ञान भी नही अत्यंत दुःखद स्थिति है प्राथमिक शालाओ मो में मेरे क्षेत्र में में मुझे लगता है शाला में जिस भाषा मे शिखने शिखने की प्रक्रिया हो रही है वह बहुत बहुत ज्यादा सामान्य बात करने की आवश्यकता है छात्रों से ताकि उनके पास एक सब्द भंडार दिया जा सके फिर पढ़ना और शिखने सरल हो जता है आपके निर्देश ,मार्गदतन, अत्यंत उपयोगी है, हम पूरी तरह पालन करने और करवाने में लग रहे है

परमानंद बंजारे On: 23/01/2023

बच्चों में भाषायी कौशल विकास हेतु हमें प्रत्येक बच्चे के रिपोर्ट कार्ड बनाने होंगे फिर उसके बाद

Suresh Kumar Sahu On: 23/01/2023

कहानी , कविता,गीत,संगीत,प्रहसन, सामान्य बातचीत आदि के माध्यम से हम बच्चों कोअच्छी भाषा शिक्षा दे सकते हैं,इसके लिए सर्वोपयुक्त शिक्षण सामग्री के रूप मे स्मार्ट टीवी हो सकती है पर हमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि रटना कोई नकारात्मक सोच नहीं है बच्चे पहले तो रटेंगे ही समझ धीरे धीरे बाद में आएगा।

Bise Lal On: 23/01/2023

मैं भी अपने बच्चों के साथ इसी तरह व्यवहार करता हूं आपका लेख मुझे बहुत पसंद आया और बहुत कुछ सीखने को भी मिला आपको कोटि-कोटि धन्यवाद साथ हुआ था

Dr. Omprakash Verma On: 23/01/2023

बहुत ही सुंदर लेख, मैं बच्चों के साथ इसी तरह व्यवहार करता हूं इसीलिए यह लेख मुझे और भी अच्छा और प्रभावी लगा। आप इस तरह की सोच को लेख के माध्यम से हम तक आपने पहुंचाया । प्रणाम के साथ साथ बहुत-बहुत धन्यवाद ,साधुवाद

Rohit Kumar sahu On: 23/01/2023

अभिव्यक्त होकर हिन्दी शायद नहीं सीखा सकते ।हमे हिन्दी के लिए वातावरण तैयार भी करना होगा अर्थात शिक्षक विद्यार्थी सभी हिन्दी बोलने का अभ्यास कर संकोच मिटा सकते फिर जो सुनना होगा उनका बोलना भी संभव होगा और उसे लिखना भी आसान होगा।तब परीक्षा मे लिखना भी हो पायेगा तथा बाहरी व्यक्ति अर्थात हमारे आकलनकर्ता या अधिकारी से अपना संवाद भी कर पायेगा।अक्षर से शब्द सिखाने के जगह शब्द से अक्षर आसान होता है जैसे फल का चित्रव उसके नीचे फल लिखा होने से बच्चा फल पढ़ता है और फ ल को पहचान लेता है निजी विद्यालय मे हिन्दी बोला जाने के कारण वातावरण मिलता है और बिना संकोच के घर के भाषा से अलग (हिंदी) भी बोलना सीख जाता है अतः हम जो बोलेंगे वही लिखेंगे तो शायद बच्चा सीखेगा और बोलेंगे अलग ,लिखेंगे अलग तो व्यक्त कुछ भी नही हो पाता ।संकोच होता है और गलत न हो जाए तथा उपहास के पात्र न बन जाए इस डर मे बोलती नहीं खुलती जैसे हम को अंग्रेजी भाषा मे होती है।इसलिए हिन्दी के लिए वातावरण उपलब्ध कराने से हिन्दी सीखेंगे। छत्तीसगढ़ी मे भावार्थ बताना जरूरी है ताकि वस्तु की पहचान बन जाए क्योंकि मातृभाषा सीख गया /रहा होता है । सुना हुआ ,लिखा हुआ और व्यक्त हुआ एक भाषा मे हो परिणाम दिखेगा ।

