अनुसूचित जनजातियों के संबंध में संवैधानिक प्रावधान
Constitutional Provisions about Scheduled Tribes
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अनुसूचित जनजातियों के संबंध में संवैधानिक प्रावधान - (हिन्‍दी में)

Constitutional Provisions about Scheduled Tribes - (In English)

अनुसूचित जनजातियों के संबंध में संवैधानिक प्रावधान

जनजाति (tribe) वह सामाजिक समुदाय है जो राज्य के विकास के पूर्व अस्तित्व में था या जो अब भी राज्य के बाहर हैं. किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने के आधार हैं-

  1. आदिम लक्षण
  2. विशिष्ट संस्कृति
  3. भौगोलिक पृथक्करण
  4. समाज के एक बड़े भाग से संपर्क में संकोच
  5. पिछडापन

भारत में अनुसूचित जनजातियों से संबंधित कई प्रावधान हैं. मुख्यतः इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है - सुरक्षा तथा विकास. अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा संबंधी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 15(4), 16(4), 19(5), 29, 46, 164, 244, 330, 332, 334, 335 व 338, 339(1), पांचवी सूची व छठी सूची में निहित हैं. अनुसूचित जनजातियों के विकास से संबंधित प्रावधान मुख्य रूप से अनुच्छेद 275(1) प्रथम उपबंध तथा 339 (2) में निहित हैं.

अनुच्छेद 15(4) – (संविधान पहला संशोधन अधिनियम 1951 की धारा 2 व्दारा जोड़ा गया) अनुच्छेद 15 कहता है कि राज्य किसी नागरिक के विरुध्द केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म‍स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा. परन्तु अनुच्छेद 15(4) कहता है कि इस अनुच्छेद या अनुच्छेद 29 के खंड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी.

अनुच्छेद 16(4) – अनुच्छेद 16 कहता है कि राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी और राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जायेगा. परन्तु अनुच्छेद 16(4) कहता है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व् राज्य की सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी.

अनुच्छेद 16(4क) - (संविधान सतहत्तरवां संशोधन अधिनियम 1995 की धारा 2 व्दारा जोड़ा गया) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओं में किसी वर्ग के पदों पर पारिणामिक ज्येाष्ठता सहित, प्रोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी.

अनुच्छेद 16(4ख) - (संविधान इक्यासीवां संशोधन अधिनियम 2000 की धारा 2 व्दारा जोड़ा गया) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को किसी वर्ष में किन्हीं ऐसी रिक्तियों को, जो खंड (4) या खंड (4क) के अधीन किए गए आरक्षण के लिए किए गए उपबंध के अनुसार उस वर्ष में भरी जाने के लिए आरक्षित हैं, किसी उत्तरवर्ती वर्ष या वर्षों में भरे जाने के लिए पृथक वर्ग की रिक्तियों के रूप में विचार करने से निवारित नहीं करेगी और ऐसे वर्ग की रिक्तियों पर उस वर्ष की रिक्तियों के साथ जिसमें वे भरी जा रही हैं, उस वर्ष की रिक्तियों की कुल संख्या के संबंध में पचास प्रतिशत की अधिकतम सीमा का अवधारण करने के लिए विचार नहीं किया जायेगा.

अनुच्छेद 19 (5) – अनुच्छेद 19 नागरिकों को वाक् स्वातंत्र्य आदि अनेक स्वतंत्रताएं प्रदान करता है. इस अनुच्छेद का खंड (घ) सभी नागरिकों को भारत के राज्य‍क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का अधिकार देता है और खंड (डं.) सभी नागरिकों को भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने का अधिकार देता है. परन्तु् अनुच्छेद 19 (5) कहता है कि – उक्त खंड के उपखंड (घ) और उपखंड (डं.) की कोई बात उक्ता उपखंडों व्दारा दिए गए अधिकारों के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में या किसी अनुसूचित जनजाति के हितों के संरक्षण के लिए युक्तियुक्त निर्बधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्यल को निवारित नहीं करेगी.

अनुच्छेद 29 – भारत के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा.

अनुच्छेद 46 – यह संविधान के भाग 4 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) में हैं. यह अनुच्छेद कहता है – राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टितया अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृध्दि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा.

अनुच्देछ 164 – यह अनुच्छेद राज्यों की मंत्रिपरिषदों के संबंध में है. इसमें प्रवधान है कि – बिहार, मध्यछप्रदेश और उड़ीसा राज्यों में जनजातियों के कल्याण का भारसाधक एक मंत्री होगा जो साथ ही अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण का या किसी अन्य कार्य का भी भारसाधक हो सकेगा.

