सच्चा संकल्प
लेखक - कन्हैया साहू शिक्षक, शा.प्रा.विद्यालय लमती, भाटापारा, जिला बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़

सूरज आग उगल रहा था। धूप इतनी तेज थी कि पेड़ की छाँव भी पसीना-पसीना हो जाए। सूखी जमीन तप रही थी और हरियाली जैसे रूठकर कहीं और चली गई थी। हर रोज की तरह गाँव के छह बच्चे—हर्षू, तानी, अन्नू, आस्था, आयुष और छोटा रीयू—स्कूल जा रहे थे। उनके पैर ज़मीन से यूँ उछलते थे मानो अंगारों पर चल रहे हों। आयुष ने माथे पर पसीना पोंछते हुए कहा, अरे धूप तो आज नाक में दम कर रही है, लगता है सूरज को भी गुस्सा आ गया है!छोटा रीयू बोला, गुस्सा तो बादल भी हो गए हैं। सालभर से गाँव की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा।
तानी ने एक टूटी हुई शाख को उठाकर ज़मीन पर मरोड़ा और बोली, बादल आएँगे भी कैसे? हमने तो उनके रास्ते ही बंद कर दिए हैं। पेड़ काट दिए, नदियाँ सुखा दीं... अब हम किस मुँह से बारिश माँगें?हर्षू ने कहा, सच में! खेत जैसे बूढ़े हो गए हैं, सूखे और थके हुए। लगता है जैसे हरियाली को किसी ने जादू से गायब कर दिया हो।स्कूल पहुँचने तक बच्चों के जूते मिट्टी में धँस चुके थे और चेहरे सूरज की तरफ से मुंह फेरते-फेरते थक चुके थे। मास्टर जी ने भी थक कर क्लास में कहा, बच्चों, आज विज्ञान नहीं, जीवन पढ़ेंगे। पर्यावरण का पाठ पढ़ेंगे... वरना कल पानी को तरसेंगे।
शब्द बच्चों के दिल में गूँजने लगे। वापस लौटते हुए आयुष बोला, कहीं हम सचमुच ऐसा गाँव न बन जाएँ जहाँ किताबों में बारिश हो और ज़िंदगी में नहीं। आस्था ने सिर झुकाकर कहा, बिलकुल... अगर अब भी हम नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—'बादल कहाँ चले गए?'
उसी शाम, गाँव के मंदिर के पास पीपल के नीचे सभी बच्चे बैठे। अन्नू ने कहा, हम बच्चे हैं, पर बेअक्ल नहीं! अगर बड़े नहीं समझते तो हम समझेंगे! आस्था ने सुझाव दिया, स्कूल के पीछे जो जमीन पड़ी है, वहाँ हम पेड़ लगाएंगे। हर बच्चा एक पौधा गोद ले। छोटा रीयू ने तालियाँ बजाईं, और उसका नाम भी रखेंगे! मेरा पेड़ होगा 'छोटी बूँद'! बच्चों ने अपने पुराने बोतल, टूटी बाल्टी और घर के फावड़े इकट्ठे किए। गाँव के बुज़ुर्ग पहले हँसे, अरे! ये बच्चे क्या पेड़ उगाएँगे? लेकिन धीरे-धीरे सबका दिल पिघलने लगा। हर दिन बच्चे स्कूल से लौटकर पौधों की सेवा करते। कभी किसी के घर से गोबर लाते, कभी नदी से पानी भरते। धूप और मच्छर से जूझते, लेकिन न हारते। एक दिन आयुष के पिता ने खुद आकर एक पेड़ लगाया। मुझे माफ़ कर दो बेटा, अब समझ में आया कि असली काम तो तुम कर रहे हो। धीरे-धीरे गाँव में जैसे चेतना फैलने लगी। पंचायत ने फैसला किया—हर घर एक पेड़ लगाएगा। अगले साल जुलाई की एक सुबह थी। बच्चे स्कूल जा रहे थे। आसमान अब भी हल्का था लेकिन हवा में कुछ अलग था—एक सौंधी सी खुशबू, एक मीठी सरसराहट... तानी ने खुशी से उछलकर कहा,
रुको! सुनो! ये पत्तों की सरसराहट नहीं, ये तो बादल के चप्पलों की आवाज़ है! फिर एक बिजली चमकी, और देखते ही देखते बादल उमड़ पड़े, जैसे पुराना वादा निभाने आए हों। बारिश शुरू हो गई, धरती खिल उठी।
बच्चे भीगते-भीगते नाच उठे। हर्षू ने आसमान की ओर देखकर कहा, अब नहीं पूछेंगे—बादल कहाँ गए थे। अब सब जान गए हैं, वो यहीं थे... बस हमारे सुधरने का इंतज़ार कर रहे थे। प्रकृति हमारी माँ है। जब हम उससे मुँह मोड़ते हैं, तब वह भी हमें दरकिनार कर देती है। लेकिन एक नन्ही-सी कोशिश, एक सच्चा संकल्प, और थोड़ी मेहनत से हम बादलों को फिर से बुला सकते हैं। बच्चे अगर ठान लें, तो आसमान भी झुक सकता है। आस्था ने जोर देकर कहा।
