स्थिर विद्युत

कक्षा 6 में हम विद्युत के विषय में पढ़ चुके हैं। यह एक प्रकार की ऊर्जा है। जिस प्रकार पानी के एक स्थान से दूसरे स्थान तक बहने को पानी की धारा कहा जाता है, उसी प्रकार विद्युत आवेश जब एक स्थान से दूसरे स्थान तक बहने लगता है, तो इसे हम विद्युत की धारा कहते हैं। यदि आवेश एक ही स्थान पर स्थिर रहे तो इसे स्थिर विद्युत कहा जाता है। हम कक्षा 6 में यह भी देख चुके हैं कि यदि एक कंघी को किसी रेशम या ऊन के सूखे कपड़े से कुछ समय तक रगड़ा जाये तो यह कंघी कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षिक करने लगती है। ऐसा इसलिये होता है कि रेशम या ऊन से रगड़ने पर कंघी में विद्युत आवेश आ जाता है। हम अनेक वस्तुओं में इसी प्रकार विद्युत आवेश उत्पन्न कर सकते हैं। एक गुब्बारे को फुलाकर, उसे कागज़ अथवा ऊनी कपड़े से रगड़ो। इसके बाद गुब्बारे को दीवाल के पास ले जाओ। गुब्बारा दीवाल में चिपक जाता है। इसी प्रकार यदि हम कोकाकोला के खाली एल्यूमिनियम कैन के पास इस गुब्बारे को ले जायें तो कैन गुब्बारे की ओर लुढ़कने लगता है –

किसी कंघी को बालों पर रगड़कर हम नल के पानी की धार के पास ले जायें तो पानी की धार कंघी की ओर मुड़ जाती है। ऐसा इसलिये होता है कि पानी के कणों में भी विद्युत आवेश है, जो पानी को कंघी की ओर खींचता है -

समान आवेश विकर्षित करते हैं और विपरीत आवेश आकर्षित करते हैं – यदि हम दो गुब्बारों को रेशम या ऊनी कपड़े से रगड़ कर एक धागे में बांधकर एक दूसरे के पास लायें तो गुब्बारे एक दूसरे से दूर जाते दिखते हैं। दोनों गुब्बारों में एक समान आवेश होने के कारण ऐसा हुआ –

विद्युत आवेश दो प्रकार का होता है। एक को ऋण आवेश तथा दूसरे को धन आवेश कहते हें। आओ हम एक प्रयोग से इस बात को समझें। एक कांच की छड़ को रेशम के कपड़े से रगड़कर उसे एक धागे में बांधकर छत से लटका दो। अब दूूसरी कांच की छड़ को भी रेशम के कपड़े से रगड़कर पहली छड़ के पास लाओ। धागे से लटकती हुई छड़ दूर जाने लगती है। इसे ही विकर्षण कहते हैं। ऐसा इसलिये हुआ कि दोनो कांच की छड़ों में एक समान आवेश है। कांच की छड़ में इस प्रकार उत्पन्न हुए आवेश को धन आवेश कहा जाता है। अब प्लास्टिक के एक स्ट्रा को भी इसी प्रकार रेशम या बालों से रगड़कर कांच की छड़ के पास लाओ। कांच की छड़ स्ट्रा की ओर आती दिखती है। इसे आकार्षण करते हैं। ऐसा इसलिये हुआ कि स्ट्रा में ऋण आवेश उत्पन्‍न हुआ है, और विपरीत आवेश आकर्षित करते हैं।

विद्युत आवेश कैसे उत्पन्‍न होता है विद्युत आवेश उत्पन्न होने के तीन तरीके हैं –

  1. रगड़ने से - रगड़ने से विद्युत आवेश उत्पन्न होता है यह तो हम देख ही चुके है।
  2. संपर्क में आने से यदि किसी आवेशित वस्तु को किसी दूसरी वस्तु के संपर्क में लाया जाये को वह आवेश दूसरी वस्तु में चला जाता है और वह दूसरी वस्तु‍ भी आवेशित हो जाती है। इसे देखने के लिये हम बालों में रगड़कर एक कंघी को आवेशित करें और उस कंघी को किसी प्लाेस्टिक के सकेल से संपर्क करायें। अब यह प्लास्टिक का स्केल भी कागज़ के टुकड़ों को आकर्षित करने लगता है, क्योंकि संपर्क में आने से कंघी का आवेश स्केल में आ गया।
  3. प्रेरण से जब किसी आवेशित वस्तु को बिना संपर्क किये ही, केवल पास लाने मात्र से दूसरी वस्तु आवेशित हो जाती है, तो इसे ही प्रेरण से आवेश उत्पन्न होना कहा जाता है। यदि किसी आवेशित प्‍लास्टिक के स्केल अथवा कंघी को एक इलेक्ट्रोस्को‍प के पास लाया जाये तो इलेक्ट्रोस्कोप की पत्तियां एक दूसरे से दूर होती दिखती हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि पास लाने मात्र से इेलेक्ट्रोस्‍कोप में आवेश उत्पन्न हो गया। प्रेरण से हमेशा विपरीत प्रकार का आवेश उत्पन्न होता है।

इेलेट्रोस्कोप अथवा विद्युतदर्शी आओ एक कोकाकोला कैन से इलेक्‍ट्रोस्‍कोप बनायें -

एक कोकाकोला कैन को एक कागज़ या स्टायरोफोम के कप के ऊपर रखकर टेप से चिपका दें। इस कैन के ढ़क्कन पर लगी घुंडी में पतले एल्यूमिनियम फायल की पत्ती चित्र में दिखाये अनुसार लटका दें। आपका इलैक्ट्रोस्कोप तैयार है। अब बालों में रगड़कर कंघी या गुब्बारा कैन के पास लायें। ऐल्यूमिनियम की पत्तियां एक दूसरे से दूर जाकर खुलती हुई दिखेंगी। इेलेक्ट्रोस्कोप का उपयोग यह जानने के लिये किया जाता है कि किसी वस्तुू में विद्युत का आवेश है अथवा नहीं।

तडित और तडित चालक आपने वर्षा ऋतु में बादलों में गर्ज के साथ बिजली चमकते तो देखा ही होगा। इसे ही तडित कहते हैं।

बादलों में पानी की बूंदे भरी होती हैं। इनमें विद्युत आवेश होता है। इन आवेशित बूंदों को हवा और धूल एक दूसरे से दूर रखते हैं, परंतु जब आवेश बहुत अधिक हो जाता है तो यह आवेश हवा से प्रवाहित हो जाता है। आवेश के प्रवाहित होने से विद्युत धारा बन जाती है, जिससे बहुत सी ऊष्मा निकलती है और गर्जन की घ्वनि भी होती है। ऊष्मा से प्रकाश उत्पन्न होता है, जिसे हम बादलों में बिजली की चमक या तडित के रूप में देखते हैं। कभी कभी यदि आवेश बहुत अधिक हो तो यह विद्युत धारा धरती की वस्तुओ जैसे पेड़-पौधों, ऊंचे भवनों आदि से प्रवाहित हो सकती है। इससे यह वस्‍तुएं जल जाती हैं। इसे ही बिजली गिरना कहते हैं। यदि एक तांबे का तार किसी भवन की छत पर लगाकर, उसे नीचे लाकर मिट्टी में दबा दिया जाये तो तांबे के विद्युत सुचालक होने के कारण विद्युत की धारा इस तार से होकर धरती में चली जायेगी और भवन पर तडित का असर नहीं होगा। इसे ही तडित चालक कहा जाता है।

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