Rohit Kumar sahu On: 23/01/2023

बच्चे अपने मातृभाषा में अभिव्यक्त होने मे सहजता महसूस करता है और दूसरे भाषा में संकोच करता है ।हमारे पुस्तक हिन्दी मे लिखा होता है । हम भी बच्चे के भाषा का उपयोग कक्षा मे करते है।बच्चा केवल मातृभाषा ही सीख रहा होता है और जब लिखने की बारी आती है तो हिन्दी लिखना और यादकरना होता ऐसे मे लिख तो लेता है पर उसे प्रयोग/उच्चारण के लिए उसे वातावरण न स्कूल मे मिलता है और न ही घर मे ।ऐसे मे लिखे को व्यक्त होना असहज हो जाता है और हम न हिन्दी सीखा पाते है और न वह परीक्षा मे लिख पाता है।शब्द का अंतिम लक्ष्य वस्तु की समझ करान होता है ऐसे में हमें वातावरण उपलब्ध कराना होगा।हम छत्तीसगढ़ी मे ही

रबीन्द्र नाथ मिश्र On: 23/01/2023

आदरणीय श्रीमान सादर प्रणाम ।आपका चिॅतन बालक की भाषा के विकास का अनुशीलन है । आपकी चिंता सामयिक अनिवार्यता है ।अध्यातक

Narendra kumar choudhary On: 23/01/2023

सर जी प्रणाम मैने आपके विचारों को गंभीरता से पढ़ा बच्चो को किसी भी वस्तु या अन्य छात्रों के बारे में बोलने की आदत का जो तरीका आपने बताया है उस पर मैं स्कूलों में जाकर जरूर अमल करूंगा त

Yogesh kumar Barhai On: 23/01/2023

सर जी सादर प्रणाम मैं आपके लेख को गंभीरता से अध्ययन किया मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और बच्चा विद्यालय आने के पूर्व हि बहुत कुछ सिख गया रहता है लेकिन विद्यालय मे परिवेश नहीं मिलने के करन गुमशुम हो जाता है जो कि गलत है। सर जी मैं छोटे-छोटे को आसानी से अंग्रेजी कैसे सिखा सिखाये ? इस पर कार्य किया है और एक छोटी सी पुस्तक सह वर्कबूक तैयार किया हूँ लेकिन परिवेश नहीं मिलने के कारण शासकीय क्षेत्रो मे सफलता नहीं मिल पा रही है।

संतोष कुमार तारक On: 23/01/2023

बहुत ही सुंदर लेख सर जी मुझे खुशी है कि मै अपने स्कूल में बच्चों के साथ इस तरह की गतिविधियां करता हूं, सादर प्रणाम सर जी

संतोष कुमार तारक On: 23/01/2023

बहुत ही सुंदर लेख सर जी मुझे खुशी है कि मै अपने स्कूल में बच्चों के साथ इस तरह की गतिविधियां करता हूं, सादर प्रणाम सर जी

Dipti mishra gandecha On: 22/01/2023

आपकी बातों से पूर्ण सहमत आपको सादर प्रणाम मेरे हिसाब से हमको मातृभाषा या स्थानीय भाषा में सीखने हेतु प्रयास करना चाहिए क्यो न हम सीधे से उनकी माताओं को ही हफ्ते में एक बार बुलवाकर उनके सामने हफ्ते भर की रिपोर्टिंग de sir hota ye hai ki bchche Ghar Jane ke bad bag fek kar khelne me lag jate hai yadi ham bchcho ke parivar ko individual जोड़कर यह कार्य करें तो बच्चो में काफी सुधार होगा इसके साथ साथ स्कूल बंद होने के बाद gav ke kuch educated bchcho ko is kary me sahyog le to hanara भाषा और गणित शिक्षण और सरल हो जाएगा ,,इससे बच्चे समुदाय के बीच भी उन्ही chijo ko सीखेंगे जो वो स्कूल में सीखते है बस माहौल मनोरंजक और भयमुक्त होना चाहिए इसी विचार के साथ मैं दिप्ती अपने विचार को यही विराम देती हु धन्यवाद कत

Dr. Omprakash Verma On: 22/01/2023

मैं आपकी लेख को गंभीरता से पढ़ा है, बहुत सही बातें लिखी है आपने मैं लगभग बच्चों से यही संप्रेषण उपयोग करता हूं

