ध्वनि

ध्वनि या आवाज़ से हम सभी परिचित हैं। हम जानते हैं कि ध्वनि को हम अपने कानों से सुन सकते हैं। कभी आपने सोचा है कि ध्वनि कैसे उत्पन्न होती है। दरअसल ध्वनि कंपनों से उत्पन्न होती है। जब कोई वस्तु कंपन करती है तो आसपास की हवा में इन कंपनों से तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं। यह तरंगें ही ध्वनि हैं। इसे एक सरल गतिविधि से समझते हैं। स्कूल की घंटी को बजाइये। आपको घंटी की ध्वनि सुनाई देगी। अब बजती हुई घंटी को अपने हाथ से छुएं। आपको घंटी में होते हुए कंपन का अनुभव होगा। घंटी को यदि आप हाथ से पकड़ लें तो घंटी में कंपन शीघ्र बंद हो जाते हैं और घंटी बजना भी बंद हो जाती है, परंतु यदि हम घंटी को न पकड़ें को घंटी अधिक देर तक कंपन करती रहती है और अधिक देर तक बजती भी रहती है। इससे यह सिध्द हुआ कि घंटी की ध्वनि उसके कंपनों के कारण उत्पन्न होती है।

ध्वनि की तरंगों को पानी में देखने का एक सरल प्रयोग करते हैं। एक बर्तन में पानी भर लें। अब एक चम्मच इस बर्तन पर टकराएं। चम्मच टकराने से बर्तन में ध्वनि उत्पन्न होती है, और आप बर्तन में भरे पानी में तरंगें देख सकते हैं। जब तक वर्तन ध्वनि करेगा तब तक तरंगें दिखती रहेंगीं।

ध्वनि कंपनों से उत्पन्न होती है, इसे समझने के लिये एक और मज़ेदार गतिविधि की जा सकती है। अपने पेंसिल बाक्स पर चित्र में दिखाये अनुसार 2 पेंसिलें एक रबर बैंड की सहायता से बांध लो। अब रबर बैंड को हल्के‍ से खींचकर छोड़ दो। आपको ध्वनि सुनाई देगी और रबर बैंड कंपन करता हुआ दिखेगा।

हमने देखा कि ध्वनि हवा के माध्यम से हमारे कानो तक पहुंचती है। क्या अन्य माध्यमों से भी ध्वनि सुनी जा सकती हैॽ इसका उत्तर है कि ध्वनि अन्य माध्यमों में भी चल सकती है। पानी से भरे एक टब में घंटी बजाओ और पानी की सतह पर अपना कान रखकर घंटी की आवाज़ सुनो। अब घंटी और हमारे कान के बीच हवा नहीं पानी है, इसलिये हम यह जान सकते हैं कि घंटी की ध्वनि पानी के माध्यम से हमारे कान तक पहुंची है।

इसी प्रकार हम अन्य माध्यमों से ध्वनि का चलना भी देख सकते हैं। अपना कान किसी लकड़ी की मेज के एक कोने पर रखो, और अपने मित्र से मेज के दूसरे कोने पर ठक-ठक करने को कहो। आपको ठक-ठक की ध्वनि लकड़ी की मेज से चलकर सुनाई देती है।

ध्वनि की इस चाल के आधार पर ही खिलौने का टेलीफोन बनाया जाता है। दो माचिस की डिब्बियां लेकर उन्हें एक लंबे धागे से बांध लो। अब एक डिब्बी अपने किसी मित्र को दो, तथा दूसरी डिब्बी स्वयं लेकर कुछ दूरी पर खड़े हो जाओ। अपने मित्र से माचिस की डिब्बी में फुसफुसाकर कुछ बोलने को कहो। स्वयं दूसरी डिब्बी को कान में लगाकर सुनो। आपको अपने मित्र की आवाज साफ सुनाई देगी। ऐसा इसलिये होता है कि आपके मित्र की आवाज़ धागे के माध्यम से आप तक पहुंच रही है।

ध्वनि के संचरण के लिये माध्यम आवश्यक है हमने देखा कि ध्वनि अनेक माध्यमों से चलकर जा सकती है। परंतु क्या ध्वनि बिना किसी माध्यम के भी चल सकती हैॽ इसका उत्तर है – नहीं। ध्वनि प्रकाश की भांति निर्वात में नहीं चल सकती। एक सरल प्रयोग से इसे समझते हैं –

