छत्तीगसढ़ में ब्रिटिश शासनकाल
British Rule in Chhattisgarh
विस्‍त्रत नोट देखने के लिए शीर्षक पर क्लिक करें. Please click on the Heading to see the detaied Note

छत्तीगसढ़ में ब्रिटिश शासनकाल - (हिन्‍दी में)

British Rule in Chhattisgarh - (In English)

छत्तीगसढ़ में ब्रिटिश शासनकाल

भोंसले राज्य का ब्रिटिश राज्य में विलय एवं छ.ग. में पुनः ब्रिटिश शासन

दिनांक 11 दिसंबर 1853 को रघुजी तृतीय की मृत्यु होते ही ब्रिटिश रेसिडेंस मेन्सल ने उसी दिन राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया. गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने अपनी हड़प निति के अंतर्गत 13 मार्च 1854 को नागपुर का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय करने की घोषणा कर दी. दिनांक 1 फरवरी 1855 को छ.ग. के अंतिम मराठा जिलेदार – गोपालराव ने, छ.ग. का शासन, ब्रिटिश शासन के प्रतिनिधि, प्रथम डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स सी इलियट को सौप दिया. ब्रिटिश शासन के अंतर्गत पूरे छत्तीसगढ़ को एक जिले का दर्जा दिया गया. जिले का प्रमुख अधिकारी डि‍प्टी कमिश्नर कहा जाता था. उसकी सहायता के लिए सहायक कमिश्नर तथा अतिरिक्त सहायक कमिश्नर थे. अतिरिक्त सहायक कमिश्नर का पद केवल भारतीयों के लिए था. इस पद पर गोपालराव आनंद को बिलासपुर में और मोहिबुल हसन को रायपुर में नियुक्त किया गया.

छ.ग. में ब्रिटिश प्रशासन का नवीन स्वरुप

असैनिक प्रशासन का पुनर्गठन कर यहाँ पंजाब जैसी प्राशासनिक व्यावस्था लागू की गयी. इसके अंतर्गत प्रशासन को दो वर्गों – माल और दीवानी में विभक्त किया गया. डिप्टी कमिश्नर को दीवानी शाखा के प्रशासन हेतु मूल और अपील दोनो प्रकार के 5000 रुपये से अधिक के अधिकार थे. बाद में तहसीलदारों की नियुक्ति कर उन्हें भी दीवानी और फौजदारी अधिकार सौपे गए.

तहसीलदारी व्यवस्था का आरम्भ

प्रारंभ में छत्तीसगढ़ जिले में रायपुर, धमतरी, रतनपुर इन तीन तहसीलों का निर्माण किया गया. तहसीलदार डिप्टी कमिश्नर के निर्देशानुसार कार्य करते थे. यह पद भारतीयों के लिए निर्धरि‍त था. परगनों के पुनर्गठन के बाद परगनों में कमाविश्दार के स्थान पर नायब तहसीलदार नियुक्त किये गए. तहसीलदार का वेतन 150 रुपये प्रतिमाह एवं नायब तहयीलदार का वेतन 50 रुपये प्रतिमाह था. दिनांक 1 फरवरी 1857 को तहसीलों की संख्या बढ़ाकर पांच कर दी गई. धमधा और नवागढ़ 2 नई तहसीलें बनी. इसके आठ माह बाद तहसीलों का पुनर्गठन हुआ और धमधा के स्थान पर दुर्ग को नया तहसील मुख्यालय बनाया गया.

मध्य प्रांत का गठन

प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से 2 नवंबर 1861 को नागपुर और उसके अधीनस्थ क्षेत्रो को मिलाकर एक केन्द्रीय क्षेत्र का गठन किया गया जिसे मध्य प्रांत कहा गया. इसमें निम्नलिखित क्षेत्र शामिल थे -

  1. नागपुर राज्य के क्षेत्र इसमें तीन संभाग थे – नागपुर संभाग (नागपुर, वर्धा, भण्डारा और चांदा ज़ि‍ले), रायपुर संभाग (रायपुर, बिलासपुर और संबलपुर ज़ि‍ले) और गोदावरी तालुक संभाग (गोदावरी तालुक, अपर गोदावरी और बस्तर ज़ि‍ले).
  2. सागर नर्मदा क्षेत्र इसमें इसमें दो संभाग – सागर संभाग (सागर, दमोह और होशंगाबाद ज़ि‍ले) एवं जबलपुर संभाग (जबलपुर, मंडला एवं सिवनी ज़ि‍ले) शामिल थे.