Dipti mishra gandecha On: 22/01/2023

आपकी बातों से पूर्ण सहमत आपको सादर प्रणाम मेरे हिसाब से हमको मातृभाषा या स्थानीय भाषा में सीखने हेतु प्रयास करना चाहिए क्यो न हम सीधे से उनकी माताओं को ही हफ्ते में एक बार बुलवाकर उनके सामने हफ्ते भर की रिपोर्टिंग de sir hota ye hai ki bchche Ghar Jane ke bad bag fek kar khelne me lag jate hai yadi ham bchcho ke parivar ko individual जोड़कर यह कार्य करेत

Dipti mishra gandecha On: 22/01/2023

आपकी बातों से पूर्ण सहमत आपको सादर प्रणाम🙏

Inder Preet Kaur kukreja On: 22/01/2023

आपने बिल्कुल सही कहा सर जी जब बच्चे शाला में आते हैं तो यह उनके लिए बिल्कुल ही एक नया वातावरण होता है बच्चा नहीं जानता कि वो यहां कुछ सीखने आया है जब हम बच्चे के साथ उसकी परिचित भाषा में बातचीत करते हैं उससे जुड़ते हैं तो बच्चा हमारे साथ उस परिचित भाषा के माध्यम से जो कि उसकी मातृभाषा है जुड़ाव महसूस करता है , जैसा कि हम सभी जानते ही हैं की एक परिचित भाषा ही एक नई भाषा को बोलना सीखने एवं लिखना सीखने का माध्यम है, तो क्यों न हम बच्चे को जो कि अभी इस नए माहौल में आया है और किताबों की भाषा से बिल्कुल अपरिचित है , उसे उसकी भाषा में संवाद करते हुए चित्रों के माध्यम से छोटे-छोटे खेल कूद गतिविधियों के माध्यम से सिखाते हुए धीरे-धीरे किताबी ज्ञान से जोड़ें जिससे बच्चों के मन में शुरू से ही पढ़ाई के प्रति भय उत्पन्न ना हो, और वे स्कूल को अपने लिए एक अच्छी खुशनुमा जगह समझें और धीरे धीरे सीखते हुए आगे बढ़ें।

Dr.Uma patel On: 22/01/2023

आपने मेरे दिल की बात लिख दी

Dr.Uma patel On: 22/01/2023

आपने मेरे दिल की बात लिख दी

Dayalu ram Netam On: 22/01/2023

जारी...(आश्रम शाला कमार भौजी में) वहां के बच्चों को हिन्दी, छत्तीसगढ़ी बोलना नही आता था। केवल उड़िया भाषा बोलते थे, और मुझे उड़िया बोलना नही आता था,इस अवस्था में एक दूसरे से बात -चीत संवाद करना मुश्किल हो रहा था, ऐसा नही था कि वे मेरे विचारों और प्रश्नों नही समझते थे।वे समझते थे लेकिन लेकिन मेरे भाषा में उसका उत्तर नही दे पाते थे। फिर मैंने, कुछ दिनों तक उनके स्थानीय क्षेत्रीय भाषा (उड़िया)को सीखा, और अब स्थिति ऐसा कि मैं उनके साथ उनकी भाषा में बातचीत कर सकूं।उसी प्रश्नों को जो पहले मैं हिन्दी या छत्तीसगढ़ी में पूछा था,उसको उनके ही बोलचाल की भाषा में पूछा - जैसे - तोर के नाव? मोर नाव गिरधर। तोर बुआ के नाव ? दामोदर। तोर बुआ केन्ती गला? नंद गला।इस तरह के तमाम प्रशना

मोहिनी गोस्वामी On: 22/01/2023

जो हम सीखा रहे हैं उससे मैं खुद संतुष्ट नहीं हूं कारण मैं

मोहिनी गोस्वामी On: 22/01/2023

Sir ji 🙏आपने सचमुच मेरे मन की बात रख दी है आज हम व्याकरण का ज्ञान बच्चो को बिलकुल भी नहीं देते बच्चे आज भी वही सिख रहे

