रचनाकार- डॉ. कमलेंद्र कुमार, रावगंज, कालपी जिला जालौन, उत्तर प्रदेश

1
जर्मन में 'जिन्के' सब कहते,
मैं हूँ धातु अजब।
एंड्रियास मार्ग्राफ ने खोजा है,
ये है बात गजब।

2
चमकदार, मजबूत, टिकाऊ,
घर- घर पाया जाऊँ।
लोहे और कार्बन से बनता,
बोलो क्या कहलाऊँ?

3
'एलुमेन' लैटिन में कहते,
चांदी जैसा रंग।
इससे खिड़की, बर्तन बनते,
बोलो राज तरंग।

4
लैटिन में 'फेरम' सब कहते,
हूँ बहुत फौलादी।
समझ बूझ कर बोलो बच्चो!
फिर चलें चौपाटी।

5
चमकीली, बहुमूल्य धातु मैं,
श्वेत है मेरा रंग।
पायल , बिछिया ,गुच्छा,कंगन ,
रख लो अपने संग।।

6
चमकदार बहुमूल्य धातु मैं,
पीला- पीला रंग।
कुंदन, कंचन कहते मुझको,
बोलो राज उमंग।।

7
चमकदार एक तरल धातु मैं,
बूझो मेरा नाम।
क्विकसिल्वर भी कहते मुझको,
धातु नहीं मैं आम ।।

8
लाल-लाल सा रंग है मेरा,
सदा प्रकृति में पाओ।
थाली, चम्मच , लोटा, बोतल,
बर्तन आदि बनाओ।।

9
प्रथम हटे तो 'तल' बन जाता,
अंत हटे तो 'पीत'।
तीन वर्ण का नाम है मेरा,
बोलो राम सुजीत।।

10
लैटिन में 'स्टैन्नम' कहते,
हूँ मैं धातु निराली।
रांगा भी कहते मुझको,
बोलो नव्या लाली।।

11
चाँदी जैसा रंग है मेरा,
तीन वर्ण का नाम।
मध्य हटे तो 'निल' कहलाऊँ,
धातु नहीं मैं आम।।

12
'प्लंबम' के नाम से मुझे,
सदा लोग पहचाने।
सोचो समझो और बताओ,
गाओ खूब तराने।।

उत्तर : 1-जस्ता(जिंक), 2-इस्पात(स्टील), 3-एल्युमिनियम, 4-लोहा(आयरन), 5-चांदी, 6-सोना, 7-पारा, 8-तांबा , 9-पीतल, 10-टिन, 11-निकिल, 12-लेड ।

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बाल पहेलियाँ

रचनाकार -गौरीशंकर वैश्य विनम्र, आदिलनगर. विकासनगर, लखनऊ

1
राष्ट्रीय फल हूँ मैं निराला।
मीठे रस का भरा है प्याला।
पका डाल का टपका है।
चूसो - खाओ सबका है।

2
दूर गगन में उड़ती हूँ।
लंबी डोर से जुड़ती हूँ।
हवा से बातें करती हूँ।
जोश हृदय में भरती हूँ।

3
लाल रंग की पेटी हूँ,
जिसमें पत्र हैं डाले जाते।
वहीं से पत्र मित्र तक पहुँचें
डाकघरों में शोभा पाते।

4
सोडियम और क्लोरीन तत्व से
योगिक बन जाता है नवीन ।
प्रायः रंग सफेद है इसका
जिसका स्वाद लगे नमकीन।

5
यदि संख्या के पीछे बैठूँ
तो संख्या को हो न गुमान।
संख्या के आगे बैठूँ तो
उसका करूँ दस गुना मान।

6
बादल ने पानी बरसाया।
नन्हीं बूँदों ने दुलराया।
सूरज की किरणों ने जैसे
रंगबिरंगा धनुष सजाया।
उत्तर - 1 आम 2 पतंग 3 पत्र पेटी 4 नमक 5 शून्य 6 इन्द्रधनुष

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पहेलियां

रचनाकार - प्रीति श्रीवास, मुंगेली ( छ. ग. )

1
बारिश होती, धूप निकलती,
आसमान में मैं हूँ दिखती।
रंग-बिरंगी सबको भाती,
बुझो-बुझो, क्या कहलाती?