मध्यप्रांत का मुख्यालय नागपुर था. राज्य का शासन चीफ कमिश्नर या संभागायुक्त के हाथो में था.

छत्तीासगढ़ संभाग का गठन

1861 तक छत्तीसगढ़ मध्यप्रांत के चीफ कमिश्नर के अधीन था. सन् 1862 में छ.ग. एक स्वतंत्र संभाग बना, जिसका मुख्यालय रायपुर था. संबलपुर को मध्य प्रांत में शामिल कर रायपुर संभाग का हिस्सा बना लिया गया. छत्तीसगढ़ में इस समय तीन जिले - रायपुर, बिलासपुर एवं संबलपुर बन गए थे. यह प्रशासनिक व्यवस्था बिना किसी परिवर्तन के 1905 तक बनी रही.

भौगोलिक पुनर्गठन एवं प्रशासनिक परिवर्तन

1905 में संबलपुर जिले को बंगाल प्रांत उड़ीसा में मिला लिया गया एवं इसके बदले बंगाल प्रांत के बिहार के छोटा नागपुर क्षेत्र की पांच रियासते – चांगभखार, कोरिया, सरगुजा, उदयपुर, व जशपुर को छत्तीगसढ़ में मिला लिया गया. इस समय छत्तीसगढ़ में तीन जिले थे – रायपुर, बिलासपुर, व दुर्ग. यह प्रशासनिक व्यवस्था 1947 तक बनी रही.

छत्तीगसढ़ में राजस्व व्यवस्था

सिध्दांत रूप से सरकार सम्पूर्ण भूमि की स्वामी थी. आय का मुख्य स्रोत भूमि कर था. डिप्टी कमिश्नर इलियट ने तीन वर्षीय राजस्व व्यवस्था लागू की. यह व्यवस्था 1855 – 1857 तक बनी रही. परगनों का पुनर्गठन कर उनकी संख्या 12 कर दी गई. परगनों के अधीन रेवेन्यु सर्कल बनाया गया. पटवारियों की नियुक्ति की गई. तीन पुराने परगनों – राजरो, लवन, और खल्लारी के स्थान पर चार नए परगने गुलू, सिमगा, मारो, और बीजापुर का निर्माण हुआ.

राजस्व की दृष्टि से सम्पूर्ण क्षेत्र को तीन भागो में बांटा गया —

  1. खालसा क्षेत्र
  2. जमींदारी क्षेत्र
  3. ताहुतदारी क्षेत्र – ताहुतदारी पध्दति केपटेन सेन्डिस के समय में प्रारंभ हुई थी. उन्होने लोरमी और तरेंगा, दो ताहुतदारियों का निर्माण किया. इसके पहले मराठा काल में सिरपुर और लवन दो तहुतदारियां बनाई थीं. डिप्टी कमिश्नर इलियट के समय में तीन और ताहुतदारियां – सिहावा, खल्लाीरी और संजारी बनाई गईं. यह पध्दति तहुतदारों व्दारा प्रेरित किया जाकर किसानों से पड़ती भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित कराने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई थी, परन्तु यह पध्दति अधिक सफल नहीं हुई क्योंकि ताहुतदार न तो गोंटिया की तरह लोकप्रिय थे और न ही ज़मीन्दार की तरह सक्षम.

ज़मीन्दारी क्षेत्र मे गांव का प्रमुख मालगुज़ार होता था, जो संबंधित ज़मीन्दार को मालगुज़ारी देता था. ज़मीन्दार समपूर्ण ज़मीन्दारी के लिए निर्धारित भूराजस्व सरकार को देता था. खालसा क्षेत्र के किसान गोंटिया के माध्यम से सीधे सरकार को भूमि राजस्व अदा करते थे. ताहुतदारी क्षेत्र में निर्धारित भूराजस्व ताहुतदार सरकार को अदा करते थे. आय के चार प्रमुख मद थे – भूराजस्व, आबकारी (मादक दृव्यों की बिक्री पर कर), सायर (चुंगी) और पंडरी (गैर किसानों पर विशेष कर) शेष सभी कर समाप्त कर दिए गए थे. कर के रूप में अनाज नहीं लिया जाता था बल्कि नकद में ही लिया जाता था. राजस्व वर्ष 1 मई से 30 अप्रेल निर्धारित किया गया था.