Dayalu ram Netam On: 22/01/2023

जारी...(आश्रम शाला कमार भौजी में) वहां के बच्चों को हिन्दी, छत्तीसगढ़ी बोलना नही आता था। केवल उड़िया भाषा बोलते थे, और मुझे उड़िया बोलना नही आता था,इस अवस्था में एक दूसरे से बात -चीत संवाद करना मुश्किल हो रहा था, ऐसा नही था कि वे मेरे विचारों और प्रश्नों नही समझते थे।वे समझते थे लेकिन लेकिन मेरे भाषा में उसका उत्तर नही दे पाते थे। फिर मैंने, कुछ दिनों तक उनके स्थानीय क्षेत्रीय भाषा (उड़िया)को सीखा, और अब स्थिति ऐसा कि मैं उनके साथ उनकी भाषा में बातचीत कर सकूं।उसी प्रश्नों को जो पहले मैं हिन्दी या छत्तीसगढ़ी में पूछा था,उसको उनके ही बोलचाल की भाषा में पूछा - जैसे - तोर के नाव? मोर नाव गिरधर। तोर बुआ के नाव ? दामोदर। तोर बुआ केन्ती गला? नंद गला।इस तरह के तमाम प्रशना

Ritu Rao On: 22/01/2023

भाषा लैब का होना अत्यंत आवश्यक है सर जी जिसमें बच्चों को अपनी भावनाओं को बोलने एवं सुनने का अवसर प्रदान होगा जिससे अपनी बात कहें और उसके बाद अपनी त्रुटियों को सुने इससे बच्चों के भाषाई कौशल का विकास होगा और बच्चों मैं भाषा सीखने की रूचि बढ़ेगी को

Ritu Rao On: 22/01/2023

भाषा शिक्षण के विषय में आप के विचारों से मैं पूर्ण रूप सहमत हूँ |बच्चों में भाषा शिक्षण को रुचिपूर्ण बनाने के लिए विद्यालय में भाषा लैब

Ranjay Kumar Singh On: 22/01/2023

बच्चों की मातृ भाषा बच्चों को सीखने आगे बढ़ने में काफी मददगार है परंतु क्षेत्र के हिसाब से भाषा में थोड़ा बदलाव होता है जिसे शिक्षक समुदाय से सम्पर्क कर सीख सकते है बच्चो के साथ मातृ भाषा में बोलना बच्चे बहुत पसंद करते है साथ ही अपनत्व झलकता है प्रारंभिक कक्षाओं में मातृ भाषा बहुत महत्वपूर्ण शाबित होगा ।बस इसे हम सभी शिक्षकों को गंभीरता से लेने की जरूरत है यह बच्चो के मन के झिझक को भी दूर करने में सहायक होगा ।हमारा प्रमुख उद्देश्य बच्चे के भाषा को समझ कर आगे बढ़ाना होगा ।

Dayalu ram Netam On: 22/01/2023

बच्चों को भाषा सिखाने के लिए शिक्षक को भी उस क्षेत्र विशेष की भाषा की समझ होनी चाहिए। मैं अपना अनुभव साझा कर रहा हूं, जब मेरा पोस्टिंग ऐसे क्षेत्र में हुआ (आश्रम शाला कमार भौजी में

Dayalu ram Netam On: 22/01/2023

बच्चों को भाषा सिखाने के लिए शिक्षक को भी उस क्षेत्र विशेष की भाषा की समझ होनी चाहिए। मैं अपना अनुभव साझा कर रहा हूं, जब मेरा पोस्टिंग ऐसे क्षेत्र में हुआ (आश्रम शाला कमार भौजी में

Dayalu ram Netam On: 22/01/2023

बच्चों को भाषा सिखाने के लिए शिक्षक को भी उस क्षेत्र विशेष की भाषा की समझ होनी चाहिए। मैं अपना अनुभव साझा कर रहा हूं, जब मेरा पोस्टिंग ऐसे क्षेत्र में हुआ (आश्रम शाला कमार भौजी में

Dharmendra Kaiwart On: 22/01/2023

मैं आपकी लेख को गंभीरता से पढ़ा है, और अच्छा भी लगा।इससे शिक्षक, बच्चे, जनसमुदाय में एक अच्छा संदेश जायेगा।बच्चों को एक बेहतर मंच मिलेगा।

Dharmendra Kaiwart On: 22/01/2023

मैं आपकी लेख को गंभीरता से पढ़ा है, और अच्छा भी लगा।इससे शिक्षक, बच्चे, जनसमुदाय में एक अच्छा संदेश जायेगा।बच्चों को एक बेहतर मंच मिलेगा।

Ku. Prity soni On: 22/01/2023

Maine aapke vicharo ko achchhe se pda achchha bhi lga. Mujhe aise lgta hai ki bachche tbhi khulkr apni bate bol pate hai jb unhe lgta hai ki unki bhasha aur hmari bhasha me bilkul bhi antr n ho aisa hone se bhy smapt hota hai aur bhy n hone se ve apni bawnaye bol pate hai to mera manna hai ki kisi bhi vishy vstu ko sikhne k liye ydi bhy thoda sa bhi rhe to unhe srl chije bhi sikhne me dikkt hogi. Jaise bachche apni ma k dwara kthin vishy vstu ko aadani se sikhte hai kyuki bhy nhi hota. to mahol ko hme achchha bnane ki koshish krni chahiye.

