छत्तीसगढ़ में आदिवासी विद्रोह
Tribal Revolts in Chhattisgarh
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छत्तीसगढ़ में आदिवासी विद्रोह - (हिन्‍दी में)

Tribal Revolts in Chhattisgarh - (In English)

छत्तीसगढ़ में आदिवासी विद्रोह

छत्तीसगढ़ में अनेक आदविासी विद्रोह हुए हें. इनमे प्रमुख हैं –

  1. हलबा विद्रोह (1774-77 ई)
  2. भोपालपट्टनम विद्रोह (1795 ई)
  3. परलकोट विद्रोह (1824-25 ई)
  4. तारापुर विद्रोह (1842-54 ई)
  5. मेरिया विद्रोह (1842-63 ई)
  6. महान मुक्ति संग्राम अथवा लिंगागिरि विद्रोह (1856-57 ई)
  7. कोई विद्रोह (1859 ई)
  8. मुरिया विद्रोह (1876 ई)
  9. महान भूमकाल (1910 ई)

हलबा विद्रोह

बस्तर के राजा दलपतसिंह की मृत्यु के बाद पटरानी के पुत्र अजमेरसिंह और बड़ी रानी के पुत्र दरियावसिंह के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष हुआ. अजमेरसिंह जीत गया और दरियावसिंह भाग कर जैपुर के राजा की शरण में गया. उसने भोसलों एवं अंग्रेज़ो से संधि कर ली एवं जगदलपुर पर आक्रमण कर दिया. मराठा सेना एवं अंग्रेज़ सेना से अजमेर सिंह हार गया और भाग गया. अजमेर सिंह लोकप्रिय था इसलिये हल्बा लोगों ने विद्रोह कर दिया. लंबे संघर्ष के बाद दरियाव सिंह हार गया परंतु विरोधि‍यों में शीघ्र ही फूट पड़ गई. दरियाव सिंह ने जैपुर के राजा से संधि की जिसके अनुसार वह बस्तर के पांच गढ़ों – कोटपाड़, चुरचुंडा, नोड़ागढ़, ओमरकोट और रायगढ़ा को देने के लिये राजी हो गया. उसने यह भी स्वीकार किया कि उसके राज्य पाने पर बस्तर मराठा राज का अंग हो जायेगा. इसके अतिरिक्त उनसे अंग्रेजों को वचन दिया कि राज पाने पर वह कंपनी सरकार के अधीन हो जायेगा. इसके बाद अंग्रेजों, मराठों एवं जैपुर की सेना ने आक्रमण किया और जगदलपुर का पतन हो गया. अजमेर सिंह मारा गया. 1776 में हल्बा लोगों का बर्बरतापूवर्क कत्लेआम किया गया. केवल एक ही हल्बा अपनी जान बचा सका. इस घटना को ही बस्तर में चालुक्य राज का पतन माना जाता है.

भोपालपट्टनम संघर्ष

अप्रेल 1795 ई में बस्तर के गोंडों ने कैप्टेन ब्लंट को इंद्रावती पार करके भोपालपट्टनम जाने से रोक दिया था. ब्लंट ने कुछ बंजारे दुभाषियों की मदद से गोंड लोगों से बातचीत करनी चाही परंन्तु गोंडों ने उसे रास्ता नहीं दिया. इसे ही भोपालपट्टनम संर्घष कहा जाता है.