2
पल में दुनिया की सैर कराऊँ,
घर बैठे सब ख़बर बतलाऊँ।
सही-गलत का भेद बताऊँ,
सच का आईना मैं दिखलाऊँ।

3
वर्षा ऋतु मुझको भाए,
बादल भैया मुझे रिझाए।
नाचूँ जब मैं पंख फैलाए,
सारा जग खुश हो जाए।

4
कुछ मीठे, कुछ कसीले,
जामुनी-काले, बड़े रसीले।
पेड़ों पर पके, गुच्छों में फले,
गर्मी में खाओ, गुणकारी कहे।

5
रंग-बिरंगी, गोल सी होती,
धूप-बारिश से हमें बचाती।
दादा जी की छड़ी बन जाती,
खूँटी पर मैं लटकी रहती।

6
धूप निकले तो सबको सताऊँ,
हवा लगे तो मैं छिप जाऊँ।
पानी नहीं, पर सबको नहलाऊँ,
स्वाद खारा, बोलो क्या कहलाऊँ?
उत्तर - 1) इंद्रधनुष 2) अखबार 3) मोर 4 ) जामुन 5 ) छतरी 6 ) पसीना

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पहेलियां

डॉo सत्यवान सौरभ,परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा

1
मोबाइल से बात कराऊं,
चुटकी में सब हाल सुनाऊं।
मुझमें बसी है चिप बड़ी,
पड़ो मुझे, मैं चीज़ नई।

2
कागज पर नहीं, स्क्रीन पर लिखते,
ऊंगली से चलते, चुपचाप दिखते।
बच्चों के हाथों में अब मैं हूं,
ज्ञान और गेम का संगम हूं।

3
दिखने में हूं गोल-गोल,
डिजिटल में करता कमाल।
पढ़ाता, गाता, ज्ञान बड़ाता,
घर में सबका मन बहलाता।

4
ना मैं पेड़, ना मैं फूल,
पर हवा दूँ ठंडी धूल।
गर्मी में सबको भाऊूं,
छत से लटककर मैं चल जाऊूं।

5
छू लो मुझको, जल जाऊूं,
गरम चीज़ें पकाऊं।
रोटी-सब्ज़ी झटपट दे दूं,
बिज्ली से काम मैं ले लूं।

6
सब्ज़ी-फल रखूं मैं ठंडे,
बिना बर्फ के रखूं मैं सहेजे।
गर्मी में भी ताज़ा रखूं,
सबके घर में मैं ही दिखूं।

7
ज्ञान का सागर समाया मुझमें,
सवाल-जवाब सब कुछ हैं इनमें।
एक क्लिक में सब बताऊं,
बच्चों का मैं प्यारा बन जाऊं।

8
उड़ता नहीं, फिर भी चलता,
घर से ऑफिस तक ही चलता।
बैठो उसमें आराम से,
घूमो शहर के हर काम से।

9
दो नहीं, चार पैर मेरे,
छत है मुझ पर, स्टीयरिंग घेरे।
भूख नहीं, पर पेट है बड़ा,
ईंधन पीकर भागूं ज़रा।

10
देखो मुझको, पर छू ना पाओ,
कभी गोल, कभी आड़ी-तिरछी बन जाओ।
मैं हूं रोशनी की एक छाया,
मुझमें छुपा है विज्ञान साया।

उत्तर: 1 टैब्लेट / टैब, 2: स्मार्टफोन 3: स्मार्ट टीवी 4: पंखा 5: इंडक्शन चूल्हा 6: फ्रिज / रेफ्रिजरेटर, 7: इंटरनेट / गूगल, 8: ईलेक्ट्रिक स्कूटर, 9: कार, 10: होलोग्राम

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