Manoj kumar chandrakar On: 22/01/2023

महोदय जी,भाषा से संदर्भित आपके विचार काफी सराहनीय है। हमारे विचार से इसके लिए पहली कक्षा में भाषा के विषय में कम से कम 60% पाठ में सिर्फ चित्र कथन को समाहित करना चाहिए,जिसे देखकर बच्चे अपने भाषा में बोल सके और शिक्षक क्षेत्रिय भाषा के साथ साथ मानक भाषा का प्रयोग करेंगे।ऐसे करने पर बच्चों को दोहरा लाभ होगा।

Manoj kumar chandrakar On: 22/01/2023

महोदय जी,भाषा से संदर्भित आपके विचार काफी सराहनीय है। हमारे विचार से इसके लिए पहली कक्षा में भाषा के विषय में कम से कम 60% पाठ में सिर्फ चित्र कथन को समाहित करना चाहिए,जिसे देखकर बच्चे अपने भाषा में बोल सके और शिक्षक क्षेत्रिय भाषा के साथ साथ मानक भाषा का प्रयोग करेंगे।ऐसे करने पर बच्चों को दोहरा लाभ होगा।

Ishwari sinha On: 22/01/2023

भाषा विचारों के आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम है एक भाषा की अच्छी समझ दूसरे भाषा को सीखने में सरलता प्रदान करती है, बच्चों की घरेलू भाषा अच्छा ज्ञान उन्हें दूसरी अन्य भाषाओं को सीखने सिखाने के लिए सहायक है।घर पर हम बच्चों से जब से तुक बंदी अंताक्षरी खेलते हुए नये नये शब्दों का निर्माण करना सिखाते हैं, मैं भी अपने कक्षा में बच्चों को उनके घरेलू भाषा के साथ बातचीत करते हुए हिन्दी की ओर जोड़ती हूं , मैं कभी छत्तीसगढ़ी में बोलती हूं,और बच्चे उनका हिन्दी अर्थ बोलते हैं इस प्रकार खेलते हुए सिखते हैं। बच्चों को भाषा सिखने के लिए आनंददायक वातावरण और अवसर दें बच्चे बेहतर तरीके से सिखेंगे।

Ishwari sinha On: 22/01/2023

भाषा अपने विचारों को दूसरे तक पहुंचाने सबसे सशक्त माध्यम है,और‌ एक

चन्द्र प्रकाश कश्यप On: 22/01/2023

बिल्कुल सही है सरजी बच्चे को उनके परिवेश के अनुसार उनके मातृभाषा में भाषा सिखने के लिए अधिक से अधिक बातचीत करने का अवसर देनाचाहिए बच्चे सुन सुन कर मौखिक भाषा के साथ साथ भाषा लिखना भी सीख जायेगा|

Onkar Prasad On: 22/01/2023

आपके विचारों से पूर्णतया सहमत हैं। वास्तव में भाषा भी इसी तरीके से ही सिखाई जानी चाहिए । कक्षा एक की किताबों को देखें तो वह भी इसी तरीके से ही डिजाइन की गई है । किंतु ज्यादातर वर्णमाला , बारहखड़ी पढ़ना और लेखन पर ही ज्यादा ध्यान देते हैं। जिस कारण से बच्चों की अपेक्षित भाषा का विकास नहीं हो पा रहा है। बच्चों में भाषा का विकास करने के लिए हमें अपने पारंपरिक तरीकों से मोह त्यागने की आवश्यकता है । 🙏🙏

Ajay Kumar Nareti On: 22/01/2023

कोई भी भाषा किसी भी विषय को समझने के लिए आधार होता है। जबकि हमारे यहां विषय के रूप में पढ़ाया जाता है।