परलकोट का विद्रोह

बस्त‍र राज में परलकोट उत्तर-पश्चिम में सबसे पुरानी ज़मीन्दारी थी. यहां के राजा अपने को सूर्यवंशी मानते थे. वे अबूझमाड़ि‍या थे. परलकोट कोटरी, निबरा एवं गुडरा नदियों के संगम पर स्थित है. परलकोट के आदिवासी मराठों एवं अंग्रेज़ों के शोषण से तंग आ चुके थे. उन्हें लग रहा था कि अबूझमाडि़या अपनी पहचान खो देंगे. गेंद सिंह के आह्वान पर अबूझमाडिया आदिवासी 24 दिसंबर 1824 को परलकोट में एकत्रित होने लगे. 4 जनवरी 1825 तक क्रातिकारी चांदा तक आ गए. सबसे पहले उन्होने मराठों को समान पहुंचाने वाले बंजारों को लूटा. इसके बाद वे मराठों एवं अंग्रेज़ों के विरुध्द घात लगाकर बैठ गए. आदिवासी धावड़ा वृक्ष की टहनियों को विद्रेाह के संकेत के रूप में सक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजते थे. पत्तों के सूखने के पहले क्रातिकारियों तक पहुचने की सूचना होती थी. कुछ ही समय में विद्रोह की चिंगारी पूरी गोंड अंचल में फेल गई. छत्तीसगढ़ के एगन्यू के कहने पर चांदा के पुलिस अधीक्षक कैप्टेन पेव के अधीन एक सेना परलकोट भेजी गई. विद्रोही महि‍लाओं को सामने रखकर छापामार युध्द‍ करते थे. वे तीरकमान से लड़ते थे. 10 जनवरी 1825 को गेंदसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया. गेंदसिह और उसके साथियों को महल के सामने फांसी दे दी गई.

तारापुर का विद्रोह

तारापुर परगना जगदलपुर से 80 किलोमीटर दक्षि‍ण-पश्चिम में है. राजा भूपालदेव का भाई दलगंजन सिंह यहा का प्रशासक था. बस्तर के राजा ने मराठों के कहने से यहां का कर बढ़ा दिया. आदिवासी पहले से ही मराठों को रसद आपूर्ति करने वाले बंजारों से नाराज़ थे और उन्हें लगता था कि मराठे उनकी जीवन शैली को समाप्त करने में लगे हैं. कर बढ़ने से और अधिक नाराज आदिवासियों ने दलगंजन सिंह और मांझियों के साथ मिलकर यहां के दीवान जगबंधु को हटाने के लिये विद्रोह कर दिया. दीवान जगबंधु को कैद कर दिया. राजा के हस्तक्षेप पर दीवान को छोड़ दिया गया. इससे आदिवासी और नाराज़ हो गए. दीवान ने नागपुर की सेना के सहयोग से आदिवासि‍यों को हरा दिया. दलगंजन सिंह को नागपुर जेल भेज दिया गया जहां उसे 6 माह रखा गया. नागपुर के रेज़ीडेंट मेजर विलियम्स ने आदि‍वासियों के असंतोष को समाप्त करने के लिये दीवान जगबंधु को पद से हटा दिया और नया कर भी वापस कर लिया.

मेरिया विद्रोह

दंतेवाड़ा की जनजातियों ने 1842 में विद्रोह किया. ग्रि‍ब्सिन ने लिखा है कि ब्रिटिश सरकार ने बस्तर में मेरिया या नरबलि को समाप्त करने के लिए राजा भूपालदेव को आदेश दिया. नरबलि रोकने के लिये नागपुर के भोसला राजा की एक सुरक्षा टुकड़ी दंतेवाड़ा के मंदिर में 22 वर्षों तक (1842 से 1863) रखी गई. आदिवासियों ने इसे अपनी परंपराओं के विरोध में बाहरी आक्रमण समझा ओर विद्रोह कर दिया. दीवान वामनराव के सुझाव पर रायपुर के तहसीलदार शेर खां को नरबलि पर नियंत्रण करने के लिये नियुक्त किया. आदिवासी इससे आक्रोशित हो गए. हिड़मा माझी के नेतृत्व में आदिवासियों ने मांग की कि अंग्रेज़ हट जायें. शेर खां ने आदिवासियों पर भयंकर अत्याचार किए. उनके घरों को जला दिया और महिलाओं से बलात्कार किया. अंतत: विद्रोह को दबा दिया गया.