अनुच्छेद 244 (1) – पांचवीं अनुसूची के उपबंध असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों से भिन्न किसी राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के लिए लागू होंगे.

अनुच्छेद 275 (1) - में प्रवधान है कि राज्यों के राजस्वों मे सहायता अनुदान के रूप में भारत की संचित निधि से ऐसी पूंजी और आवर्ती राशियां संदत्त की जायेंगी जो उस राज्य को उन स्कीमों के खर्चों के पूरा करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हों जिन्हे उस राज्य में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण की अभिवृध्दि करने या उस राज्य में अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन स्तर को उस राज्य के शेष क्षेत्रों के प्रशासन स्तर तक उन्नत करने के प्रयोजन से उस राज्य व्दारा भारत सरकार के अनुमोदन से हाथ में लिया जाये.

अनुच्छेद 330 – लोक सभा में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए स्था‍नों का आरक्षण.

अनुच्छेद 332 – राज्यों की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण.

अनुच्छेद 334 – यह अनुच्छेद कहता है कि लोक सभा और विधान सभाओं में आरक्षण के प्रावधान संविधान के इस उपबंध के प्रारंभ से साठ वर्ष की अवधि की समाप्ति पर प्रभावी नहीं रहेंगे.

अनुच्छेद 335 – संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं और पदों पर नियुक्ति के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के दावों का प्रशासन की दक्षता बनाए रखने की संगति के अनुसार ध्यान रखा जायेगा. परन्तु इस अनुच्छेद की कोई बात अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के पक्ष में संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं के किसी वर्ग या वर्गों पर प्रोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए किसी परीक्षा के अर्हक अंकों में छूट देने या मूल्यांकन के मानकों को घटाने के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी. (यह परन्तुक संविधान बयासीवां संशोधन अधिनियम 2000 की धारा 2 व्दारा जोड़ा गया)

अनुच्छेद 338 क – राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के संबंध में. (यह परन्तुक संविधान नवासीवां संशोधन अधिनियम 2003 की धारा 2 व्दारा जोड़ा गया)

अनुच्छेद 339 – (1) राष्ट्रपति राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के बारे में प्रतिवेदन देने के लिए आयोग की नियुक्ति आदेश व्दारा किसी भी समय कर सकेगा और इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की समाप्ति पर करेगा. (2) संघ की कार्यपालिक शक्ति का विस्तार किसी राज्य को ऐसे निदेश देने तक होगा जो उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए निदेश में आवश्यक बताई गई स्कीमों के बनाने और निष्पादन के बारे मे हैं.

अनुच्छेद 342 – अनुसूचित जनजातियां – (1) राष्ट्रपति किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में और जहां वह राज्य है वहां उसके राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चाकत लोक अधिूसचना व्दारा उन जनजातियों या जनजाति समुदायों अथवा जनजातियों या जनजाति समुदायों के भागों या उनमें के यूथों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए यथास्थिति उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में अनुसूचित जनजातियों समझा जायेगा. (2) संसंद विधि व्दारा किसी जनजाति या जनजाति समुदाय को अथवा किसी जनजाति या जनजाति समुदाय के भाग या उसमें के यूथों को खंड (1) के अधीन निकाली गई अधि‍सूचना में विनिर्दिष्ट अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल कर सकेगी या उसमें से अपवर्जित कर सकेगी, किन्तु जैसा ऊपर कहा गया है उसके सिवाय उक्त खंड के अधीन निकाली गई अधिसूचना में किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचना व्दारा परिवर्तन नहीं किया जायेगा.