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योग्यता
लेखक - प्रिया देवांगन, राजिम, जिला – गरियाबंद , छत्तीसगढ़

रागिनी! लाओ तुम्हारे पास जितनी भी पढ़ाई–लिखाई और स्पोर्ट्स वगैरह की डिग्री हैं, सभी ले आओ। रागिनी की सासू माँ आरती की थाली दिखाती हुई बोली। रागिनी चौंक गई! मम्मी जी; आप मेरी डिग्री का क्या करेंगी? भला आप का क्या लेना–देना है उससे? रागिनी अपने मोबाइल में अंगूठा सरकाती हँसती हुई बोली। आरती की थाली पूजा स्थान में रखती हुई सासू माँ बोली- रागिनी.... मैं मजाक नहीं कर रही हूँ।सासू माँ की आवाज जैसे ही तेज उड़ान भरने लगी वैसे ही सोफा में मोबाइल रखती घबराती हुई रागिनी बोली– मम्मी जी, आप मेरी डिग्री क्यों माँग रही? मुझे समझ नहीं आ रहा है।गैस खत्म हो चुका है, चूल्हे में डालकर आग जलाना है। क्या? रागिनी चौंक गई। मम्मी जी बात को यूँ ही स्प्रिंग की तरह गोल–गोल मत घुमाइए न, ये भी कोई बात है? बस.....यही सुनना रह गया था। हर सवाल का उत्तर है तुम्हारे पास लेकिन ये नहीं समझना है कि मैं क्यों और क्या बोलना चाहती हूँ। जब देखो फ्रेंड्स, रील्स, व्हाट्सएप वगैरह......वगैरह.......! सारा दिन इसी में लगी रहती हो। इतने में ही जीवन व्यतीत करना है? क्या इसी के लिए इतनी पढ़ाई की है? पाई–पाई जोड़कर तुम्हारे पेरेंट्स ने पढ़ाया–लिखाया है, उसका ज़रा सा भी ख्याल नहीं है तुम्हे? ससुराल आ गई हो तो अपना फ़र्ज़ और सपना भूल गई हो? भगवान के आशीर्वाद से हम सम्पन्न हैं लेकिन हम यूँ ही लोगों में उलझने के बजाय एक अच्छा काम करें और अपने जीवन को खुशहाल बनाएँ। ऐसा क्यों नहीं सोच सकती? रागिनी तुम बहुत होनहार लड़की हो, मैं चाहती हूँ अपने हुनर को सामने लाओ और अच्छे कार्य करो। सोशल मीडिया में रहकर ही तुम लोगों को मोटिवेट क्यों नहीं करती; आजकल ऑनलाइन वर्क हो रहा। तुम्हें कहीं भी जाना नहीं पड़ेगा। स्नेह और आत्मविश्वास के साथ सासू माँ बोली।
मम्मी जी! आपने आज मेरे नयन पट खोल दिए। आपने मेरे बँधे हुए पंखों को आज़ाद कर दिया। मुझे नहीं पता था कि एक ऐसा भी ससुराल होता है जहाँ बहुओं को स्वावलंबी होने का हक मिले। ये तो मेरा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसी प्रेरणा देने वाली सासू माँ मिली। मैं धन्य हो गई! बोलती हुई रागिनी ने सासू माँ को झट से गले लगा लिया। सासू माँ रागिनी के सर पर हाथ फेरने लगी।
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पहला दिन
लेखक -श्रीमती चंदा सिन्हा, शास. प्राथ. शाला बीजागोड़, सुवरतला, जिला बेमेतरा

विद्यालय का पहला दिन अपनी कक्षा में मासूम भोले भाले नन्हें नन्हें नये चेहरे देखकर आज सिन्हा मेम खूब खुश थी। प्रिंटरिच दृश्यों से सजी उसकी कक्षा नन्हीं फूलों की बगिया लग रही थी।
ऑगनबाड़ी के खुले वातावरण में रहने वाले इन मासूम फूलों को विद्यालय के नियमों से कोई सरोकार नहीं था।उन बच्चों को देखकर सिन्हा मेम के मन में एक बहुत ही प्यारा सा विचार आया वैसे भी उसका विद्यालय नवाचार के लिए जाना जाता था ।अपने इसी हुनर को वो नये आयाम देना चाहती थी उसे याद है पिछले बरस उसने नन्हें बच्चों के प्रथम दिवस उनके हाथों के चिन्ह एवं पाँवों के पदचिन्ह निशानी के तौर पर लेकर कक्षा में लगा दिये थे ।बच्चे उसे देखकर बहुत खुश होते थे।