एक बड़े ग्लास में एक मोबाइल फोन रख दो। अब अपने किसी मित्र से उस मोबाइल पर काल करने को कहो। मोबाइल की घंटी बजने लगे तो ग्लास का मुंह आपने हाथों से चित्र के अनुसार बंद करके अपने मुंह से ग्लास की हवा खींच लो। आपको घंटी की आवाज धीमी सुनाई देगी। अब यदि आप ग्लास को अपने मुंह से हटा लेंगे, तो पुन: घंटी की आवाज़ तेज़ सुनाई देने लगेगी। आपने जब ग्लास से हवा खींच ली तो ध्वनि को चलने के लिये माध्यम कम मिला इसलिये ध्वनि कम हो गई, और ग्लास मुंह से हटाते ही पुन: हवा ग्ला‍स में प्रवेश कर गई इसलिये ध्वनि फिर से तेज़ हो गई। आपके पास यदि वायु चूषण पंप हो तो आप किसी बर्तन में एक घंटी रखकर वायु चूषण पंप से उस बर्तन की पूरी हवा निकाल सकते हैं। ऐसी स्थिति में घंटी की आवाज़ पूरी तरह बंद हो जायेगी।

हमारे गले से आवाज़ कैसे निकलती है - हम कैसे बोल सकते हैं आइये एक सरल प्रयोग करें –

रबर की 2 पट्टियां लेकर उन्हें ज़ोर से खींचें और उनके बीच में फूंके। रबर की पट्टियां कंपन करती हैं और इनमें से ध्वनि निकलती है। यह प्रयोग आप चित्र में दिखाये अनुसार किसी कागज़ की झिरी में फूंककर भी कर सकते हैं। हमारे गले में भी इसी प्रकार की झिल्लियां होती हैं। आप अपने गले को छूकर देखें। जबड़े के ठीक नीचे आपको कुछ कड़ा सा महसूस होगा। यह आपका साउंड बाक्स या लैरिंक्स है। यह कार्टिलेज का बना होता है। यह ऊपर की ओर नाक तथा मुंह से एवं नीचे की ओर श्वास नली से जुड़ा हेाता है। ध्वनि उत्पान्न करने वाली झिल्लियां इसी में होती हैं। जब हवा हमारी नाक अथवा हमारे मुंह से श्वास नली में जाती है, अथवा जब हवा श्वांस नली से बाहर आती है तो इसी लैरिंक्स से होकर गुज़रती है, और इन ‍झिल्लियों में कंपन करती है, जिससे ध्‍वनि उत्पन्‍न होती है। इन झिल्ल्यिों को वोकल कार्ड्स कहा जाता है। हम अपने मुंह, होठ, जीभ, दांत आदि से इस ध्‍वनि में बदलाव करके बात कर सकते हैं।

हम ध्वनि को सुनते कैसे हैं यह तो सभी जानते हैं कि हम कानों से ध्वनि सुनते हैं। यह किस प्रकार होता है इसे जानने के लिये एक सरल प्रयोग करते हैं –

एक प्लास्टिक की बोतल को दोनो ओर से काट लो। अब इस बोतल के एक ओर एक गुब्बारे को काटकर और खींचकर रबर बैंड की सहायता से बांध दो। इस गुब्बारे के ऊपर हल्के अनाज के कुछ दाने रख दो। अब इस बोतल की दूसरी ओर से चित्र के अनुसार बोतल के अंदर मुंह करके जोर से चिल्लाओ। आपको गुब्बारे पर रखे हुए अनाज के दाने कूदते हुए दिखेंगे।

हमारे कान में भी कुछ ऐसा ही होता है। कान के अंदर एक झिल्ली खींचकर लगी होती है। इसे कान का पर्दा करहे हैं। इस पर्दे के दूसरी ओर कुछ बहुत छोटी हडिडयां लगी होती हैं। जब ध्वनि कान में जाती है तो कान के पर्दे में कंपन होता है और उसके दूसरी ओर लगी हड्डियां भी कंपन करती हैं। इन हड्डियों से कान की तंत्रिकाएं जुड़ी होती हैं जो इन कंपनो के संवेग को मस्तिष्क तक ले जाती हैं, और हम सुन पाते हैं –