भारत का संविधान- पांचवीं अनुसूची

अनुच्छेद 244 (1)
अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में उपबंध
भाग क साधारण
  1. निर्वचन
    इस अनुसूची में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, 'राज्य' पद के अंतर्गत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्य नहीं हैं.
  2. अनुसूचित क्षेत्रों में किसी राज्य की कार्यपालिका शक्ति
    इस अनुसूची के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उसके अनुसूचित क्षेत्रों पर है.
  3. अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को राज्यपाल व्दारा प्रतिवेदन- ऐसे प्रत्येक राज्य का राज्यपाल जिसमें अनुसूचित क्षेत्र हैं, प्रतिवर्ष या जब भी राष्ट्रपति इस प्रकार अपेक्षा करे, उस राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा और संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार राज्य को उक्त क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में निदेश देने तक होगा.
भाग ख
अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों का प्रशासन और नियंत्रण
  1. जनजाति सलाहकार परिषद्
    1. ऐसे प्रत्येक राज्य में, जिसमें अनुसूचित क्षेत्र हैं और यदि राष्ट्रपति ऐसा निदेश दे तो, किसी ऐसे राज्य में भी जिसमें अनुसूचित जनजातियाँ हैं किंतु अनुसूचित क्षेत्र नहीं हैं, एक जनजाति सलाहकार परिषद् स्थापित की जाएगी जो बीस से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी जिनमें से यथाशक्य निकटतम तीन-चौथाई उस राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधि होंगे, परंतु यदि उस राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधियों की संख्या जनजाति सलाहकार परिषद में ऐसे प्रतिनिधियों से भरे जाने वाले स्थानों की संख्या से कम है तो शेष स्थान उन जनजातियों के अन्य सदस्यों से भरे जाएँगे.
    2. जनजाति सलाहकार परिषद् का यह कर्तव्य होगा कि वह उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और उन्नाति से संबंधित ऐसे विषयों पर सलाह दे जो उसको राज्यपाल व्दारा निर्दिष्ट किए जाएँ.
    3. राज्यपाल -
      1. परिषद के सदस्यों की संख्या को, उनकी नियुक्ति की और परिषद के अध्यक्ष तथा उसके अधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति की रीति को,
      2. उसके अधिवेशनों के संचालन तथा साधारणतया उसकी प्रक्रिया को, और
      3. अन्य सभी आनुषंगिक विषयों को, यथास्थिति, विहित या विनियमित करने के लिए नियम बना सकेगा.
  2. अनुसूचित क्षेत्रों को लागू विधि
    1. इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, राज्यपाल लोक अधिसूचना व्दारा निदेश दे सकेगा कि संसद का या उस राज्य के विधान मंडल का कोई विशिष्ट अधिनियम उस राज्य के अनुसूचित क्षेत्र या उसके किसी भाग को लागू नहीं होगा अथवा उस राज्य के अनुसूचित क्षेत्र या उसके किसी भाग को ऐसे अपवादों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए लागू होगा जो वह अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे और इस उपपैरा के अधीन दिया गया कोई निदेश इस प्रकार दिया जा सकेगा कि उसका भूतलक्षी प्रभाव हो.
    2. राज्यपाल किसी राज्य में किसी ऐसे क्षेत्र की शांति और सुशासन के लिए विनियम बना सकेगा जो तत्समय अनुसूचित क्षेत्र है. विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम-
      1. ऐसे क्षेत्र की अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों द्वारा या उनमें भूमि के अंतरण का प्रतिषेध या निर्बंधन कर सकेंगे,
      2. ऐसे क्षेत्र की जनजातियों के सदस्यों को भूमि के आबंटन का विनियमन कर सकेंगे,
      3. ऐसे व्यक्तियों व्दारा जो ऐसे क्षेत्र की अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को धन उधार देते हैं, साहूकार के रूप में कारबार करने का विनियमन कर सकेंगे.
    3. ऐसे किसी विनियम को बनाने में जो इस पैरा के उपपैरा (2) में निर्दिष्ट है, राज्यपाल संसद के या उस राज्य के विधान मंडल के अधिनियम का या किसी विद्यमान विधि का, जो प्रश्नगत क्षेत्र में तत्समय लागू है, निरसन या संशोधन कर सकेगा.
    4. इस पैरा के अधीन बनाए गए सभी विनियम राष्ट्रपति के समक्ष तुरंत प्रस्तुत किए जाएँगे और जब तक वह उन पर अनुमति नहीं दे देता है तब तक उनका कोई प्रभाव नहीं होगा.
    5. इस पैरा के अधीन कोई विनियम तब तक नहीं बनाया जाएगा जब तक विनियम बनाने वाले राज्यपाल ने जनजाति सलाहकार परिषद् वाले राज्य की दशा में ऐसी परिषद् से परामर्श नहीं कर लिया है.
भाग ग
अनुसूचित क्षेत्र
  1. अनुसूचित क्षेत्र
    1. इस संविधान में, 'अनुसूचित क्षेत्र' पद से ऐसे क्षेत्र अभिप्रेत हैं, जिन्हें राष्ट्रपति आदेश व्दारा अनुसूचित क्षेत्र घोषित करे.
    2. राष्ट्रपति किसी भी समय आदेश व्दारा -
      1. निदेश दे सकेगा कि कोई संपूर्ण अनुसूचित क्षेत्र या उसका कोई विनिर्दिष्ट भाग अनुसूचित क्षेत्र या ऐसे क्षेत्र का भाग नहीं रहेगा,
      2. किसी राज्य के किसी अनुसूचित क्षेत्र के क्षेत्र को उस राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात्‌ बढ़ा सकेगा,
      3. किसी अनुसूचित क्षेत्र में, केवल सीमाओं का परिशोधन करके ही, परिवर्तन कर सकेगा,
      4. किसी राज्य की सीमाओं के किसी परिवर्तन पर या संघ में किसी नए राज्य के प्रवेश पर या नए राज्य की स्थापना पर ऐसे किसी क्षेत्र को, जो पहले से किसी राज्य में सम्मिलित नहीं हैं, अनुसूचित क्षेत्र या उसका भाग घोषित कर सकेगा,
      5. किसी राज्य या राज्यों के संबंध में इस पैरा के अधीन किए गए आदेश या आदेशों को विखंडित कर सकेगा और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करके उन क्षेत्रों को, जो अनुसूचित क्षेत्र होंगे, पुनः परिनिश्चित करने के लिए नए आदेश कर सकेगा, और ऐसे किसी आदेश में ऐसे आनुषंगिक और पारिणामिक उपबंध हो सकेंगे जो राष्ट्रपति को आवश्यक और उचित प्रतीत हों, किंतु जैसा ऊपर कहा गया है उसके सिवाय इस पैरा के उपपैरा (1) के अधीन किए गए आदेश में किसी पश्चात्‌वर्ती आदेश व्दारा परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
भाग घ
अनुसूची का संशोधन
  1. अनुसूची का संशोधन
    1. संसद समय-समय पर विधि व्दारा, इस अनुसूची के उपबंधों में से किसी का, परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में, संशोधन कर सकेगी और जब अनुसूची का इस प्रकार संशोधन किया जाता है तब इस संविधान में इस अनुसूची के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह इस प्रकार संशोधित ऐसी अनुसूची के प्रति निर्देश है.
    2. ऐसी कोई विधि, जो इस पैरा के उपपैरा (1) में उल्लिखित है, इस संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए इस संविधान का संशोधन नहीं समझी जाएगी.