इस बार सिन्हा मेम ने क्राफ्ट पेपर से फूलों की आकृतियाँ बनाकर उसमें हरे पत्ते लगा दिये।बहुत ही सुंदर फूलों की कतारें ही लग गयी। कुछ ही देर में नवप्रवेशी बच्चे कतारबद्ध कक्षाओं की तरफ बढ़ने लगे।प्रधानपाठक सरजी उन्हें गुलाल से और पीले अक्षत से टीका लगाते और एक सुंदर क्राफ्ट से बना फूल बच्चों को उपहार दिये जा रहे थे।मिठाई से मुँह भी मीठा कर बच्चे जैसे ही आगे बढ़ते सिन्हा मेम उनके स्वागत के लिए ग्रीटिंग कार्ड की सुंदर मनमोहक गतिविधियों की लडियाँ लिये खड़ी थी।बच्चे वारी बारी से बच्चे अपनी पसंद की गतिविधियाँ जैसे हाथ मिलाना, पिंकी शेक,गले लगाना,हैंड शेक करके भीतर जा रहे थे।बच्चे आज इन मजेदार गतिविधियों का खूब आनंद ले रहे थे। कुछ ही समय में सरपंच महोदय का आगमन और वे अपने हाथों से बच्चों को गणवेश वितरित किये और सभी नव प्रवेशी के हाथों में फूलों को देखकर खुश होकर बोले सिन्हा मेमजी आज तो नन्हें फूलों ने फूलों को ही थाम लिया है।सिन्हा मेम ने हँसते हुए कहा _हाँ जी,भैयाजी।ये हमारी बगिया के नन्हें फूल हैं।और सभी खिलखिलाकर हॅंस पड़े इन हँसते पलों को कैमरामैन ने अपने कैमरे में हमेशा के लिए कैद कर लिया।
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गुरु का महत्व सार्वकालिक
लेखक - अशोक पटेल, तुस्मा,शिवरीनारायण(छ ग)
प्राचीन कालों की बात की जाय तो इस कालों में गुरुओं का अत्यंत महत्व होता था,मानव समाज में ये आदरणीय,सम्मानीय,और पूज्य हुआ करते थे। गुरुओं के बिना कोई भी धार्मिक कार्य सम्पन्न नही होता था।हम चाहे सतयुग की बात करें या त्रेता की या फिर द्वापर युग की और फिर आता है कलयुग।सभी युगों में कालों में गुरुओं को भगवान से भी बढ़कर माना जाता था।सतयुग में जिस प्रकार वेद-व्यास गुरु हुए तो त्रेता में गुरु वशिष्ठ,विश्वामित्र तो द्वापर में द्रोणाचार्य संदीपनी गुरु,सभी ने अपने आश्रम में रहकर अपने शिष्यों को धर्म अर्थ काम मोक्ष की शिक्षा तो प्रदान की ही इसके अलावा,जीव,आत्मा,शरीर,ब्रम्ह और जगत के बारे में पूर्ण ज्ञान प्रदान करते थे।गुरु चार पुरुषार्थ,चार आश्रम,चार वेद,आदि-आदि के बारे में गंभीर ज्ञान की बाते बताया करते थे।ये गंभीर ज्ञान शिष्यों के लिए अति महत्वपूर्ण माना जाता था। गुरुओं के द्वारा ऐसा कोई क्षेत्र या कोई विषय नही रहता था जिस पर उनके द्वारा न बताया जाता हो। जो गुरु ऐसा ज्ञान प्रदान करे वही पूर्ण गुरु या फिर सद्गुरु के रूप माना जाता था,वही जनसमाज में गुरु के रूप में परिभाषित होते थे।और उन्ही को गुरु के रूप में सम्बोधन किया जाता था,जो अपने आप में सम्मान और गौरव की बात हुआ करती थी।और इस प्रकार से गुरुओं को सबसे ऊंचा माना जाता था। इसीलिए कहा जाता है-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः,
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
गुरुओं का अपना एक विशेष महत्व है।गुरु अपने शिष्यों को अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर उसे ज्ञान के प्रकाश की ले जाते हैं।गुरु दो शब्दों से मिलकर बना गु+रुअर्थात गु का मतलब अंधकार और रु का मतलब प्रकाश।अर्थात गुरु वही है जो अंधकार भरे जीवन में प्रकाश भर दे। इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि गुरु ही माता गुरु ही पिता और गुरु ही सर्वस्व हैं। यही गुरु आगे चलकर एक शिक्षक के रूप में हमारे सामने आया।जो कभी गुरु कहलाता था अब वह शिक्षक हो गया।किसी युग में जो महिमा गुरु की हुआ करती है,आज उस महिमा में तनिक गिरावट आई है।