ध्वनि का परावर्तन प्रकाश की तरह ध्वनि भी किसी सतह से टकरा कर परावर्तित हो जाती है, और प्रकाश की तरह ही ध्वनि के परावर्तन में भी आपतन कोण परावर्तन कोण के बराबर होता है। इसे समझने के लिये एक प्रयोग किया जा सकता है। एक लकड़ी का तख्ता लेकर उसके आगे लकड़ी का एक और तख्ता चित्र में दिखाये अनुसार रख दो। अब गत्तेा के 2 ट्यूब चित्र के अनुसार तख्ते के सामने रखो। एक ट्यूब के आगे एक घड़ी रख दो। अब दूसरे ट्यूब पर कान लगा कर घड़ी की आवाज़ सुनो। घड़ी की आवाज सबसे अच्छी तभी सुनाई देती है जब दोनो ट्यूब्स तख्ते के साथ एक बराबर कोण पर होते हैं।

प्रतिध्वनि या इकोजब ध्वनि किसी दूर की वस्तु से टकराकर परावर्तित होती है तो हमें परावर्तित ध्वनि मूल ध्वनि सुनने के कुछ समय बाद सुनाई देती है। इसे प्रतिध्वनि या इको कहा जाता है। अक्सर पहाड़ों में इको आसानी से सुनी जा सकती है।

जब परावर्तन की सतह अधिक दूर नहीं होती तो प्रतिध्वनि मूल ध्वनि से साथ मिल जाती है और मूल ध्वनि साफ सुनाई नहीं देती। इस कारण बड़े हाल आदि में ध्वनि का परावर्तन रोकना आवश्यक होता है। कुछ पदार्थ जैसे थर्मोकोल, कपड़ा आदि ध्वनि का परावर्तन कम करते हैं। ऐसे पदार्थों को ध्वनि अवशोषक कहते हैं, और इनका उपयोग सिनेमा हाल आदि में प्रतिध्वनि को रोकने के लिये किया जाता है।

तीव्र तथा मंद ध्वनि ध्वनि की तीव्रता इस बात पर निर्भर करती है कि ध्वनि उत्पन्न करने वाली वस्तु कितना अधिक कंपन कर रही है। कंपन जितनी दूर तक होता है उसे कंपन का आयाम कहते हैं। आयाम अधिक होने पर ध्वनि अधिक तीव्र होती है। इसे भी एक प्रयोग से समझा जा सकता है।

एक थर्मोकोल का टुकड़ा एक धागे से बांधकर एक ग्लास के पास लटका दो। अब ग्लास से एक चम्मच टकराकर ध्वनि उत्पन्न करो। थर्मोकोल को ग्लास की दीवार से छुवाओ। थर्मोकोल ग्लास से टकरा कर ग्लास के कंपन के कारण दोलन करने लगता है। यदि आप चम्‍मच को ग्लास पर अधिक ज़ोर से मारोगे और तो अधिक तेज ध्वनि होगी और थेर्मोकोल भी दूर तक दोलन करेगा। चम्मच से ग्लास पर धीरे से मारने से कम ध्वनि होगी और थेर्मोकोल कम दूरी तक दोलन करेगा।

मोटी तथा पतली ध्वनि हम अपने गले से विभिन्न प्रकार की ध्वनियां निकाल सकते हैं। यह ध्वनियां मोटी तथा पतली हो सकती है। ध्वनि का मोटा या पतला होना कंपन की आवृति पर निर्भर करता है। कोई वस्तु एक सेकेंड में जितने कंपन करती है उसे कंपन की अवृति कहते हैं। जब आवृति अधिक होती है अर्थात् कंपन अधि‍क होते हैं तो ध्वनि पतली होती है। आवृति कम होने पर ध्वनि मोटी होती है।

मनुष्य अपने कानो से केवल 20 से 20,000 आवृति प्रति सेकेंड तक की ही ध्वनि सुन सकते हैं। इससे कम आवृति अथवा इससे अधिक आवृति की ध्वनि को सुना नहीं जा सकता। जिस ध्वनि की आवृति अधिक होने के कारण उसे सुना नही जा सकता उसे अल्ट्रासाउंड कहते हैं।

सुस्वर ध्वनि एवं शोर जो ध्वनि हमें सुनने में अच्छी लगती है उसे सुस्वर ध्वनि कहा जाता है, जैसे संगीत। जो ध्वनि सुनने में अच्छी नहीं लगती वह शोर है। जब बच्चे कक्षा में एक साथ बात करते हें, तो शोर होता है। बहुत अधिक शोर को कोलाहल कहते है। कोलाहल एक प्रकार का ध्वनि प्रदूषण है जिसका स्वास्थ्‍य पर बुरा असर पड़ता है। इसलिये ध्वनि प्रदूषण रोकने के उपाय करना आवश्यक है।

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