सजीवों की रचना तथा कार्य – 1 (जंतु)


बच्‍चों को जंतुओं के विभिन्न अंग तंत्रों एवं उनके क्रियाकलापों के बारे में बतायें। फिर प्रत्येक अंग तंत्र से संबंधित गतिविधि करवायें।


पाचन तंत्रपाचन तंत्र के कुछ हिस्से हम बच्चों को उनके शरीर में आसानी से दिखा सकते हैं, जैसे मुंह, जीभ, दांत इत्यादि। पाचन तंत्र के अन्य हिस्सों जैसे आमाशय, यक्रत, छोटी आंत, बड़ी आंत आदि के बारे में ब्लैकबोर्ड पर चित्र बनाकर समझायें। इसके बाद हम आसानी से उपलब्ध सामग्री से पाचन तंत्र का माडल भी बच्चों से बनवा सकते हैं। इस प्रकार का एक माडल नीचे चित्र में दिखाया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि माडल इन्हीं वस्तुओं से बनाया जाये। शिक्षक अपनी सुविधानुसार उपलब्ध वस्तुओं से माडल बनवा सकते हैं।



पाचन तंत्र के कार्य समझाने का प्रयोग - इसके लिये हमें निम्न‍लिखित वस्तुओं की आवश्यकता होगी – एक गिलास संतरे का रस या नीबूू का रस - आमाशय के अम्ल को दिखाने के लिये; एक छोटा गिलास पानी - लार के रूप में, एक सील बंद किया जा सकने योग्य पालीथीन का थैला – आमाशय के रूप में; एक प्लास्टिक का छोटा गिलास जिसकी तली काट दी गई हो, कुप्पी के रूप में उपयोग करने के लिये; एक ट्रे – हमारे शरीर को दिखाने के लिये; एक लंबा मोजा – छोटी आंत के रूप में; कुछ बिस्कुट और एक केला – भोजन के रूप में।

सबसे पहले पालीथीन के थैले में बिस्कुट, संतरे अथवा नीबू का रस एवं पानी डाल दें। अब इस थैले को सीलबंद करके खूब मसलें ताकि सारा भोजन एक लेई के रूप में बन जाये। अब तली कटे हुए प्लाीस्टिक के गिलास को मोजे में लगाकर उसे कुप्पी के रूप में प्रयोग करें, और पालीथीन के थैले को खोलकर उसमें से लेई बने भोजन को मोजे में डाल दें। अब मोजे को ट्रे में रखकर निचोड़ें। इससे भोजन का सत निकलकर ट्रे में गिर जाता है, जैसे पाचन के बाद छोटी आंत से भोजन का सत शरीर में अवशोषित हो जाता है। बाकी का सूखा पदार्थ जो सत निकलने के बाद मोजे में ही रह जाता है, वह मल है, तो प्रतिदिन हमाने मलव्दार से बाहर निकल जाता है।



परिसंचरण तंत्र बच्चों को बतायें कि शरीर में भोजन और आक्सीजन गैस को सभी अंगों तक पहुचाने और हानिकारक अपशिष्टि पदार्थों तथा कार्बन-डाई-आक्साइड गैस को बाहर निकालने के लिये रक्त अथवा खून का प्रयोग होता है। रक्त को एक शरीर के सभी स्थानों तक पहुंचाने का कार्य परिसंचरण तंत्र करता है। इसमें शिराएं, धमनियां तथा हृदय होते हैं। बच्चों को बतायें कि धमनियां हृदय से आक्सीजन युक्त रक्तह लेकर जाती हैं जिसका रंग लाल होता है इसलिये धमनियां लाल दिखाई पड़ती हैं। शिराएं अंगों से कार्बन-डाई-आक्सािइड युक्त रक्त हृदय में लेकर जाती हैं जिसका रंग कुछ नीला सा होता है इसलिये शिराएं नीली दिखाई पड़ती हैं। हृदय एक पंप का कार्य करता है जिसके कारण रक्त का प्रवाह बना रहता है। इसके बाद ब्लैकबोर्ड पर परिसंचरण तंत्र का चित्र बनाकर दिखायें। बच्चों से भी अपनी कापी में परिसंचरण तंत्र का चित्र बनाने को कहें।



शिराएं दिखाने की गतिविधि एक बच्चे का हाथ अपनी मुट्ठी में कोहनी के कुछ ऊपर से कस कर पकड़ लें। ऐसा करने से उसके हाथ में रक्त का संचरण रुक जायेगा और कुछ देर में उसके हाथ में शिरायें उभर आयेंगी। इस प्रकार बच्चों को शिरायें आसानी से दिखाई जा सकती हैं।