सन् 1856 में नए अधिकारी नियुक्त किए गए. यह थे – सरि‍स्तेदार, नायब सरिस्तेदार, मुहाफिज़, दफ्तरी, बासिल बाकी नवीस, परगना नवीस, मोहर्रिर, नाज़ि‍र आदि. इसी तरह कोषालय में खजांची, सियानवीस, मोहर्रिर, फोतदार आदि नियुक्त किए गए. राजस्व मामलों का निराकरण करने के लिये एक नियमावली भी बनाई गई थी, जिसे दस्तूर उल अमन कहा जाता था.

न्याय व्यवस्था

डिप्टी कमिश्नर दीवानी तथा फौजदारी दोनों प्रकार के मामलों में न्याय करता था. इस काम में सहायक कमिश्नर उसकी सहायता करता था. कमिश्नर के पास अपील की जाती थी और उसके आदेश के वि‍रुध्द अंतिम अपील न्यायि‍क कमिश्नर को की जाती थी. अपील के लिए 2 माह का समय निर्धारित था. सन् 1856 में कमि‍श्नर ने तहसीलदारों के दीवानी अधिकार समाप्त कर दिये. बाद में ज़िला एवं सत्र न्यायधीश का पद निर्मित किया गया. फौजदारी मामलों में भी तहसीलदारों को कुछ सीमित अधिकार थे. डिप्टी कमिश्ननर को अधिक अधिकार थे. कमिश्नर उम्र कैद तक दे सकता था और मृत्यु दंड के प्रकरण गवर्नर जनरल तक जाते थे. बाद में कमिश्नर को ही मृत्यु दंड देने का अधि‍कार दे दिया गया. जनवरी 1862 में इंडियन पेलन कोड लागू कर दिया गया. बाद में न्याय व्यवस्था को प्रशासन से प्रथक कर दिया गया.

पुलिस व्यवस्था

सन् 1855 में केवल 149 पुलिस कर्मचारी थे. पुलिस प्रशासन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ को चार भागो में बांटा गया था – रायपुर सदर, रायपुर तहसीलदारी क्षेत्र, धमतरी तहसीलदारी क्षेत्र और रतनपुर तहसीलदारी क्षेत्र. प्रत्येक तहसीलदारी क्षेत्र में 15 पुलिस थाने बनाए गए. सन् 1858 में पुलिस मेन्युअल लागू हुआ. सन् 1862 में पुलिस अधीक्षक का पद बनाया गया. रायपुर का जेल 1854 से पूर्व का था. सन् 1873 में बिलासपुर जेल का निर्माण किया गया.

डाक व्यवस्था

रायपुर में हरकारे नियुक्त करके डाकघर का निर्माण किया गया. सन् 1857 में रायपुर में पहला पोस्ट मास्टर स्मिथ बना.

यातायात व्यवस्था

कैप्टन एग्न्यू ने रायपुर- नागपुर सड़क योजना की शुरुवात की थी. सन् 1862 में ग्रेट ईस्टर्न रोड बनी जो आज राष्ट्रीय राजमार्ग 6 है. सन् 1905 में बिलासपुर – अंबिकापुर सड़क बनी. 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेज़ों ने नागपुर-छत्तीसगढ़ रेल्वे के नाम से रेल लाइने बिछाने का काम प्रारंभ किया. आरंभ में यह मीटर गेज में थी परन्तु 1887 में इसे बंगाल नागपुर रेल्वे ने अधिग्रहण करके बड़ी लाइन में परिवर्तित कि‍या. सन् 1900 तक राजनांदगांव, दुर्ग, रायपुर और बिलासपुर बाम्बे-कलकत्ता लाइन से जुड़ गए थे. धमतरी और राजिम से रायपुर को छोटी लाइन से जोड़ा गया.