Ajay Kumar Nareti On: 22/01/2023

कोई भी भाषा किसी भी विषय को समझने के लिए आधार होता है। जबकि हमारे यहां विषय के रूप में पढ़ाया जाता है।

Ajay Kumar Nareti On: 22/01/2023

कोई भी भाषा किसी भी विषय को समझने के लिए आधार होता है। जबकि हमारे यहां विषय के रूप में पढ़ाया जाता है।

Kuber Singh Sahu On: 22/01/2023

Bacchon ko Bhasha sikhana bahut anivarya hai aur usmein shuddhta Lana bahut avashyak hai Sabhi bacchon Ko varnon Ko Yad aur kar sake likh sake aur apne shabdon ko banaa sake Shabd anuchchhed Kahani Ko shuddhta purvak padh kar samajh sake Bhasha Agar bacchon ko Achcha se aata hai to Anya subject V Achcha se padhaai kar sakta hai uske Arth ko samajh sakta hai isliye Bhasha per Vishesh Jod Diya Jana chahie bahut Achcha vichar Hai Sar

Deepak kumar thakur On: 22/01/2023

आपके बातो से मैं सहमत हूं सर, जैसा कि अन्य सभी विषयों को अच्छे से समझने के लिये, भाषा का अच्छी तरह से ज्ञान होना आवश्यक है शब्द का उच्चारण, मात्रा आदि का ज्ञान होना चाहिये, तभी अन्य विषयों को आसानी से समझ आयेगा, और समझने में सरल होगा

Swati Anand On: 22/01/2023

भाषा सीखने का एक सशक्त माध्यम है अगर आप सीखने सिखाने में भाषाओं का ध्यान रखेंगे तो सीखने सिखाने की प्रक्रिया और भी सरल हो सकती है जैसे कि स्थानीय भाषा में किन्ही शब्दों को जानना इसलिए जरूरी होता है क्योंकि अलग अलग स्थान पर इसका अलग अलग महत्व होता है भाषा एक माध्यम है दूसरे की समझ को समझने का और अपनी समझ को समझाने का हम भाषा के साथ बहुत सारे प्रयोग कर सकते हैं जिनमें खासकर छोटे बच्चों को बोलने का मौका देकर उनके सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाते हैं अक्सर शिक्षक ऐसा सोचते हैं कि वे शाला में बच्चों को बोलने का मौका देते हैं किंतु यह पूरी तरह सच नहीं है बच्चे शाला के वातावरण में घुलनहीं पाते शिक्षकों की अकादमिक भाषा या भाषा की स्पष्टता उन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति डर जैसे भाव उत्पन्न करती है जिसमें वह अपने अनुभव आधारित विषय वस्तु को भी बताने में झिझक महसूस करते हैं एक शिक्षक होने के नाते बच्चों को बोलने और अपने आप को अपनी स्थानीय भाषा में अभिव्यक्त करने का भरपूर मौका देना चाहिए वैसे भी सीखने की प्रक्रिया एक विकासात्मक प्रक्रिया है जिसमें हम धीरे-धीरे अपनी भाषाई त्रुटियों को सुधार करते हैं आज भी आमतौर पर हम छोटी-छोटी भाषाई त्रुटियों को सीख कर निरंतर सुधार कर रहे।सीखने की प्रक्रियाओं का एक निरंतर क्रम होत है जिसमें सुनना जिसमें आसपास की समझ अनुभव भावनात्मक मनोभाव आदि जैसे मने योग समाहित होते हैं और जब हम कहते हैं तब भी यही अनुभव मनोभाव भावनात्मक अभिव्यक्ति हम व्यक्त कर पाते हैं जब यह स्वास्थ्य वातावरण में देने लेने की प्रक्रिया बराबर होती है तक सीखना सरल और स्वाभाविक होता है। बच्चों को ज्यादा से ज्यादा अपने अनुभव साझा करने के मौके देना चाहिए ताकि वह भाषाई दक्षता को स्वयं के अनुभव से प्राप्त कर लें यहां शिक्षक एक सहायक के रूप में उनकी मदद कर सकता है। शिक्षक के पास सीखने के अनगिनउपकरण हैं जिसमें स्थानीयविषय से लेकर कर समाचार पत्र एर्क सशक्त माध्यम हैं आज जहाँ कुकह पिछड़े इलाकों में नेटकी सुविधा नही वहाँ कहानी क़िताब, पत्रिकाओं एवं एक्टिविटी बुक स्मार्ट क्लास ये सभी बच्चों को सीखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं स्वाति आनंद शिक्षक SCERT