महान मुक्तिसंग्राम

लिंगागिरि विद्रोह – अंग्रज़ो से नाराज़ आदिवासियों ने भेपालपट्टनम जंमीन्दारी के अंतर्गत लिंगागिरि तालुके के तालुकदार धुर्वाराम के नेतृत्व में विद्रोह किया. दोर्ला आदिवासियों ने गांवों को लूटा और बंजारों की माल से लदी गाड़ि‍यों पर कब्जा कर लिया. 3 मार्च 1856 को चिन्तलनार में धुर्वाराम और अन्य आदिवासियों के साथ अंग्रेज़ो का सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे तक भयंकर युध्द हुआ. अंत में धुर्वाराम पकड़ा गया. उसकी पत्नी और बच्वो सहित 460 अदिवासी औरतों ओर बच्चों को कैद कर लिया गया. 5 मार्च 1856 को धुर्वाराम को फांसी दे दी गई और उसका तालुका भोपालपट्टनम के ज़मीन्दार को दे दिया गया.

कोई विद्रोह – वनरक्षा के लिये आंदोलन

बस्त‍र की दोरली भाषा में कोई का अर्थ है, वनों और पहाडों में रहने वाले लोग. 1859 में फोतकेल के ज़मीन्दार नागुला दोरला ने भेपालपट्टनम के ज़मीन्दार राम भेई और भेजी के ज़मीन्दार जुग्गाराजू के साथ मिलकर साल वृक्षों को काटे जाने के विरुध्द विद्रोह किया. आदविासियों ने वृक्ष न कटने देने की सूचना अंग्रेज़ों के हैदराबाद के ठेकेदारों को दे दी. अंग्रेज़ों ने नागुला के खिलाफ बंदूकधारी सिपाही भेजे. आदिवासियों ने अंग्रेज़ों की लकड़ी की टालें जला दीं और आरा चलाने वालों को मार डाला. उन्होने ''एक साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर'' का नारा दिया. अंग्रेज़ों और हैदराबाद के ठेकेदारों में मजबूरी में नागुला के साथ समझौता कर लिया. सिरोंचा के डिप्टी कमिश्नर ने अपनी हार मानकर बस्तर से लकड़ी काटने की ठेकेदारी प्रथा को ही समाप्त कर दिया.

मुरिया विद्रोह

1876 का मुरिया विद्रोह के प्रमुख कारण थे –

  1. ब्रिटिश सरकार के भूराजस्व संबंधी प्रयोग.
  2. अंग्रेज़ सरकार का राजा भैरमदेव के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप.
  3. दीवान गोपीनाथ और नौकरशाहों का आदिवासियों की पंरंपराओं में हस्तक्षेप.
  4. मुंशि‍यों व्दारा आदिवासियों का शोषण.
  5. बेगारी प्रथा
  6. मांझियों के अधिकारों में कमी

जनवरी 1864 में जगदलपुर से 6 मील दूर मारेंगा नामक स्थान पर आदिवासियों ने राजा भैरमदेव को प्रिंस आफ वेल्स को सलामी देने के लिये बम्बई जाने से रोका क्योंकि उन्हें डर था कि राजा की अनुपस्थिति में दीवान कपड़दार उनपर ज़ुल्म करेगा. दीवान ने सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया. गोली से कुछ आदिवासी मारे गये. 18 लोगों को पकड़कर जगदलपुर भेज दिया गया. कुरंगपाल में 500 आदिवासियों ने मिलकर सभी 18 को छ़ुड़ा लिया और सैनिकों को पकड़ लिया. आदिवासियों ने आरा में झाड़ा सिरहा को अपना नेता बनाया और संघर्ष जारी रखा. स्थिति की गंभीरता से राजा भैरमदेव भी घबरा गया और उसने गोली चलवा दी. 6 मुरिया आदिवासी मारे गये और बाकी भाग गए. झाड़ा सिरहा ने पुन: लोगों को एकत्रित किया और आम के वृक्ष की डालियों को प्रतीक के रूप में भेजकर विद्रोह में शामिल होने का न्योता भेजा गया. 3 से 5 हजार आदिवासी एकत्रित हो गए. उन्होने महल को घेर लिया और संवाद सामग्री, जल तथा रसद को रोक लिया. राजा और दीवान घबराकर आत्मसमर्पण करने वाले थे. इस बीच दीवान ने एक महरा महिला की पेज की हांडी में एक पत्र मोम में लपेटकर मदद के लिये सिरोंचा के ब्रिटिश अधिकारियों को भेजा. मई 1876 में सिरोंचा के डिप्टी कमिश्नर ने जैपुर और विशाखापट्टनम की सेना के सहयोग से विद्रोहियो का दमन किया. ब्रिटिश सरकार ने राजा और कर्मचारियों को इस घटना के लिये जिम्मेदार ठहराया और सभी कायस्थ कर्मचारियों को बस्‍तर से बाहर कर दिया. असंतोष दूर करने के लिए 8 मार्च 1876 को जगदलपुर में मुरिया दरबार आयोजित किया गया. इसके बाद अनेक सुधार किए गए. नया 10 वर्षीय बंदोबस्त लागू किया गया. पहाड़ी क्षेत्र मे पेछा, मैदानी क्षेत्र में गायला, खालसा क्षेत्र में दीवान, नेगा और थानेदार को भूराजस्व की वसूली का अधिकार दिया गया. दीवान गोपीनाथ को कैद करके सिरोंचा भेज दिया गया. इस प्रकार यह विद्रोह पूरी तरह सफल हुआ.