उद्योग

सन् 1894 में CP कपड़ा मिल्स राजनंदगांव में बनी. इस मिल के निर्माता बंबई के मैकवेथ ब्रदर्स थे. सन् 1897 में में. शावालिन कंपनी कोलकाता को बेची गई और उसका नाम बंगाल नागपुर कॉटन मिल BNC मिल रखा गया. सन् 1935 में मोहन जूट मिल रायगढ़ में स्थापित किया गया.

सिंचाई

धमतरी में रुद्री नहर 1912-15 में, मुरुमसिल्ली 1923-25 में और बालोद में तांदुला 1931 में बनाए गए. आदमाबाद, खुड़ि‍या बांधऔर खूंटाघाट बनाए गए. इसके अतिरिक्त भी अनेक तालाब और नहरें आदि बनाकर सिंचाई की व्यवसथा की गई.

वन

प्रथक वन विभाग बनाया गया जिसका प्रमुख अधिकारी डिवीज़नल फारेस्ट आफीसर था. उसका मुख्यालय रायपुर में था.

शिक्षा व्यवस्था

सन् 1864 में रायपुर ज़ि‍ले में केवल 58 स्कूल थे. सन् 1897 तक इनकी संख्या बढ़कर 98 हो गई थी. सन् 1910 में छत्तीसगढ़ में स्वतंत्र शिक्षा विभाग की स्थापना की गयी. राजकुमार कॉलेज 1893 में बना. सन् 1907 में अंग्रेज़ी माध्यम की सालेम कन्याशाला बनी. सन् 1911 में सेंट पाल स्कूल, 1913 में लारी स्कूल और 1925 में काली बाड़ी संस्था स्थापित हुए. इसके बाद धमतरी और रायपुर में अमेरिकन मेनोनाईट संस्था बनी. असहयोग आन्दोलन के दौरान रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय का संचालन वामनराव लाखे व्दारा किया गया. सन् 1937 में मध्यप्रांत के मुख्य मंत्री एन. बी. खरे बने और रविशंकर शुक्ल शिक्षामंत्री बने. रविशंकर शुक्ल ने विद्या मंदिर योजना प्रारंभ की. सन् 1937 में छत्तीसगगढ़ शिक्षण समिति का गठन रायपुर में हुआ जिसके अध्यक्ष प्यारेलाल सिंह थे. सन् 1938 में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय का निर्माण रायपुर में हुआ, जिसका प्राचार्य महासमुंद के अधिवक्ता जे. योगानंदन जी को बनाया गया. उस समय प्रांत में विश्वविद्यालय नागपुर तथा सागर में थे. लोग उच्च शिक्षा के लिए नागपुर, इलाहाबाद और बनारस जाते थे. बिलासपुर में सन् 1944 में महाकौशल शिक्षण समिति ने एस.बी.आर. (शिव भगवान रामेश्वर लाल) महाविद्यालय की स्थापना की. बिलासपुर में नार्मल स्कूल और बृजेश (सन् 1885 में चिंतन गृह के नाम से) स्कूल बने. बद्रीनाथ साव के मकान में राष्ट्रीय विद्यालय का संचालन पं. शिवदुलारे मिश्र ने प्रारंभ किया.

छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश शासन का प्रभाव

प्रशासनिक सुधार

मराठाकाल की प्रशासनिक दुर्व्यवस्था को ब्रिटिश शासन काल में ठीक किया गया. छत्तीसगढ़ मध्यठप्रांत का अंग बना. राजस्व , न्याय व पुलिस प्रशासन की अच्छी व्यावस्था की गई.

आर्थिक विकास

मराठा काल में कृषि का हृास हुआ और आर्थिक दुर्गति हुई. ब्रिटिश काल आते ही राजस्व व्यवस्था में सुधार होने के कारण एवं कृषि को बढ़ावा दिया जाने के कारण आर्थिक उन्नति के व्दार खुल गए. उद्योग और व्यापार में उन्नति हुई. सड़क, रेल और संचार व्यवस्‍था में सुधार होने के कारण भी आर्थिक प्रगति हुई.

