सजीवों में प्रजनन

प्रजनन का अर्थ होता है, अपने ही जैसे अन्य जीव उत्पन्न करना। प्रजनन के कारण ही जीव इस दुनिया में अपनी उपस्थिति बनाये रखते हैं। एक जीव के मर जाने पर भी उसके बच्चे जीवित रहते हैं और संसार में जीवन का नाश नहीं होता। संसार मे जीवन के बने रहने के लिये प्रजनन अनिवार्य है।

प्रारंभ में जब जीवन का उदय हुआ तो जीवों में लिंग भेद नहीं होता था। इसलिये प्रारंभिक छोटे जीव अलैंगिक होते हैं और इनमें प्रजनन भी अलैंगिक ही होता है।

अलैंगिक प्रजनन जब बिना लैंगिक संबंध के प्रजनन होता है तो उसे अलैंगिक प्रजनन कहते हैं। अमीबा जैसे एककोशीय जीवों मे अलैंगिक प्रजनन कोशि‍का के विभाजन से होता है –

बड़े जीवों में भी अलैंगिक प्रजनन के कई उदाहरण हैं। ध्यान से देखने पर आलू में हमें बहुत से छोटे-छोटे अंग दिखते हैं जिन्हें आलू की आंख कहते हैं। इनसे आलू के नये पौधे बन सकते हैं। इसीलिये आलू के टुकड़े जमीन में गाड़ देने से आलू के नये पौधे निकल आते हैं। इसी प्रकार प्याज़ को जमीन में गाड़ने से प्याज़ के पौधे निकलते हैं। अदरक के पंजों से अदरक के पौधे निकल आते हैं। पथरचटा के पत्तों के किनारे से भी नये पौधे निकलते हैं। यह सब अलैंगिक प्रजनन के उदाहरण हैं –

गन्ने के तने के छोटे टुकड़े काट कर यदि जमीन में दबा दिये जांय तो उनसे भी जड़ें निकल आती हैं और गन्नेे के नये पौधे बन जाते हैं –

इसी प्रकार गुलाब आदि पौधों के तनो को काट कर कलम लगाई जाती है –

जंतुओं में भी अलैंगिक प्रजनन के कई उदाहरण हैं। हाइड्रा में मुकुलन (बडिंग) इसका एक उदाहरण है –

छिपकली की पूंछ यदि काट दी जाये तो कुछ समय में फिर से उग आती है। यह सभी अलैंगिक प्रजनन के उदाहरण हैं। आज विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि बड़े जंतुओं, यहां तक कि मनुष्य में भी अलैंगिक प्रजनन से बच्चे पैदा किये जा सकते हैं। इस प्रकार अलैंगिक प्रजनन से जन्मे बच्चोंं को क्लोन कहते हैं।

लैंगिक प्रजनन जीवों में विविधता लाने के लिये प्रकृति में लैंगिक प्रजनन प्रारंभ हुआ। इसमें एक नर तथा एक मादा होते हैं। इन दोनो के बीच लैंगिक संबंध होने पर नर तथा मादा की कोशिकाएं आपस में मिलकर एक नये जीव की रचना करती हैं जिसमे माता एवं पिता दोनो के गुण होते हैं। इसी को लैंगिक प्रजनन कहते हैं। पौधों में लैंगिक प्रजनन फूलों के माध्यम से होता है। फूलों के नर तथा मादा अंग नीचे चित्र में दिखाये गये हैं –

जिन फूलों में नर तथा मादा दोनो ही अंग होते हैं उन्हें उभयलिंगी फूल कहते हैं जिन पौधों में नर और मादा अंग अलग-अलग फूलों में होते हैं उन्हें एकलिंगी कहते हैं, जैसे पपीते का पौधा।

नर कोशिकाएं पराग में होती हैं। इन्हें शुक्राणु कहते हैं। मादा कोशिकाएं फूल के अंदर अंडाशय में होती हैं। इन्हें अंडाणु कहते हैं। जब कीट-पतंगे फूलों पर मंडराते हैं तो अपने साथ परागकण लेकर जाते हैं। यह परागकण वे वर्तिकाग्र पर छोड़ देते हैं।

पराग कणों से एक नलिका बनती है तो वर्तिका से होकर अंडाशय तक जाती है और बीजांड में जाकर अंडाणुओं तक पहुंच जाती है। इसे एक सरल प्रयोग से देखा जा सकता है। एक स्लाइड पर कुछ पराग कण रखकर उनपर चीनी मिला मीठा पानी डाल दो। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर कुछ घंटों में ही परागनाल बढ़ती हुई दिखेगी –

शुक्राणु परागनाल से होकर, अंडाणु तक पहुंच जाते हैं और वहां जाकर दोनो एक दूसरे से मिल जाते हैं। इसे ही निषेचन कहते हैं –

निषेचन के बाद अंडाणु धीरे-धीरे बड़ा होकर बीज बन जाता है, जिससे नया पौधा बनता है।

जंतुओं में भी जब लैंगिक प्रजनन होता है, तो नर का शुक्राणु मादा के अंडाणु से मिलकर नये जीव की रचना करता है। जंतुओं में नर और मादा को आसानी से अलग-अलग पहचाना जा सकता है। हम दूर से देख कर ही नर और मादा जंतुओं की पहचान कर सकते हैं।

जंतुओं में निषेचन के बाद अंडाणु में विभाजन होने लगता है और यह बढ़ने लगता है। इससे भ्रूण बनता है –

छिपकली, मछली और चिडि़या जैसे जंतु में यह भ्रूण अंडे के भीतर होता है। मादा अंडा देती है और कुछ समय तक अंडे के भीतर ही बढ़ने के बाद बच्चा अंडा तोड़कर बाहर आता है। स्तनधारी जंतुओं में भ्रूण मादा के शरीर के भीतर ही विकसित होता है और मादा बच्चा ही देती है। मानव भ्रूण के विकास का एक चित्र देखें –

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