1910 का विद्रोह – भूमकाल

भूमकाल का अर्थ है भूकम्प या उलट-पुलट. इस विदोह का नारा था – बस्तर बस्तरवासियों के लिये. आदिवासी बस्तर में मुरिया राज स्थापित करना चाहते थे. इस विद्रोह के कारण थे –

  1. अंग्रेज़ों का राजा रुद्रप्रताप को सत्ता न सौंपना.
  2. राजवंश से दीवान न बनाना.
  3. स्थानीय प्रशासन व्दारा शोषण.
  4. लाल कालेन्द्र सिंह और राजमाता सुवर्णकुंवर देवी की उपेक्षा.
  5. बस्तर के वनों को सुरक्षित वन घोषित करना.
  6. वन उपज का उचित मूल्य न मिलना.
  7. लगान में वृध्दि और ठेकेदारी प्रथा को जारी रखना.
  8. घरेलू मदिरा पर पाबंदी.
  9. कम मजदूरी.
  10. बाहरी लोगों व्दारा आदिवासियों का शोषण.
  11. बेगारी प्रथा.
  12. पुलिस के अत्याचार.
  13. सरकारी अधिकारियो व्दारा मुफ्त में मुर्गा, देसी घी और वनोपज प्राप्त करना.
  14. आदिवासियों को गुलाम समझना.
  15. इसाई मिशनरियों व्दारा आदिवासियों को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करना.