शिक्षा

ब्रिटिश काल में शिक्षा की व्यवस्था बहुत बेहतर हुई. स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन मिला. पाश्चात्य शिक्षा भी बढ़ी. राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव से शिक्षा में भी राष्ट्रीय विचाराधारा आई.

धार्मिक स्थिति

सबसे बड़ी संख्या हिन्दू धर्मावलंबियों की थी. हिन्दू धर्म के सुधारवादी आंदोलन का काफी असर हुआ. ररामकृष्ण मिशन, आर्य समाज, ब्रह्म समाज, जैसी संस्थाओं ने कार्य किया. जाति प्रथा, शोषण और भेदभाव के विरुध्द अनेक धार्मिक आंदोलन छत्तीसगढ़ में हुए. कबीरपंथ काफी फैला. गुरू धासीदास के सतनाम पंथ का प्रभाव भी एक बड़े क्षेत्र में हुआ. उत्तकरी छत्तीसगढ़ में इसाई मिशनरियों ने काफी काम किया. यहां पर बड़ी संख्या में लोगों ने, विशेषकर उरांव जनजाति के लोगों ने तथा समनामी समाज के भी कुछ लोगों ने इसाई धर्म स्वीकार किया.

सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति

ब्रिटिश काल में नवचेतना आई. स्वतंत्रता संग्राम में काम करने वाले लोगों ने सामाजिक पुनर्रुत्थान का काम भी किया. पं. सुदरलाल शर्मा ने हरिजन उध्दार का कार्य बढ़े पैमाने पर किया. अनेक भारतीय एवं विदेशी विव्दानों ने प्रचीन भारतीय संस्कृाति का अध्ययन किया और भारतीयों में अपने इतिहास के प्रति सम्मान का भाव जागृत किया. पुरानी सामाजिक मान्यताएं बदलने लगीं. राष्ट्रीय भावना का विकास होने लगा. ब्रिटिश शासनकाल को छत्तीसगढ़ में आधुनिक विचारधारा के विकास का दौर भी कहा जा सकता है.

British Rule in Chhattisgarh

Annexation of Bhosle princely State in British India and re-establishment of British Rule in Chhattisgarh

On the death of Raghuji third on 11th december 1853 the British resident Mensel immediately took over the administration in his own hands on the same day. Governor general Lord Dalhousie rejected the right of the king to adopt a heir and annexed the kingdom under his doctrine of annexation on 13th March 1854. On 1st February 1855, the last Maratha Ziledar of Chhattisgarh handed over administration to the first Deputy Commissioner Charles C. Elliot.

The whole of Chhattisgarh was given the status of a district under British rule. The head of the district was the Deputy Commissioner. There was an Assistant Commissioner to assist him. There was the post of Extra Assistant Commissioner, which was reserved for Indians. Gopalrao Anand was appointed Extra Assistant Commissioner in Bilaspur and Mohibul Hasan in Raipur.

The new system of Administration under British Rule in Chhattisgarh

Civil administration was reorganized on the lines of Punjab. The administration was divided into Mal of revenue and Civil. The Civil administration was under the Deputy Commissioner who had both original and appeal jurisdiction up to Rs 5000. Latter Tahsildars were appointed and were given both civil and criminal jurisdiction.

The Tahsildari System

Initially three tahsildaris – Raipur, Dhamtari and Ratanpur were made. Tahsildars worked under the supervision of Deputy Commissioner. This post was reserved for Indians. Naib tahsildars were appointed as head of parganas instead of Kamawisdars. The salary tahsildiars was Rs 150 and of Naib Tahsildars Rs 50 per month. The number of Tahsils was increased to five on 1st February 1857. Dhamdha and Nawagarh were the two new Tahsils. Latter Durg was made Tahsil headquarter instead of Dhamdha.

Establishment of Central Provinces

On 2nd November 1861 Nagpur and administrative areas under it were reorganized into Central Provinces for administrative convenience. Following areas were included in central provinces -

  1. Areas under the Nagpur State There were three divisions in this – Nagpur division (Nagpur, Wardha and Bhandara districts), Raipur division (Raipur, Bilaspur and Sambalpur districts) and Godawari Taluq division (Godawari Taluq, Upper Godawari and Bastar district).
  2. Sagar Narmada area This had two divisions – Sagar division (Sagar, Damoh and Hoshangabad districts) and Jabalpur division ( Jabalpur, Mandla and Seoni districts)

The headquarters of Central Provinces was Nagpur and was headed by a Cheif Commissioner.