धमनियां दिखाने की गतिविधिबच्चों को बतायें कि धमनियों में क्योंकि रक्त सीधे हृदय से आता है इसलिये धमनियां हृदय की धड़कन के साथ फूलती-पिचकती रहती हैं। इसे धमनी पर अपना हाथ रखकर महसूस किया जा सकता है। धमनियों के इस प्रकार फूलने-पिचकने को नब्ज़ कहते हैं। जो धमनियां शरीर के बाहरी भाग में हैं उनकी नब्ज़ आसानी से महसूस की जा सकती है। आम तौर पर कलाई पर नब्ज़ महसूस की जाती है। इसके अतिरिक्त अनेक अन्य स्थानों पर जैसे गर्दन पर, बगल में, कान के पीछे आदि स्थानों पर नब्ज महसूस की जा सकती है। बच्चों को एक दूसरे की नब्ज़ देखना (महूसस करना) सिखायें। यह भी बतायें कि डाक्टर नब्ज़ की सहायता से अनेक रोगों की पहचान भी कर लेते हैं। जिन स्थानों पर नब्ज़ आसानी से देखी जा सकती है, उन्हें नीचे दिये चित्र में दिखाया गया है।



हृदय की ध्वनियां सुनने की गतिविधि‍ दो कीप लें और उन्हें एक प्लास्टिक की नली से आपस में जोड़ दें। अब एक कीप को एक बच्चे की छाती पर हृदय के ऊपर रखें और दूसरी कीप को दूसरे बच्चों के कान में लगाकर हृदय की ध्वनियां सुनायें।



बच्चों को बतायें कि इस प्रकार हृदय की ध्वनियां सुनने के लिये एक अधिक संवेदनशील यंत्र बनाया गया है जिसे स्टेथेस्कोप कहते हैं। डाक्टर इस यंत्र से मरीज के हृदय की ध्वनियां सुनकर रोगों की पहचान करते हैं। संभव हो तो कक्षा में स्टेथेस्कोप लाकर भी दिखायें।


हृदय के पंप के रूप में कार्य करने को दर्शाने का प्रयोग एक प्लाास्टिक अथवा कांच का जार लें। जार को पानी से तीन-चौथाई भर लें। एक गुब्बारे को काटकर इस जार के मुह पर एयरटाइट कर के अच्छी तरह खींचकर बांध दें। अब 2 स्ट्रा इस गुब्बारे में से जार में इस प्रकार डालें कि वह एयरटाइट बना रहे। अब गुब्बारे को दबाने पर स्ट्रा से पानी बाहर निकालता है। इससे यह सिध्द हुआ कि यदि इसी प्रकार हृदय को दबाया जाये तो रक्त भी धमनियों में आगे को बढ़ेगा। हृदय के धड़कने से इसी प्रकार रक्त का संचरण होता है।


श्वसन तंत्र बच्चों को बतायें कि सभी जीवों की भांति हमें भी सांस लेने की आवश्यककता होती है। इसे लिये हम अपनी नाक अथवा मुंह से हवा अंदर लेते हैं। यह हवा हमारे फेफड़ों में जाती है जो हवा से आक्सीजन सोख लेते हैं और शरीर में बनी हुई कार्बन-डाई-आक्साइड को हवा में छोड़ देते हैं। अब यह कार्बन-डाई-आक्साइड मिली हवा हमारी नाक से बाहर निकल जाती है। इस क्रिया को श्वसन अथवा सांस लेना कहा जाता है। फेफड़ों में मौजूद रक्त में आक्सीजन घुल जाती है और यह रक्त परिसंचरण तंत्र व्दारा आक्सीजन को सभी अंगों तक ले जाता है। इसी प्रकार सभी अंगों में बनी कार्बन-डाई-आक्साीइड गैस रक्त के माध्य्म से फेफड़ों तक आती है और फिर सांस के व्दारा बाहर चली जाती है। हमारी सांस से निकली हुई हवा में कार्बन-डाई-आक्साइड गैस होती है यह सिध्द करने के लिये हम बच्चों से नली व्दारा चूने के पानी में फूंकने की गतिविधि करके दिखा सकते हैं कि इससे चूने का पानी दूधिया हो जाता है।


फेफडों का माडल बच्चों को बतायें कि हमारी छाती और पेट के बीच एक झिल्ली होती है जिसे डायफ्राम कहते हैं।