अक्टूबर 1909 के दशहरे के दिन राजमाता स्वर्णकुंवर देवी ने लाल कालेन्द्र सिंह की उपस्थिति में आदिवासियों को ताड़ोकी में अंग्रेज़ों के विरुध्द सशस्त्र विद्रोह के लिए प्रेरित किया. लाल कालेन्द्र सिंह ने नेतानार ग्राम के गुंडाधूर को क्रांति का नेता बनाया और प्रत्येक परगने से एक बहादुर वयक्ति को विद्रोह का संचालन करने के लिए मनोनीत किया. जनवरी 1910 में पुन: ताड़ोकी में गुप्त सम्मेलन हुए. 1 फरवरी 1910 को पूरे बस्तर में क्रांति की शुरुवात हुई. प्रत्येक गांव में हर परिवार के एक सदस्य को इसमें शामिल करने के लिए लाल मिर्च, मिट्टी के ढ़ेले, धनुष बाण भाले और आम की डालियां प्रतीक के रूप में भेजे गए. 2 फरवरी को विद्रोहियों ने पूसपाल बाज़ार में लूट की. 4 फरवरी को कूकानार के बाज़ार में बुंटू और सोमनाथ नामक दो विद्रोहियों ने एक व्यापारी की हत्या कर दी. 5 फरवरी को करंजी बाज़ार लूटा गया. 7 फरवरी को गीदम में सभा करके मुरिया राज की घोषणा हुई. बारसुर, कोण्टार, कुटरू, कुआंकोण्डा, गदेड़, भोपालपट्टनम, जगरगुण्डा, उसूर, छोटे डोंगर आदि में आक्रमण हुए. 16 फरवरी को इंद्रावती के तट पर खड़गघाट में अंग्रेज़ों और विद्रोहियो की बीच भीषण युध्द हुआ जिसमें विदोहियों की हार हुई. 24 फरवरी को गंगामुण्डा में भी विद्रोही हार गए. 25 फरवरी को डाफनगर में गुंडाधूर के नेतृत्व में संर्घष हुआ. अबूझमाढ़ में आयतू महरा ने अंग्रेज़ों से संघर्ष किया. अंग्रेज़ों के कमांडर गेयर ने पंजाबी सेना के बल पर विद्रोहि‍यों का दमन किया. 6 मार्च 1910 से दमन बढ़ गया. राजमाता स्वर्णकुंवर देवी और लाल कालेन्द्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया. आदिवासियों के शस्त्र छीन लिये गये और हज़ारों को बेंत लगाने की सज़ा दी गई. अंतत: विदोह को दबा दिया गया. विद्रोह के बाद दीवान बैजनाथ पंडा को हटाकर जेम्स को दीवान बनाया गया. इसके बाद अंग्रेज़ों ने आदिवासियों को सम्मान देकर उनसे जुड़ने का प्रयास भी किया.

Tribal Revolts in Chhattisgarh

Many tribal revolts have taken place in Chhattisgarh. The main are –

  1. Halba Revolt (1774-77 AD)
  2. Bhopalpattanam Revolt (1795 AD)
  3. Paralkot Revolt (1824-25 AD)
  4. Tarapur Revolt (1842-54 AD)
  5. Maria Revolt (1842-63 AD)
  6. Mahan freedom struggle or Lingagiri Revolt (1856-57 AD)
  7. Koi Revolt (1859 AD)
  8. Muria Revolt (1876 AD)
  9. Mahan Bhumkal (1910 AD)

Halba Revolt

After the death of the King of Bastar Dalpatsingh, there was a dispute of succession between the son of the elder queen Dariyav Singh and the son of the Patrani Ajmer Singh. Ajmer Singh won and Dariyav Singh took refuge in Jepur from the King of Jepur. He entered into a treaty with the Bhosles and the British and attacked Jagdalpur. Ajmer Singh lost to the combined Marath and British Army and Ajmet Singh had to run. Ajmer Singh was popular so the Halba people revolted. After a long struggle Dariyav Singh lost but there were soon disputes among the rebels. Dariyav Singh entered into a treaty with the KIng of Jepuraccording to which he agreed to give 5 garhs of Bastar - }Kotpad, Churchinda, NOdagarh, Omarkot and Raigada to Jepur. He also accepted that if be get the throne, Bastar will become a part of Maratha Empire. He also promised to the British that he will be subordinate to the company government. After this the combined forces of Jepur, British and Marathas attacked jagdalpur. Jagdalpur lost the war. Ajmer Singh was killed. Halbas were cruelly executed. Only one Halba was able to save his life. Thus the rule of Chalukya dynasty ended in Bastar.

Bhopalpattanam Struggle

The Gonds of Bastar stopped Captain Bunt from crossing Indrawati and going to Bhpalpattanam in April 1795. Blunt tried to reason with them through Banjara interpreters but Gonds still did not give him the way. This is called Bhopalpattanam struggle.