Creation of Chhattisgarh Division

Till 1861 Chhattisgarh was under the Chief Commissioner of Central Provinces. In 1862 Chhattisgarh became a division. Raipur became the headquarter. Sambalpur was included in Central Provinces and was a part of Raipur division. At this time Raipur division had three districts – Raipur, Bilaspur and Sambalpur. This continued till 1905.

Geographical reorganization and administrative changes

Sambalpur district was included in Odisha of Bengal presidency and in its place 5 princely states of Changbhakhar, Koria, Surguja. Udaipur and Jashpur was taken away from Chhota Nagpur of Bengal presidency and added to Chhattisgarh in 1905. Now Chhattisgarh had three districts – Raipur, Bilaspur and Durg. This continued till 1947.

Revenue administration in Chhattisgarh

The principle was that all land belonged to the Government. Land revenue was t he main source of income of the State. Three year settlement was done at the time of Elliot from 1855 to 1857. Parganas were reorganized and their number increased to 12. Revenue circles were made under the Parganas. Patwaris were appointed. Four new Parganas – Gulu, Simga, Maro and Bijapur wer emade in place of the three old parganas of Rajro, Lawan and Khallari.

The state was divided into three types of areas for the purpose of revenue collection —

  1. Khalsa area
  2. Zamindari area
  3. Tahutdari area – Tahutdari system was started at the time of Capt. Sandis. He made tow Tahutdaris of Lormi and Tarenga. Before this two Tahutdaris of Sirpur and Lawan were made during the Maratha period. During the period of Elliot three more Tahutdaris – Sihawa, Khallari and Sanjari were made. The purpose was that Tahutdars will encourage the farmers to bring the fallow lands under cultivation, but this system was not successful as the Tahutdars were neither popular like the Gontias not efficient like the Zamindars.

The head of the village in the Zamindari area was the malguzar. He used to give Malguzari to the Zamindar and Zamindar gave the revenue fixed for his whole area to the Government. In the Khalsa area the farmers direclty deposited the land revenue through the Gontia. In the Tahutdari area the Tahutdars deposited the revenue. There were four main sources of income for the Government – Land revenue, Excise (tax on intoxicants), Sair (entry tax) and Pandri (tax on non-farming activities). All other taxes were abolished. The tax was collected in cash and the system of taking food grains as land revenue was abolished. The agricultural year was from 1st May to 30th April.

New officers were appointed in 1856. these wer Sarishtedar, Naib Sarishtedar, Muhafiz, Daftari, Wasil Baki Nawis, Pargana Nawis, Moharrir, Nazir etc. Similarly Kazanchi, Siyanawis, Moharrir, Fotedar etc. were appointed in the treasury. A code of rules was made for disposal of revenue matters which was called Dasut ul aman.

Justice administration

The deputy commissioner used to decide both civil and criminal matters. He was assisted by the Assistant Deputy Commissioner. The appeal went to the Commissioner. Appeal could be made in two months. The appeal against the decision of the Commissioner went to a Judicial Commissioner. The civil jurisdiction of Tahsildars was ended in 1856. Latter the postof District and Sessions Judge was created. The Tahsildars had some limited criminal jurisdiction as well. Deputy Commissioner had more powers. The Commissioner could pass a sentence of life imprisonment and the cases of capital punishment went up to the Governor General. Latter the powers of capital punishment were also delegated to the Commissioner. The Indian Penal Code came into force in January 1862. Latter administration of justice was separated from civil administration.

Police system

There were only 148 policemen in Chhattisgarh in 1855. Chhattisgarh was divided into four parts for police administration – Raipur Sadar, Raipur Tahsildar area, Dhamtari Tahsildari area and Ratanpur Tahsildari area. 15 police stations were made in each tahsildari area. Police manual was enforced in 1858 and the post Superintendent of Police was created in 1862. Raipur jail was made before 1854. Bilaspur jail was made in 1873.