Sanjay Kumar Pandey CAC Gaina On: 22/01/2023

Ji sir बिल्कुल सही कहा आपने जब प्रारंभिक कक्षाओं में सीधे शिक्षक खड़ी हिन्दी में संवाद करते हैं तो कुछ बच्चों द्वारा अपने पालकों से कई बार हमने कहते हुए सुना है कि गुरूजी अंग्रेजी में बोलते हैं वहाँ पर उस बच्चे की समझ खड़ी हिंदी को अंग्रेजी के रूप में है तथा स्थानीय मातृभाषा को हिन्दी के रूप में है अर्थात प्रारंभिक कक्षाओं में स्थानीय भाषा को जोड़ते हुए (उपयोग करते हुए) भाषायी दक्षताओं का अधिगम विकसित किया जाना उनके लिए रुचिकर होगा | स्थानीय बालगीत, कहानी को जोड़ते हुए आगे बढ़ना ग्रामीण क्षेत्रों के लिए नितांत आवश्यक है| निश्चित रूप से बच्चों के पढ़ाई की बुनियाद तो भाषा ही है| धन्यवाद संजय कुमार पाण्डेय संकुल समन्वयक संकुल केन्द्र- गैना विकास खण्ड- वाड्रफनगर जिला- बलरामपुर मो.नं. 9617168334

रमाकांत साहू शिक्षक शासकीय माध्यमिक विद्यालय फुसेरा कुरूद धमतरी On: 22/01/2023

आदरणीय सर आपके द्वारा किया गया पोस्ट मैंने गंभीरता से

Ramakant Sahu Ms fusera kurud dhamtari On: 22/01/2023

आदरणीय सर आपका द्वारा पोस्ट किया गया पोस्ट मैंने बहुत ही गंभीरता से क ई

Neelam kaur On: 22/01/2023

बच्चा अच्छा बोल सके उसके लिए सबसे पहले उसे सुनने की सुविधा देनी होगी , वो अच्छा लिखे इसके लिए उसे पढ़ने की और उसकी रूची होनी ज़रूरी है , उसके लिए सिलेबस से हट के उसकी रुचि की किताबें पढ़ने का अवसर उपलब्ध कराना शिक्षक का काम है , छोटे छोटे वाक्य शिक्षक क्लास में उपयोग करे जिससे बच्चे सुन के दोहराए , ट्रेन या कही भी अगर दो भाषा में जानकारी हो बच्चे इंगलिश ही पढ़े , बच्चों को जीवन से जोड़ के खेल खेल में भाषा सिखाई जाये !. जब कोई फ़िल्म देखे तो नीचे अंग्रेज़ी के टाइटल पढ़े , रोज़ कुछ वर्ड्स याद करे और उसका उपयोग वाक्यों में करना बहुत अच्छा है , बिना उपयोग आप भूल जाएँगे शब्दों को !!

Shweta shukla On: 22/01/2023

Bilkul sahi bat hai sir ji ...Ajkl na parents k pas time hai na teachers k pas k bachcho ko sune unse bat kare ..Kyoki wo jagah to ab mobile ne li hai ..Kyo na ham Saturday ko bagless day wale din ak children psychology ki class lekar unse bat kare unki bato ko sune is tarah bhasha k gyan ko bhi badhawa milega or bachcho se mentally emotionally judne k mouka bhi milega Even mai khud is tarah ki classes sages m leti hu Pricipal Sages bamnindi janjgir champa

Shweta shukla On: 22/01/2023

Bilkul sahi bat hai sir ji ...Ajkl na parents k pas time hai na teachers k pas k bachcho ko sune unse bat kare ..Kyoki wo agah to ab mobile ne li hai ..Kyo na ham Saturday ko bagless day wale din ak children psychology ki class

Shweta shukla On: 22/01/2023

Bilkul sahi bat hai sir ji ...Ajkl na parents k pas time hai na teachers k pas k bachcho ko sune unse bat kare ..Kyoki wo agah to ab mobile ne li hai ..Kyo na ham Saturday ko bagless day wale din ak children psychology ki

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