Revolt of Paralkot

Paralkot was the oldest zamindari in north-west Bastar. The kings of Paralkot considered themselves to be Suryavanshis. They were Abhjhmarias. Paralkot is situated at the confluence of rivers Kotri, Nibra and Gudra. The tribal people of Paralkot were tiered of exploitation by the Marathas and British. They felt that the tribal people will lose their identity. On the call of Gend Singh Abujhmarias collected in Paralkot on 24th December 1824. On 4th January 1825 the revolutionaries came up to Chanda. First they looted the Banjaras who used to supply goods to the Marathas. After this they hid themselves to ambush the Marathas and British. Branches of the Dhawda tree were sent from one village to another as an invitation to join the rebellion. The village was required to reach the revolutionaries before the leaves on the branches dried. In a short time the revolt spread to the whole area. On the request of Agnue of Chhattisgarh a force was sent to Paralkot under Pev, the police superintendent of Chanda. The rebels used to keep women in front and raid the British army. The rebels fought with bow and arrow. Gend Singh was arrested on 10th January 1825. Gend Singh and his colleagues were hanged in front of the palace.

Tarapur Revolt

Tarapur pargana is 80 kilometers southwest of Jagdalpur. Dalganjan Singh, the brother of King Bhupladev was administrator here. The King of Bastar increased the tax of this area at the instance of Marathas, The tribal people were already angry with the Banjaras who supplied the rasad to the Marathas. They felt that the Marathas were destroying their way of life The tribal people along with Dalganjan Singh and Manjhis revolted to remove the Diwan Jagbandhu of this area. The Diwan was taken hostage. After the intervention of the King he was released but the tribal people became angry b this. The Diwan defeated the tribal people with the help of the army from Nagpur. Dalganjan Singh was arrested and sent to Nagpur Jail where he was imprisoned for 6 months. The resident Major Williams removed the Diwan Jagbandhu to quell disaffection of the tribal people and also removed the new tax.

Meria Revolt

The trbals of Dantewada revolted in 1842. Gribson has written that the British gave orders to King Bhpaldev to stop human sacrifice or Meria in Dantewada. The Bhosla King kept a platoon in Danteawada for 22 years (1842 से 1863) to stop human sacrifice.The tribals considered this to be against their traditions and revolted. Tahsildar Sher Khan was brought from Raipur on the suggestion of Diwan Waman Rao to stop human sacrifice. The tribal people became angry with this and demanded under the leadership of Hidma Manjhi that the British should go. Sher Khan tortured the people burnt their houses and raped women. Finally the revolt was quelled.

Mahan freedom struggle – Lingagiri Revolt

The tribal people of Bhopalpattanam zamindari revolted against the British under he leadership of Taluqdar Dhurwaram. The Dorla tribals looted the wagons loaded with goods to be supplied to the British army. A fierce battle was fought on 3rd March 1856 between the tribal people under Dhurwa Ram and the British in Chintalnar form 8 in the morning till 3 in the afternoon. Finally Dhurwa Ram was captured. 460 tribal people were arrested along with their wives and children. Dhurwa Ram was hanged on 5th March 1856 and his estate was given to the Zamindar of Bhopalpattanam.

Koi Revolt – the revolution to save the forests

In the Dorli language of Bastar, Koi means people who live in forests and hills. The zamindar of Fotkel Nagula Dorla along with the zamindar of Bhopalpattanam Ram Bhei and zamindar of Bheji, Juggaraju opposed the felling of Sal trees. Information sent to the Hyderabadi contractors of the British that no Sal trees will be allowed to be cut. The British sent armed soldiers against Nagula. The tribal people burned the wood godowns of the British and killed the loggers. They gave the slogan of one head for each Sal three. The British and the Hyderbadi contractors had to enter into an agreement with Nagula. The Deputy Commissioner finally stopped the system of contracts for felling of trees in Bastar.

Muria Revolt

The main reasons for the Muria Revolt of 1876 were–

  1. Experiments of the British Government in land revenue system
  2. Interference of the British in the personal life of the King Bhairamdev.
  3. Exploitation of the tribal people by Diwan Gopinath and bureaucrats and their interference in the tribal way of life.
  4. Exploitation by the Munshis.
  5. Begari system
  6. Reduction in the authority of Manjhis.