गुरुओं का जो आदर्श,निष्ठा,ज्ञान, संस्कार,और नैतिकता हुआ करती थी,आज वह दिखाई नही देता।जबकि काम तो वही है,बस नाम बदला रूप बदला।बाकी तो जो गुण एक गुरु में होता है वही गुण शिक्षक में भी होना चाहिए।जो आज नही है।बच्चों के लिए शिक्षक ही सब कुछ होता है।शिक्षक सर्वगुणी सर्व सम्पन्न होता है,यही बच्चों का भाग्य-विधाता होता है।समाज का देश का सच्चा मार्गदर्शक होता है।इसीलिए चाणक्य ने ठीक ही कहा है- 'शिक्षक कभी साधारण नहीं होता,प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं'।
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अमर वीर बलिदानी कैप्टन मनोज पाण्डेय
लेखक - गौरीशंकर वैश्य विनम्र, आदिलनगर. विकासनगर, लखनऊ
सन् 1999 के कारगिल युद्ध में अनेक वीर सेनानियों ने अपने पराक्रम से शत्रुओं की कुटिल चालों को ध्वस्त करके विजयश्री प्राप्त की थी। इस युद्ध में महान वीर योद्धा कैप्टन मनोज पाण्डेय वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उन्हें मरणोपरांत वीरता का सर्वोच्च पदक परमवीर चक्र प्रदान किया गया था। बलिदानी कैप्टन मनोज पाण्डेय 3 जुलाई, 1999 को सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण खालूबार पोस्ट को दुश्मनों से मुक्त कराते हुए बलिदान हो गए थे। कैप्टन मनोज पाण्डेय का जन्म 25 जून, 1975 को सीतापुर जनपद में नैमिष की पावन भूमि ग्राम रूढ़ा में गोपीचंद पाण्डेय और मोहिनी पाण्डेय के घर हुआ था। तब उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल (वर्तमान कैप्टन मनोज पाण्डेय यू पी सैनिक स्कूल) और फिर रानी लक्ष्मी बाई मेमोरियल स्कूल लखनऊ से शिक्षा प्राप्त की थी। तत्पश्चात उनका चयन एनडीए में हो गया।। कैप्टन मनोज पाण्डेय को 6 जून, 1997 को 1/11 गोरखा राइफल्स में कमीशंड प्रदान किया गया। उनकी पहली ही नियुक्ति आतंक प्रभावित क्षेत्र जम्मू के नौशेरा में हुई थी, जबकि दूसरी नियुक्ति सियाचिन में 18 हजार फीट की ऊँचाई पर की गई। वहाँ डेढ़ वर्ष की नियुक्ति के बाद उनकी पलटन को पुणे जाने का आदेश दिया गया। पलटन को पूरी रसद और हथियार पुणे भेजे जा चुके थे। उनकी पलटन भी वापस हो रही थी कि अचानक बताया गया कि कारगिल में दुश्मन ने घुसपैठ कर ली है। कैप्टन मनोज पाण्डेय को उनकी कंपनी के साथ कारगिल के बटालिक सेक्टर खालूबार की हिमाच्छादित ऊँची चोटी को दुश्मनों के कब्जे से मुक्त कराने का आदेश मिला।
कैप्टन मनोज पाण्डेय 3 जुलाई, 1999 को खालूबार में ऊँची चोटी पर दुश्मन देश पाकिस्तान की सैनिक टुकड़ी के कब्जे से बंकर को मुक्त कराते हुए आगे बढ़े। उन्होंने तीन बंकरों को ध्वस्त कर दिया और चौथे बंकर पर कब्जा करने के लिए आगे की ओर बढ़े ही थे कि दुश्मन की गोली उनको लगी। अंतिम सांस लेने तक उन्होंने दुश्मन की सैनिक टुकड़ी का चौथा बंकर भी दुश्मन से मुक्त करा लिया । टुकड़ी को तहस - नहस करके भारतमाता के चरणों में हँसते - हँसते आत्मोत्सर्ग कर दिया। उनको वीरता का सर्वोच्च पदक परमवीर चक्र (मरणोपरांत) मिला।
लखनऊ में छावनी स्थित कैप्टन मनोज पाण्डेय नाम से एक चौराहा है, जहाँ उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है। वीर बलिदानी की प्रतिमा पर जन्म जयंती तथा पुण्य तिथि पर उनके सम्मान में पुष्पांजलि अर्पित की जाती है। कैप्टन मनोज पाण्डेय सदैव अमर रहेंगे और प्रेरणास्रोत के रूप में चिरस्मरणीय रहेंगे।देश के सच्चे सपूत वीर सेनानी को शतशःनमन।
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