एक प्लास्टिक का जार लेकर उसकी तली को काट दें और उसकी तली के स्थान पर एक गुब्बारे को काटकर कसकर और खींचकर एक झिल्ली की भांति बांध दें। अब एक नली के एक अंत पर एक गुब्बारा बांध दें। अब जार के मुंह को एक कार्क से बंद कर दें और इस नली को इस कार्क में से इस प्रकार जार में डालें कि वह एयरटाइट रहे। अब यदि आप गुब्बारे से बनी झिल्ली को नीचे की ओर खीचेंगे तो नली में बंधे हुए गुब्बारे में हवा भर जायेगी और वह फूल जायेगा। झिल्ली को छोड़ देने पर वह वापस अपने स्थान पर आ जायेगी और गुब्बारे से हवा बाहर निकलने के कारण गुब्बारा पिचक जायेगा। बच्चों को बताइये कि इसी प्रकार डायफ्राम के ऊपर नीचे होने से फेफड़ों में हवा भरती और निकलती है।


कीपों से बनाये गये स्टेथेस्कोेप से हम बच्चों को श्वहसन की ध्वनियां भी सुना सकते हैं। बच्‍चों को बताइये कि डाक्टर स्टेथेस्कोप से श्वसन की ध्वनियां सुनकर फेफड़ों की बीमारियो का पता लगा लेते हैं।


उत्सर्जन तंत्रबच्चों को उत्सर्जन तंत्र का चित्र बोर्ड पर बना कर दिखायें। इसका माडल भी बच्चों से बनवा सकते हैं।



बच्चों को बतायें कि हमारी किडनी या वृक्क एक छन्नी की भांति काम करती है जिससे शरीर के हानिकारक पदार्थ निकल जाते हैं। इसके लिये एक आसान प्रयोग किया जा सकता है। 2 प्लास्टिक की बोतलें लेकर उनकी तली को काट दें और उनमे रुई भर दें। अब इनके मुंह को ढक्कन से बंद कर दें। इसके बाद ढक्कन में छेद करके उसमें से एक प्लास्टिक की नली या स्ट्रा डालें और प्लास्टिसिन से अच्छी तरह सील कर दें। अब एक गुब्बारे में छेद करके दोनो नलियों को गुब्बारे के अंदर अच्छी तरह से बांध दें। गुब्बारे के मुंह को उंगलियों से दबाकर बंद रखें। बोतल में रुई के ऊपर पानी डालें। यह पानी नलियों में से होकर गुब्बाारे में भरता जायेगा और गुब्बाारा फूल जायेगा। बच्चों को बतायें कि इसी प्रकार किडनी से पेशाब, हमारी पेशाब थैली में भरती जाती है और जब पेशाब थैली भर कर फूल जाती है तो हमें पेशाब करने की इच्छा होती है। अब गुब्बारे के मुंह को खोल दें। पानी बाहर निकल जायेगा। अब आप पानी में कोई अघुलनशील पदार्थ डालकर पानी बोतल में डालें। यह पदार्थ रुई से छन जायेगा और केवल पानी ही बाहर आयेगा। हमारी किडनी भी इसी प्रकार छन्नी का काम करती है। इसे इस वीडियो में भी देखें –



तंत्रिका तंत्र और संवेदी अंग बच्चों को बतायें कि हमारा मस्तिष्क तंत्रिकाओं और संवेदी अंगों के माध्य‍म से संवेद ग्रहण करता है। तंत्रिका तंत्र का चित्र बच्चों को दिखायें –



बच्चों को आंख, कान, नाक, जीभ, और त्वचा के संबंध में बतायें और समझायें कि किस प्रकार ये संवेद ग्रहण करके तंत्रिकाओं के माध्यम से मस्तिष्क को भेजते हैं। इसी प्रकार मस्तिष्क तंत्रिकाओं के व्दारा मांसपेशियों को संदेश भेजता है जिससे हम अपनी इच्छा से चल फिर सकते हैं।


प्रजनन तंत्र बच्चों को बतायें कि जिस प्रकार पौधे प्रजनन करते हैं और बीज व्दारा नये पौधे उत्पनन्न होते हैं उसी प्रकार जंतु भी प्रजनन करते हैं। कुछ जंतु जैसे मुर्गियां अंडे देती है जिससे नये जंतु उत्पन्न‍ होते हैं और कुछ सीधे बच्चों को जन्म देते हैं। प्रजनन का कार्य प्रजनन तंत्र से होता है। नर और मादा के अलग-अलग प्रजनन अंग होते हैं।

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