In January 1864 the tribal people stopped King Bhairamdev 6 Kilometers from jagdalpur to go to Bombay for giving salute to the Prince of Wales because they feared that in the absence of the King the Diwan Kapaddar will torture them. The Diwan ordered firing. Some tribal people died in firing and 18 people were arrested and sent to Jagdalpur. However 500 tribal people got them released in Kurangpal and captured the soldiers. They made Jhada Sirha their leader and continued the struggle. King Bhairamdev was afraid by this turn of events and ordered firing. 6 persons died and the rest ran away. Jhada Sirha again organized the people. Branches of the mango tree were sent as invitation to join the rebellion. 3 to 5 thousand tribal people collected and surrounded the palace. They stopped all supplies to the palace including communication material, water and food. The King and the Diwan had decided to surrender but in the meantime the Diwan had sent request for help with a Mahra woman who had taken a letter wrapped in wax in her pot of Pej to the British officers in Sironja. In May 1876 the Deputy Commissioner of Sironja sent an army from Jepur and Vishakhapatnam and defeated the rebels. British Government held the King and his officers responsible for this incident and all the kayastha employees were sent away from Bastar. A Muria darbar was held in Jagdalpur on 8th March 1876 to hear the grievances of the people. Many reforms were done after this. New 10 years settlement was done. The work of revenue collection was given to Pechha in hill area, Diwan, Nega and thanedar in Khalsa area. Diwan Gopinath was arrested and sent to Sitronja. Thus it can be said that this revolt was successful in its objectives.

The revolt of 1910 - Bhumkal

Bhumkal means upheaval, earth quake or huge change. The slogan of this revolt was Bastar for Bastariyas. The tribal people wanted to establish Muria raj in Bastar. The main reasons for this revolt were –

  1. Throne was not given to Rudrapratap
  2. Diwan was not made from the royal family.
  3. Exploitation by the local administration.
  4. Neglect of Lal Kalendra Singh and Rajmata Suwarna Kunwar Devi.
  5. The forests of Bastar were made reserved forests.
  6. Tribals did not get reasonable price for forest produce.
  7. Increase in land revenue and continuation of the contract system.
  8. Ban on home brewed liquor.
  9. Low wages.
  10. Exploitation of tribals by outsiders.
  11. Begari system.
  12. Torture by the police.
  13. Demand of free chicken, liquor, ghee and forest produce by government officers.
  14. Tribal people were considered slaves.
  15. Christian Missionaries efforts at religious conversion by force.

Rajmanta Swarna Kunwar Devi exhorted the tribal people in Tadoki on the Dushehra day in October 1909 in the presence of Lal Kalendra Singh for armed revolt against the British. Lal Kalendra Singh chose Gundadhur of Netanar village to lead the revolt and nominated one person from each pargana to run the revolt. Secret meetings were once again held in Tadoki in January 1910. Revolution spread in entire Bastar on 1st February 1910. Invitation was sent to villages in the form of branches of mango, red chilies, lumps of soil, bow and arrows as symbols and they were requested to give one person from each family. On 2nd February the rebels looted the Bazar in Poospal. on 4th February to rebels named Buntu and Somnath killed a trader in Kukanar. On 5th February Karanji Bazar was looted. On 7th February establishment of Muria Raj was announced in Geedam. Government offices were attacked in Barsur, Konta, Kutru, Kuankonda, Gaded, Bholapatanam, Jagargunda, Usoor, Chhote Dongar etc. Fierce battle happened between the British and the rebels in Khadagghat on the banks of Indrawati on 16th February. The rebels were dfeated in thsi battle. Rebels were defeated again on 24th February in Gangamunda. On 25th February a battle was fought under the command of Gundadhur in Dafnagar. Aytu Mahra led the battle in Abujhmarh. The British commander Gear subdued the rebels with the help of army from Punjab. Rajmata Swarna Kunwar Devi and Lal Kalendra Singh were arrested on 6th March 1910. The tribal people were disarmed. Many were punished with canings. The rebellion was quelled. After the revolt Deewan Baijnath Panda was removed and James was made the Deewan. The British also tried to develop an god relationship with the tribal people. Gundadhur was never captured.

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