चित्र देखकर कहानी लिखो

पिछले अंक में हमने आपको यह चित्र देख कर कहानी लिखने दी थी–

हमें जो कहानियाँ प्राप्त हुई हम नीचे प्रकाशित कर रहे हैं-

रचनाकार - संतोष कुमार कौशिक शिक्षक, शास.पूर्व माध्य. विद्यालय ककेड़ी, जिला-मुंगेली, द्वारा भेजी गई कहानी

लौट आओ पेड़

एक समय की बात है,उदयपुर के एक छोटे से गाँव में पाँच दोस्त स्कूल जाया करते थे-मनु,तारा, राजू,मीरा और छोटा सनी।रोज़ सुबह वे अपने स्कूल के रास्ते में हरियाली से भरपूर रास्तों से गुजरते-दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़,ठंडी छाया और पक्षियों की मधुर चहचहाहट।लेकिन इस साल कुछ बदल गया।
एक दिन वे स्कूल जाते समय देख रहे थे कि उनके रास्ते के सारे पेड़ काट दिए गए थे।अब न कोई छाया बची थी,न ही वो मीठी हवा।धूल उड़ रही थी,ज़मीन तप रही थी और चारों ओर सूखा और उदासी छाई थी।मीरा ने गहरी साँस ली और बोली,- पहले इस रास्ते पर चलते हुए कितनी ठंडक लगती थी…अब तो धूप से पैर जल रहे हैं। राजू ने सिर झुका लिया,यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि लोगों ने जंगल के सारे पेड़ काट दिए… अब न पक्षी हैं,न हवा, न बारिश।सनी ने मासूमियत से पूछा,- तो क्या हम फिर से पेड़ नहीं उगा सकते? तभी मनु ने कहा,- क्यों नहीं! अगर पेड़ काटे गए हैं,तो हमें नए पेड़ लगाने होंगे! ये हमारी ज़िम्मेदारी है!
स्कूल पहुँचते ही सभी बच्चों ने अपने कक्षा शिक्षक से बात की।कक्षा शिक्षक बहुत खुश हुए और उन्होंने बच्चों को बताया कि कैसे पेड़ न केवल हवा को शुद्ध करते हैं,बल्कि बारिश लाने,मिट्टी को बचाने और जानवरों को घर देने का काम भी करते हैं।उन्होंने समझाया -पेड़ हैं तो जीवन है।पेड़ नहीं? तो पानी नहीं।पानी नहीं,तो धरती भी मर जाएगी।
शाला परिवार ने अगले शनिवार को सभी बच्चे और कक्षा शिक्षक,अपने प्रधान पाठक के साथ मिलकर "एक पेड़ मां के नाम" पेड़ लगाने का अभियान शुरू किया। हर बच्चा अपने हाथों से एक-एक पौधा लाया और उसे स्कूल के रास्ते में रोपा।कुछ महीनों में वो रास्ता फिर से हरा-भरा होने लगा। फिर से पक्षी आने लगे,छाया लौट आई और बच्चों के चेहरे पर मुस्कान।
अब जब भी कोई नया बच्चा स्कूल में आता,तो मीरा मुस्करा कर कहती,- यही रास्ता पहले सूना था… हमने इसे फिर? से जिंदा किया है। बच्चों,प्रकृति की रक्षा करना हमारी ज़िम्मेदारी है।अगर पेड़ कट जाएं,तो हमें दूसरों को दोष देने की जगह खुद बीज बोने चाहिए,क्योंकि पेड़ हैं,तो जीवन है।

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रचनाकार - यजत साहू दलदल सिवनी, आदर्श विद्यालय मोवा, द्वारा भेजी गई कहानी

बादल और बस्ता

एक बार की बात है। शहर के एक मोहल्ले में छोटा सा बालक अर्जुन रहता था। वह कक्षा 3 में पढ़ता था। हर दिन की तरह आज भी वह सुबह-सुबह तैयार होकर स्कूल जाने के लिए निकला। माँ ने टिफिन पकड़ा दिया, पानी की बोतल भर दी और पीठ पर टंगा दिया उसका भारी-सा बस्ता। अर्जुन जैसे ही गली के मोड़ पर पहुँचा, उसने आसमान की ओर देखा। बादल कुछ गहराते से लग रहे थे। सूरज तो था, पर कहीं-कहीं बादलों के पीछे छिपा। हवा भी कुछ ठंडी चल रही थी।
अर्जुन ने रुककर आकाश की ओर देखा और मन ही मन सोचने लगा — कहीं बारिश तो नहीं होने वाली? अगर बरसात हो गई तो मेरा बस्ता, मेरी कॉपियाँ, सब गीले हो जाएँगे। माँ ने तो छाता भी नहीं दिया! थोड़ा घबराया, थोड़ा सोचा, फिर पास में खड़े एक अंकल से पूछा, "अंकल जी, क्या आपको लगता है बारिश होगी?" अंकल मुस्कराए, बोले, "शायद… बादल तो हैं, पर हवा की चाल तेज है। हो सकता है निकल जाएँ। पर एहतियात रखना अच्छा है बेटा।" अर्जुन सोच में पड़ गया। "अब क्या करूँ? वापस जाकर छाता लाऊँ तो देर हो जाएगी।"
उसी समय उसके दोस्त रिया और सूरज भी आ गए। रिया के पास छाता था। सूरज बोला, "अगर बारिश हुई तो हम सब एक ही छाते के नीचे चलेंगे।" रिया बोली, "या फिर हम स्कूल की छत के नीचे रुक जाएँगे। डरने की बात नहीं है अर्जुन!" अर्जुन मुस्करा दिया। बोला, "ठीक है, चलो स्कूल। अगर बादल आए हैं तो शायद थोड़ी बारिश के बाद धूप भी आ जाए। जैसे जीवन में मुश्किलें आती हैं, फिर हल भी मिल जाता है।" सभी बच्चे हँसते, बातें करते हुए स्कूल की ओर बढ़ गए। रास्ते में कुछ हल्की बूँदें जरूर गिरीं, पर सूरज भी मुस्कराता रहा।
और अर्जुन ने उस दिन सीखा — डर से नहीं, समझदारी और साथ से आगे बढ़ना चाहिए।