Post

Harkaras were appointed to carry post in Raipur. The first postmaster was Smith who was appointed in 1857.

Transport

Capt. Agnue had started work on Raipur-Nagpur road. The Great Easter Road (GE Road) was made in 1862 which is now called NH 6. Bilapspur-Ambikapur road was constructed in 1905. The British started work on Railways under Nagpur-Chhattisgarh Railway in the early 19th century. Latter this was acquired by Bengal-Nagpur Railway and was converted to borad gauge. By 1900 Rajnandgaon, Durg, Raipur and Bilaspur were connected to the Bombay-Calcutta rail line. Dhamtari and Rajim were connected to Raipur by narrow gauge.

Industry

The CP cloth mill was made in Rajnandgaon in 1854 by Mackbeth brothers of Bombay. In 1897 it was sold to Shawalis company of Calcutta and was renamed as Bengal Cotton Mills (BNC Mills). Mohan Jute Mills were established in Raigarh in 1935.

Irrigation

Rudri Canal was made in Dhamtari in 1912-15, Murumsilli in 1923-25 and Tandula in Balod in 1931. Admabad, Kudhiya and Khutaghat were constructed. Many other tanks and canals were made for irrigation which improved agricultural production tremendously in Chhattisgarh.

Forest

Separate forest department under a Divisional forest officer at Raipur was made during the British period.

Education

There were only 58 schools in Raipur in 1864. The number of schools increased to 98 in 1897. Independent education department was made in 1910. Rajkumar College was established in 1893. A English medium girls school – Salem girls school was established in 1907 and Saint Paul’s school was started in 1911. Lawrie school started in 1913. In 1925, the Kali Badi was established which also started a school. American Mennonite institute was started in Dhamtari and Raipur for education. During the civil disobedience movement, Rashtriya School was started and was run by Wamanrao Lakhe. N.B. Khare became the Chief Minister of Central Provinces in 1937 and Pt. Ravishankar Shukla became the Education Minister. He started the Vidya Mandir scheme to improve education. Chhattisgarh Shikshan Samiti was formed in 1937. Pyarelal Singh was its first president. Chhattisgarhh College was established in 1938 with J. Yoganandam, who was an advocate in Mahasamund, as its first principal. At that time there were Universities in Nagpur and Sagar. People used to go to Nagpur, Allahabad and Varanasi for higher education. Mahakaushl Siksha Samiti was formed in 1944 and started the S.B.R. (Shiv Bhagwan Rameshwar Lal) College. Norman school and Brijesh school, (called Chintan Griha at that time) were started in 1885 in Bilaspur. Rashtriya school was established in the house of Badrinath Sao and was run by Pt. Shivdulare Mishra.

The impact of British Rule in Chhattisgarh

Administrative reforms

The poor administrative system of the Maratha period was improved in the British time. Chhattisgarh became a part of Central provinces. God systems of revenue, justice and police administration were established.

Economic Development

Agriculture had suffered greatly during the Maratha period. It improved greatly in the British time. This improved the economic condition of the people. Industry came to Chhattisgarh. Improvement in transport by roads and rail opened the state to trade and commerce.

Education

Education system improved during the British period. Women education got a fillip. Western education was also opened up in Chhattisgarh. During the freedom struggle patriotic feelings also got integrated in education system

Religions condition

Most of the people were Hindus. Many new movements for religious reforms like the Arya Samaj, Brahma Samaj, Ramkrishna MIssion etc. did exemplary work. Many religious reforms were started against the caste system, exploitation of the backward castes etc. Among them Kabirpanth has a very large number of followers. The Satnam panth started by Guru Ghasidas also spread to large areas in Chhattisgarh. Christian Missionaries had an impact in northern Chhattisgarh and many people particularly of the Oraon tribe and some Satnamis also converted to Christianity.

Social and Cultural condition

During the British period the freedom fighters also worked for socio-cultural reforms. Pt. Sundarlal Sharma did a lot of work for Harijans. Many scholars both foreign and Indian studied Indian history and brought a sense of National pride in the people. Gradually old customs and traditions changes and modern thoughts emerged in Chhattisgarh. The British time in Chhattisgarh can also be called the era of emergence of modern thoughts.