Constitutional Provisions about Scheduled Tribes

Tribe is a social group which existed before the development of State or is still outside the concept of State. The basis of calling a community a tribe includes the following -

  1. Primitive
  2. Distinctive Culture
  3. Geographical Separation
  4. Hesitation in interacting with the mainstream society
  5. Backwardness

The provisions for Scheduled Tribes in the Indian Constitution can be divided mainly in two groups – provisions for security and provisions fro development. The provisions for security of Scheduled Tribes are contained in Articles 15(4), 16(4), 19(5), 29, 46, 164, 244, 330, 332, 334, 335 व 338, 339(1) and fifth and sixth schedule of the Constitution. The provisions for development of Scheduled Tribes are contained in Articles 275(1) and 339 (2) of the Constitution.

Article 15(4) – (Inserted by Section 2 of First Constitution Amendment Act 1951) Article 15 of the Constitution states that the State shall not discriminate against any citizen on grounds only of religion, race, caste, sex, place of birth or any of them. However Article 15(4) qualifies it by stating that - Nothing in this article or in clause (2) of article 29 shall prevent the State from making any special provision for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes.

Article 16(4) – Article 16 States that - No citizen shall, on grounds only of religion, race, caste, sex, descent, place of birth, residence or any of them, be ineligible for, or discriminated against in respect of, any employment or office under the State. However Article 16(4) qualifies it by stating that- (4) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for the reservation of appointments or posts in favour of any backward class of citizens which, in the opinion of the State, is not adequately represented in the services under the State.

Article 16(4 a) - (Inserted by Section 2 of Seventy seventh Constitution Amendment Act 1995) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for reservation 3 [in matters of promotion, with consequential seniority, to any class] or classes of posts in the services under the State in favour of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes which, in the opinion of the State, are not adequately represented in the services under the State.

Article 16(4 b) - (Inserted by Section 2 of Eighty first Constitution Amendment Act 2000) Nothing in this article shall prevent the State from considering any unfilled vacancies of a year which are reserved for being filled up in that year in accordance with any provision for reservation made under clause (4) or clause (4A) as a separate class of vacancies to be filled up in any succeeding year or years and such class of vacancies shall not be considered together with the vacancies of the year in which they are being filled up for determining the ceiling of fifty per cent reservation on total number of vacancies of that year.