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रचनाकार –हिमकल्‍याणी सिन्‍हा शिक्षिका, शास.प्राथ.शाला अकोला जिला-बेमेतरा द्वारा भेजी गई कहानी

जादुई बादल

एक बार की बात है। एक चहचहाते मोहल्ले में महेश नाम का नटखट और जिज्ञासु बच्चा रहता था। वह कक्षा तीसरी में पढ़ता था। रोज़ की तरह उस दिन भी स्कूल जाने को तैयार हो गया। महेश बेटा, टिफिन ले लो! पानी की बोतल भी रख ली? हाँ मम्मी, सब ले लिया। चलूँ अब? उसकी पीठ पर था एक भारी-सा बस्ता — जैसे किसी योद्धा की ढाल! जैसे ही महेश गली के मोड़ पर पहुँचा, उसने ऊपर आसमान की ओर देखा… और रुक गया। अरे! ये बादल तो कुछ ज़्यादा ही गहरे हैं! राजेश बादलों के पीछे ऐसे छुपा था जैसे लुका-छुपी खेल रहा हो। हवा कुछ ठंडी थी और पेड़ों की पत्तियाँ सरसराने लगीं। महेश के मन में हलचल मच गई। महेश (सोचता है): अगर बारिश हो गई तो? मेरा बस्ता, कॉपियाँ… सब भीग जाएँगी! और… माँ ने छाता भी नहीं दिया! वह थोड़ी देर तक वहीं खड़ा रहा। फिर उसने देखा — एक पेड़ के नीचे स्मार्ट अंकल खड़े थे, जो अक्सर बच्चों को मजेदार बातें बताया करते थे। महेश अंकल जी, क्या आपको लगता है बारिश होगी? अंकल (हँसकर) बादल तो ज़रूर हैं बेटा, पर हवा तेज है। अगर बादल रुक जाएँ तो बरसेंगे, वरना उड़ जाएँगे! पर याद रखो — समझदारी हमेशा काम आती है। महेश (सोचते हुए) क्या वापस जाकर छाता लाऊँ? पर इससे तो देर हो जाएगी।
महेश उलझन में था, जब अचानक— म अ हेश ! उसके दोस्त रिया और राजेश दूर से आवाज़ लगाते हुए दौड़े चले आए। रिया तुम यहीं खड़े हो? देखो, मेरे पास छाता है! अगर बारिश हुई, तो हम बच जाएँगे।
राजेश (मजाक में) और अगर बहुत तेज बारिश हुई, तो हम तैरते-तैरते स्कूल जाएँगे! महेश हँस पड़ा।
ठीक है! चलो फिर! मुश्किल आए तो क्या हुआ — हम तीनों साथ हैं न! वे तीनों स्कूल की ओर चल दिए — बातें करते हुए, हँसते-गुनगुनाते हुए। रास्ते में कुछ हल्की बूँदें ज़रूर टपकीं — टप... टप... टप... लेकिन राजेश ने बादलों के पीछे से झाँककर मुस्कराते हुए कहा, मैं यहीं हूँ! और उस दिन महेश ने एक छोटा-सा मगर बड़ा सबक सीखा —मुसीबतें चाहे जैसी भी हों,समझदारी और साथ हो — तो हर बादल के पीछे छुपी होती है धूप!
सीख: घबराने की जगह सोचें और समझदारी से काम लें।

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अगले अंक की कहानी हेतु चित्र

आप दिए गये चित्र को देखकर कल्‍पना कीजिए और कहानी लिखकर हमें यूनिकोड फॉण्‍ट में टंकित कर ई मेल : kilolmagazine@gmail.com पर अगले इस माह की 15 तारिख तक भेज दे आपके द्वारा भेजी गयी कहानियों को हम किलोल के अगले अंक में प्रकाशित करेंगे.

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