Article 19(5) – Article 19 provides many freedoms to the citizens including the freedom of speech. Sub clause (d) of this article gives freedom to citizens to move freely throughout the territory of India and sub clause (e) of this article gives freedom to citizens to reside and settle in any part of the territory of India. However Article 19 (5) qualifies these freedoms by stating that - Nothing in 5 sub-clauses (d) and (e) of the said clause shall affect the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State from making any law imposing, reasonable restrictions on the exercise of any of the rights conferred by the said sub-clauses either in the interests of the general public or for the protection of the interests of any Scheduled Tribe.

Article 29 – Any section of the citizens residing in the territory of India or any part thereof having a distinct language, script or culture of its own shall have the right to conserve the same.

Article 46 – This is in Part-4 of the Constitution – Directive Principles of State Policy. This article states – The State shall promote with special care the educational and economic interests of the weaker sections of the people, and, in particular, of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes, and shall protect them from social injustice and all forms of exploitation.

Article 164 – This is with respect to the council of Ministers of States. It provides that – Provided that in the States of Bihar, Madhya Pradesh and Orissa, there shall be a Minister in charge of tribal welfare who may in addition be in charge of the welfare of the Scheduled Castes and backward classes or any other work.

Article 244 (1) – The provisions of the Fifth Schedule shall apply to the administration and control of the Scheduled Areas and Scheduled Tribes in any State other than the States of Assam, Meghalaya, Tripura and Mizoram.

Article 275 (1) - Provides that there shall be paid out of the Consolidated Fund of India as grants-in-aid of the revenues of a State such capital and recurring sums as may be necessary to enable that State to meet the costs of such schemes of development as may be undertaken by the State with the approval of the Government of India for the purpose of promoting the welfare of the Scheduled Tribes in that State or raising the level of administration of the Scheduled Areas therein to that of the administration of the rest of the areas of that State.

Article 330 – Reservation of seats in Lok Sabha for Scheduled Castes and Scheduled tribes.

Article 332 – Reservation of seats in State Vidhan Sabhas for Scheduled Castes and Scheduled Tribes.

Article 334 – This article provides that - the reservation of seats for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes in the House of the People and in the Legislative Assemblies of the States shall cease to have effect on the expiration of a period of 1 [sixty years] from the commencement of this Constitution.

Article 335 – The claims of the members of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes shall be taken into consideration, consistently with the maintenance of efficiency of administration, in the making of appointments to services and posts in connection with the affairs of the Union or of a State: Provided that nothing in this article shall prevent in making of any provision in favour of the members of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes for relaxation in qualifying marks in any examination or lowering the standards of evaluation, for reservation in matters or promotion to any class or classes of services or posts in connection with the affairs of the Union or of a State. (The proviso was inserted by Section 2 of Eighty Second Constitution Amendment Act 2000)

Article 338 a – This is about National Scheduled tribes Commission. (This was inserted by section 2 of Eighty Ninth Constitution Amendment Act 2003)

Article 339 – (1) The President may at any time and shall, at the expiration of ten years from the commencement of this Constitution by order appoint a Commission to report on the administration of the Scheduled Areas and the welfare of the Scheduled Tribes in the States 1 ***. The order may define the composition, powers and procedure of the Commission and may contain such incidental or ancillary provisions as the President may consider necessary or desirable. (2) The executive power of the Union shall extend to the giving of directions to 2 [a State] as to the drawing up and execution of schemes specified in the direction to be essential for the welfare of the Scheduled Tribes in the State.

Article 342 – (1) The President may with respect to any State or Union territory, and where it is a State, after consultation with the Governor thereof, by public 5 notification, specify the tribes or tribal communities or parts of or groups within tribes or tribal communities which shall for the purposes of this Constitution be deemed to be Scheduled Tribes in relation to that State or Union territory, as the case may be. (2) Parliament may by law include in or exclude from the list of Scheduled Tribes specified in a notification issued under clause (1) any tribe or tribal community or part of or group within any tribe or tribal community, but save as aforesaid a notification issued under the said clause shall not be varied by any subsequent notification.  

FIFTH SCHEDULE
Article 244(1)
Provisions as to the Administration and Control of Scheduled Areas and Scheduled Tribes
PART A
GENERAL
  1. Interpretation - In this Schedule, unless the context otherwise requires, the expression “State” does not include the States of Assam, Meghalaya, Tripura and Mizoram.
  2. Executive power of a State in Scheduled Areas—Subject to the provision of this Schedule, the executive power of a State extends to the Scheduled Areas therein.
  3. Report by the Governor to the President regarding the administration of Scheduled Areas - The Governor of each State having Scheduled Areas therein shall annually, or whenever so required by the President, make a report to the President regarding the administration of the Scheduled Areas in that State and the executive power of the Union shall extend to the giving of directions to the State as to the administration of the said areas.
PART B
ADMINISTRATION AND CONTROL OF SCHEDULED AREAS AND SCHEDULED TRIBES
  1. Tribes Advisory Council –
    1. There shall be established in each State having Scheduled Areas therein and, if the President so directs, also in any State having Scheduled Tribes but not Scheduled Areas therein, a Tribes Advisory Council consisting of not more than twenty members of whom, as nearly as may be, three-fourths shall be the representatives of the Scheduled Tribes in the Legislative Assembly of the State: Provided that if the number of representatives of the Scheduled Tribes in the Legislative Assembly of the State is less than the number of seats in the Tribes Advisory Council to be filled by such representatives, the remaining seats shall be filled by other members of those tribes.
    2. It shall be the duty of the Tribes Advisory Council to advise on such matters pertaining to the welfare and advancement of the Scheduled Tribes in the State as may be referred to them by the Governor
    3. The Governor may make rules prescribing or regulating, as the case may be –
      1. the number of members of the Council, the mode of their appointment and the appointment of the Chairman of the Council and of the officers and servants thereof;
      2. the conduct of its meetings and its procedure in general; and
      3. all other incidental matters.
  2. Law applicable to Scheduled Areas –
    1. Notwithstanding anything in this Constitution, the Governor may by public notification direct that any particular Act of Parliament or of the Legislature of the State shall not apply to a Scheduled Area or any part thereof in the State or shall apply to a Scheduled Area or any part thereof in the State subject to such exceptions and modifications as he may specify in the notification and any direction given under this sub-paragraph may be given so as to have retrospective effect.
    2. The Governor may make regulations for the peace and good government of any area in a State which is for the time being a Scheduled Area. In particular and without prejudice to the generality of the foregoing power, such regulations may –
      1. prohibit or restrict the transfer of land by or among members of the Scheduled Tribes in such area;
      2. regulate the allotment of land to members of the Scheduled Tribes in such area;
      3. regulate the carrying on of business as money-lender by persons who lend money to members of the Scheduled Tribes in such area.
    3. In making any such regulation as is referred to in sub-paragraph (2) of this paragraph, the Governor may repeal or amend any Act of Parliament or of the Legislature of the State or any existing law which is for the time being applicable to the area in question.
    4. All regulations made under this paragraph shall be submitted forthwith to the President and, until assented to by him, shall have no effect.
    5. No regulation shall be made under this paragraph unless the Governor making the regulation has, in the case where there is a Tribes Advisory Council for the State, consulted such Council.
PART C
SCHEDULED AREAS
  1. Scheduled Areas –
    1. In this Constitution, the expression “Scheduled Areas” means such areas as the President may by order declare to be Scheduled Areas.
    2. The President may at any time by order-
      1. direct that the whole or any specified part of a Scheduled Area shall cease to be a Scheduled Area or a part of such an area;
        (aa) increase the area of any Scheduled Area in a State after consultation with the Governor of that State;
      2. alter, but only by way of rectification of boundaries, any Scheduled Area;
      3. on any alteration of the boundaries of a State or on the admission into the Union or the establishment of a new State, declare any territory not previously included in any State to be, or to form part of, a Scheduled Area;
      4. rescind, in relation to any State or States, any order or orders made under this paragraph, and in consultation with the Governor of the State concerned, make fresh orders redefining the areas which are to be Scheduled Areas; and any such order may contain such incidental and consequential provisions as appear to the President to be necessary and proper, but save as aforesaid, the order made under sub-paragraph (1) of this paragraph shall not be varied by any subsequent order.
PART D
AMENDMENT OF THE SCHEDULE
  1. Amendment of the Schedule –
    1. Parliament may from time to time by law amend by way of addition, variation or repeal any of the provisions of this Schedule and, when the Schedule is so amended, any reference to this Schedule in this Constitution shall be construed as a reference to such Schedule as so amended.
    2. No such law as is mentioned in sub-paragraph (1) of this paragraph shall be deemed to be an amendment of this Constitution for the purposes of article 368.

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